गणतंत्र एक शब्द है जिसका आशय लिया जाये तो मनुष्यों के एक ऐसे समूह का दृश्य सामने आता है जो उनको नियमबद्ध होकर चलने के लिये प्रेरित करता है। न चलने पर वह उनको दंड देने का अधिकार भी वही रखता है। इसी गणतंत्र को लोकतंत्र भी कहा जाता है। आधुनिक लोकतंत्र में लोगों पर शासन उनके चुने हुए प्रतिनिधि ही करते हैं। पहले राजशाही प्रचलन में थी। उस समय राजा के व्यक्तिगत रूप से बेहतर होने या न होने का परिणाम और दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता था। विश्व इतिहास में ऐसे अनेक राजा महाराज हुए जिन्होंने बेहतर होने की वजह से देवत्व का दर्जा पाया तो अनेक ऐसे भी हुए जिनकी तुलना राक्षसों से की जाती है। कुछ सामान्य राजा भी हुए। आधुनिक लेाकतंत्र का जनक ब्रिटेन माना जाता है यह अलग बात है कि वहां प्रतीक रूप से राजशाही आज भी बरकरार है।
मूल बात यह है कि हम गणतंत्र में मनुष्य समुदाय पर एक नियमबद्ध संस्था शासन के रूप में रखते हैं। विश्व के जीवों में एक मनुष्य ही ऐसा है जिसे राज्य व्यवस्था की आवश्यकता है। इसकी वजह साफ है कि सबसे अधिक बुद्धिमान होने के कारण उसके ही अनियंत्रित होने की संभावना भी अधिक रहती है। माना जाता है कि राज्य ही मनुष्य का नियंता है जिसके बिना वह पशु की तरह व्यवहार कर सकता है। राज्य करना मनुष्य की प्रवृत्ति भी है। उसमें अहंकार का भाव विद्यमान रहता है। सभी मनुष्य एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखना चाहते हैं और राज्य व्यवस्था के प्रमुख होने पर उनको यह सुखद अनुभूति स्वतः प्राप्त होती है। जिन लोगों को प्रमुख पद नहीं मिलता वह छोटे पद पर बैठकर बाकी छोटे लोगों को अपने दंड से शासित करते है। इस तरह यह क्रम नीचे तक चला आता है। वहां तक जहां से आम इंसान की पंक्ति प्रारंभ होती है। इस पंक्ति के ऊपर बैठा हर शख्स अपने श्रेष्ठ होने की अनुभूति से प्रसन्न है पर साथ ही अपने से ऊपर बैठे आदमी की श्रेष्ठता पाने का सपना भी उसमें रहता है। इस तरह यह चक्र चलता है। जो राज्य व्यवस्था से नहीं जुड़े वह भी कहीं न कहीं अपनी श्रेष्ठता दिखाने के व्यसन में लिप्त हैं।
राज्य कर्म अंततः राजस भाव की उपज है। उसमें सात्विकता बस इतनी ही हो सकती है जितना आटे में नमक! इससे अधिक की अपेक्षा अज्ञान का प्रमाण है। राज्य कर्म में ईमानदारी एक शर्त है पर उसे न मानना भी एक कूटनीति है। प्रजा हित आवश्यक है पर अपनी सत्ता बने रहने की शर्त उसमें जोड़ना आवश्यक है। अकुशल राज्य प्रबंधकों के के लिये ईमानदारी और प्रजा हित अंततः गौण हो जाते हैं। राज्य कर्म में एक सीमा तक ही सत्य भाषण, धर्म के प्रति निष्ठा और दयाभाव दिखाया जा सकता है। छल, कपट, प्रपंच तथा क्रूर प्रदर्शन राज्य कर्म करने वालों की शक्ति का प्रमाण बनता है। वह ऐसा न करें तो उनको सम्मान नहीं मिल सकता। न्याय के सिद्धांत सुविधानुसार चाहे जब बदले जा सकते हैं।
सभी राजस कर्म करने वाले असात्विक हैं यह मानना ठीक नहीं है पर इतना तय है कि उनमें एक बहुत वर्ग ऐसे लोगों का रहता है जो अपने लाभ के लिये इसमें लिप्त होते हैं जिसे राजस भाव माना जाता है। आज के समय में तो राजनीति एक व्यवसाय बन गया है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे बुद्धिमान लोग उसमें सत्य, अहिंसा तथा दया के भाव ढूंढना चाहते है।
विश्व में अधिकतर लोग चाहते हैं कि उन्हें राजसुख न मिल पाये तो उनकी संतान को प्राप्त हो। राजसुख क्या है? यह सभी जानते हैं। दूसरे पर हमारा नियम चले पर हम पर कोई नियम बंधन न हो! लोग हमारी माने पर हम किसी की न सुने। किसी में हमारी आलोचना की हिम्मत न हो। बस हमारी पूजा भगवान की तरह हो। इसी भाव ने राज्य व्यवस्था को महत्वपूर्ण बना दिया है।
राज्य संकट पड़ने पर प्रजा की मदद करता है। गणतंत्र का मूल सिद्धांत है पर यह एक तरह का भ्रम भी है। प्रजा कोई इकाई नहीं बल्कि कई मनुष्य इकाईयेां का समूह है। मनुष्य अपने कर्म के अनुसार फल भोगता है। वह इंद्रियों से जैसे दृश्य चक्षुओं से, सुर कर्णों से, भोजन मुख से तथा सुगंध नासिका से ग्रहण करने के साथ ही अपने हाथ से जिन वस्तुओं का स्पर्श करता है वैसी ही अभिव्यक्ति उसकी इन्हीं इद्रियों से प्रकट होती है। विषैले विषयों से संपर्क करने वालों से अमृतमय व्यवहार की अपेक्षा केवल अपने दिल को दिलासा देने के लिये ही है। मनुष्य को अपना जीवन संघर्ष अकेले ही करना है। ऐसे में वह अपने साथ गणसमूह और उसके तंत्र के साथ होने का भ्रम पाल सकता है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है।
उससे बड़ा भ्रम तो यह है कि गणतंत्र हम चला रहे हैं। धन, पद और अर्थ के शिखर पुरुषों का समूह गणतंत्र को अपने अनुसार प्रभावितकरते हैं जबकि आम इंसान केवल शासित है। वह इस गणतंत्र का प्रयोक्ता है न कि स्वामी। स्वामित्व का भ्रम है जिसमें जिंदा रहना भी आवश्यक है। अगर आदमी को अकेले होने के सत्य का अहसास हो तो वह कभी इस भ्रामक गणतंत्र की संगत न करे। जिनको पता है वह सात्विक भाव से रहते हैं क्योंकि जानते हैं कि सहनशीलता, सरलता और कर्तव्यनिष्ठ से ही वह अपना जीवन संवार सकते हैं। जिनको नहीं है वह आक्रामक ढंग से अभिव्यक्त होते है। वह अनावश्यक रूप से बहसें करते है। वाद विवाद करते हैं। निरर्थक संवादों से गणतंत्र को स्वयं से संचालित होने का यह भ्रम हम अनेक लोगों में देख सकते है।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior
writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior
जनवरी 25, 2012 – 2:45 अपराह्न
Categories: हिन्दी
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फेसबुक पर आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी सक्रिय हैं पर उनमें अधिकतर लेखक नहीं है इसलिये हिन्दी साहित्य की परंपराओं के ज्ञान का उनमें अभाव है। ऐसे में नयी पीढ़ी के लोगों से यह अपेक्षा तो करना कठिन है कि वह उन्हें समझ सकें खासतौर से जब वह स्वरचनाकर्म से अधिक कट पेस्ट यानि किसी का पाठ उठाकर अपने पृष्ठ पर रखने के आदी हों। हमारे प्रचार माध्यमों ने तो नयी पीढ़ी में यह बात स्थापित कर दी है कि ब्लॉग, ट्विटर या फेसबुक पर केवल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, फिल्म, टीवी तथा कला क्षेत्र के शिखर पुरुष ही लिखते हैं और उनकी ही परवाह करना चाहिए। आम लेखक तो फोकटिया हैं और उनकी कोई बात सम्मानीय या पठनीय नहीं है।
यही कारण कि फेसबुक तथा ब्लॉग पर जब हमने अपनी रचनायें बिना नाम के देखीं तो वहां प्रतिकूल टिप्पणियां लिखीं। ऐसा लगता है कि बजाय प्रतिकूल टिप्पणियां करने के साथ उनको यह बात समझाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में साभार रचनायें लेने की परंपरा है। उसमें लेखक का नाम अवश्य दिया जाता है। जिन टीवी चैनलों के पास किसी खास समाचार का दृश्यव्य प्रसारण नहीं है वह दूसरे से साभार लेते हैं। हालांकि यह उदाहरण समझाने के लिये पर्याप्त या उचित नहीं है। हिन्दी टीवी चैनल साभार प्रसारण लेते हैं पर वह या तो विदेशी चैनल का या फिर देश का अंग्रेजी चैनल हो। मतलब यह कि हिन्दी वाले की हिन्दी से सोतिया डाह तो रहती ही है। यह बात इंटरनेट पर भी दिखाई देती है जब चोरी के पाठ प्रकाशित होते दिखते हैं।
बहरहाल फेसबुक पर एक वेबसाईट संचालिका ने हमसे अपने पाठ प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो हमने उसे सहर्ष नाम प्रकाशित करने की शर्त पर दी। उसने ऐसा किया भी! उसकी इस क्रिया पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। दरअसल उसने भ्रष्टाचार पर उस कविता को ही लिया जो कि हमारी इस विषय पर लिखी गयी सबसे हिट कविता है। इसी कविता ने एक नहीं दो ब्लॉग को हिट बना रखा है। हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि केवल ब्लॉग को नियमित या अपडेट बनाये रखने के लिये लिखी गयीं कविताओं ने अधिक पाठक जुटायें हैं बनिस्बत उन बड़े लेखों के जो बड़े मनोयोग से लिखे गये। इसका कारण यह भी है कि नयी पीढ़ी के युवा ज्यादा समय खराब करने के थोड़े समय में अधिक पढ़ना चाहता है। वह कहानी भी कविता में पढ़ना चाहता है। अगर विषय गंभीर हो तो एक लघु कथा लिखने से काम चल सकता है पर हास्य हो तो कविता ही ठीक जमती है।
हमें इंटरनेट पर सक्रियता से जहां खुशी मिली वहीं इस बात का दुःख भी होने लगा है कि नयी पीढ़ी भाषा के लिहाज से तोतली हो रही है। रोमन लिपि में अंग्रेजी और हिन्दी का मिश्रण प्रसन्नता नहीं दे सकता। हैरानी की बात है कि हिन्दी टूलों की उपलब्धता के चलते यह हो रहा है। खासतौर से जब यह जीमेल पर ही उपलब्ध हो और प्रयोक्ता उसके उपयोग में असमर्थ हों। लड़के लड़कियां अगर यह सोच रहे हैं कि वह अभिव्यक्त होकर कोई बड़ा नाम करेंगे तो वह गलतफहमी में हैं। फेसबुक पर लिखने के बाद प्रतिक्रियायें मिल जाती हैं पर कालांतर में वह भी बोरियत लगने लगेगी। फेसबुक पर तो यह आशा करना ही बेकार है कि कोई अपने अभिव्यक्त होने की लंबी पारी खेल सकता है। इससे अच्छा तो यह है कि ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर ब्लॉग लिखकर प्रयास करना श्रेयस्कर है। फेसबुक में केवल अपने समूहों से जुड़े हुए लोग ही साथी होते हैं जबकि ब्लॉग एक सार्वजनिक पत्रिका की तरह उपयोग में लाये जा सकते हैं। जिन युवक युवतियों में मन में हिन्दी लिखने का आनंद प्राप्त करने की इच्छा है वह फेसबुक के साथ ही ब्लॉग जरूर बनायें। कुछ समय तक उनको टिप्पणियां मिलेंगी पर बाद में बंद हो जायेंगी मगर सर्च इंजिनों में वह हमेशा जीवंत बना रहेगा। ऐसे में अगर केवल अपने अंदर बैठे लेखक को जिंदा रखने के लिये एकांत यात्रा करनी होगी। हालांकि ब्लॉग पर फेसबुक की तरह लिखना अधिक परिणामदायक नहीं रहेगा ऐसे में हिन्दी टूलों के साथ प्रभावी हिन्दी का भी ज्ञान रखना होगा। वह केवल पुराने लेखकों की रचनाओं से मिल सकता है। नये लेखकों ने तो अंग्रेजी का मिश्रण करना प्रारंभ कर दिया है।
फेसबुक पर पिछले एक दो महीने से हम अधिक सक्रिय रहे हैं। वहां अपने ब्लॉग के लिंक देखने अक्सर जाना होता है। अनेक महानुभावों ने संपर्क किया है। उनसे चैट में भाषा का तोतलापन अखरता है। हम आपसी संवाद पर अपने साथियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहे पर इतना तय है कि यह रोमन लिपि में लिखना या पढ़ना हमको तोतलापन लगता है। चूंकि लेखक हमेशा भावुक होता है इसलिये हमारे लिये वार्तालाप के समय टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। यह सही है कि ऐसे संवाद के समय शीघ्रता होती है इसलिये कही दूसरी जगह से कट पेस्ट करने में देरी करना अच्छा नहीं लगता है पर अभ्यास हो जाये तो कुछ भी असहज नहीं है। हिन्दी तो फिर भी सरलता से लिखी जाती है पर चीनी लिखने में कठिन है मगर फिर भी चीन के नागरिक उसमें लिखते हुए संकोच नहीं करते। हमारा उद्देश्य आक्षेप करना नहीं बल्कि नयी पीढ़ी के लोगों को यह समझाना है कि भाषा की कमी उनकी अभिव्यक्ति को कमजोर बनाने के साथ विचार को क्षणिक आवेग के रूप में प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात आत्मीयता का वैसा संबंध वह कभी नहीं बना सकती जैसे कि हमारे अपने साथ ब्लॉग लेखकों के साथ प्रभावी हिन्दी के कारण बने।
जनवरी 20, 2012 – 4:24 अपराह्न
Categories: हिन्दी
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विद्यालय के संचालक ने प्राचार्य को बुलाकर कहा कि-‘‘देखो मैंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया है। तुम अपने साथ शिक्षकों को मेरे साथ रैली में भाग लेने के लिये तैयार रहने के लिये कहो। विद्यालय के छात्रों के लिये देश में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के संबंध में विशेष ज्ञान देने का प्रबंध करो। मैं चाहता हूं कि मेरे साथ मेरे विद्यालय का नाम भी प्रचार के शीर्ष पर पहुंचे।’’
प्राचार्य ने कहा-‘‘महाशय, आपका आदेश सिर अंाखों पर! मगर इसी अंादोलन की वजह से हमारे विद्यालय के शिक्षक अब जागरुक हो गये हैं। आप जितने वेतन की रसीद पर हस्ताक्षर करते हो उसका चौथाई ही केवल भुगतान करते हैं। वह चाहते हैं कि कम से कम आधी रकम तो दें। विद्यार्थियों के पालक भी तयशुदा फीस से अलग चंदा या दान देकर नाराज होते हैं। ऐसे में आप स्वयं भले ही इस आंदोलन में सक्रियता दिखायें पर विद्यालय की सक्रियता पर विचार न करें, संभव है यह बातें आपके विरुद्ध प्रचार का कारण बने।’’
संचालक ने कहा-‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, यह भ्रष्टाचार है! कतई नहीं, यह तो मेरा निजी प्रबंधन है। हम तो केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं!’’
प्राचार्य ने कहा-‘हमारे पास कुछ मदों मे सरकारी पैसा भी आता है।’’
संचालक ने कहा-‘‘वह मेरा निजी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि तुम देश का भ्रष्टाचार रोकने की बजाय उसकी आड़ में तुम मेरे साथ दाव खेलना चाहते हो! तुम मेरा आदेश मानो अन्यथा अपनी नौकरी खोने के लिये तैयार हो जाओ।’’
आखिर प्राचार्य ने कहा-‘‘आपका आदेश मानने पर मुझे क्या एतराज हो सकता है? पर संभव है कि छात्रों के पालक अपने बच्चों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध तिरस्कार का भाव देखकर नाराज हो जायें। आप तो जानते हैं कि अधिकतर माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर बड़े पद पर पहुंचे। बड़ा पद भी वह जो मलाईदार हो। ऐसे में अगर उसकी निष्ठा कहीं ईमानदारी से हो गयी तो संभव है वह अधिक पैसा न कमा पाये। भला कौन माता पिता चाहेगा कि उसका बेटा मलाई वाली जगह पर बैठकर माल न कमाये। सभी चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार खत्म हो पर उनके घर में ईमानदार पैदा हो यह कोई नहंीं चाहता। कहंी ऐसा न हो कि हमारे इस प्रयास पर पालक नाराज न होकर अपने बच्चों को दूसरे स्कूल पर भेजना शुरु करें और आपकी प्रसिद्धि ही विद्यालय की बदनामी बन जाये।’’
संचालक कुछ देर खामोश रहा और फिर बोला-‘‘तुम क्या चाहते हो मैं भी वहां न जाऊं?’
प्राचार्य ने कहा-‘‘आप जाईये, पर अपने स्कूल का परिचय न दें। आप सारे देश में ईमानदारी लाने की बात अवश्य करें पर उसे अपने विद्यालय से दूर रखें।’’
संचालक खुश हो गया। प्राचार्य बाहर आया तो एक अन्य शिक्षक जिसने दूसरे कमरे में यह वार्तालाप सुना था उससे कहा-‘‘आपने मना किया तो अच्छा लगा। बेकार में हमारे हिस्से एक ऐसा काम आ जाता जिसमें हमें कुछ नहीं मिलता। यह संचालक वैसे ही छात्रों से फीस जमकर वसूल करता है पर हम शिक्षकों को देने के नाम पर इसकी हवा निकल जाती है। वैसे आपके दिमाग में ऐसा बोलने का विचार कैसे आया?’’
प्राचार्य ने कहा-‘‘अपनी जरूरतें जब पूरी न हों तो ईमानदारी की बात करना भी जहर जैसा लगता है। वैसे फोकट में भ्रष्टाचार का विरोध करना मैं भी ठीक नहीं समझता। खासतौर से जब इस आंदोलन को चलाने वाले घोषित रूप से चंदा लेने वाले हों। हमें अगर कोई पैसा दे तो एक बार क्या अनेक बार ऐसे आंदोलन में जाते। फोकट में टांगें तोड़ना या भाषण देना तो तब और भी मुश्किल हो जब हमें यही अपनी मेहनत का पैसा कम मिलता है।’’
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जनवरी 9, 2012 – 3:22 अपराह्न
Categories: हिन्दी
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आजकल बाज़ार का प्रभाव धर्म तथा समाज के विषयों में बहुत अधिक हो गया है। उपभोग संस्कृति ने लोगों के अंदर अध्यात्म ज्ञान के प्रति विरक्ति पैदा की है जिसके कारण उनके पास सामान्य व्यवहारिक ज्ञान भी नहीं रहा है। लोगों के अंदर पैसा पाने का मोह इतना अधिक हो गया है कि दूसरों की बातों में आकर अपना कमाया भी सब कुछ गंवा बैठते हैं। हमने ऐसे अनेक समाचार सुने और देखे होंगे कि लोगों को अतिशीघ्र अपने धन का दोगुना या चार गुना देकर उनसे भारी रकम की ठगी की गयी। अनेक कंपनियों ने तो शहर में एक नहंी बल्कि चार पांच सौ लोगों को चूना सामूहिक रूप से चूना लगा लिया। यह समाज में अपराध बढ़ने की प्रवृत्ति का परिचायक है पर साथ ही आम जनमानस में बौद्धिक सोच के अभाव का प्रमाण भी है। इस तरह की घटनायें चिंताजनक हैं। दो चार व्यक्ति हों तो ठीक पर यहां तो हजारों के हजारों एक साथ ठगे जाते हैं।
ठगी करने वाले लोग अपनी मीठी बातों के साथ ही आकर्षण प्रलोभन भी देते हैं। कहीं तो आरंभ में ही उपहार भी दे दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर इतने सारे लोग कैसे जाल में फंस जाते हैं। इसमें फंसने वाले लोग ग्रामीण या अशिक्षित पृष्ठभूमि वाले नहीं वरन् पढ़े लिखे और नौकरीशुदा लोग ही होते हैं। इस तरह आधुनिक शिक्षा को लेकर भी संशय पैदा होता है।
महाकवि तुलसी दास जी कहते हैं कि
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‘तुलसी’ खल बानी मधुर, मुनि समुझिअं हियं हेरि।
राम राज बाधक भई, मूढ़ मंथरा चेरि।।
‘‘कभी किसी की मधुर वाणी सुनकर उस पर मोहित नहीं होना चाहिए। दासी मंथरा ने कैकयी को मधुर वाणी में समझाकार भगवान श्री राम के राज्याभिषेक में बाधा डाली थी।’’
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हमारे देश के ग्रामीण तथा अशिक्षित लोग कथित आधुनिक समाज से अधिक चतुर हैं। वह भी ठगे अवश्य जाते हैं पर सामूहिक रूप से उनको कोई चूना नहीं लगा सकता। ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे रहकर आधुनिक समाज कहीं बौद्धिक क्षमता खो तो नहीं बैठा है?
जनवरी 7, 2012 – 4:38 पूर्वाह्न
Categories: हिन्दी
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अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन तथा जेलभरो आंदोलन फिलहाल स्थगित कर अच्छा ही किया। जब हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करते हैं तो उसके राजनीतिक पक्ष की चर्चा अधिक होती है और सामाजिक पक्ष पीछे रह जाता है। हमने जब भी इस पर लिखा है सामाजिक पक्ष को अधिक छूने का प्रयास किया है। एक बात के लिये यह आंदोलन हमेशा याद रखा जायेगा कि इसने संपूर्ण देश के समस्त समाजों के सभी लोगों को चिंत्तन और मनन के विवश किया। मूल प्रश्न भ्रष्टाचार से जुड़ा होने के बावजूद ऐसे अनेक विषय हैं-जिनका संबंध कहीं न कहीं उससे है-जिन पर चर्चा हुई। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आमतौर से सरकारी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की बात होती है पर उद्योग, व्यापार, कला, तथा धर्म के क्षेत्र के कदाचार छिप जाता है। संभव है हम जैसे चिंतकों के इस मत से कम ही लोग सहमत होंगे कि हमारे समाज का यह सामान्य दृष्टिकोण ही ऐसे भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार हैं जिसमें धन को सर्वाधिक महिमामय माना जाता है। सिद्धांतों की बात करना सभी को अच्छी लगती है पर जहां धन का मामला आये वहां सभी की आंख बंद हो जाती है।
अपने आंदोलन के अकेले शीर्षक अन्ना साहेब हैं पर उनके विस्तार में अनेक प्रश्न चिन्ह थे। किसी पाठ में फड़कते शीर्षक के साथ बहुत सारे शब्द होते हैं जिनमें विषय से जुड़े सार का सार्थक होना आवश्यक है। इसके अभाव में शीर्षक एक नारा होकर रह जाता है। हम जैसे गीता साधकों के लिये यह आंदोलन अध्ययन और अनुसंधान के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान हमने केवल अन्ना के वाक्यों के साथ ही उनकी पर्दे पर दिख रही गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखा। अन्ना के बारे में दूसरे लोग और दूसरे लोगों के बारे मे अन्ना क्या कह रहे हैं इसमें हमने दिलचस्पी नहीं रखी बल्कि अन्ना अपने इस आंदोलन से इस समाज के लिये क्या नया ढूंढ रहे हैं यह प्रश्न हमेशा हमारे लिये महत्वपूर्ण रहा है। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा रही और हमारा मानना है कि ज्ञानी और ध्यानी अनशन जैसी हल्की गतिविधि से तब तक दूर रहें जब तक यह आवश्यक न हो। आंदोलनों और अभियानों का शांतितिपूर्ण प्रदर्शन करना ठीक है पर अनशन जैसी गतिविधि विचलित कर देती है।
अन्ना ने जब अपना अनशन स्थगित किया तो प्रचार माध्यम उनका मखौल उड़ा रहे हैं। इन्हीं प्रचार माध्यमों ने उनके इसी आंदोलन पर अपने विज्ञापनों का समय पास कर कमाई की। टीवी चैनलों को इतने सारे दर्शक मिले होंगे कि वह कल्पनातीत होगा। हमारा मानना तो यह है कि यह आंदोलन ही आम जनमानस को भरमाने के लिये आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का एक योजनाबद्ध प्रयास था। टीवी चैनलों में शामिल हुए जिन बुद्धिजीवियों ने उनके मुंबई में कम भीड़ होने की जो बात कही है वह इसी का ही परिणाम है। लोकपाल या जनलोकपाल से इतर बहस इस पर चल रही है कि क्या अन्ना साहेब का जादू खत्म हो गया है। तो क्या यह जादू चल रहा था?
अन्ना मूलतः अकेले थे पर उनके पीछे अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन आये जिनके अपने अपने लक्ष्य थे। जनलोकपाल उनका नारा था जो संसद में लोकपाल का बिल पास होते ही फ्लाप हो गया। अन्ना के अनेक साथियों को लगा कि उनका नारा अब चलने वाला नहीं है। यकीनन अन्ना ने यह सब देखा होगा। अन्ना ने बहुत कुछ कहा पर हमें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं भी कहा। उनके सामने अनेक ऐसे सत्य अदृश्य रूप में प्रकट हुए होंगे जिनको देखकर वह आश्चर्यचकित हुए होंगे। वह उनको देखते होंगे पर उनका बयान करना उनके लिये कठिन रहा होगा। वह ऐसे सात्विक पुरुष हैं जो राजस पुरुषो के क्षेत्र में घुसकर उनको त्रास देता है। अभी तक उन्होंने राजस पुरुषों से जो द्वंद्व किया था उसमें भी उनके विरोधी राजस पुरुषों की सहायता लेते रहे होंगे। एक को परास्त किया तो दूसरा विजेता बना होगा। इस बार वह राजस पुरुषों के विशाल समूह से लोह लेने निकले थे और धीरे धीरे उनके इर्दगिर्द अपने राजसी वृत्ति के लोगों का आंकड़ा कम होता जा रहा था। राजस पुरुष पराक्रमी होते हैं जबकि सात्विक पुरुषों को पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। यदि राजस पुरुषों के विशाल समूह से सामना करना हो तो पहले अपने पराक्रम का भी परीक्षण करना चाहिए। अन्ना ने यह बात अब जाकर अनुभव की होगी। हम नहीं मानते कि अन्ना हारकर बैठ जायेंगे। दूसरी बात यह भी लगती है कि वह अपने वर्तमान राजस पुरुषों के साथ लेकर अपना अभियान चलने वाले भी नहीं है।
हम जब अन्ना हजारे के अभियान से राजनीतिक पक्ष से हटकर उसका सामाजिक पक्ष देखते हैं तो लगता है कि अन्ना हजारे की त्यागी छवि जनमानस में है। इसलिये भविष्य में उनको समर्थन नहीं मिलेगा यह सोचना बेकार है। मुश्किल यह है कि अन्ना हजारे को बौद्धिक वर्ग का समर्थन अधिक नहीं मिला। इसका कारण यह है कि इस देश ने कई आंदोलन और उसके परिणाम देखे हैं जिससे निराशावादी दृष्टिकोण उभरता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े स्वयं सेवी और उनके संगठनों की निष्ठा को लेकर लोगों के मन में अनेक संदेह थे। देश के बौद्धिक समाज से जुड़े अनेक लोगों के लिये वह किसी भी दृष्टि से स्वयंसेवक नहीं थे। समाज सेवा में उनकी भूमिका धनपतियों और आमजनमानस के बीच उनकी भूमिका मध्यस्थ की थी। वैसे हमारा मानना है कि अन्ना को अपना अभियान राजनीति से जुड़े विषय से हटकर समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भेदभाव मिटाने के लिये प्रारंभ करना चाहिए। हालांकि यह कहना कठिन है कि इसके लिये उनको प्रायोजक मिलेगा या नहीं। एक बात तय रही कि बिना प्रायोजन के ऐसे आंदोलन चल नहीं सकते।
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दिसम्बर 30, 2011 – 3:21 अपराह्न
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समाचार तो यह है कि श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने के लिये रूस के एक शहर में की अदालत में याचिका दायर की गयी है। यहां इस समाचार को लेकर गीता के विषय में संशय उठ रहे हैं। जिस तरह भगवान श्रीराम के विभिन्न रूप हैं उसी तरह श्रीगीता ने भी अपने भक्तों के अनुरूप धारण कर लिये हैं। भगवान श्रीराम के स्वरूप का प्रश्न है तो अनेक प्रचलित हैं-बाल्मीकी के राम, दशरथ पुत्र राम, कौशल्या के राम, तुलसी के राम-उनमें सबसे श्रेष्ठ रूप माना गया है घट घट में बसे राम! महाभारत युद्ध के समय श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को जो तत्वज्ञान दिया था वह श्रीमद्भागतगीता के रूप में स्मरण किया जाता है। मूलतः यह वेदव्यास रचित महाभारत ग्रंथ का एक महत्वपूर्ण भाग है। अगर कहें अगर श्रीमद्भागत गीता वाला अंश नहीं होता तो शायद ही कोई महाभारत काल को याद करता। यह भी संभव है कि अगर यह अंश न होता तो भगवान श्रीकृष्ण ने भी वह प्रतिष्ठा अर्जित नहीं की होती जो आज तक अक्षुण्ण बनी हुई है। हम इससे भी आगे जाकर यह कहें कि आज हमारे देश की विश्व में अध्यात्म गुरु की जो छवि है वह श्रीमद्भागवत गीता के कारण ही है तो गलत न होगा। गीता के तत्वज्ञान के रूप में कोई बदलाव नहीं आया पर जिन भगवत्भक्तों ने इसकी साधना से कृपा पायी उन्होंने अपना जीवन इसके प्रचार में इस सीमा तक समर्पित कर दिया कि उनके शब्दों के संचय समूह भी गीतातुल्य सम्मानीय बन गये। उनके साथ उन महापुरुषों के नाम भी जुड़े। ऐसे में अनेक महापुरुषों के नाम से गीता का नाम जुड़ा है। उन महापुरुषों के शब्द संचय समूहों में श्रीमद्भागवत गीता शीर्षक सर्वोपरि है पर उपशीर्षक में कहीं न कहीं उनके स्वयं या आश्रम के नाम जुड़े हुए हैं। नहीं भी जुड़े हैं तो प्रतीक चिन्ह उनकी प्रथक गीता होने की पहचान देते हैं।
दस बरस पूर्व जब हमें योगसाधक के रूप में ज्ञान पाने की जिज्ञासा जागी तो हमने गोरखपुर प्रेस की अपने घर में रखी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन प्रारंभ किया। उसमें हर पाठ के साथ उसके अध्ययन की महत्ता तथा पुण्य का प्रभाव भी प्रकाशित था। हम तो श्रद्धा के साथ पढ़ते थे। एक दिन हमें एक ब्राह्मण मित्र मिला। वह हमारी तरह ही साहित्यक रुचि वाला है। अध्यात्म में उसकी रुचि शायद इतनी नहंी है पर पारिवारिक पृष्ठभूमि के नाते उसका ज्ञान की कमी भीनहीं थी। उसे हमने अपनी गीता साधना की चर्चा की तो उसने हमसे कहा‘भाई साहब, आप श्रीमद्भागवत गीता का वही प्रकाशन पढ़ें जिसमें केवल श्लोकों के अनुवाद हों कि साथ में महात्म्य हो। उसमें उसके अध्ययन का महत्व आदि नहीं बताया गया हो। तभी आप समझ पायेंगे वरना आप दूसरी तरह की कहानियों में अपनी ऊर्जा नष्ट करेंगें।’’
हम हैरान रह गये। बात यह थी कि हम महत्त्ता बताने वाली जिन कहानियों को साथ में पढ़ रहे थे उसमें कोई एक भी पाठ नहीं था जिसमें ब्राह्मण पात्र न हो। ऐसे में उस मित्र की बात थोड़ी चौंकाने वाली लगी मगर जब हमने नयी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना प्रारंभ किया तो लगा कि वास्तव में मित्र के हृदय से यह बात भगवत्कृपा की उपज थी। उस दिन हमने अपने मित्र से जब इस बात की चर्चा करते हुए श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्यान प्रस्तुत किया तो उसने जो कहा वह लिखना अपने मुंह मियां मिट्ठु बनना होगा।
नियमित योग क्रिया से निवृत होने के बाद गीता की साधना करना हमारे दिन का सबसे स्वर्णिम समय होता है। अब यहां हम श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा करने नहीं जा रहे पर जो लिख रहे हैं वह कहीं न कहीं उनसे प्रभावित है।
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इस्कॉन नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों का प्रचार करती है। उसके आश्रमों में हमारा जाना हुआ है। हम उनमें कोई दोष नहीं देखते। देखने वाले देखते भी हैं। हम देखते हैं सुनते हैं पर लिप्त नहीं होते। सुना देख और भूल गये। उनके संस्थान से प्रकाशित श्रीमद्भागवत का एक संस्करण हमारे पास भी है। इसका अनुवाद विश्व के अनेक भाषाओं के इसलिये हुआ है क्योंकि इस्कॉन ने अनेक देशों में अपना स्थान बनाया है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम तथा भगवान शिवजी के अनेक भक्तों ने विश्व में उनका प्रचार किया है पर संगठित रूप से यह काम इस्कॉन ने किया है उतना शायद ही कोई कर सका हो। अनेक भारतीय संतों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है पर इससे भारतीय अध्यात्म का प्रचार कम उनकी छवि अधिक बनी है। इस्कॉन की जो कार्यशैली हमने देखी है उसमें दोष हम नहीं देखते पर इतना तय है कि श्रीमद्भागवत गीता के प्रचार में उनकी भूमिका हो सकती है वह उसमें वर्णित तत्वज्ञान के दर्शन उसमें नहीं होते। इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद की कृपा से श्रीमद्भागवत यथारूप प्रस्तुत की गयी है पर उसमें व्याख्या ज्यादा है। हमने नहीं पढ़ी पर उसमें कुछ आपत्तिजनक हो सकता है इस पर यकीन नहीं है। अनुवाद करने या पढ़ने वालों की समझ का फेर हो सकता है। इस फेर में कोई नाराज हो गया तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जब आत्मा जीवन धारण करता है तो वह सत्य लगता है पर होता तो झूठ है। देहधारी जीव विवादास्पद हो जाते हैं पर आत्मा निर्विवाद है। यही स्थिति तत्वज्ञान की है। वह सूक्ष्म है जब उसे व्याख्या देकर व्यापक बनाया जाता है तो वह देहधारी जीव की तरह विवादस्पद हो जाता है। यह समझ का फेर अपने देश में ही बहुत सारे गीता सिद्धों को भी है कि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अत्यंत गूढ़ है जबकि एक बार अगर श्रीमद्भागवत हृदय में आत्मसात होना प्रारंभ हो तो एक जीवन के प्रति स्वयमेव दृष्टिकोण अन्य लोगों से प्रथक हो जाता है। यह अलग बात है कि कथित गीता सिद्ध इसे रहस्यमय कहकर स्वयं को ज्ञानी साबित करते हैं जैसे उनको समझ में सब कुछ आ गया है। कुछ लोग इस बात से नाराज हो सकते हैं कि मगर गीता सिद्ध अपना ज्ञान दिखाने उन लोगों के पास नहीं जाते जिनकी उसमें रुचि नहीं है। न ही सार्वजनिक रूप से श्रीमद्भागवत गीता पर प्रवचन करते हैं। गीता सिद्ध संगठन बनाकर नहीं चलते क्योंकि वह हंस होते हैं। संगठन तो कौए बनाकर चलते हैं।
अब तो प्रश्न हैं एक तो क्या इस्कॉन की श्रीमद्भागवत पर प्रतिबंध लगाने की बात है या मूल रूप से गोरखपुर प्रेस जैसे प्रकाशन से जुड़ी श्रीमद्भागवत गीता को भी उसमें शामिल किया गया है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि क्या श्रीमद्भागवत गीता के शब्द उच्चारण पर ही प्रतिबंध लगाने का विचार हो रहा है या उसके श्लोकों के स्थानीय भाषा में अनुवाद पर भी रोक लगेगी। एक रूसी नेता ने भारत में इस विषय पर हो रहे प्रदर्शन पर कहा कि श्रीमद्भागवत गीता का प्रवेश हमारे देश में दो सौ वर्ष पहले ही हो गया था। इससे तो लगता है कि रूस में इसके इतने अनुवाद हो चुके होंगे कि उनको रोकना संभव नहीं होगा।
जिस तरह का इसमें तत्वज्ञान है और आधुनिक विज्ञान उसके सामने फीका है उसे देखकर तो यह लगता है कि इसका प्रचार वहां स्वयमेव बढ़ेगा। इस विवाद की भारत में चर्चा करने का मतलब इसलिये भी नहीं है क्योंकि यह तत्वज्ञान है इसे कोई नहीं बदल सकता। जहां तक हम जैसे आम गीता साधकों की भावनाओं के आहत होने का प्रश्न है तो यह एक भुलावा है। यह प्रचार माध्यमों के लिये समय पास करने के लिये अच्छा विषय बन गया है।
हमारा मानना है कि श्रीमद्भावगत गीता में मनोरंजन नहीं है। जिसकी रुचि नहीं है उसे अहंकारवश गीता का ज्ञान देना भी तामस बुद्धि का परिचायक है। जिसकी भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति नहीं है उसके सामने तो इसका नाम लेना भी निरर्थक है। अगर कोई यह सोचकर कि श्रीमद्भागवत गीता से ज्ञान मिल जाये ताकि लोगों के सामने अपने ज्ञानवान होने का प्रदर्शन करूं और वह इसे पढ़ने लगे तो जल्दी बोर हो जायेगा। संभव है कि वह अर्थ रटकर उसे सुनाने लगे पर इसका आशय यह कतई नहीं कि वह ज्ञानी है। सच्चे गीता साधक श्रीमद्भागवत गीता शब्द सुनकर न तो भावविभोर होते हैं न उसकी निंदा सुनकर विचलित होते हैं। उनके लिये यह विवाद एक हल्की मुस्कराहट लाने से अधिक प्रभाव नहीं रखता। मान अपमान से परे होने के गुण का महत्व आखिरी श्रीगीता में ही बताया गया है। ऐसी श्रीमद्भागवत गीता और उसके सृजनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण का कोई अपमान भी कर सकता है या किसी में इतनी औकात है यह गीता सिद्ध नहीं मानते। ऐसा करने वालों का जो हश्र होगा उसकी कल्पना वही कर सकते हैं जो तत्वज्ञानी हैं।
दिसम्बर 22, 2011 – 2:27 अपराह्न
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किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर चल रही बहस में कई बातें दिलचस्प हैं। यकीनन अगर हम उनको सुने तो अपनी बात प्रभावी ढंग से न रख सकते हैं न सोच सकते हैं। जहां तक हमारी इस विषय पर अपनी सोच यह है कि अभी तक इससे देश के लाभ या हानियों पर किये गये अनुमान उस रूप में प्रकट नहीं होंगे जिस तरह व्यक्त किये जा रहे हैं।
हम लाभ हानियों से अलग हटकर एक बात जरूर मानते हैं कि इस देश की समस्याओं का हल अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप करने की बात तो यह कभी दिखाई नहीं दी। हम एक अर्थशास्त्री होने के नाते-अर्थशास्त्र हमारे अध्ययन के दौरान एक विषय रहा है इसलिये यह पदवी हमने स्वयंभू रूप से स्वयं धारण की है-मानते हैं कि अगर इस देश में राज्य प्रबंध अगर प्रत्येक गांव में स्वच्छ पानी, पक्की सड़क तथा बिजली की व्यवस्था कर ले तो इस देश में आर्थिक समस्यायें नगण्य रह जायेंगी। यह अलग बात है कि आज़ादी के बाद इस पर भारी पैसा खर्च हुआ पर भ्रष्टाचार के कारण परिणाम शून्य ही रहा। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा तथा भुखमरी जैसी समस्यायें पूरी तरह से खत्म भले न हों पर वह गंभीर चिंता का विषय नहीं रहेगी। मूल बात कहें तो सरकार कल्याण के नाम पर दूसरे काम न भी करे तो चल जायेगा।
यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती है कि गांव के विषय पर लिखने के लिये वहां पैदा होना जरूरी है। हम शहर में जन्मे हैं पर अनेक बार गांवों में जाने का अवसर मिला। उससे यह लगता है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। बरसात के दिनों में जब गांवों में सब्जी, गेंहु, चावल तथा दूध अधिक मात्रा में होता है तब वहां से उसे निकालकर शहर पहुंचाने के लिये कितनी मुश्किल होती है यह हमने स्वयं देखा है। उस समय अशुद्ध जल की वजह से बीमारी अपना रौद्र रूप दिखाती है तब यह गांव के मार्ग इस कदर नाले में बदल जाते हैं कि रात को किसी मरीज को गांव से बाहर पास के बड़े गांव या शहर ले जाना लगभग असंभव होता है। इसी कारण छोटी बीमारी में लोग वहां मर जाते हैं। गांव में अगर अस्पताल भी हो तो वहां चिकित्सक पहुंच नहीं सकता। वैसे सामान्य हालत में भी स्वास्थ्य कमी वहां पहुचंने से कतराते हैं। अगर आजादी के बाद हम देश के पूरे गांवों में शुद्ध जल, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधायें नहीं पहुंच पाये तो यह संकट हमारी प्रबंध व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शहरों के पास जो गांव हैं उनमें शायद ऐसा आधारभूत ढांचा मिल जाये पर जो दूर हैं उनकी समस्याओं पर कितना सोचा गया यह अलग से विचार का विषय है।
विदेशी कंपनिंयां अगर भारत आ रही हैं तो वह कोई आधारभूत ढांचा नहीं बनायेंगी बल्कि उनका अपनी सुविधानुसार दोहन ही करेंगी। जहां आधारभूत ढांचा नहंी है वहां उनको उन्हीं बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा जिनको हटाने की बात हो रही है। इधर हम सुन रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप गंभीर रूप से आर्थिक संकट में हैं और अब वहां विकासशील देशों के निचले स्तर पर जाकर कमाने की बात हो रही है। हमने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को यह कहते हुए पढ़ा था कि हमें विदेशों में जाकर छोटे स्तर पर काम करना होगा। अमेरिका की विदेशमंत्राणी हेनरी क्लिंटन ने भी कहा था कि काम के बारे में भारतीयों से सीखना चाहिए।
बहरहाल इस बहस में एक महत्वपूर्ण समाचार पर चर्चा किसी ने नहीं की कि अमेरिका ने पाकिस्तान के 28 सैनिकों को मार दिया जिससे दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव है। पाकिस्तान ने अपना एक हवाई अड्डा अमेरिकी सेना से खाली करने को कहा है। इतना ही नही उसने संयुक्त राष्ट्र में भी यह मामला उठाया है। भारतीय प्रचार माध्यम इस पर खबर देकर चुप हो गये हैं। उनको शायद इसका अंदाजा नहीं है कि अंततः यह तनाव युद्ध में बदल सकता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के हाथ से निकल गया तो उसका राजनीतिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप से करीब करीब खत्म होने जैसा ही है। हमारा मानना है कि अमेरिका से अधिक मित्रता से अब कोई लाभ नहीं है। वह सामरिक रूप से शक्तिशाली है पर उसका आर्थिक ढांचा करीब करीब गड़बड़ाने लगा है। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीतिक बगावत उसके सम्राज्य में आखिरी कील की तरह लग सकती है। देखा जाये तो पाकिस्तान अपने सहधर्मी देशों का एक तरह से प्रवेश द्वार है। भले ही वह एक सार्वभौमिक राष्ट्र की तरह दिखता है पर संक्रमण काल में उसकी सरकार की बैठक सऊदी अरब में होती है तो क्रमवार होने वाले क्रिकेट मैच दुबई या आबुधाबी में होते हैं। जिन दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों का क्रम में पाकिस्तान का दौरा होता है वह दुबई या आबुधाबी में उसके साथ मैच खेलती हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेेरिका का तनाव मध्यएशियाई देशों तक विस्तृत हो सकता है। यह देश एक तरह से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं।
बहरहाल अब बड़े विषयों पर बड़े विद्वानों की चर्चा सुनकर ऐसा लगता है कि निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रेक्षकों की बातें दमदार होती हैं पर महत्व केवल संगठित विद्वानों को ही दिया जा रहा है। अनेक स्वतंत्र विद्वानों ने किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर अपनी राय बेबाकी रूप से रखी। वह इससे चिंतित नहीं है पर खुश भी नहीं है। जहां तक किसानों और उपभोक्ताओं के हित का प्रश्न है तो सवाल यह है कि इन दोनों रूपों में हर मनुष्य शोषित होता है और अगर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाये तो पूरी दुनियां का व्यापार ही ठप्प हो जाये। वाल मार्ट आये या नहीं यह समस्या शोषितों के आपसी द्वंद्व का विषय है। यह अलग बात है कि समय के अनुसार बाज़ार और प्रचार के अनुसार समाज का स्वरूप बदलता रहता है और उसे रोकना कठिन है।
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दिसम्बर 9, 2011 – 3:55 अपराह्न
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सांसरिक पदार्थों का मोह ऐसा है कि हर आदमी उसे प्राप्त करना चाहता है। यह अलग बात है कि सभी का कर्म एक जैसा नहीं होता अतः उसका परिणाम भी भिन्न होता है। अनेक लोग अपने सामर्थ्य से अधिक लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो अनेक ऐसे हैं जो सहज प्राप्य वस्तु को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। कुछ लोग समय बीत जाने पर अपना अभियान प्रारंभ करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार चलते हैं वैसे ही उनका जीवन भी चलता है। ज्ञानी लोग देशकाल और अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अपना काम आरंभ करते हैं। भले ही वह अधिक धनवान न बने पर उनका जीवन शांति से गुजरता है। इसके विपरीत अनेक लोग लालच, लोभ और काम के वशीभूत होकर अपना काम प्रारंभ करते हैं। भाग्यवश किसी को सफलता मिल जाये तो अलग बात है वरना अधिकरत तो अपना पूरा जीवन ही अशांति में नष्ट कर देते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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मनुष्य युग्यापचयक्षयो हि हिरण्यधान्यावचयव्यस्तु।
तस्मादिमान्नैव विदग्धबुद्धिः क्षयव्ययायासकरीमुपेयात्।।
‘‘मनुष्य और पशु आदि जीवधारियों की देह का ह्रास ही क्षय है। सोने आदि भौतिक पदार्थों का नाश व्यय है। जिसमें दोनों प्रकार का क्षय दिखे वह कार्य या अभियान प्रारंभ न करें। राजा का कर्तव्य है कि वह विशेष संहार और व्यय कर भी फल न मिलने वाले कार्य को रोके।
वस्तुष्वशक्येषु समुद्यमश्वेच्छक्येषु मोहादसमुद्यमश्च।
शक्येषु कालेन समुद्यश्वश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदन्ति।।
“किसी भी कार्य के तीन व्यसन होते हैं। एक तो अपने सामर्थ्य से अधिक वस्तु की प्राप्ति करने का प्रयास करना दूसरा सहजता से प्राप्त वस्तु के लिये उद्यम करना। तीसरा समय बीत जाने पर किसी वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना।
हमारी देह का ह्रास होता है तो स्वर्ण आदि भौतिक पदार्थों का व्यय भी करना पड़ता है। ऐसे में यह निश्चित कर कोई काम हाथ में लेना चाहिए जिसमें दोनों ही प्रकार की हानियों से बचा जा सके या फिर वह कम से कम हो। धन का सीधा नियम है कि जहां सें लाभ हो वहीं विनिवेश करें। राजनीति करने वालों के लिये यह नियम बहुत विचारपूर्ण है। अक्सर हम लोग देख रहे हैं कि सरकार के माध्यम से वितरित सहायता गरीब और निम्न वर्ग तक नहीं पहुंचती है। उस पर ढेर सारा व्यय हो रहा और देश के सभी शिखर पुरुष भी यह मानते हैं कि जनता तक वह सहायता नहीं पहुंच रही है। ऐसे में उस सहायता पर धन देने से क्या लाभ जिससे राज्य का लक्ष्य पूरा न होता हो। उल्टे इससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।
इसी तरह हमें अपने जीवन में भी व्यय करते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उससे हमें प्राप्त क्या हो रहा है। हम लोग अधिक धन होने पर अनेक संस्थाओं को दान आदि देते हैं इस विचार से कि उसका पुण्य मिलेगा पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सुपात्र को दिया गया दान ही फलीभूत होता है। उसी तरह जिन मदों पर व्यय करना विलासिता लगता है उनको कभी नहीं करना चाहिए। वैसे भी कहा जाता है कि लक्ष्मी चंचल है और कभी स्थिर नहीं रहती अतः सोच समझकर ही कहीं विनिवेश करना चाहिए।
दिसम्बर 1, 2011 – 4:15 पूर्वाह्न
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आज सुबह अपनी ही आनंद नगर कॉलोनी के पर्यटन में पतंजलि योग संस्थान के सानिध्य में आयोजित एक सात दिवसीय योग शिविर का उद्घाटन शिविर को देखने का अवसर मिल गया। बाबा रामदेव तो नहंी थे पर उनकी अनुपस्थिति कोई मायने भी नहीं रखती क्योंकि जो योग साधना का अभ्यास करवा रहे थे वह योग्य शिक्षक लगे। सिंहासन और हास्यासन का आनंद पूरी तरह लिया। यह आनंद तब दोगुना लिया जा सकता है आप योग साधना निरंतर करते हों। भारतीय योग संस्थान के योग शिविर में-जो वह बिना किसी प्रचार के आयोजित करता है-भी इस तरह का योगाभ्यास कराया जाता है पर वहां कम लोग ही पहुंचते हैं। इसका कारण यह है कि उसके शिविरों में कोई प्रसिद्ध हस्ती का नाम नहीं जुड़ा। पतंजलि योग संस्थान के नाम से स्वामी रामदेव का नाम जुड़ा हैै और यही कारण है कि उसके शिविर अधिक से अधिक लोग जुटा लेते हैं। यह अलग बात है कि वह स्थाई नहीं होते जबकि भारतीय योग संस्थान के शिविर नियमित रूप से चलते हैं।
यह लेखक न तो बाबा रामदेव का शिष्य है न ही उनका समर्थक पर इसके बावजूद उनके योग प्रचार से प्रसन्नता होती है। इस प्रसन्नता का कारण समाज के प्रति निष्काम प्रेम है। नौ बरस नितांत योग साधना कर चुकने के बाद आदमी का मन कैसे होता है, यह वही समझ सकता है जिसने किया हो। दूसरी बात यह भी है कि चार बरस से श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन के बाद इस बात का अनुभव हुआ कि जब तत्वज्ञान का आभास हो जाता है तब आदमी निरंकार दृष्टा होकर चिंतन करता है। ऐसे में शुभकर्म करने वाला कोई अन्य व्यक्ति क्यों न हो तत्वज्ञानी उसकी प्रशंसा करेगा।
दरअसल यह लेख अगर एक दिन पहले लिखते तो शायद इस शिविर की चर्चा नहीं होती। इस लेख को लिखने का मूल उद्देश्य स्वामी रामदेव के कृत्तिव पर प्रकाश डालना जरूरी है। यह विचार स्वामी अग्निवेश के एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार को देखने सुनने के बाद आया।
पहले स्वामी अग्निवेश की बात कर लें। वह 73 वर्ष के हैं यह बात कल उनके श्रीमुख से पता चली। इसका मतलब यह कि वह अन्ना हजारे से एक वर्ष छोटे हैं। अग्निवेश जी की आयु देखकर मन श्रद्धा से इसलिये भर गया क्योंकि उनके चेहरे और देह से वह इतनी बड़ी आयु के नहीं दिखते। उन्होंने इसका राज संयम बरतने को बताया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अपने ही साथियों के प्रति उनका जो बर्ताव टीवी चैनलों पर दिखाया गया उससे उनकी छवि खलनायक की बनी। इतना ही नहीं अमरनाथ को लेकर हिन्दू समाज पर उनकी टिप्पणी ने भी उनकी छवि खराब की थी। चूंकि हमने पहले भी कहा है कि बाज़ार और प्रचार समूह अपने प्रायोजित आदमी की छवि बनाने और बिगाड़ने का काम करते हैं और स्वामी अग्निवेश कहीं न कहीं उनके ही नायक हैं। संभव है कि स्वामी अग्निवेश को इसका आभास न हो बल्कि उनके पर्दे के पीछे सक्रिय साथी उनकी गतिविधियों का जिम्मा लेकर काम चला रहे हों पर यह तय है कि कहीं न कहीं उनके साथ बाज़ार का समर्थन है। यही कारण है कि छवि खराब होने के बाद उसे सुधारने के लिये उनको बिग बॉस में लाया गया और अब तमाम तरह के साक्षात्कार प्रसारित हो रहे हैं। हमने अपने पहले के पाठों में उनकी आलोचना की है पर कल के साक्षात्कार ने उनके प्रति हमारे मन में आकर्षण पैदा किया। सबसे पहले तो उनकी इस बात के लिये प्रशंसा कर चाहिए कि उन्होंने अपने संयम से आयु को मात दी है। मतलब उनसे भी सीखने लायक कुछ है। उन्होंने एक बात स्वीकार की कि अहंकारवश उन्होंने अपने साथियों के प्रति भूल की तो उनके साथी भी अहंकार में रहे हैं। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया पर प्रकृतियों से द्वंद्व की बात मानी। वह आर्यसमाजी हैं यह भी एक अच्छी बात लगी। उन्होंने गीता का अध्ययन किया है यह भी लगा। अखरी तो बस एक बात वह यह कि वह बाबा रामदेव के प्रति दुराग्रह रखते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने स्वामी रामदेव के एक निकटस्थ आदमी से कहा था कि वह व्यापार से अलग होकर काम करें वरना उनके विरोधी गलतियां निकालकर बदनाम करेंगे।
इसी साक्षात्कार में तीनों महिला संचालनकर्ता बार बार ढोंगी साधुओं का जिक्र इस तरह कर रही थीं जैसे कि भक्तों से पैसा लेने वाला हर साधु ढोंगी हो। इतना ही नहीं वह इस तरह बोल रही थीं कि आधुनिक साज सज्जा से काम करने वाले सारे संत केवल पैसे से काम रहे हों। स्वामी अग्निवेश भी लगता है कि इससे सहमत थे। हमारी बात यहीं से शुरु होती है।
हम यहां बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता में कहीं नहीं लिखा हुआ है कि माया से परे रहो। सांसरिक कर्म से विरक्त होना ही सन्यास है। दरअसल श्रीगीता में कहा गया कि हमें दृष्टा और देह के ंअंतर को समझते हुए आत्मिक रूप से कहीं भी सांसरिक विषयों में लिप्त नहीं होना चाहिए। धन से दूर रहने की बात इसलिये भी गलत लगेगी क्योंकि उसमें दान आदि करने का भी महत्व बताया गया है। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वह किसी को शिष्य नहीं बनाते। यह अच्छी बात है पर जो शिष्य बनाते हैं उन पर उनको आक्षेप करने का अधिकार नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि हम स्वामी अग्निवेश के अनेक कृत्यों से सहमत न होने के बावजूद उनके गुणों की चर्चा कर रहे हैं। यह श्रीगीता के ज्ञान की ही देन है। स्वामी अग्निवेश धर्मं के नाम पर ढोंग के विरोधी हैं। हम भी हैं। इसके बावजूद हम कर्मकांडियों के प्रति घृणा भाव नहीं रखते। यह घृणा मनुष्य के नकारात्मक भाव का प्रमाण है जो उसे दायरों में बांध देती है। स्वामी अग्निवेश को अधिक शिष्य मिलने भी नहीं थे। उनके साथ जो लोग भी है तो वह समर्थक होंगे प्रशंसक नहीं। अमरनाथ यात्रा पर उनकी टिप्पणियां सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना हमें पसंद नहीं था। दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करना अहंकार भाव दिखाना है जो तामस बुद्धि का परिचायक है। आयु में अग्निवेश हम से बड़े हैं इसलिये उनके प्रति हमारे मन में सम्मान है पर जहां अध्यात्म की बात आती है तो सबसे पहले यह देखना ही पड़ता है कि आदमी अपने ज्ञान के साथ कितना समय बिता रहा है।
कुछ लोग शायद हमसे नाराज होंगे यह जानकर कि हम तो किसी भी साधु या संत को ढोंगी कहने के बाद मन में पछताते हैं। इसका कारण भी बताये देते हैं कि हम में इतनी कुब्बत नहंी है कि हम स्वामी रामदेव, आसाराम बापू, सुधांशु महाराज तथा मोरारी बापू की तरह अध्यात्म की शक्ति के सहारे इतनी भीड़ जुटा लें। जो भीड़ जुटती है उसमें सभी को अज्ञानी कहना भी तामस बुद्धि का परिचायक है क्योंकि हम स्वयं भी कुछ अच्छा सुनने की खातिर वहां जाते हैं। अगर कभी अवसर मिला तो स्वामी अग्निवेश की सभा सुनने भी जा सकते हैं यह जानते हुए कि वह हमारे मन को अप्रिय लगने की बात कर सकते है। हमारे अंदर ज्ञान और गुण की चाह है पर अपने ज्ञान के कारण यह यकीन भी है कि हम स्वामी अग्निवेश में भी ढूंढ निकाल सकते हैं। अगर धार्मिक संतों के पास काला धन है तो स्वामी अग्निवेश जी के कार्यक्रमों के आयोजक भी दूध के धुले नहीं हो सकते। इसके बावजूद हमें स्वामी अग्निवेश ने प्रभावित किया यह बात मानने में संकोच नहीं है। वह अरविंद केज़रीवाल के और अन्ना हजारे के प्रति कोई कठोर बात करते हुए झिझक रहे थे जो कि उनके मर्यादित स्वभाव का प्रमाण है।
चाहे योग शिविर हो या प्रवचन का कार्यक्रम उनके आयोजन पर पैसा खर्च होता है। सीधी बात कहें तो माया का खेल है तो माया से ही जीता जा सकता है। हमारा समाज इसके लिये खर्च करने को तैयार भी रहता है। एक समय था जब फिल्म, क्रिकेट और टीवी ने लोगों के मन को बांध दिया पर फिर लोग ऊब गये तो यही अध्यात्म संत उनके काम आये। एक आयु के बाद जब आदमी थकने लगता है तब वह आसरा ढूंढता है। यह आश्रम, मंदिर तथा दरबार उसके लिये एक आसरा बन जाते हैं। इनके निर्माण पर पैसा खर्च होता है और इसके लिये भक्तों से दान या सहायता लेनी पड़ती है। स्वामी अग्निवेश सत्य के ज्ञानी है पर माया के खेल से अनभिज्ञ है। ज्ञानी तो इस देश में बहुत लोग हैं पर अधिक भीड़ सभी के पास नहीं जाती। माया भी बहुत लोगों के पास है पर सभी संतों की तरह नहीं पुजते। सीधी बात यह है कि जिसके पास ज्ञान का संग्रह और माया की शक्ति है वही बड़े प्रसिद्ध संत बन पाये हैं।
स्वामी अग्निवेश बजाय अनर्गल विषयों पर में लगने के अगर आर्य समाज का ही विचार आगे बढ़ाते तो शायद बेहतर रहता। प्रसिद्ध की बात छोड़कर अगर योग्यता के आधार पर तुलना की जाये तो वह बाबा रामदेव के आगे बहुत छोटे लगते हैं। बाबा रामदेव ने जिस कदर योग साधना की पुनःप्रतिष्ठा की है वह अनुकरणीय है। उनके पतंजलि योग संस्थान का पूरे देश में काम चल रहा है। अब तो उन्होंने अनेक साधकों को शिक्षक होने योग्य भी बना दिया है। उनके शिविर लग रहे है। धन अगर नहीं होगा तो यह प्रचारतंत्र चलेगा कैसे? अलबत्ता हम स्वामी अग्निवेश से यह अपेक्षा जरूर करेंगे कि वह योग साधना की आलोचना करने की बजाय अपने नियम और संयम के विषयों पर लोगों को जागरुक करने का काम करें। भ्रष्टाचार केवल नारे लगाने या आंदोलन चलाने से हटने वाला नहीं है बल्कि लोगों में नियम और संयम से चलने की शिक्षा देने पर ही उसका निराकरण संभव है।
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नवम्बर 23, 2011 – 4:32 अपराह्न
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पेट्रोल की कीमतें बढ़ी तो पूरे देश में आक्रोश का माहौल दिखा। पेट्रोल के मूल्यों को लेकर तमाम बहसें हुईं। ऐसे में कुछ बहसकर्ताओं ने कहा कि ‘देश की अर्थव्यवस्था जनता की स्थिति और लोकप्रियता को देखकर नहीं बनाई जाती बल्कि अर्थशास्त्र के आधार पर अर्थशास्त्रियों के राय के अनुसार तय की जाती है।’’
हम यहां पेट्रोल के अर्थशास्त्र पर बहस नहीं कर रहे हैं क्योंकि यह तय करना अब कठिन है कि इस देश में कौन अर्थशास्त्री है और कौन अनर्थशास्त्री। स्पष्टतः हम वाणिज्य विषय के विद्यार्थी रहें और अर्थशास्त्र हमारा एक अप्रिय विषय रहा है इसलिये अपने को अर्थशास्त्री कहते हुए तो संकोच होता है अलबत्ता व्यंग्यकार होने के नाते भाई लोग अनर्थशास्त्री जरूर कहते हैं। स्नातक होने के बाद हमें अर्थशास्त्री बनने का ख्याल आया तो पुनः उसे पढ़ा। उसे पढ़ा तो अर्थशास्त्री तो बन गये पर देश के हालातों को देखकर लगा कि हम स्वयं ही अनर्थशास्त्री हैं। प्रचार माध्यमों के अनुसार पाकिस्तान और बंग्लादेश में भारत की अपेक्षा पेट्रोल बहुत सस्ता है। जिस तरह हमारे देश में पेट्रोल के दाम बढ़ते रहे हैं उससे तो लगता है कि पाकिस्तान और बंग्लादेश की जनता भाग्यशाली है कि वहां कोई अर्थशास्त्री नहीं है। बहरहाल हम सब खामोशी से देखते रहे।
अब पेट्रोल के दाम कम हो गये तो कुछ लोगों के पेट में मरोड़ उठते दिखा। कथित विद्वानों ने कहा कि ‘देश में लोकप्रियता पाने के लिये जनप्रतिनिधियों के दबाव में इस तरह दाम कम किये गये पर अर्थशास्त्रियों की नज़र से गलत है। पहले पेट्रोल के भाव अर्थशास्त्रियों की सलाह पर किये गये और अब जनप्रतिनिधियों के कहने पर कम किये गये।’
इस तर्क पर हमारे पास हंसने के अलावा कोई चारा नहीं था। हमने एक मित्र से कहा-‘‘यार देश में ऐसे कौनसे अर्थशास्त्री हैं जिनको पेट्रोल के दाम कम होने पर एतराज है?‘‘
वह बोलो-‘मुझे क्या मालुम? मैं तो विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं अर्थशास्त्र का नहीं। न तुम्हारी तरह अनर्थ वाली बातें लिखता हूं। मुझे अफसोस है कि मेरी तुम्हारे से दोस्ती हुई पर इतना तय है कि तुम अर्थशास्त्र के जानकार न ही सही पर अनर्थशास्त्र तुम्हें खूब ज्ञान है। तुम कोई व्यंग्य लिखने वाले हो और एक चाय की कीमत पर मैं तुम्हारे साथ कोई सहयोग करने को तैयार नहीं हूं।’’
हमने कहा-‘‘हमें तुमने अनर्थशास्त्री कहा इसके लिये शुक्रिया! याद रखना हम उन अर्थशास़्ित्रयों से तो ठीक हैं जिनको पेट्रोल के दाम कम होने का अफसोस है।’’
भगवान ही जानता है कि इस देश में ऐसे कौनसे अर्थशास्त्री हैं जिनको तेल के दाम कम होने पर अफसोस हुआ। इन अक्लमंदों से कोई पूछे तो यह सलाहें देते हैं कि विदेशों से ऐसे समझौते करने चाहिए जिससे देश लोग दोहरे कराधान का शिकार न हों। मतलब यह कि अगर किसी ने विदेश में कर चुकाया हो तो वह देश में राहत पाये। सीधी मतलब यह है कि पूंजीपतियों को लाभ हो ताकि वह देश को लूट सकें। यहां पेट्रोल पर दोहरा नहीं तिहड़ा चोहड़ा टैक्स लगता है। केंद्र का अलग, राज्य का अलग तथा क्षेत्रीय अलग। तब क्या इन अर्थशास्त्रियों को दिमाग का क्या घास चरने चलाज जाता है? अमीर के साम्राज्य में देश की रक्षा तथा गरीब के शोषण में विकास देखने वाले इन अर्थशास्त्रियों को हम जैसे अनर्थशास्त्री से सामना नही हुआ है। इसलिये लगे रहें, रोते रहें, हंसते रहें! प्रचार माध्यमों में बहस कर अपना काम चलायें। यही ठीक है। अपने विद्वान होने का भ्रम न पालें तो ठीक है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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नवम्बर 20, 2011 – 11:56 पूर्वाह्न
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दर्द के पल गुजर गये,
गम के बादलों ने भी
बरसना छोड़ दिया
तब लबों पर हंसी आ ही गयी।
जिंदगी का फलसफा
जो समझे हम
इसलिये कभी बुरे हालातों पर रोये नहीं
जोर से हंसने के मौके भी नहीं गवांये
जब खुशी घर में आ ही गयी।
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कभी करना पड़ता है
मौके का इंतजार
कभी जिंदगी में जीत के मौके
सामने भी आ ही जाते हैं,
काबिल इंसान खुद बने या किस्मत बनाये
मगर मौके ही जिंदगी को बदल जाते हैं।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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नवम्बर 12, 2011 – 10:51 पूर्वाह्न
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उच्च पदस्थ, धनवानों तथा बलिष्ठ लोगों को समाज में सम्मान से देखा जाता है और इसलिये उनसे मित्रता करने की होड़ लगी रहती है। जब समाज में सब कुछ सहज ढंग से चलता था तो जीवन के उतार चढ़ाव के साथ लोगों का स्तर ऊपर और नीचे होता था फिर भी अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीतने वाले लोग अपने भौतिक पतन के बावजूद सम्मान पाते थे। बढ़ती आबादी के साथ राज्य करने के तौर तरीके बदले। समाज में राज्य का हस्तक्षेप इतना बढ़ा गया कि अर्थ, राजनीति तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में राजनीति का दबाव काम करने लगा है। इससे समाज में लोकप्रियता दिलाने वाले क्षेत्रों में राज्य के माध्यम से सफलता पाने के संक्षिप्त मार्ग चुनने की प्रक्रिया लोग अपनाने लगे। स्थिति यह हो गयी है कि योग्यता न होने के बावजूद केवल जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। दुष्ट लोग जनकल्याण का कार्य करने लगे है। हालत यह हो गयी है कि दुष्टता और सज्जनता के बीच पतला अंतर रह गया है जिसे समझना कठिन है। व्यक्तिगत जीवन में झांकना निजी स्वतंत्रा में हस्तक्षेप
उच्च पदस्थ, धनवानों तथा बलिष्ठ लोगों को समाज में सम्मान से देखा जाता है और इसलिये उनसे मित्रता करने की होड़ लगी रहती है। जब समाज में सब कुछ सहज ढंग से चलता था तो जीवन के उतार चढ़ाव के साथ लोगों का स्तर ऊपर और नीचे होता था फिर भी अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीतने वाले लोग अपने भौतिक पतन के बावजूद सम्मान पाते थे। बढ़ती आबादी के साथ राज्य करने के तौर तरीके बदले। समाज में राज्य का हस्तक्षेप इतना बढ़ा गया कि अर्थ, राजनीति तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में राजनीति का दबाव काम करने लगा है। इससे समाज में लोकप्रियता दिलाने वाले क्षेत्रों में राज्य के माध्यम से सफलता पाने के संक्षिप्त मार्ग चुनने की प्रक्रिया लोग अपनाने लगे। स्थिति यह हो गयी है कि योग्यता न होने के बावजूद केवल जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। दुष्ट लोग जनकल्याण का कार्य करने लगे है। हालत यह हो गयी है कि दुष्टता और सज्जनता के बीच पतला अंतर रह गया है जिसे समझना कठिन है। व्यक्तिगत जीवन में झांकना निजी स्वतंत्रा में हस्तक्षेप माना जाता है पर सच यही है कि जिनका आचरण भ्रष्ट है वही आजकल उत्कृष्ट स्थानों पर विराजमान हो गये है। उनसे समाज का भला हो सकने की आशा करना स्वयं को ही धोखा देना है।
इस विषय में भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
“जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।”
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
“इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।”
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विद्वता के शिखर पर भी वही लोग विराजमान हो गये हैें जो इधर उधर के विचार पढ़कर अपनी जुबां से सभाओं में सुनाते हैं। कुछ तो विदेशी किताबों के अनुवाद कर अपने विचार इस तरह व्यक्त करते हैं जैसे कि उनका अनुवादक होना ही उनकी विद्वता का प्रमाण है। उनके चाटुकार वाह वाह करते हैं। परिणाम यह हुआ है कि अब लोग कहने लगे हैं कि शैक्षणिक, साहित्यक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अब नया चिंतन तो हो नहीं रहा उल्टे लोग अध्ययन और मनन की प्रक्रिया से ही परे हो रहे हैं। जैसे गुरु होंगे वैसे ही तो उनके शिष्य होंगे। शिक्षा देने वालों के पास अपना चिंतन नहीं है और जो उनकी संगत करते हैं उनको भी रटने की आदत हो जाती है। ज्ञान की बात सभी करते हैं पर व्यवहार में लाना तो विरलों के लिऐ ही संभव हो गया है।
अब तो यह हालत हो गयी है की अनेक लोगों को मिलने वाले पुरस्कारों पर ही लोग हंसते हैं। जिनको समाज के लिये अमृतमय बताया जाता है उनके व्यवसाय ही विष बेचना है। सम्मानित होने से वह कोई अमृत सृजक नहीं बन जाते। इससे हमारे समाज की विश्व में स्थिति तो खराब होती है युवाओं में गलत संदेश जाता है। फिल्मों में ऐसे गीतों को नंबर बताकर उनको इनाम दिये जाते हैं जिनका घर में गाना ही अपराध जैसा लगता है। फिल्म और टीवी में माध्यम से समाज में विष अमृत कर बेचा जा रहा है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म दर्शन से ही यह आशा रह जाती है क्योंकि वह समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाये रहता है।
——————-
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
माना जाता है पर सच यही है कि जिनका आचरण भ्रष्ट है वही आजकल उत्कृष्ट स्थानों पर विराजमान हो गये है। उनसे समाज का भला हो सकने की आशा करना स्वयं को ही धोखा देना है।
इस विषय में भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
“जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।”
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
“इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।”
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विद्वता के शिखर पर भी वही लोग विराजमान हो गये हैें जो इधर उधर के विचार पढ़कर अपनी जुबां से सभाओं में सुनाते हैं। कुछ तो विदेशी किताबों के अनुवाद कर अपने विचार इस तरह व्यक्त करते हैं जैसे कि उनका अनुवादक होना ही उनकी विद्वता का प्रमाण है। उनके चाटुकार वाह वाह करते हैं। परिणाम यह हुआ है कि अब लोग कहने लगे हैं कि शैक्षणिक, साहित्यक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अब नया चिंतन तो हो नहीं रहा उल्टे लोग अध्ययन और मनन की प्रक्रिया से ही परे हो रहे हैं। जैसे गुरु होंगे वैसे ही तो उनके शिष्य होंगे। शिक्षा देने वालों के पास अपना चिंतन नहीं है और जो उनकी संगत करते हैं उनको भी रटने की आदत हो जाती है। ज्ञान की बात सभी करते हैं पर व्यवहार में लाना तो विरलों के लिऐ ही संभव हो गया है।
अब तो यह हालत हो गयी है की अनेक लोगों को मिलने वाले पुरस्कारों पर ही लोग हंसते हैं। जिनको समाज के लिये अमृतमय बताया जाता है उनके व्यवसाय ही विष बेचना है। सम्मानित होने से वह कोई अमृत सृजक नहीं बन जाते। इससे हमारे समाज की विश्व में स्थिति तो खराब होती है युवाओं में गलत संदेश जाता है। फिल्मों में ऐसे गीतों को नंबर बताकर उनको इनाम दिये जाते हैं जिनका घर में गाना ही अपराध जैसा लगता है। फिल्म और टीवी में माध्यम से समाज में विष अमृत कर बेचा जा रहा है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म दर्शन से ही यह आशा रह जाती है क्योंकि वह समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाये रहता है।
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नवम्बर 6, 2011 – 9:19 पूर्वाह्न
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लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को आज से 42 वर्ष पूर्व अगर कोई अपनी उस प्रकार की मृत्यु की तस्वीर खींचकर बता देता तो वह कतई राजनीति में नहीं आता। लीबिया के सर्वोच्च पद पर रहते हुए उसने ढेर सारे सुख भोगे होंगे। उन सुखों की कल्पना तक उसने बचपन में नही की होगी। वह बेखटके अपने राज्य सुख भोगता रहा। इस दौरान अपनी शक्ति में मदांध होकर उसने अनेक ऐसे भी काम किये होंगे जो कि राजस पुरुष के हाथ से अहंकारवश हो ही जाते हैं। अगर उसे कोई भविष्यवाणी कर यह बता देता कि राज्य प्रमुख पद पर प्रतिष्ठित होने से उसको इस तरह की मौत मिलेगी तो वह हर हाल में रहना मंजूर करता पर राजनीति में नहीं आता। मिठाई खाने वाले को अगर यह बताया जाये कि उसकी मिठाई में जहर है तो वह उसे नहीं खायेगा। इंसान कितना भी भूखा हो पर पर उसमें जहर होने की सूचना उसे विरक्त कर देती है।
संभव है गद्दाफी की मौत पर लीबिया के लोग बहुत प्रसन्न हों पर उनका भविष्य कितना उज्जवल है यह समय ही बतायेगा। मूल बात यह नहीं है कि वहां तख्ता पलटा गया है। सवाल तो यह है कि जो अब वहां के शासन को संभालेगा क्या वह कोई उदारमना र्या इंमानदार आदमी होगा। यह भी संभव नहीं लगता क्योंकि पश्चिमी राष्ट्रों ने अपने लाभ के लिये उनकी मदद की है वह उनसे वैसे ही अपेक्षा करेंगे जैसे कि अभी तक गद्दाफी से करते थे। उनको तेल चाहिए और विश्व में शासन करने के साथ ही पैसा कमाने के लिये यह माध्यम एक महत्वपूर्ण काम करता है। ऐसे में अपनी जनता को खुश रखने की बजाय उनको भी पश्चिमी राष्ट्रों के कदमों में अपना सिर रखकर चलना पड़ेगा। वरना वह किस तरह कलम होता है यह दुनियां जानती है।
ऐसा हमेशा होता नहीं है कि आदमी अपने कर्म फल का अनुमान करे। विश्व भर में अनेक ज्योतिषवेता हैं पर वह ऐसी भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि किसी की मौत दर्दनाक होगी या सहज। अनुमान से किसी की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो जाये पर उसके लिये संयोग जिम्मेदार होता है। इसके बावजूद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि अंततः राजस कर्म का परिणाम अहंकार, लोभ तथा काम के कारण दुःख के रूप में प्रकट होता है। पहले तो सात्विक लोग राजस कर्म करते नहीं पर अगर करें तो वह सात्विक मार्ग पर नहीं चल सकते। अक्सर लोगों को लगता है कि राजकाज में संलग्न रहना ही राजस कर्म है पर ज्ञानी जानते हैं कि राजस भाव अधिकतर सभी लोगों में रहता है-यह अलग बात है कि कुछ लोग सहजता से राजसी कर्म करते हैं तो कुछ तामस प्रवृत्ति की सहायत लेते हैं जैसा कि गद्दाफी ने किया।
मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह अपने सांसरिक कर्म से अन्य मनुष्यों पर शासन करना चाहता है। सभी लोग राजा बनकर प्रजा पर शासन करे यह जरूरी नहीं है पर अपने आसपास के लोगों से प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहना भी इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है। यही राजस भाव है जो कि अंततः सुख के बाद दुःख का कारण बनता है।
गद्दाफी को एकदम बेरहमी से मारा गया। इतनी बेरहमी से कोई आवारा कुत्ते को भी नहीं मारता। उसके शरीर में गोलियां लग चुकी थीं। वह खून से सराबोर था। उसे जब अस्पताल ले जाने की आवश्यकता थी तब लोग उसे पीट रहे थे। अगर इस तरह कोई व्यक्ति राह पर दुर्घटना के बाद मिले तो अनजान लोग भी उसकी सहायता के लिये आयेंगे जबकि गद्दाफी पिट रहा था। उसीे घायल तस्वीरें टीवी चैनलों पर दिखाकर बताया गया कि उसका खून गोलियां लगने के कारण निकल रहा था। देखा जाये तो गोलियां ताजा लगी थीं और जिस तरह उसकी स्थिति थी उसे देखकर प्रतीत होता था कि अगर उस समय भी वह अस्पताल ले जाया जाता तो बचता नहीं क्योंकि कालांतर में गोलियों की पीड़ा बढ़ने और रक्त स्त्राव से उसका जीवन नष्ट होना था। गद्दाफी के 42 वर्ष के सौभाग्य ने साथ छोड़ा तो पलभर का दुर्भाग्य उसके लिये मौत का संदेश ले आया।
गद्दाफी की यह मौत अच्छे खासे आदमी को राजकाज के कर्म में लिप्त होने से रोक सकती है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि अमेरिका से मित्रता रखने वाले देशों के राज्यप्रमुखों को भी डरा सकती है। यह सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका पूरे विश्व का खैरख्वाह बन गया हैं मध्यएशिया के तेल उत्पादक देशों पर उसका नियंत्रण रहा है। जो भी वहां तानाशह है वह अभी तक किसी न किसी रूप में उसके हितचिंतक ही रहे हैं। इराक के सद्दाम हुसैन अमेरिका तो गद्दाफी ब्रिटेन के प्रिय रहे पर अंततः दोनों को बुरी मौत मिली। ऐसे में जिन लोगों को अमेरिका और ब्रिटेन से राजनीतिक या आर्थिक मदद मिलती है उन्हें यह समझना चाहिए कि पश्चिमी देश किसी के सगे नहीं है। उल्टे उनके निकट रहने से सारी कमजोरियां उनकी नज़र में आ जाती हैं और समय आने पर वह पुराने मित्र को निपटाने के लिये नये शत्रु खड़े कर बुरी हालत कर देते हैं। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी को निपटाने क्रे लिये उनके ही देश में विरोधी खड़े किये। फिर पश्चिमी देशों ने पहले उनकी सेना को तहस नहस किया जिससे विद्रोहियों ने उनको निपटाया। दूसरी बात यह कि अगर अमेरिका या ब्रिटेन का एक बात पल्लू पकड़ा तो फिर उसे छुड़ाने का प्रयास करने की बजाय नियमित रूप उसे उनके सामने अपनी उपयोगिता साबित करना चाहिए।
अक्टूबर 22, 2011 – 5:04 अपराह्न
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अन्ना ने मौन व्रत ले लिया है। अपने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बाद दो बार अनशन करने के बाद यह तीसरा अवसर है जब वह चर्चा में आये हैं। आमतौर से देश की गतिविधियों का गहन अध्ययन करने वाले लोग यह मानते हैं कि अभी यह आंदोलन परिणाम पाना तो दूर उस मार्ग पर आया तक नहीं है। अन्ना साहब ने अनशन के बाद मौन व्रत प्रारंभ कर भले ही प्रचार माध्यमों में स्थान बनाया पर चिंतनशील लोग इससे बहलने वाले नहीं है। यही कारण है कि धीरे धीरे उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जनमानस में अपनी पहचान खो रहा है। अब तो कुछ लोगों को लगने लगा है कि प्रचार माध्यमों को अपना विज्ञापन व्यवसाय चलाने के लिये प्रकाशन तथा प्रसारण का महानायक मिल गया है। उनकी गतिविधियों के साथ ही उनके साथियों के कार्यों के भी समाचार प्रसारित होने के साथ ही लंबी बहसें होती है। बार बार ब्रेक लेकर होने वाले इन प्रकाशनों और प्रसारणों को देखकर तो यही लगता है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का एक परिणाम लोकतंत्र के चौथे स्तंभों के पास विज्ञापन व्यवसाय बनाये रखने वाले एक महानायक मिलने के रूप में तो सामने आ ही गया है।
दरअसल अन्ना हजारे स्वयं एक चतुर राजनीतिज्ञ हैं पर उनके सहयोगियों के साथ ऐसा नहीं है। जब अन्ना पहली बार अनशन करने दिल्ली आये थे तो कथित स्वयंसेवी संगठनों के लोगों ने उनके मंच पर आकर आंदोलन को संगठित रूप प्रदान किया। तय बात है कि अन्ना महानायक बने तो उनके सहयोगी नायक बन गये। मुश्किल यह आयी कि इन लोगों के पास भ्रष्टाचार का विरोध एक नारे के रूप में था पर कोई रणनीति नहीं है। दूसरी बात यह कि देश और विदेश से प्राप्त अनुदान से स्वैच्छिक संगठनों के वास्तविक उद्देश्यों पर शक भी किया जाता रहा है और कश्मीर पर अन्ना टीम के एक वरिष्ठ सदस्य की टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि अन्ना के सहयोगियों का यह भी एक उद्देश्य है कि वह विद्यमान लोकतंत्र प्रणाली से प्रथक होकर ऐसे समाज सेवी के रूप में अपनी पहचान बनायें जो राज्य प्रतिष्ठानों पर प्रभाव रखता हुआ प्रदर्शित हो। तय बात है राज्य पर प्रभाव रखने से समाज सेवा में दान, अनुदान और सम्मान अधिक मिलता है। अन्ना के सहयोगी के इस बयान ने आंदोलन पर संकट ला दिया है। एक बयान किस तरह पूरे आंदोलन को संकट में डाल सकता है यह पहली बार देखा गया है। इतना ही नहीं एक आंदोलन का प्रमुख अपने लक्ष्य से इतर विषय पर बयान देखकर लोगों के गुस्से का शिकार इस तरह होता है समूचा आंदोलन संदेह के दायरे में आ जाता है यह भी शायद ही कभी पहले देखा गया हो।
जनलोकपाल बनेगा या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। स्थिति यह है कि पहले से ही उसका श्रेय लेने की तैयारी हो रही है। अन्ना के बयानों का बारीकी से अध्ययन किया जाये तो उन्होंने उसमें अनेक बार बदलाव किये हैं। वह भले ही दावा करते हों कि वह किसी दबाव में नहीं आते पर उनके बदलते बयान इसके विपरीत स्थिति बयान करते हैं। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह उनकी रणनीतिक चतुराई का हिस्सा नहीं है जिससे वह अपने लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। मुश्किल यह है कि उनके सहयोगियों में न केवल रणनीतिक चतुराई का अभाव है बल्कि अनेक विषयों पर कार्य कर अपने आपको महानतम साबित करने के प्रयास में वह मूर्खतायें भी करते हैं। हम अन्ना के उस सहयोगी की ही बात कर लें जिन्होंने जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का समर्थन किया। दरअसल उन्हें शायद पता नहीं है कि अगर देश में भ्रष्टाचार खत्म होने के साथ ही राजकीय कार्यशैली में भी बदलाव आ जाये तो यकीनन जम्मू कश्मीर में कोई समस्या नहीं रहने वाली है। जम्मू कश्मीर में सभी जगह की तरह भ्रष्टाचार है और तय बात है कि वहां भी लोगों में आक्रोश होगा। इसी आक्रोश वहां के कुछ कथित लोग उठा रहे हैं और उनको भी वैसे ही समर्थन मिल जाता है जैसे कि भ्रष्टाचार के मसले पर अन्ना साहेब को मिल गया। मतलब यह कि कहीं भी किसी जगह आक्रोशित लोग व्यवस्था से इतने नाराज होते हैं कि वह किसी का भी समर्थन करने को तैयार हो जाते हैं। अन्ना साहेब भी भ्रष्टाचार का मामला लेकर तभी आगे आये जब भारतीय संसद, न्यायालय तथा प्रचार माध्यमों में अनेक घोटालों का पर्दाफाश हुआ। नेताओं का समूह भ्रष्टाचार के लिये बदनाम हैं पर याद रखने की बात यह है कि भारतीय संसद में घोटालों पर जमकर चर्चा हुई। सरकार ने उन पर कार्यवाही की। न्यायालय ने उनका संज्ञान लिया। भ्रष्टाचार के कुछ आरोपी जेल भी गये जिससे भ्रष्टाचार का मुद्दा ज्वलंत हो गया। तब कहीं अन्ना साहेब अनशन के लिये आये और उनको प्रचार में लाभ मिला।
अन्ना का एक सहयोगी तो अपने साथियों से बेवफाई कर बाहर हो गया। दूसरा बयान देकर संकट में फंसा है। ऐसे में अन्ना को अपने आंदोलन को संगठित रूप से चलाने के लिये अब अपने नये साथी ढूंढना चाहिए। उनके वर्तमान साथियों में अधिकतर अपने अन्य लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सक्रिय दिख रहे हैं। पता नहीं यह बात अन्ना अभी तक समझे कि नहीं पर इतना तय है कि भविष्य में वह इसका अनुभव अवश्य करेंगे। उनका मौन भी एक रणनीति का हिस्सा है। उनके विरोधी मानते हैं कि वह कुछ असुविधाजनक सवालों के जवाब से बचना चाहते हैं। समर्थकों के अनुसार वह अक्सर ऐसा करते हैं। वह पहले भी मौन व्रत रख चुके हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार चर्चित हो रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रचार माध्यमों के विज्ञापन व्यवसाय के लिये वह एक ऐसे नायक हैं जिनसे उनको अच्छी आय होती है।
इन सबसे प्रथक भारतीय जनमानस के उतार चढ़ाव के भावों को भी देखना चाहिए। अन्ना साहेब ने देश की जनता में एक आशा की किरण फूंकी थी। वह स्वयं भी मानते हैं कि जनता ही उनके आंदोलन का आधार हैं। अन्ना का मौन होने का मतलब है एक आंदोलन का मौन होना। उनके सहयोगियों की संकीर्ण मानसिकता तथा सीमित चिंत्तन क्षमता का आभास अब लोगों को हो गया है ऐसे में अन्ना के अभियान के सफल होने में संदेह जनमानस को उनसे दूर ले जायेगा। इतना ही नहीं अब अन्ना साहेब पर देश के जागरुक लोगों की नजर है और वह यह यकीन माने कि अब टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में पेशेवन बुद्धिमान बाजार और प्रचार समूहों के हितों को देखने हुए केवल प्रशंसात्मक वाक्य लिखें पर इंटरनेट पर लिखने वाले बिना लाग लपेटे के लिखने वालो लोगों की कमी नहीं है जो केवल जनहित के परिणाम देखकर ही विचार करेंगे। भले ही वह ज्यादा नहीं पढ़े जाते पर समाज तक अपनी बात तो वह पहुंचा ही देते हैं। अलबत्ता फिर भी अन्ना टीम नामक संगठन अब कुछ दिन मौन रहेगा पर जब यह व्रत टूटेगा तब अनेक परिवर्तन परिलक्षित होंगे। तब यह देखना होगा कि उनका दूरगामी परिणाम क्या होता है। अगर अन्ना टीम का यथारूप रहता है तो आंदोलन के साथ उसकी सफलता का संदेह भी साथ चलता रहेगा।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
अक्टूबर 16, 2011 – 5:49 अपराह्न
Categories: हिन्दी
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Tagged अण्णा हजारे का मौन व्रत, अन्न हज़ारे का मौन व्रत, आलेख, मनोंरजन, संपादकीय, समाज, हिन्दी साहित्य, editorial, hindi literature, hindi sahitya, lekh, samaj, society
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दीपक भारतदीप समूह के इस
‘शब्द लेख पत्रिका’ ब्लाग/पत्रिका ने पाठक/पाठ पठन संख्या दो लाख पार कर ली। इस समूह का यह पांचवा ब्लाग है जिसने यह संख्या पार की है। यह ब्लाग भी वर्डप्रेस पर ही बना है। अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि ब्लॉग स्पॉट के ब्लाग के मुकाबले वर्डप्रेस के ब्लाग अधिक पाठक संख्या क्यों जुटाते हैं। इसका कारण शायद यह है कि वर्डप्रेस पर अपने पाठ के साथ लेबल या मुंह कहें या टैग या पूंछ कहें अधिक संख्या में लगाने की सुविधा है जिनसे पाठों को सर्च इंजिन पर अधिक पाठक मिल जाते हैं। बीच में अधिक लेबल लगाने की सुविधा ब्लॉग स्पॉट के ब्लॉग पर मिली थी पर पता नहीं अचानक वह बंद हो गयी।
शुरुआती दौर में यह लगा था इंटरनेट पर ब्लॉग लिखने से कोई हिन्दी जगत का नया रूप सामने आयेगा पर वह अभी तक परिलक्षित नहीं हुआ। मुख्य विषय यह है कि हिन्दी भाषी अधिक संख्या होने के बावजूद भारत में इंटरनेट पर हिन्दी के पाठक अत्यंत कम हैं जो हैरान करती है। कम से कम हम जैसे आम लेखक के लिये स्वांत सुखाय लिखने के अलावा कोई अन्य प्रेरणा नहीं है। अब यह हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों की मानसिकता है या बाज़ार की थोपी गयी बाध्यता कि उसे शुद्ध हिन्दी लेखक तब तक रास नहीं आता जब तक लेखन से इत्तर उसके पास अन्य कोई उपलब्धि न हो। लेखक अगर नेता, अभिनेता, समाज सेवी, धार्मिक गुरु या फिर पूंजीपति हो तो उसे समाज पढ़ने के लिये तैयार है। इसके अलावा वह अंग्रेजी में श्रेष्ठता साबित कर हिन्दी में अनुवाद होकर छपे तो भी वह स्वागतयोग्य है। अगर कोई आम जीवन वाला मनुष्य है और हिन्दी में लेखन करता है तो वह भाषाई दृष्टि से वह सराहनीय नहीं है। मतलब उसे जीवन में सिद्ध होना चाहिए तभी उसका लेखन भी पठनीय है।
हम लिखे जा रहे हैं इस बात की परवाह किये बिना कि उसकी कोई प्रशंसा करता है या नहीं। अलबत्ता ऐसा लगता जरूर है कि कहीं न कहंीं ऐसे लोग हमारे ब्लॉग पढ़ते हैं जो फिर उनको अपने विचार बताकर प्रस्तुत करते हैं। कभी कभी तो लगता है कि बड़े लोग स्वयं या उनके अनुयायी इसे पढ़कर अपनी रणनीति भी बनाते हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के चुनावी राजनीति की तरफ मुड़ने की संभावना इसी ब्लाग समूह पर व्यक्त की गयी थी। यह हुआ भी। उस समय समाचार पत्र या चैनल में किसी विद्वान ने उस पाठ को पढ़ लिया होता तो वह तत्काल व्यक्त कर देता। आज की तारीख में उसकी जयजयकार होती। संभव तो यह भी लगता है कि अन्ना के ही किसी अनुयायी ने उसे अवश्य पढ़ा होगा और व्यक्त संभावना को भविष्य की रणनीति बना लिया हो। संभव है कि यह हमारी आत्ममुग्धता हो पर इतना तय है कि हम जैसे आम लेखक की उपेक्षा करने की वजह से ही हिन्दी भाषा के व्यवसायिक क्षेत्र में ऐसे मुखौटे छा गये हैं जिनकी चिंत्तन क्षमता भी केवल तत्कालिक मुद्दों भी क्षणिक रूप सीमित है। हिन्दी में गंभीर तथा सुरुचिपूर्ण लेखन नहीं होता यह शिकायत गलत है बल्कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की आत्ममुग्धता इसके लिये जिम्मेदार है यह बात अब हमारे समझ में आने लगी है। आम पाठक को दोष देना बेकार है क्योंकि वह बाज़ार और प्रचार के संयुक्त ढांचों पर ही निर्भर है। इंटरनेट में तकनीकी समस्या है और कंप्यूटर बेचने वाली तथा इंटरनेट चलाने वाली कंपनियों को हिन्दी से पैसा तो चाहिए पर उसके लेखकों की सहायता करना उनके लक्ष्यों में शािमल नहीं है। इसके अलावा पाठकों तथा प्रयोक्ताओं को प्रथक से कोई बेहतर सामग्री देने की भी उनकी कोई योजना नहीं है। ऐसे में आम हिन्दी ब्लाग लेखक और पाठकों के बीच सर्च इंजिन ही एक पुल है। उसमें भी याहू तो किसी तरह हिन्दी का मददगार नहीं है। इसके अलावा गूगल ने तो ब्लॉग तक पहुंचने के रास्ते बनाये हैं पर याहू तो एकदम खामोश है। हिन्दी सर्च इंजिनों में रफ्तार और गुरुजी चल रहे हैं पर जनमानस को इसके बारे में अधिक नहीं मालुम।
बहरहाल हम पाठ लिखते हैं तो पाठक पढ़ता है। हमारा पाठ भी उनको पढ़कर बता जाता है कि उसे किस तरह पढ़ा गया। अपने अनुभवों में सबसे अधिक हमें जिस बात ने चौंकाया है वह यह कि जब देश में क्लब स्तरीय प्रतियोगितायें होती हैं तब यहां पाठक संख्या तीस से चालीस प्रतिशत तक गिर जाती है। फिक्सिंग के आरोपों के चलते हम क्रिकेट कम ही देखते हैं और जब अचानक पाठक संख्या कम दिखती है तो दो तीन तक तो सोचते नहीं और बाद में पता चलता है कि यह सब चैंपियन लीग और आईपीएल की वजह से हुआ है। इससे पता चलता है कि भारत में लोग मनोरंजन का लंबा घटनाक्रम चाहते हैं और क्रिकेट जैसा सुस्त खेल उनको इसकी सुविधा प्रदान करता है। इस पर बीस ओवरीय मैचों में चौके छक्के अधिक लगने से लोग ज्यादा मनोरंजन लेते हैं। बाज़ार और प्रचार समूहों के पास क्रिकेट एक ऐसा हथियार लग गया है जिसे वह समय के अनुसार परिवर्तन कर अपने लिये आय के साधन जुटा लेते हैं। ऐसे में फिक्सिंग के आरोप भी इस खेल से लोगों को विरक्त नहीं कर पाये। यही कारण है कि 14 सितम्बर हिन्दी के दिवस आसपास जहां इस ब्लाग समूह के 20 ब्लाग जहां एक दिन में नौ हजार के आसपास पाठक/पाठ पठन संख्या जुटा रहे थे अब दो हजार की संख्या पार करने को भी तरस गये हैं। उस समय दीपक बापू कहिन अकेला ही इस संख्या के पास था। चैपियन लीग के चलते सब गड़बड़ हो गया। बहरहाल यह शिकायत नहीं है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसका हम पहले भी उल्लेख कर चुके हैं पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
‘शब्दलेख पत्रिका’ को दो लाख पर करना कोई बड़ी बात नहीं है पर इसका उल्लेख इसलिये भी करना जरूरी है ताकि हिन्दी ब्लाग जगत के विश्लेषक उसे देख सकें। पाठक भी यह बात समझें कि वह अकेले ही हिन्दी ब्लाग पर सक्रिय नहीं है बल्कि उनकी गतिविधियों का सकारात्मक प्रभाव लेखक पर पड़ता है। इस पर सभी साथी ब्लाग लेखकों और पाठकों धन्यवाद करते हुए इस बात का वादा करते हैं कि अपने निष्काम प्रयास करते हुए निष्प्रयोजन लेखन दान हम करते रहेंगे।
दीपक भारतदीप
नीचे वह लेख अवश्य पढ़ें जो दीपक बापू कहिन पर अन्ना हजारे के आद्नोलन के राजनीती की तरफ बढ़ने की संभावना व्यक्त की गयी थी ।
अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होने का मतलब-हिन्दी संपादकीय लेख (anna hazare ka anshan samapt hone ka matlab-hindi editorial article or lekh)
अन्ना हजारे का अनशन समाप्त होने पर पूरे देश में जश्न मनाया जा रहा है। कोई इसे लोकतंत्र की जीत बता रहा है तो किसी का दावा है कि इस लोकचेतना का संचार हुआ है। भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल बनाने को लेकर महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे ने 12 दिन तक जमकर अनशन किया। अंततः कुछ आश्वासनों पर हजारे साहब ने बड़े राजनीतिक चातुर्य के साथ आधी जीत बताकर उसे समाप्त कर दिया। संविधान और राजनीतिक विश्लेषकों की बात माने तो आधी जीत तो दूर अभी उनका अभियान अपनी जगह से एक इंच हिला भी नहीं है। इतना ही नहीं अब कथित रूप से गैरराजनीतिक होने का दावा करने वाली उनकी कथित ‘अन्ना टीम’ अंततः परंपरागत राजीनीतिक दलों के शिखर पुरुषों में की दरबार में मदद मांगने भी जा पहंुची। जब देश में कानून बनाने में संसद सर्वोपरि है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दलीय राजनीतिक दलों के आधार पर ही गठित होती है। ऐसे में उनके साथ संवाद करना उस आदमी के लिये भी जरूरी होता है जो स्वयं गैरराजनीतिक है पर किसी जनसमस्या का हल चाहता है। दूसरी बात यह है कि अगर कोई समूह अपने मनपसंद का कानून बनाना चाहता है तो उसके पास चुनाव लड़ना ही एक जरिया है। किसी गैर राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से कानून बनाना एक आत्ममुग्ध प्रक्रिया हो सकती है जिससे परिणाम प्रकट नहीं होता चाहे नारे कितने भी लग जायें। अन्ना की टीम यह जानती है और ऐसा लगता है कि कहंी न कहीं भविष्य के चुनाव उसकी नजर में है।
अब हम जो देख रहे हैं तो लग रहा है कि अन्ना हजारे और अन्ना टीम दो अलग अलग केंद्र बन गये हैं। अन्ना टीम के सदस्य पेशेवर अभियानकर्ता हैं जबकि अन्ना स्वयं एक फकीर हैं। अलबत्ता राजनीतिक चातुर्य उनमें कूटकूटकर भरा ही यही कारण है कि उन्होंने पेशेवर अभियानकताओं की दाल नहीं गलने दी। इससे हुआ यह कि एक स्वामी नामधारी एक पेशेवर अभियानकर्ता उनसे नाराज हो गया। उसका सीडी जारी हो गया है जिसमें वह अपने किसी मित्र के साथ सहयोगियों की निंदा कर रहा है। सच तो यह है कि उसके शामिल होने की वजह से लोग इस आंदोलन को अनेक बुद्धिजीवी शक की नजर से देख रहे थे। कहने को वह जोगिया वस्त्र पहनता है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की निंदा उसके श्रीमुख से कई बार सुनी गयी है। उस पर यह आरोप लगता है कि वह समाज सेवा की आड़ के केवल दिखावा करता है। हमारा उसके चरित्र से मतलब नहीं है पर इतना जरूर अब लग रहा है कि आने वाले समय में अन्ना टीम को अनेक तरह के सवालों का सामना करना पड़ेगा।
अन्ना हजारे ने कहा था कि यह आधी जीत है। लोग फूल रहे हैं। जश्न बनाये जा रहे हैं। विवेकशील लोगों के लिये इतना ही बहुत है कि अन्ना जी ने अनशन तोड़ दिया। दूसरी बात यह भी लग रही है परंपरागत समाज सेवी और राजनीतिक संगठन अब चेत गये हैं। अभी तक वह देश के जनमानस में फैले असंतोष का शायद सही अनुमान नहीं कर पाये थे जो अन्ना के अनशन के लिये शक्ति बना और अन्ना टीम उसके आधार पर ऐसा व्यवहार करने लगी कि वह कोई संवैधानिक संगठन है। वैसे हम यहां साफ कर दें कि इस अनशन की समाप्ति से कोई हारा नहीं है कि किसी को विजेता बताया जाये। अलबत्ता प्रचार माध्यमों के लिये यह अनशन महान कमाई का साधन बन गया। पूरे पंद्रह दिन तक उन्होंने इस प्रकरण को जिस तरह चलाया वह आश्चर्यजनक लगता है। अलबत्ता इस चक्कर में उन्होंने देश के संविधानिक संगठनों के महत्व को कम कर दिखाया। आज तो सारे चैनल दूसरी आजादी का जश्न मना रहे हैं। अब इस आजादी का मतलब कौन पूछे?
भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के लिये यह एक दो दिन आत्म मंथन का समय है जब उनको प्रचार माध्यम हाशिए पर बैठा दिखा रहे हैं। विवेकवान लोग जानते हैं कि भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान में अनेक बुद्धिमान लोग सक्रिय हैं। शीर्ष पदों पर है और अपनी चतुराई से उन्होंने इस आंदोलन की हवा निकाल दी है। यह अलग बात है कि इस आंदोलन की वजह से उनके मन में अब तेजी से जनकल्याण का भाव आया लगता है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा संविधान हैं तो हम बचे हुए हैं और संसद और सत्ता प्रतिष्ठान कहीं न कहीं हमारे चुने हुए लोगों की सक्रियता के कारण चल रहे हैं।
पिछले 15 दिनों से परंपरागत राजनीतिक संगठन को शीर्ष पुरुषों ने शायद बहुत तनाव झेला होगा पर अब वह यकीनन चेत गये होंगे। अन्ना साहेब भले हैं पर उनकी टीम का का व्यवहार राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अन्ना अकेले अनशन कर रहे थे पर यह अन्ना की टीम केवल राजनीति करती दिखी। ऐसा लगा कि अन्ना का अनशन उनकी निजी जागीर हो। अभी एक स्वामी की हवा निकली है और अब उनका सामना देश के समस्त परंपरागत राजनीतिक संगठनों से होगा तो पता नहीं कितनों की हवा निकल जायेगी। आखिरी बात यह है कि इस गलत फहमी में किसी को नहीं रहना चाहिए कि अन्ना टीम कोई हाथ पर हाथ धरे बैठेगी। ऐसा लगता है कि अगले चुनाव में इसके लोग मैदान में भी उतर सकते हैं। परंपरागत राजनीतिक दलों को उनकी इस बात पर यकीन नहीं करना चाहिए वह गैरराजनीतिक लोग हैं। दरअसल अन्ना टीम धीरे धीरे परंपरागत राजनीतिक संगठनों को अप्रासंगिक दर्शाते हुए जनता में उनकी छवि खराब करेगी फिर आखिर यही कहेगी कि चुनाव में हमें जितवाने के अलावा जनता के पास कोई चारा नहीं है।
विवेकशील पुरुष इस बात से खुश हैं कि अन्ना साहेब के अनशन से देश भर में उपजा तनाव खत्म हो गया है पर जिस तरह इसकी कथित विजय पर जश्न मन रहा है वह शक पैदा करता है कि वाकई यह कोई भ्रष्टाचार की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाले हैं। अब तो मामला चुनाव सुधार की तरफ मुड़ गया है। अन्ना साहेब भले हैं पर अपना राजनीतिक इस्तेमाल होने देते हैं। कोई उनको चला नहीं सकता यह सच है पर अपनी राजनीतिक मौज के चलते वह अपने चेलों की सहायता करते हैं। वह कहते हैं कि वह महात्मा गांधी के अनुयायी हैं और यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी छवि राजनीतिक संत की रही है। अन्ना साहब की वाक्पटुता गजब की है और उनका एक एक वाक्य जनमानस में प्रभाव डालता है। जब वह कहते हैं कि अभी अनशन स्थगित किया है खत्म नहीं किया तो समझना चाहिए कि उनकी राजनीतिक मौज का सिलसिला जारी रहेगा। यह स्पष्ट है कि अनशन की समाप्ति पर वह विवेकवान लोगों के नजरिये को समझते हैं पर यह भी जानते हैं कि उनके नाम से जुटी भीड़ नारों पर चलने और वादों में बहने वाली है इसलिये उसे अपने साथ बनाये रखने के लिये यह अहसास दिलाना जरूरी है कि आधी ही सही जीत जरूर हुई है।
अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होना स्वागतयोग्य-हिन्दी लेख (end of anna hazare fast and agitation-hindi lekh or article)
महाराष्ट्र के समाज सेवी अन्ना हजारे आज पूरे देश के जनमानस में ‘महानायक’ बन गये हैं। वजह साफ है कि देश में जन समस्यायें विकराल रूप ले चुकी हैं और इससे उपजा असंतोष उनके आंदोलन के लिये ऊर्जा का काम कर रहा है। पहले अप्रैल में उन्होंने अनशन किया और फिर अगस्त माह में उन्होंने अपने अनशन की घटना को दोहराया। जब अप्रेल में उन्होंने अनशन आश्वासन समाप्त किया तब उनका मजाक उड़ाया गया था कि वह तो केवल प्रायोजित आंदोलन चला रहे हैं। अब की बार उन्होंने 12 दिन तक अनशन किया। इस अनशन से भारत ही नहीं बल्कि विश्व जनमानस पर पड़े प्रभावों का अध्ययन अभी किया जाना है क्योंकि इस प्रचार विदेशों तक हुआ है। फिर जिन लक्ष्यों को लेकर यह अनशन किया गया उनके पूरे होने की स्थिति अभी दूर दिखाई देती है मगर देश के चिंतकों के लिये इस समय उनकी उपेक्षा करना ही ठीक है। अन्ना हजारे के अनशन आंदोलित पूरे देश के लोगों ने उसकी समाप्ति पर विजयोन्माद का प्रदर्शन किया पर महानायक ने कहा‘‘यह जीत अभी अधूरी है और अभी मैंने अनशन स्थगित किया है समाप्त नहीं।’ इस बयान से एक बात तो समझ में आती है कि अन्ना साहेब में राजनीतिक चातुर्य कूट कूटकर भरा है।
अन्ना साहेब के बारह दिनों तक चले अनशन में तमाम उतार चढ़ाव आये और अगर उनका उसे छोड़ना ही सफलता माना जाये तो कोई बुरी बात नहीं है। साथ ही लक्ष्य से संबंधित परिणामों पर दृष्टिपात न करना भी ठीक है। पूरे देश का जनमानस ही नहीं जनप्रतिनिधियों के मन में जो भारी तनाव इस दौरान दिखा वह चौंकाने वाला था। इसका कारण यह था कि हिन्दी प्रचार माध्यम निरंतर इससे जुड़े छोटे से छोटे से घटनाक्रम का प्रचार क्रिकेट मैच की तरह कर रहे थे गोया कि देश में अन्य कोई खबर नहीं हो।
अगर हम तकनीकी दृष्टि से बात करें तो अन्ना साहेब के प्रस्तावित जनलोकपाल ने अभी एक इंच कदम ही बढ़ाया होगा पर अन्ना साहेब की गिरते स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह भारी सफलता है। हम तत्काल इस आंदोलन के परिणामों पर विचार कर सकते हैं पर ऐसे में हमारा चिंत्तन इसके दूरगामी प्रभावों को देख नहीं पायेगा। इस आंदोलन के लेकर अनेक विवाद हैं पर यह तो इसके विरोधी भी स्वीकारते हैं कि इसके प्रभावों का अनदेखा करना ठीक नहीं है।
प्रधानमंत्री श्रीमनमोहन सिंह की चिट्ठी मिलने के बाद श्री अन्ना साहेब न अनशन तोड़ा। अपने पत्र में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यह अच्छी बात कही है कि ‘संसद ने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है जो कि देश के लोगों की भी है।’’
उनकी इस बात में कोई संदेह नहीं है और इस विषय पर संसद के शनिवार को अवकाश के दिन विशेष सत्र में सांसदों ने जिस तरह सोच समझ के साथ ही दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने विचार जिस तरह दिये वह इसका प्रमाण भी है। संभव है विशेषाधिकार के कारण कुछ सांसदों के मन में अहंकार का भाव रहता हो पर कल सभी के चेहरे और वाणी से यही भाव दिखाई देता कि किस भी भी तरह इस 74 वर्षीय व्यक्ति का अनशन टूट जाये जो कि इस देश के जनमानस का ही भाव है। सच बात तो यह है कि इस बहस में आंदोलन से जुड़े संबंधित सभी तत्वों का सार दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रचार माध्यमों के सहारे इस आंदोलन की सफलता की बात कही गयी। अनेक सांसदों ने इस आंदोलन के उन देशी विदेशी पूंजीपतियों से प्रायोजित होने की बात भी कही जो भारत की संसदीय प्रणाली पर नियंत्रण करना चाहते हैं। इसके बावजूद सभी ने श्री अन्ना हजारे के प्रति न केवल सभी ने सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके चरित्र की महानता को स्वीकार भी किया। देश के जनमानस का अब ध्यान करना होगा यह बात कमोबेश सभी सांसदों ने स्वीकार की और इस आंदोलन के अच्छे परिणाम के रूप में इसे माना जा सकता है।
देश के जिन रणनीतिकारों ने इस विषय पर संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बनाई हो वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि श्री अन्ना साहेब की वजह से देश के युवा वर्ग ने उसे देखा और यकीनन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रुचि बढ़ेगी। देश के संासदों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इस बात को अनुभव किया कि अन्ना साहेब की देश में एक महानायक की छवि है और उन पर आक्षेप करने का मतलब होगा देश की आंदोलित युवा पीढ़ी के दिमाग में अपने लिये खराब विचार करना इसलिये शब्दों के चयन में सभी ने गंभीरता दिखाई। बहरहाल कुछ सांसदों ने प्रचार माध्यमों पर आंदोलन को अनावश्यक प्रचार का आरोप लगाया पर उन्हें यह भी याद रखना होगा इसी विषय पर हुए विशेष सत्र के बहाने उन्होंने पूरे देश को संबोधित करने का अवसर पाया जिसे इन्हीं प्रचार माध्यमों ने अपने समाचारों में स्थान दिया। यह अलग बात है कि इस दौरान उनके विज्ञापन भी अपना काम करते रहे। वैसे तो संसद की कार्यवाही चलती रहेगी पर इस तरह पूरे राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर सांसदों के पास बहुत समय बाद आया। उनको इस बात पर भी प्रसन्न होने चाहिए कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र को संबोधित न करने के कारण जनप्रतिनिधियों पर देश के जनमानस की उपेक्षा का आरोप लगता है वह इस अवसर के कारण धुल गया क्योंकि उन्होंने देश की इच्छा को ही व्यक्त किया।
हम जैसे आम लेखकों के पास इंटरनेट और प्रचार माध्यम ही है जिसके माध्यम से विचारणीय सामग्री मिलती है यह अलग बात है कि उसे छांटना पड़ता है। होता यह है कि समाचार पत्र और टीवी चैनल अपनी रोचकता का स्तर बनाये रखने के लिये किसी एक घटना में बहुत सारे पैंच बना देते हैं और फिर अलग अलग प्रस्तुति करने लगते हैं। सामग्री में दोहराव होता है और जब पाठकों और दर्शकों के अधिक जुड़ने की संभावना होती है तो उनके विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं। समस्त प्रचार माध्यम धनपतियों के हाथ में और यही कारण है कि अन्ना साहेब के आंदोलन के प्रायोजन की शंका अनेक बुद्धिमान लोगों के दिमाग में आती है। इसमें कुछ अंश सच हो सकता है पर एक बात यह है अन्ना साहेब एक सशक्त चरित्र के स्वामी हैं।
आखिरी बात यह है कि भोगी कितना भी बड़ा पद पा जाये वह बड़ा नहीं कहा जा सकता। बड़ा तो त्यागी ही कहलायेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना साहेब ने अन्न का त्याग किया था। पूरे 12 दिन तक अन्न का त्याग करना आसान काम नहीं है। हम जैसे लोग तो कुछ ही घंटों में वायु विकार का शिकार हो जाते हैं। अन्ना साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना लोगों के सामने प्रस्तुत की है जो अभी स्वप्न ही लगता है पर सबसे बड़ी बात वह अभी अपने प्रयास जारी रखने की बात भी कह रहे हैं। मुश्किल यह है कि वह अनशन शुरु कर देते हैं तब आदमी का हृदय कांपने लगता है। यही कारण है कि उनका अनशन टूटना भी ही लोगों में विजयोन्माद पैदा कर रहा है। उन्होंने जिस तरह आज की युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त बनाया उसकी प्रशंसा तो की ही जाना चाहिए जो कि अंततः हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वाहक हैं।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior
writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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अक्टूबर 9, 2011 – 9:46 पूर्वाह्न
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