चाणक्य नीतिःसंपत्ति वही जो सभी के काम आये

किं तया क्रियते लक्ष्य्या या वधूरिव केवला
या तु वेश्येध सामान्या पथिकैरपि भुज्यते

उस संपत्ति को कोई लाभ नहीं है जो कुलवधू के समान केवल स्वामी के स्वयं के ही काम आती हो। उसका उत्तम उपयोग तो तभी संभव है जब वह नगरवधु के समान दूसरों के काम भी आये। राहगीर भी उसका उपयोग कर सकें।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल सभी जगह संपत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति लोगों में बहुत है। जिसे देखो वही संपत्ति बनाने में लगा हुआ है। हां इसके साथ लोगों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ी है कि वह संपत्ति किसी अन्य को सुख प्रदान न करे। अपने समान धनिक का तो वह स्वागत करने के लिये तत्पर रहते हैं पर वह आते नहीं और निर्धन का आना उन्हें स्वीकार नहीं। इस कारण उनके घरों  की सारी सुख सुविधाएं केवल उनके स्वयं के उपयोग की होकर रह जातीं हैं।

लोगों ने अपनी कालोनियों में सरकार द्वारा पेड़-पौघों के लिये छोड़ी गयी  जगह तथा प्याऊओं पर अतिक्रमण कर लिया है। उस कालोनी में अपना सामान बेचने आने वाले गरीब लोगों और वहां से गुजरने वाले पथिकों की छाया और पानी की सुविधा का अधिकार छीन लिया है। इससे कोई वह भी सुखी नहीं क्योंकि उनके वैभव को सराहने वाला कोई नहीं होता। कोई भी अपने घर के बाहर प्याऊ लगाना नहंी चाहता। ऐसे पेड़ काट देता है जो राहगीर को शीतलता प्रदान करते हैं। केवल अपनी संपत्ति का सुख स्वयं उठाने से कोई आनंद नहीं होता यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए। उसका आनंद तभी है जब हम उसको दूसरों के साथ बांटे।

रहीम के दोहेःपरोपकार करने वाले को बीच में मत छोड़ो

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने दीन्हों हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि परोपकार करने वाले व्यक्ति की मित्रता को बीच में ही नहीं छोड़ देना चाहिए। राजा शिवि ने अपने शरीर का मांस काटकर कबूतर के वजन के बराबर करने के लिए दान दिया  था और ऋषि दधीचि ने इंद्र के वज्र के लिए अपनी हड्डियां दान में दे दी थीं।

वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-इस दुनियां में परोपकार करने वाले मित्र वैसे ही बहुत कम मिलते हैं ऐसे में अगर कोई हमारा ऐसा संगी साथ है जो एक बार हमारा काम कर देता है तो फिर हमें उससे मूंह नहीं फेरना चाहिए क्योंकि फिर कभी कोई परेशानी आई तो उसके सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।
वैसे आजकल लोगों की परेशानियों का कारण यह भी है कि उन्हेंं अच्छे-बुरे व्यक्ति की पहचान नहीं रही। अगर किसी में कोई काम फंस जाता है तो उससे वह करवाकर ऐसे मूंह फेर लेते हैं जैसे जानते ही नहीं हो पर बाद में जब विपत्ति आती है तो स्वयं ही दोबारा अपना काम कहने में उन्हें शर्म आती है। आजकल लोग अपने मित्रों के साथ भी ‘उपयोग करो और फैंक दो’ (यूज एंड थ्रो) की नीति पर चलते हैं पर याद रखने लायक बात यह  है कि पग-पग पर परोपकारी लोग नहीं मिलते पर विपत्तियों का दौर शुरू होता है तो पग-पग पर आतीं हैं। इसलिये संयोग से कोई परोपकारी साथी मिल जाये तो फिर उसे नहंी छोड़ना चाहिए। हालांकि ‘उपयोग करो और फैंक दो’ की नीति कहने सुनने में हमारी बुद्धिमानी का परिचायक लगती है पर पश्चिम से आयातित यह नीति अपने देश के लिए अनुपयुक्त है।

मनुस्मृतिःईमानदारी से धन कमाना ही है सबसे बड़ी पवित्रता

सर्वैषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्
योऽथेंशुचिहिं स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः

जीवन में पवित्रता जरूरी है पर इनमें ईमानदारी से धन कमाने की पवित्रता सबसे महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी आजीविका ईमानदारी से कमाता है वह सदा ही पवित्र समझा जाना चाहिए। अगर धनोपर्जन में पवित्रता नहीं तो मिट्टी पानी आदि से अपने को शुद्ध करना व्यर्थ है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय टिप्पणी- अब धीरे-धीरे यह बात समझ में आने लगी है कि क्यों लोग मनुस्मृति की कुछ जातिवादी टिप्पणियों को लेकर उनकी आलोचना करते हैं और उसमें वर्णित अन्य ज्ञानपूर्ण वचनों का अनदेखा करते हैं। समाज में बेईमान, चालाकी और धोखे से धन कमाने वालों के प्रति आकर्षण बढ़ा है और सारी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के सूत्र उनके हाथ में चले गये हैं। उन्हें मनुस्मृति के संदेश कटु लगते होंगे और इसलिये ही वह नहीं चाहते कि मनुस्मृति की चर्चा एक धार्मिक पुस्तक के रूप में हो।
मनु महाराज के अनुसार तो अनुचित रूप से धन कमाने वाला कभी पवित्र नहीं हो सकता और उसे देखते हुए तो केवल मजदूर, गरीब और मध्यम वर्ग के कुछ  लोग ही पवित्र रह जाते हैं। अगर उचित  तरीके से धन कमाने की बात करें तो हमें निचले वर्ग के लोगों  के अलावा अन्य कहीं मिल ही नहीं सकते। ऐसे लोग मनुस्मृति नहीं पढ़ते वरना वह तो अपनी पवित्रता का दावा करते तब तो धनाढ्य लोगों के लिए मुश्किल हो जाती। इस समय जो चमक सब तरफ दिख रही है वह क्या उचित प्रकार से धन कमाने की वजह से है? यह एक विचारणीय प्रश्न हो गया है। इतना ही नहीं हमारे कर्मकांडों में पवित्रता के अनेक रूप गढ़े गये हैं और वह काल्पनिक ही लगते हैं। मनु महाराज की पवित्रता की  सबसे बड़ी शर्त ईमानदारी से धन कमाने की है और कितने लोग इस समाज के इस कसौटी पर खरे उतरेंगे यह विचार का विषय है। तमाम तरह के लोग धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। कोई शांति के लिये यज्ञ करा रहा है कोई वर्षा के लिये यज्ञ करा रहा है तो कोई  खेलों में देश की टीमों को जितवाने के लिये टोटका करा रहा है पर प्रश्न एक ही क्या उनमें ईमानदारी से कमाया धन लग रहा है?

यह आश्चर्य का विषय है कि मनुस्मृति के बारे में  लोगों में शायद भ्रांत धारण इसीलिये भरी गयी है ताकि वह कहीं अधिक ज्ञानी न हो जायें और उनकी बुद्धि को भ्रमित कर उनका दोहन कठिन न हो जाय। अगर मनु महाराज के इस श्लोक पर विचार किया जाये तो यह समझ में आ सकता है कि ईमानदार होना ही सबसे अधिक पवित्र होना है। 

मनुस्मुतिःस्त्रियों का सम्मान न हो तो शुभकर्मों का फल भी नहीं मिलता

 पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस्तथा
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः

विवाह के समय अपने कल्याण पिता, भाई, पति और देवर कन्या को वस्त्र और आभूषण से संसज्जित कर सकते हैं। कन्य इस तरह सुसज्जित करना पूजा करना कहलाता है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रेतास्तु न पूज्यन्त सर्वास्तात्राफलसः क्रियाः

जहां नारियों का आदर सम्मान होता है वहां देवता भ्रमण करते है और जहां उनका इसके विपरीत होता   वहां शुभ प्रकार के कर्मों का भी कोई फल नहीं होता

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वर्तमान समाज में दहेज एक विकट समस्या है और देखा जाये तो मनु जी के अनुसार उसका एक तरह से विरोध ही किया गया है। उनका कहना है कि विवाह के समय कन्या को पति और भाई के साथ पति और देवर भी वस्त्र और आभूषण दे सकते हैं। एक श्लोक में उन्होंने कन्या के पिता द्वारा अपनी कन्या के लिये वर पक्ष से धन लेना वर्जित बताया  है पर यह कहीं नहीं कहा कि कन्या को वह दहेज दें। हालांकि आजकल ससुराल वाले कन्या के लिये गहने और वस्त्र तो करते हैं पर पहले उसके लिये कन्या पक्ष वालों से भारी राशि वसूल करते हैं। यह अनुचित और मनु द्वारा स्थापित पंरपराओं के विपरीत है।

कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जातिवाद को आधार मानकर मनु स्मृति को समाज से विस्मृत करने का प्रयास इसीलिये  किया गया है ताकि कर्मकांडों को समाज पर लादकर उसे बैल की तरह उसे ढोते रहने को बाध्य किया जाये। मनु जी का कहना है कि स्त्रियों का जहां सम्मान नहीं होता वहां शुभकर्मों का भी फल नहीं मिलता। जबकि अनेक धर्मकर्म करने वाले अपनी स्त्रियों को दासी की तरह समझते हैं। एक बात तय है कि मनु स्त्री और पुरुष का जीवन के एक सिक्के की तरह मानते हैं इसलिये वह स्त्री के सम्मान की बात करते हैं। मनु के समय में भी मनुष्य समाज पुरुष प्रधान समाज था और आज भी है और भले ही स्त्रियां आजकल नौकरी और व्यापार में काम कर रहीं है पर वह भी अपने पति और बच्चों को उतना ही प्यार करतीं हैं जितना मनु के समय में करतीं रहीं होंगी। इस प्यार के कारण वह पति का सहयोग नहीं  मिलने पर भी परिवार के कार्यों का समूचा बोझ अपने सिर पर ले लेतीं हैं। इसके बावजूद कई परिवारों में उनको सम्मान नहीं मिलता। जहां स्त्रियां कामकाजी नहीं है तो वहां तो उन्हें और भी परेशान होना पड़ता है। स्त्रियां बहुत सहनशील होतीं हैं और अपने घर की इज्जत को ढंकने के लिये बाहर अपनी घर-परिवार की व्यथाएं नहीं कहतीं पर मनु महाराज के अनुसार पुरुषों को यह समझना चाहिए कि उनके मन से उठी आह उनके शुभकर्मों-यज्ञ, हवन और मंत्रोच्चार से मिलने वाले लाभों से वंचित कर सकतीं है।

 


मनु स्मृतिःधन और अन्न न हो तो जल का दान भी पुण्य देना वाला

भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्
वेदतत्त्वर्थविदूषे, ब्राहणानापादयेत,

यदि अपने घर में खाद्यान्न न हो तो एक ग्रास भर भिक्षा या दान देने के लिये उसे स्वादिष्ट बना कर और यदि वह भी न हो तो वेद के तत्व और अर्थ को जानने वाले आदरपूर्वक जल पिलाने वाले गृहस्थ को भी पुण्य की प्राप्त होती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा तो कि धर्म निभाना तो अमीरों के बस का है और गरीब को तो बस अपनी रोटी कमाने से फुरसत भी नहीं है। अमीरों को दान करते देखकर गरीब भी यह सोचते हैं कि जिसके पास माया है उसे ही दान देने का अधिकार भगवान ने दिया है हम तो बिना कुछ दान किये ऐसा पुण्य प्राप्त नहीं कर सकते। दरअसल यह केवल अपने आप को दुःख देने के अलावा कुछ नहीं है। मनुष्य योनि में दान की महता इसलिये बताई गयी है क्योंकि वही एक ऐसा जीव है जिसके पास बुद्धि है और वह किसी को दे सकता है। भिक्षा या दान देकर पुण्य कमाने का मूल आशय यह नहीं है कि आपने क्या और कितना दान किया है बल्कि आपने अपने पास से कुछ दान दिया यह महत्वपूर्ण है। अगर धन नहीं है तो अन्न और वह भी पर्याप्त नहीं है तो केवल एक ग्रास और वह भी नहीं है तो दर पर आये किसी सहृदय सज्जन को जल पिला दें तो वह भी पुण्य प्रदान करता है।

हो सकता है कि कुछ लोग गंभीर  चिंतन करते हुए या मजाक में कह दें कि पानी भी न हो तो फिर काहे का दान? इतना तय है कि जल बिना जीवन नहीं है और अगर कोई जीव है तो वहां जल-कही अधिक तो कहीं कम-उपलब्ध होता है और अगर किसी प्यासे को पानी पिलाता है वह स्वयं प्यासा नही तड़पता। तात्पर्य यह है कि अपने हाथ से कुछ किसी को देना ही भिक्षा या दान है और हम अगर किसी को अधिक धन नहीं दे पा रहे तो थोड़ा सा उसमें से किसी को देकर अपने मनुष्य होने की अनुभूति तो कर ही सकते है।