प्राचीन ज्ञान से विमुख होना समाज के लिए कष्टकर-भर्तृहरि नीति शतक


      अंग्रेजों ने भारत में जिस शिक्षा पद्धति को स्थापित किया उसका प्रचलन निर्बाध गति से हमारे देश में अब भी जारी है।  इस पद्धति को अपनाये रखने का कारण यह है कि इसके आधार पर विद्याध्यन करने के पश्चात् जो उपाधियां प्राप्त होती हैं उसी से निजी तथा सरकारी क्षेत्रों में नौकरियां करने का अवसर आधुनिक गुलामों को मिलता है।  यह अलग बात है कि हमारे शैक्षणिक क्षेत्र के विद्वान आज भी देश में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या को देखते हुए शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुखी बनाने की मांग करते हैं।

      पहले तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा करने वालों को भी नौकरी ढूंढने के अभियान में लगना पड़ता था पर उदारीकरण ने ऐसी स्थिति बना दी है कि तकनीकी महाविद्यालायों मेें अध्ययन करने के दौरान ही नौकरी देने वाले शिविर लगाकर छात्रों का भावी गुलाम कें रूप में चयन किया जाने लगा है। आजकल  किसी भी शैक्षणिक संस्थान की प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने  अपने यहां अध्ययनरत कितने अधिक छात्रों को गुलामी का अवसर का लाभ उठाने की सुविधा प्रदान की।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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पुरा विद्वत्तासीदुषशमवतां क्लेशहेतयेगता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।

इदानीं सम्प्रेक्ष्य क्षितितलभुजः शास्त्रविमुखनहो कष्ट साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशत।।

     हिन्दी भावार्थ-पहले लोग मानसिक रूप से दृढ़ होने के लिये विद्याध्ययन करते थे। कालांतर में विषयों में आसक्त होने पर सुख प्राप्त करने के लिये उसका अनुकरण किया। अब तो लोग शास्त्रों से विमुख हो गये हैं। वह उनका नाम भी नहीं सुनना चाहते थे। राजाओं ने भी शास्त्रों में मुंह फेर लिया है। इस तरह यह प्रथ्वी रसातल में जा रही है वह चिंत्ता का विषय है।

      आमतौर से हमारे यहां के धार्मिक विद्वान शास्त्रों से विमुख होने की शिकायत करते हैं पर यह कोई नयी बात नहीं है। हमारे समाज में भले ही प्राचीन ग्रंथो को मान्यता प्राप्त है पर उसमें स्वाध्याय करने का मन सहजता से नहीं लगता। यही कारण है कि जो उनका अध्ययन करते हैं वह उसका व्यवसायिक उपयोग करते समाज में गुरु पद पर प्रतिष्ठित हों जाते हैं।  लोग फुर्सत के समय उनके प्रवचन सुनकर मनोरंजन के रूप में आनंद उठाते हैं।

        दरअसल प्राचीन ग्रंथों का अध्यात्मिक अध्ययन प्रारंभ में विषतुल्य प्रतीत होता है पर कालांतर में उसके आधार पर इस मायावी संसार के नाटकीय दृश्य देखकर उनका विश्लेषण करने की सुविधा मिलती है जो अत्यंत मनोरंजक होती है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भाव के त्याग का अत्यंत महत्व प्रतिपादित करने के साथ ही यह भी बताया गया है कि भोग का सुख क्षणिक होने के साथ कालांतर में उसका  प्रभाव विकार के रूप में प्रकट होता है।  अज्ञान के अभाव में लोग भोग के स्वरूप को ही जीवन का आनंद समझते हैं।  इतना ही नहीं लोगों में सबसे बड़ा भोगी बनने की होड़ लगी है।  यही कारण है कि देश में दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रोगियों की संख्या बढ़ी है।

      आज के समय हम प्राचीन शिक्षा पद्धति की बात तो कर ही नहीं सकते।  कारण यह है कि भारत में मानव श्रम अधिक मात्रा में है और उसका निर्यात भी होता है।  हम जिन लोगों को विदेशों में नोक्री करते देखते हैं वह मानव श्रम के निर्यात का ही रूप है।  अंग्रेजी भाषा का इसलिये अपनाये रखा गया है ताकि श्रम निर्यात करने की सुविधा बनी रहे।  ऐसे में शिक्षा के पाठयक्रम में भारतीय ग्रंथों को समाहित करने का विचार प्रकट करने पर सामान्य व्यक्ति भी हंसेगा तब अंग्रेजी शिक्षा से उच्च पद पर लोगों से समर्थन की आशा करना भी व्यर्थ है।

      यह अलग बात है कि समाज में नैतिक, भावनात्मक तथा वैचारिक पतन का रोना सभी होते हैं। हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने अपने परिश्रम से जीवन के सत्य की खोज कर प्रस्तुत कर दी है।  नया कोई सत्य दृष्टिागोचर नहीं होता।  ऐसे में जिन लोगों को ज्ञान के आधार पर जीवन का आंनद उठाना है उन्हें प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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सार्वजनिक जगहों पर कूड़ा करना अपराधिक कृत्य-मनुस्मृति के आधार चिंत्तन लेख


            हमारे देश में सार्वजनिक स्थानों, मार्गों तथा उद्यानों में भारी गदंगी होने के समाचार आते हैं। अनेक पुराने लोग यह शिकायत करते मिलते हैं जो राजतंत्र के समय शहर के साफ होने की बात कहते हुए आधुनिक लोकतंत्र में व्यवस्था चौपट होने का दावा करते हैं पर सच यह है कि उस समय उपभोग की ऐसी प्रवृत्ति नहीं थी जैसी कि आज है।  लोगों का खान पान अब घर से अधिक बाहर हो गया है।  अंडे, मांस, सिगरेट, शराब, तथा तैयार  खान पान के सामानों का उपभोग बाजारों में धड़ल्ले से होने लगा है जिससे कचरे का भंडार कहीं भी देखा जा सकता है।  ऐसा नहीं है कि बाजारों में ऐसी वस्तुओं का उपभोग बढ़ा हो वरन् लोग घरों में मंगवाकर भी इन्हें सड़क पर ही फेंकते हैं।

            वर्षा ऋतु में पिकनिक मनाने की परंपरा बन गयी है, यह अलग बात है कि यही ऋतु भोजन के पाचन की दृष्टि से संकटमय मानी जाती है।  आजकल पंचसितारा निजी चिकित्सालयों में इसी ऋतु में भीड़ लगती है।  हर जगह कचरा कीचड़ में तब्दील हो जाता है और इससे महत्वपूर्ण जलस्थल तथा उद्यान सामान्य पर्यटकों के सामने बुरे दृश्य लेकर उपस्थित रहते हैं।  कहा जाता है कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती मगर सभी वस्तुओं को इसी में बांधकर उपभोक्ता को दिया जाता है। अनेक शहरों में  इस प्लास्टिक ने सीवर लाईनों को अवरुद्ध करने के साथ ही नदियों और नालों को प्रदूषित कर दिया है।  हमारे यहां पर्वतों तथा नदियों को पूज्यनीय बताया जाता है पर हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों पर जाने वाले कथित भक्तों ने किस तरह वहां अपनी उपभोग प्रवृत्तियों से प्रदूषण फैलाया है उस पर अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ नाखुशी जताते रहते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमध्यमनापदि।

स द्वौ कार्यापर्णे दद्यादमेध्यं चाशुशेधयत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-सार्वजनिक मार्ग पर कूड़ा फेंकने वाले ऐसे नागरिक जो अस्वस्थ न हों उन पर अर्थ दंड देने के साथ ही उसकी सफाई भी करवाना चाहिये।

आपद्गतोऽधवा वृद्धो गर्भिणो बाल एव वा।

परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः।।

            हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई संकट ग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बालक सड़क पर कचरा फैंके तो उसे धमकाकर सफाई कराना चाहिये।

            हमारे देश में मनस्मृति का विरोध एक बुद्धिमानों का समूह करता है। यह समूह कथित रूप से आम आदमी की आजादी को सर्वोपरि मानता है।  उस लगता है कि मनुस्मृति में जातिवादी व्यवस्था है जबकि सच यह है कि इसमें ऐसे अनेक महत्वपूर्ण संदेश है जो आज के समय भी अत्यंत प्रासांगिक हैं। एक तरफ समाज प्लास्टिक के रंग बिरंगे रूपों में बंधे सामानों को देखकर विकास पर आत्ममुग्ध हो रहा है  जबकि अनेक प्रकार के विषाक्त, मिलावटी तथा सड़े खानपान से जो बीमारियां पैदा हो रही हैं उस पर किसी का ध्यान नहीं है।  उससे अधिक यह महत्वपूर्ण बात है कि अनेक लोग सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने की बजाय वहां कचरा डालकर न केवल अपने लिये वरन् दूसरों को भी कष्ट देते हैं।  इसलिये जागरुक लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वह कचरा उचित स्थान पर डालकर पुण्य का काम करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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तरक्की और तमीज-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


एकरसता में जीने का आदी विलासिता में फंसा समाज,

मौसम के बदलने से परेशान हो रहा है आज।

वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपनी ऊंची हैसियत पर

इतराते लोग भूख पर बहस में होते मशगूल,

बेबात के विषय को देते जोरदार तूल,

जिनके पेट चिकनी रोटी से भरे हैं,

महंगाई पर चर्चा करते हुए उनकी आंखों में आंसु भरे हैं,

कहें दीपक बापू सभी दे रहे हैं अपने अपने बयान

किसके हाथ में है हालातों पर काबू करने की ताकत

यह अभी तक बना हुआ राज है।

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तमीज नहीं आयी खाने पीने की मगर तरक्की हो गयी,

लड़खड़ाते कदम नशे में मगर सभ्य समाज में

बैठने की उनकी जगह पक्की हो  गयी।

उनके पास इतनी दौलत है कि लुटने का भय नहीं सताता,

खर्च करते हैं पानी की तरह मगर फिर भी मजा नहीं आता।

आसमान के सितारों जैसा स्वयं के  होने का उनको वहम है,

ज़माने पर ज्यादितयों से फेरते मुंह गोया उनका दिल नरम है।

चेहरे थे जिनके फुंके बल्ब की तरह अब चांद जैसे लगते हैं,

अंधेरे में रहते थे अब उनके घर शेर की मांद  जैसे लगते हैं।

कहें दीपक बापू दौलत और शौहरत खेलती इंसानों से

अपने खिलाड़ी होने पर लोग यूं ही इतराते हैं

गिर गयी नीयत भले ही हालात में तरक्की हो गयी।

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ज्ञानी लोगों का ईश्वर सभी जगह मौजूद-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख


            जकल धर्म के नाम पर समाज में  कथित एकता स्थापित करने के लिये  यह नारा दिया जाता है कि ईश्वर एक है। वैसे तो  चाहे जिस स्वरूप की आराधना करें उसमें एक ही  ईश्वर के प्रति  ही आस्था का भाव स्वीकार किया जाना चाहिये। वैसे भारतीय अध्यात्म दर्शन में भी कुछ इस तरह ही कहा गया है पर अगर हम उसमें वर्णित संदेशों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि ईश्वर अनंत है।  उसके स्वरूप, गुण, विचार, तथा क्रियाओं को प्रत्यक्ष देखना लगभग असंभव है।  वह एक भी हो सकता है और अनेक भी।  वह अदृश्य है इसलिये उसके बारे में निश्चित रूप से कहना ठीक नहीं हैं। अन्य धर्मों के विद्वानों की क्या कहें स्वयं भारतीय धर्म के अनेक विद्वान आपस में उलझ जाते हैं।  एक वर्ग कहता है कि ईश्वर एक है और उसकी जिस रूप में आराधना की जाये अच्छा है, दूसरा कहता है कि उसकी लीला अनंत और अपरंपार है जिसे जानने की बजाय उसकी निराकार भक्ति करना ही श्रेष्ठ है।

            इस तरह के विवादों पर कोई निष्कर्ष न निकलता है न आगे संभावना है पर एक बात तय है कि ज्ञानी और साधक इस तरह की बहसों में मौन रहकर अपनी योग्यता का ही प्रमाण देते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से भक्ति तथा भक्तों के चार रूप बताये गये हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  इसका सीधा मतलब यही है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त मौजूद रहेंगे और किसी पर कटाक्ष करना या किसी की भक्ति में दोष देखना अज्ञान का ही प्रमाण है।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि

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अग्रिर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।

प्रतिमा स्पल्पबुछीनां सर्वत्र समदिर्शनाम्।।

            हिन्दी में भावार्थ-द्विजाति के देव अग्नि, मुनियों का देव हृदय तथा अल्पबुद्धिमानों का देव मूर्तियों में निवास करता है पर तत्वज्ञानी समदर्शी होते हैं इसलिये उनका देव हर जगह बसता है।

            भारतीय धार्मिक परंपराओं में भी अनेक प्रकार की उपासना पद्धतियां प्रचलित हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने हर उपासना पद्धति को मान्यता दी है पर यह भी माना है कि तत्वज्ञानी तो उनका ही स्वरूप है। कहने का अभिप्राय यह है कि जो वास्तव में तत्वज्ञानी है उसके लिये परमात्मा सभी जगह है।  वह किसी विशेष स्थान को सिद्ध मानकर वहां उपस्थिति देने की बाध्यता अनुभव नहीं करता यह अलग बात है कि जिज्ञासावश ज्ञानी ऐसे स्थानों पर जाते हैं। धाार्मिक बहसों में स्वयं को धार्मिक विद्वान साबित करना या जगह जगह ज्ञान बघारकर शिष्य संचय करना ज्ञानियों का स्वाभाविक कर्म कभी नहीं बन पाता।  न ही वह आश्रम बनाकर स्वयं को गुरु पद पर प्रतिष्ठत करते हैं। ज्ञानी तो श्रीमद्भागवत गीता के गुण तथा कर्म विभाग के सिद्धांतों को जानने के बाद सांसरिक विषयों में निर्लिप्त भाव से इस तरह व्यस्त होते हैं जैसे कीचड़ में कमल रहता है।

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रहीम दर्शन-सभी खुशी देने वाला ही राज्य सराहनीय


                      हमारे देश में राजपद पाने की लालसा अनेक लोग राजनीति में सक्रिय करते हैं।  जिनके पास पैसा, प्रतिष्ठा और पराक्रम है वह आधुनिक लोकतंत्र में पद पाकर समाज में अपना प्रभाव बढ़ने को उत्सुक रहते हैं।  यह पद की चाहत अपने मन में पूज्यता का भाव शांत करने के लिये पैदा होती है। सच बात तो यह है कि राजपद पाना हमारे देश में एक उपलब्धि तो माना जाता है पर उसके साथ जो दायित्व हैं उन पर किसी की दृष्टि नहीं जाती।  किसी भी राज्य का प्रबंध सहज नहीं होता उस पर भारत जैसे विशाल तथा विविधताओं वाले देश में तो सुशासन बनाय रखना एक बड़ी चुनौती होती है पर कभी यह नहीं लगता कि राजपद की कामना रखने अनेक लोगों को इसका आभास होता है।

कविवर रहीम कहते हैं कि

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रहिमन राज सराहिए, ससि सम सुखद जो होय।

कहा बापुरो भानु है, तपै तरैयन खोय।।

                   हिन्दी में भावार्थ-वही राज्य सराहनीय है जिसमें सभी लोग वर्ग के लोग खुश रहें। जहां सभी को आगे बढ़ने का अवसर मिले और जहां सभी को अपने काम काम पूरा दाम मिले वही राज्य सुशासित कहलाता है।

                      राज्य प्रमुख का यह कर्तव्य रहता है कि वह अपने अंतर्गत रहने वाले विभिन्न वर्ग, वर्ण तथा विचार वाले लोगों की रक्षा करे।  सभी को आगे बढ़ने के समान अवसर मिले। हम देख रहे हैं भारत में आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली होने के बावजूद वैसी अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं जैसी अपेक्षा की गयी थी।  देखा यह गया कि इस लोकतंत्र की आड़ में वैसी राजशाही, वंशवाद तथा वणिक वृत्ति राज्यकर्म में व्याप्त हो गयी है जैसे पहले हुआ करती थी।  हालांकि अभी हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव के परिणामों में आम लोगों ने यह जता दिया है कि वह देश में एक सच्चा लोकतंत्र चाहते हैं।  इन चुनाव परिणामों से यही संदेश मिला है कि लोग इस देश में राज्य से अपने विकास तथा रक्षा की अपेक्षा करते हैं।  वह छोटी छोटी बातों से बहलने वाले नहीं है। न ही कथित नारे उनको प्रभावित कर सकते हैं।  यह अलग बात है  कि इस संदेश को राजपद पाने का मोह रखने वाले लोग कितना समझ पाते हैं।

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कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है-गुरू पूर्णिमा पर विशेष हिन्दी लेख


            आजकल एक संत को भगवान मानने या मानने के विषय को  लेकर प्रचार माध्यमों पर बहस चली रही है। हमारे यहां इतिहास में अनेक कथित चमत्कारी संत हुए हैं पर जिन संत की चर्चा हो रही है उन पर बाज़ार के सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों की विशेष श्रद्धा रही है। आज के आधुनिक युग में बाज़ार तथा प्रचार का संयुक्त उपक्रम किसी को भी भगवान बना सकता है और मामला बिगड़े तो शैतान भी बना सकता है।  बहरहाल अध्यात्मिक और योग साधकों के लिये ऐसी उन संत के भगवान होने या न होने पर चर्चा मनोरंजक हो सकती है तो साथ ही अपनी साधना पर चिंत्तन करने का अवसर भी प्रदान करती है।

            इस बहस में कथित रूप से अनेक धार्मिक विद्वान शामिल हो रहे हैं।  भारतीय अध्यात्म के पुरोधा होने का दावा करने वाले अनेक श्वेत और केसरिया वस़्त्र पहनने वाले सन्यासी भी इस बहस में प्रचार के लोभ की वजह से शामिल हो रहे हैं। चर्चित संत को मानने वाले इस देश में बहुत हैं पर एक बात तय है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से उनका कोई महत्व नहीं है।  उनके नाम पर कोई एक समाज नहीं रहा  पर बहस कर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई अलग समूह है जो केवल आर्त भाव की भक्ति में लीन रहना चाहता है। हमारा तो यह मानना है यह बहस ही प्रायोजित है क्योंकि चुनाव के बाद इस समय कोई सनसनीखेज विषय नहीं है जिस पर प्रचार माध्यम अपना विज्ञापन का समय पास कर सकें इसलिये धर्म से जुड़ा विषय ले लिया है।

संत कबीरदास कहते हैं कि

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हरि सुमिरन सांची कथा, कोइ न सुनि है कान|

कलिजुग पूजा दंभ की, बाजारी का मान||

            सरल हिन्दी में व्याख्या-यदि कोई श्रद्धापूर्वक हरि की कथा कहे तो उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है और धर्म का बाज़ारीकरण वाले को सम्मान मिलता है।

कालि का स्वामी लोभिया, पीतल की खटाय।

राज दुवारें यौं फिरै, ज्यों हरियाई गाय।

            सरल हिन्दी में व्याख्या-इस कलियुग का स्वामी लोभ है जहां पीतल को खटाई में रखकर चमकाया जाता है। लोभी स्वामी राज दरबारों का रुख उसी तरह करते हैं जैसे गाय हरियाली की तरफ जाती है।

            अगर हम भारतीय समाज के अध्यात्म यात्रा को देखें तो हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ है जो पूज्यनीय तथा पठनीय है पर श्रीमद्भागवत गीत ने सभी का सार ले लिया है।  इसलिये यह माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का सबसे मजबूत आधार उसके संदेशों पर ही टिका है।  श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने वालों को इस तरह की बहस में अपनी राय व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता और न ही वह चाहते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों से इतर लोगों में इस पर चर्चा करना निषिद्ध किया है।

            अनेक सन्यासी इस बहस में आ रहे हैं पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अवलोकन करें तो उनके सन्यासत्व पर ही प्रश्न उठ सकते हैं।  उनका व्यवहार इस तरह है जैसे कि वह कोई धर्म के बहुत बड़े प्रवर्तक हैं।  एक बात यह सन्यासी भूल रहे हैं है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त हमेशा ही रहेंगे-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जब इस समय महंगाई, बेकारी, बीमारी तथा अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है तो भय और आशंकाओं से ग्रसित लोग उससे उपजे तनाव के विसर्जन  के लिये नये मार्ग ढूंढ रहे हैं तो यह उनका अधिकार है। हमारे यहां भगवान की आरती की परंपरा रही जो कि अंततः आर्त भाव का ही परिचायक है। उसके बाद अर्थार्थी भाव के भक्तों का नंबर आता है। लोगों के अंदर जल्दी से जल्दी उपलब्धियां पाने की लालसा बढ़ी है इसलिये वह धर्म के नाम पर सिद्ध स्थानों का रास्ता पकड़ते हैं।  संसार के विषयों की स्थिति यह होती है कि समय आ गया तो काम सिद्ध नहीं तो इंतजार करो।  इस इंतजार में बीच लोग  दूसरा सिद्ध स्थान ढूंढने जाते है।  काम बन गया तो भक्त सिद्ध स्थान का स्थाई पर्यटक बन जाता है।  ज्ञान साधकों के लिये यह स्थिति अचंभित करने वाली नहीं होती। भक्त भी तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी-यह जानने वाले ज्ञानी कभी किसी की भक्ति पर टिप्पणी नहीं करते। इन तीनों से आगे होते हैं योगी जिनको ज्ञान भक्ति का प्रतीक माना जाता है जो ध्यान के माध्यम से अपनी आत्मा और मन का संपर्क करने में सफल होते हैं तब उन्हेें किसी अन्य प्रकार की भक्ति से प्रयोजन नहीं रह जाता-वह निरंकार परमात्मा का स्मरण करते हैं जो सामान्य मनुष्य के लिये सहज नहीं होती।  यह अलग बात है कि गेरुए और श्वेत वस्त्र धारण करने वाले अनेक लोग धर्म का झंडा उठाये स्वयं के योग होने का प्रचार करते हुए शिष्य समुदाय का संग्रंह का प्रचार करवाते हैं।

            हमारे यहां अनेक ऐसे कथित संत हुए हैं जिनके भगवान होने का प्रचार कर बाज़ार तथा प्रचार समूह अपना व्यवसायिक हित साधते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां भक्ति में फैशन आ जाता है। यह अलग बात है कि हमारे यहां प्राचीन अध्यात्मिक पुरुषों-भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण-की ऐसी महत्ता है कि भारतीय जनमानस उसे कभी विस्मृत नहीं कर सकता।  इसी दृढ़ विश्वास के कारण अध्यात्मिक ज्ञान तथा योग साधक कभी किसी के भगवान होने के दावे पर चिंतित नहीं होते और न ही उनकी भक्ति तथा भक्तों पर प्रतिकूल टिप्पणी कर अपने ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं।

 

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अमीर लोग कमाते ज्यादा दान कम करते हैं-संत कबीर दर्शन


   हमारे देश भारत में जैसे जैसे आर्थिक विकास बढ़ता गया है वैसे ही लोगों में धार्मिक प्रवृत्ति के प्रति अधिक रुझान भी देखा जा रहा है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कथित रूप से धर्म प्रचार करने वाले न केवल लोगों से चंदा और दान लेते हैं वरन् अपने ज्ञान सुनाने के लिये आधुनिक महंगे तथा अत्यंत तकनीकी साधनों का भरपूर उपयोग भी करते हैं।  सबसे बड़ा ज्ञानी वही है जिसके पास धन है। सबसे प्रभावशाली वह माना जाता है जिसके चरण कमल उच्च पद पर स्थित हैं।  सबसे शक्तिशाली वही है जो अपने बाहुबल का उपयोग कमजोर को दबाने के लिये करता है।  कभी कभी तो यह लगता है कि आधुनिक सभ्यता में शीर्ष पर पहुंचे लोग भौतिक रूप से तो जितने शक्तिशाली हो गये हैं उतने ही मानसिक रूप से कमजोर हुए हैं।  उनका पूरा श्रम, समय तथा चिंत्तन अपनी स्थिति बनाये रखने तक ही सिमट गया है।  यही कारण है कि सामाजिक रूप से बदलाव की बातें सभी करते हैं पर उनके शब्द महत्वहीन ही रहते हैं। यह शक्तिशीली शीर्ष पुरुष समाज के हित का दिखावा केवल इसलिये करते हैं ताकि उनके विरुद्ध लोगों में मन वैमनस्य का भाव बढ़ न जाये।

 

संत कबीर दास ने कहा है कि

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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान

      संतशिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दानकर अपने मनमेंप्रसन्न होते हुएफिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्गमें ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।

 

आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

 

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द दूर ही  रह जाते हैं और सिर के बाल  सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है  साथ ही माया के जाल में फंसा रहता है।

      हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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निष्काम समाज सेवक विरले ही होते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


            आधुनिक प्रचार माध्यमों के आत्म विज्ञापन की सुविधा प्रदान की है जिसका वह लोग लाभ उठाते हैं जिनके पास बृहद आर्थिक संगठन हैं।  स्थिति यह है कि  आर्थिक शिखर पुरुष  छोड़ भलाई सारे काम करते हैं पर अपने प्रचार प्रबंधकों के माध्यम से अपनी छवि देवत्व की बना लेने में सफल हो जाते हैं।  इतना ही नहीं  अपने श्रमिकों, कर्मचारियों और पूरे समाज को शोषण करने के बावजूद ऐसे धनपति प्रचार माध्यमों से अपनी छवि इस तरह बनाते हैं जैसे कि वह अत्यंत विनम्र और दयालु हों।  इसके अलावा भी कला, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म तथा समाज के क्षेत्र में भी कथित रूप से नायकत्व वाली छवि धारण किये अनेक लोग आत्म विज्ञापन के जरिये ही अपना कार्य व्यापार चला रहे हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो स्वयं कभी परमार्थ नहीं कर पाते मगर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय अन्य लोगों की निंदा कर यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि वह स्वयं ही श्रेष्ठ है। इतना ही धार्मिक क्षेत्र में भी अब विज्ञापन के जरिये कथित सिद्ध सामग्री बेचने के ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिसे देखकर अध्यात्मिक ज्ञानियों की आंखें फटी रह जाती है।

भर्तृहरि नीति शातक में कहा गया है कि

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मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः|
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः||

     हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में कितने हैं?

     वैसी देखा जाए तो दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। ‘मैंने यह अच्छा काम किया’ या ‘मैंने उसको दान दिया’ जैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता है?

      इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं। आत्म प्रचार में लगे लोगों को अपने छवि बनाने के प्रयासों से ही समय नहीं मिलता तब वह समाज से कैसे कर सकते हैं?

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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नये धनिकों में घमंड आना अस्वाभाविक नहीं-भर्तृहरि नीति शतक पर आधारित चिंत्तन लेख


      जैसे जैसे विश्व में भौतिक विकास हो रहा है वैसे वैसे ही भावनातमक संवेदनहीनता का भाव बढ़ रहा है।  कभी कभी तो लगता है कि मनुष्य समुदाय में पशु से भी कम संवेदनायें रह गयी हैं।  सभी को अपने स्वार्थ की पूर्ति करने से ही समय नहीं मिलता इसलिये कोई समाज या राष्ट्र के प्रति विचार तक नहीं कर पाता।  अब तो लोगों के बीच अमीर होने की होड़ चल पड़ी है और अमीरों में शक्तिशाली दिखने के प्रवृत्ति ने समाज में वैमनस्य का भाव पैदा किया है। आर्थिक स्तर पर रिश्तों की मर्यादा तय हो रही है ऐसे में जब पुरानी संस्कृति, संस्कार या सनातन परंपरा की बात करना केवल औपाचारिकता ही लगती है।

 

भर्तृहरि नीति शतक  में कहा गया है कि

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पुलहृदयैरीशैतज्जगनतं पुरा विधृततमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।
इह हि भुवनान्यन्यै धीराश्चतुर्दशभुंजते कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वर:||

     हिंदी में भावार्थ-अनेकलोगों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया तो कुछ उदार प्रवृति के  लोगों ने इसेजीतकर दूसरों को दान में दे दिया। आज भी कई शक्तिशाली लोग बड़े भूभाग केस्वामी है पर उनमें अहंकार का भाव तनिक भी नहीं दिखाई देता परंतु कुछऐसे हैं जो कुछ ग्रामों (जमीन के लघु टुकड़े) के स्वामी होने के कारण उसकेमद में लिप्त हो जाते हैं।

     यहप्रथ्वी करोड़ों वर्षों से अपनी जगह पर स्थित है। अनेक महापुरुष यहां आयेजिन्होंने इसका उपयोग किया। कुछ ने युद्ध में विजय प्राप्त कर जीती हुईजमीन दूसरों को दान में दी। अनेक धनी मानी लोगों ने बड़े बड़े दान किये औरलोगों की सुविधा के लिये इमारतें बनवायीं। उन्होंने कभी भी अपने धन काअहंकार नहीं दिखाया पर आजकल जिसे थोड़ा भी धन आ जाता है वह अहंकार में लिप्तहो जाता है।देखा जाये तो इसी अहंकार की प्रवृति ने समाज में गरीब औरअमीर के बीच एक ऐसा तनाव पैदा किया है जिससे अपराध बढ़ रहे हैं।दरअसल अल्पधनिकों में अपनी गरीबी के कारण क्रोध या निराशा नहीं आती बल्कि धनिकों कीउपेक्षा और क्रूरता उनको विद्रोह के लिये प्रेरित करती है।

      समाजके बुद्धिमान लोगों ने मान लिया है कि समाज का कल्याण केवल सरकार काजिम्मा है और इसलिये वह धनपतियों को समाज के गरीब, पिछड़े और असहाय तबके कीसहायता  के लिये प्रेरित नहीं करते। इसके अलावा जिनके पास धन शक्ति प्रचुरमात्रा है वह केवल उसके अस्तित्व से संतुष्ट नहीं है बल्कि दूसरे लोग उसकीशक्ति देखकर प्रभावित हों अथवा उनकी प्रशंसा करें  इसके लिये वह उसका प्रदर्शन करना चाहते हैं।वहधन से विचार, संस्कार, आस्था और धर्म की शक्ति को कमतर साबित करना चाहतेहैं।सादा जीवन और उच्च विचार से परे होकर धनिक लोग-जिनमें नवधनाढ्य अधिकशामिल हैं-गरीब पर अपनी शक्ति का प्रतिकूल प्रयोग कर उसमें भय उत्पन्न करना  चाहते हैं।परिणामतः गरीब और असहाय में विद्रोह की भावना बलवती होती है।

      आजके सामाजिक तनाव की मुख्य वजह इसी धन का अहंकारपूर्ण उपयोग ही है। धन केअसमान वितरण की खाई चौड़ी हो गयी है इस कारण अमीर गरीब रिश्तेदार में भीबहुत अंतर है इसके कारण सम्बन्धों  भावनात्मक लगाव में कमी होती जाती है। धन की शक्तिबहुत है पर सब कुछ नहीं है यह भाव धारण करने वाले ही लोग समाज में सम्मानपाते हैं और जो इससे परे होकर चलते हैं उनको कभी कभी न कभी विद्रोह कासामना करना पड़ता है।

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विदुर नीति में भी है समाजवाद का सिद्धांत


      ज के भौतिक युग में सभ्य, बुद्धिमान और ज्ञानी होने का प्रमाण केवल धनी होना ही रह गया है| जिसके पास धन, उच्च पद अथवा प्रसिद्धि है उसे चर्चे समाज में हर व्यक्ति एक नायक की तरह ही करता है|  स्थिति यह है कि धार्मिक क्षेत्र में भी सुविधा संपन्न आश्रम बनवाने, धनिक लोगों का शिष्य समुदाय एकत्रित करने  तथा प्रचार समूहों में विज्ञापन से गुरुपद  धारण करने वाले अनेक महानुभाव प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचकर समाज में भ्रम फैलाते हैं| ज्ञान का रट्टा लगाकर दूसरों से धन एकत्रित करना गुरु शब्द का पर्याय बन गया है| पर्दे के सामने किसके वचन कैसे हैं यह सभी को सुनाई देता है पर दीवारों के पीछे उनका आचरण कैसा  है यह कोई नहीं देखता| आदमी आम हो या खास अधिकतर लोगों की बुद्धि का दायरा संकुचित हो गया है और धन अच्छा है या बुरा कोई समझना भी नहीं चाहता| जिसके पास धन है उसके सर्वगुण संपन्न होने का दाम करते हुए अनेक चाटुकार लोग मिल जायेंगे|

 

विदुर नीति में कहा  गया है कि

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असंविभागो दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः।
तादृंनारिधपो लोके वर्जनीवो नारधिपः।।
हिंदी में भावार्थ-अपने व्यक्ति अपने आश्रितों में अपनी धन संपत्ति को ठीक से बंटवारा नहीं करे तो दुष्ट कृतघ्न और निर्लज्ज है उसे इस लोक में त्याग देना चाहिए।

न बुद्धिर्धनलाभाय न जाह्यमसद्धये।
लोकपर्यावृतांत प्राज्ञो जानाति नेतरः।।


हिंदी में भावार्थ- धन केवल बुद्धि से ही प्राप्त होता है या मूर्खता के कारण आदमी दरिद्र रहता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। इस संसार के नियमों को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं।

     जिन लोगों के पास धन नहीं है या अल्पमात्रा में है उन्हें धनवान लोग मूर्ख और अज्ञानी मानते हैं। अक्सर धनवान  लोग कहते हैं कि ‘अक्ल की कमी के कारण लोग गरीब होते हैं।’ इतना ही नहीं इन धनवानों के इर्दगिर्द अपने स्वार्थ कि वजह से मंडराने वाले चाटुकार लोग भी उनकी बुद्धि का महिमामंडन करते हुए नहीं थकते|

      उनका यह तर्क गलत और बेहूदा है। अगर उनका तर्क सही माना जाए तो सवाल उठता है कि  अनेक धनवान अपनी बौद्धिक त्रुटियों का कारण गरीब क्यों हो जाते हैं? जिनके पास धन और संपत्ति विपुल मात्रा में वह अपने व्यवसाय में हानि उठाने या अपने बच्चों की गलत संगत के कारण उनके द्वारा किये जा रहे अपव्यय कि वजह से संकटग्रस्त होकर निर्धनता को प्राप्त हो जाते हैं। तब उनके बारे में क्या यह कहना चाहिये कि ‘वह अक्ल के कारण ही अमीर हुए और अब उसके न रहने से गरीब हो गये।’ या ‘अब धन नहीं है तो उनके पास अक्ल भी नहीं होगी।’

      कहने का तात्पर्य है कि यह धारणा भ्रांत है कि बुद्धि या अक्ल के कारण कोई अमीर या गरीब बनता है। संसार का अपना एक चक्र है। शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलता पर माया तो महाठगिनी है। आज इस घर में सुशोभित है तो कल वह किसी दूसरे दरवाजे पर जायेगी। लक्ष्मी के नाम का एक पर्यायवाची शब्द ‘चंचला’ भी है। वह हमेशा भ्रमण करती हैं। अतः हमेशा ही अमीरों को बुद्धिमान और गरीबों को बुद्धिहीन मानने वालों को अपने विचार बदलना चाहिए।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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नये धनिकों को घमंड आ ही जाता है-भर्तृहरि नीति शतक पर आधारित चिंत्तन लेख


      जैसे जैसे विश्व में भौतिक विकास हो रहा है वैसे वैसे ही भावनातमक संवेदनहीनता का भाव बढ़ रहा है।  कभी कभी तो लगता है कि मनुष्य समुदाय में पशु से भी कम संवेदनायें रह गयी हैं।  सभी को अपने स्वार्थ की पूर्ति करने से ही समय नहीं मिलता इसलिये कोई समाज या राष्ट्र के प्रति विचार तक नहीं कर पाता।  अब तो लोगों के बीच अमीर होने की होड़ चल पड़ी है और अमीरों में शक्तिशाली दिखने के प्रवृत्ति ने समाज में वैमनस्य का भाव पैदा किया है। आर्थिक स्तर पर रिश्तों की मर्यादा तय हो रही है ऐसे में जब पुरानी संस्कृति, संस्कार या सनातन परंपरा की बात करना केवल औपाचारिकता ही लगती है।

 

भर्तृहरि नीति शतक  में कहा गया है कि

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पुलहृदयैरीशैतज्जगनतं पुरा विधृततमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।
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     हिंदी में भावार्थ-अनेकलोगों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया तो कुछ उदार प्रवृति के  लोगों ने इसेजीतकर दूसरों को दान में दे दिया। आज भी कई शक्तिशाली लोग बड़े भूभाग केस्वामी है पर उनमें अहंकार का भाव तनिक भी नहीं दिखाई देता परंतु कुछऐसे हैं जो कुछ ग्रामों (जमीन के लघु टुकड़े) के स्वामी होने के कारण उसकेमद में लिप्त हो जाते हैं।

     यह प्रथ्वी करोड़ों वर्षों से अपनी जगह पर स्थित है। अनेक महापुरुष यहां आये जिन्होंने इसका उपयोग किया। कुछ ने युद्ध में विजय प्राप्त कर जीती हुई जमीन दूसरों को दान में दी। अनेक धनी मानी लोगों ने बड़े बड़े दान किये और लोगों की सुविधा के लिये इमारतें बनवायीं। उन्होंने कभी भी अपने धन का अहंकार नहीं दिखाया पर आजकल जिसे थोड़ा भी धन आ जाता है वह अहंकार में लिप्त हो जाता है। देखा जाये तो इसी अहंकार की प्रवृति ने समाज में गरीब और अमीर के बीच एक ऐसा तनाव पैदा किया है जिससे अपराध बढ़ रहे हैं। दरअसल अल्प धनिकों में अपनी गरीबी के कारण क्रोध या निराशा नहीं आती बल्कि धनिकों की उपेक्षा और क्रूरता उनको विद्रोह के लिये प्रेरित करती है।

      समाजके बुद्धिमान लोगों ने मान लिया है कि समाज का कल्याण केवल सरकार काजिम्मा है और इसलिये वह धनपतियों को समाज के गरीब, पिछड़े और असहाय तबके कीसहायता  के लिये प्रेरित नहीं करते। इसके अलावा जिनके पास धन शक्ति प्रचुरमात्रा है वह केवल उसके अस्तित्व से संतुष्ट नहीं है बल्कि दूसरे लोग उसकीशक्ति देखकर प्रभावित हों अथवा उनकी प्रशंसा करें  इसके लिये वह उसका प्रदर्शन करना चाहते हैं।वहधन से विचार, संस्कार, आस्था और धर्म की शक्ति को कमतर साबित करना चाहतेहैं।सादा जीवन और उच्च विचार से परे होकर धनिक लोग-जिनमें नवधनाढ्य अधिकशामिल हैं-गरीब पर अपनी शक्ति का प्रतिकूल प्रयोग कर उसमें भय उत्पन्न करना  चाहते हैं।परिणामतः गरीब और असहाय में विद्रोह की भावना बलवती होती है।

      आजके सामाजिक तनाव की मुख्य वजह इसी धन का अहंकारपूर्ण उपयोग ही है। धन केअसमान वितरण की खाई चौड़ी हो गयी है इस कारण अमीर गरीब रिश्तेदार में भीबहुत अंतर है इसके कारण सम्बन्धों  भावनात्मक लगाव में कमी होती जाती है। धन की शक्तिबहुत है पर सब कुछ नहीं है यह भाव धारण करने वाले ही लोग समाज में सम्मानपाते हैं और जो इससे परे होकर चलते हैं उनको कभी कभी न कभी विद्रोह कासामना करना पड़ता है।

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जिन्होंने सुख का त्याग किया वही समाज के लिये आदर्श बने-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


      आमतौर से हर मनुष्य में दूसरों से सम्मान पाने की कामना होती है। इसे राजसी प्रवृत्ति ही माना जाता है। जिनके पास तत्व का ज्ञान है वह कभी किसी से न तो सम्मान पाने की कामना करते हैं न ही अपमान होने पर विचलित होते हैं। जैसे जैसे 2014 के लोकसभा  चुनाव का समय पास आता जा रहा है वैसे टीवी चैनलों तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं की खबरों में इससे संबंधित जानकारी दिलचस्प होती जा रही है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य समाज में राजपद की स्थापना की अनिवार्यता की शर्त पूरी करने के लिये सभी नागरिकों को अपनी भागीदारी निभानी ही होगी। कोई जनप्रतिनिधि पद का प्रत्याशी तो  कोई मतदाता के रूप में अपनी भागीदारी निभायेगा।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये सभी प्रत्याशी अपनी तरह से कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।  सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि इन चुनावों में धर्म के नाम पर कार्यरत कुछ विद्वान इस चुनावी राजनीति में अपने व्यक्तिगत प्रभाव के लिये सक्रिय होना चाहते हैं। पहली बात तो हम यहां यह बता दें कि धर्म से हमारा आशय उच्च आचरण से होता है।  इस आचरण के भी तीन रूप हैं-सात्विक, राजस और तामस।  एक चौथा रूप भी होता है- वह है योगी या सन्यासी- जिसकी चर्चा बहुत कम होती है यह अलग बात है कि धर्म के नाम पर सक्रिय कुछ पेशेवर लोग यही रूप धारण कर समाज में विशेष रंग के कपड़े पहनकर विचरते हैं।

      चुनावी राजनीति में सामान्य लोग भी सक्रिय होते हैं और कहीं न कहीं उन पर भी अन्य की तरह इन विशेष वस्त्रधारी कथित धर्म विशेषज्ञों के प्रति रुझान रहता हैं। चुनावी राजनीति में सक्रिय शिखर पुरुष भी  यह मानकर चलते हैं कि इन कथित धर्म रक्षकों के पास शिष्यों का  एक ऐसा समुदाय रहता है जो चुनाव को प्रभावित कर सकता हैं।  इसलिये अभी तक वह इनके इर्दगिर्द मंडराते थे पर अब तो यह हालत हो गयी है कि अनेक धर्मों के कथित विशेषज्ञ बाकायदा चुनाव मैदान में उतरने के लिये इन शीर्ष पुरुषों से संपर्क रखने लगे हैं। टिकट मिलने पर अपने धर्म की जीत और न मिलने पर संकट बताकर अपने समुदाय को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि वह उनके बताये अनुसार मतदान करे।  हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि यह राजसी आचरण है।  इसे सत्वगुण या योग से तो कतई नहीं जोड़ा जा सकता है।  जब यह कथित पेशेवर धार्मिक विद्वान यह दावा करते हैं कि उनका आचरण सात्विक है या वह स्वयं सन्यासी हैं तब उनका इस तरह का व्यवहार उनकी निष्ठा पर ही संदेह पैदा करता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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रम्यं हर्म्यतलं न किं वसतये श्रव्यं न गवादिकं किंवा प्राणसमासमगमसुखं नवाधिकप्रीतये।

किं तद्भ्रान्तपत्पतङ्गपवनव्यालोलदीपाङ्करच्छायचञ्वलामाकरूय सकलं सन्तो वनान्तं गताः।।

     हिन्दी में भावार्थ-क्या प्राचीन समय में संतों को रहने के लिये सुंदर महल नहीं थे? क्या उनके सुनने के लिये संगीत नहीं था। क्या उन्हें प्राण प्रिय सुंदर स्त्रियों से समागम हृदय को प्रिय नहीं लगता था? जो उन्होंने संसार को गिरते पतंगे के पंखों की हवा से विचलित हुई दीपक का लौ की छाया के समान विचलित मानकर त्याग दिया।

      हमारा मानना है कि आम आदमी की चिंतायें उसके परिवार के इर्दगिर्द ही रहती हैं।  धर्म के नाम पर वह अपने इष्ट की आराधना से अधिक कुछ नहीं करता। अधिक से अधिक अपने आसपास किसी पर विपत्ति होने पर आदमी उसकी सहायता कर अपने सात्विक होने का बोध अवश्य कराता है पर उसमें  हमेशा ही राजसी वृत्तियां ही उपस्थित रहती हैं।  वह इन कथित पेशेवर धार्मिक लोगों को इस डर से सम्मान देता है कि वह कहीं उसे धर्मद्रोही घोषित कर समाज में बदनाम न कर दें। वह इन मध्यस्थों को सर्वशक्तिमान का रूप माने यह सोचना ही भ्रम है। अनेक धर्म के ऐसे व्यवसायी यह जानते हैं इसलिये अपने साथ समाज पर नियंत्रण रखने के लिये दबंग तथा प्रभावशाली लोग साथ लेकर चलते हैं। वह सद्भाव से प्रीति की बजाय भय बिन भये न प्रीति का सिद्धांत मानते हैं।

      समस्या यह है कि श्रीमद्भागवत गीता का कर्म तथा गुण विभाग का ज्ञान आम लोगों को नहीं है । जिनसे वह श्रीगीता ज्ञान ग्रहण करते हैं वह केवल शाब्दिक अर्थ बताते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में यह ज्ञान किस तरह प्रासांगिक है इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है।

 राजनीति एक व्यापक शब्द है जिसका चुनावी राजनीति एक रूप है।  परिवार, रिश्तेदारी, व्यवसाय, नौकरी तथा खेल में भी बिना राजनीति के किसी को सफलता नहीं मिलती। जहां प्रतिफल की आशा है वह अपनायी जाने वाली नीति ही राजनीति है। पहले राजतंत्र था तो राजा अपने जीवन तक बना रहता था पर आजकल लोकतंत्र है और उसमें अदलाबदली होती रहती है। यह अदलाबदली चुनाव से ही होती है।  इस चुनावी राजनीति में धार्मिक पहचान वालों के शामिल होने  पर प्रश्न चिन्ह केवल ज्ञानी ही उठा सकते हैं पर उनको सुनने या पढ़ने वाली भीड़ तो अपने इन्ही शीर्ष पुरुषों के पीछे रहती है इसलिये कोई प्रभाव नहीं होता।

      देखा जाये तो वर्तमान काल में कोई देहधारी मनुष्य  हमारे देश में कोई धार्मिक रूप से लोकप्रिय या जनमानस में प्रतिष्ठत नहीं है। जब तक प्रचार माध्यम सीमित थे तब लोगों के सामने कथित रूप से अनेक महापुरुष विराजमान थे पर धीमे धीमे यह पता लगा कि इनमें बहुत लोग  पाखंडी और व्यापारी हैं। इन लोगों को देखकर हमें प्राचीन महापुरुषों की याद आती है जो सभी सुखों का त्यागकर सत्य की खोज में निकले। उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर समाज को चिंत्तन शक्ति प्रदान की। उन्होंने राजसुख का इस तरह त्याग किया कि राजा लोग भी उनके सामने नतमस्तक हो गये।  अब इन नवीन धार्मिक पुरुषों से यह पूछने का साहस कौन कर सकता है कि वह किसलिये राजसी सुखों के चक्कर में पड़े हैं? इससे उनके समाज को कौनसा अध्यात्मिक लाभ होने वाला है? बहरहाल ज्ञान साधकों के लिये चुनावी राजनीति में सक्रिय होने की इन पेशेवर धार्मिक लोगों की कोशिश दिलचस्पी का विषय होती है। 

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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दृदय में संयम करें तो चित्त का ज्ञान हो जाता है-पतंजलि योग साहित्य पर आधारित चिंत्तन लेख


      हमारी इंद्रियां स्वतः काम करती हैं जबकि हमारा भ्रम यह रहता है कि हम उन्हें चला रहे हैं।  कान, नाक, आंख, जीभ बुद्धि तथा हाथ पांव स्वचालित हैं।  हम सोते हैं तब भी वह प्रयासरत रहते हैं जबकि उस समय हम मोक्ष की स्थिति में होने के कारण उन पर अंतदृष्टि नहीं रख पाते।  ऐसे में जाग्रत अवस्था में उनकी सक्रियता देखकर यह सोचते हैं कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं।  इन इंद्रियों के स्वतंत्र होने का यह भी प्रमाण है कि रात्रि को ऐसे विचित्र स्वप्न आते हैं जिनके बारे में हम जाग्रत अवस्था में सोच भी नहीं पाते। जैसा कि आधुनिक विज्ञान कहता है कि सोते समय मनुष्य का वह दिमाग काम करता है जो जाग्रत अवस्था में सुप्त होता है।

      इसकी अनुभूति हम तभी कर सकते हैं जब अपने हृदय की तरफ दृष्टिपात करें।  यह क्रिया ध्यान से ही हो सकती है। जब हम शांत होकर अपना ध्यान हृदय की तरफ केंद्रित करेंगे तब हमारी सारी इंद्रिया शिथिल हो जाती है।  जब ध्यान की चरम स्थिति समाधि आती है तब हमारा संपर्क अपने आप यानि आत्मा से हो जाता है। उस समय यह पता चलता है कि बुद्धि और हृदय में भेद है। इस भेद का ज्ञान न होने पर इंद्रियां जिन भोगों के साथ संपर्क करती हैं वह हमारे प्रतीत होते हैं।  ऐसा लगता है कि हम भोग कर रहे हैं। सच यह है कि इंद्रियां सांसरिक विषयों से संपर्क स्वाभाविक रूप से करती हैं और हम उनको अपना भोग समझ बैठते हैं। देह को जीवित रखने का प्रयास इंद्रियां स्वचालित ढंग से करती हैं और हमें लगता है कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं। इसे तभी समझा जा सकता है जब हम हृदय के विषय में निरंतर ध्यान के माध्यम से उसकी क्रियायें देखते रहें।

 

पतंजलि योग दर्शन में कहा गया है कि

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हृदये चित्त संवित्।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-हृदय में संयम करने से चित्त के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।

सत्त्वपुरुषयोरत्न्तासंकीर्णयोः प्रत्यायाविशेषो भोगःपराथत्स्वार्थसंयमकात्पुरुषज्ञानम्।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-बुद्धि और पुरुष परस्पर भिन्न हैं। इन दोनों के भेद प्रतीत न होना ही भोग है। परार्थ प्रतीति से भिन्न जो स्वार्थ प्रतीति है उसमें संयम करने से संयम हो जाता है।

      अक्सर हमारे अंतर्मन में अच्छा भोजन करने, सुंदर दृश्य देखने, सुगंध के नासिका में आने, कानों से मधुर स्वर सुनने और हाथों से प्रिय वस्तु या व्यक्ति को छूने की इच्छा होती है। यह सब हमारे मन और बुद्धि का खेल है। जाग्रत अवस्था में इंद्रियां इन्हीं इंद्रियों के वशीभूत होकर काम करती है तो रात्रि में इनके बिना भी उनकी सक्रियता बंद नहीं होती।  हम सोते समय भी सांस ग्रहण करते हैं और मस्तिष्क सपने देखता है तो हाथ पांव भी हिलते हैं पर ज्ञान के अभाव में यह सत्य नहीं समझ पाते कि यह उनका स्वाभाविक कर्म है। उस समय हमारा हृदय शांत होता है इसलिये उसकी अनुभूति नहीं कर पाते। अगर हम योगासन, ध्यान, मंत्र जाप और अध्यात्मिक पाठ  निरंतर करते रहें तब जाग्रत अवस्था में इन इंद्रियों की सक्रियता से कभी स्वयं को जुड़ाव अनुभव नहीं होगा। पुरुष और बुद्धि का भेद जानने के बाद हम   उन पर नियंत्रण कर सकते हैं। इतना ही नहीं निरंतर योगाभ्यास करने पर  यह अनुभव भी कर सकते हैं कि हम एक नहीं दो लोग हैं।  एक अध्यात्मिक पुरुष और दूसरा देहधारी! यह विचार आने पर हमारा आत्मविश्वास बढ़ जाता है।  हम लोगों ने देखा होगा कि योगी लोग कभी अपने अकेलेपन को लेकर चिंतित नहीं होते। योगाभ्यास तथा ज्ञान साधना से उनके बाह्य ही नहीं बल्कि आंतरिक व्यक्तित्व में दृढ़ता आती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

http://zeedipak.blogspot.com

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वास्तविक समाज सेवा करने वाले कम ही मिलते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन


            आधुनिक प्रचार माध्यमों के आत्म विज्ञापन की सुविधा प्रदान की है जिसका वह लोग लाभ उठाते हैं जिनके पास बृहद आर्थिक संगठन हैं।  स्थिति यह है कि  आर्थिक शिखर पुरुष  छोड़ भलाई सारे काम करते हैं पर अपने प्रचार प्रबंधकों के माध्यम से अपनी छवि देवत्व की बना लेने में सफल हो जाते हैं।  इतना ही नहीं  अपने श्रमिकों, कर्मचारियों और पूरे समाज को शोषण करने के बावजूद ऐसे धनपति प्रचार माध्यमों से अपनी छवि इस तरह बनाते हैं जैसे कि वह अत्यंत विनम्र और दयालु हों।  इसके अलावा भी कला, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म तथा समाज के क्षेत्र में भी कथित रूप से नायकत्व वाली छवि धारण किये अनेक लोग आत्म विज्ञापन के जरिये ही अपना कार्य व्यापार चला रहे हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो स्वयं कभी परमार्थ नहीं कर पाते मगर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय अन्य लोगों की निंदा कर यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि वह स्वयं ही श्रेष्ठ है। इतना ही धार्मिक क्षेत्र में भी अब विज्ञापन के जरिये कथित सिद्ध सामग्री बेचने के ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिसे देखकर अध्यात्मिक ज्ञानियों की आंखें फटी रह जाती है।

भर्तृहरि नीति शातक में कहा गया है कि

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मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः|
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः||

     हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में कितने हैं?

     वैसी देखा जाए तो दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। ‘मैंने यह अच्छा काम किया’ या ‘मैंने उसको दान दिया’ जैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता है?

      इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं। आत्म प्रचार में लगे लोगों को अपने छवि बनाने के प्रयासों से ही समय नहीं मिलता तब वह समाज से कैसे कर सकते हैं?

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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मंदिर और उद्यानों में समय बिताना लाभप्रद-हिंदी सामाजिक चिंत्तन लेख


                        आमतौर से हर मनुष्य देखने में एक जैसे ही लगते हैं पर आचार, विचार, रहन सहन, खाने पीने तथा व्यवहार की दृष्टि से उनमें भिन्नता का आभास तब  होता है जब उसने कोई दूसरा व्यक्ति उनसे संपर्क करता है। अनेक बार दो लोग एक जैसे लगते हैं तो अनेक लोग भी एक जैसे स्वभाव के नहीं लगते।  इसके दो कारण है एक तो यह कि लोग अपने रहन सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार के अनुसार ही हो जाते हैं। दूसरा कारण उल्टा भी होता है कुछ लोग अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही रहन, सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार करने लगते हैं।  इन दोनों कारणों में श्रीमद्भागवत गीता का गुण और कर्म विभाग सिद्धांत लागू होता है। एक तो मनुष्य वह होता है जो अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार सात्विक, राजस तथा तामसी कार्य करता है तो दूसरा वह होता है जो अपने कर्म के अनुसार ही अपने स्वभाव की प्रकृत्ति का हो जाता है। इस चक्र को योग तथा ज्ञान साधक अनुभव कर सकते हैं।

                        हम देखते हैं कि सहकर्म में लिप्त लोगों के बीच आपसी संपर्क सहजता से बनता है। जिसको निंदा करनी है उसे निंदक मिल जाते हैं दूसरे प्रशंसा करते हैं तो उनको प्रशंसक मिल जाते हैं। यही स्थिति आदतों की भी है। जो जुआ खेलते हैं उनको जुआरी और जो शराब पीते हैं उन्हें शराबी मिल जाते है। स्थिति यह है कि व्यसन में फंसा मनुष्य कुंऐं के मेंढक की तरह हो जाता है जिसे अज्ञान का अंधेरा ही पसंद होता है।  आमतौर से हम देखते भी हैं कि बुरी संगत सहजता से मिलती है पर अच्छी संगत के लिये प्रयास करने पड़ते है।  बाज़ार में सहजता से व्यसनी मिल जाते हैं  पर सत्संगी को ढूंढना पड़ता है। ऐसे में समस्या यह आती है कि हम सहज प्रकृत्ति के लोग कहां ढूंढे।

                        हमारा मानना है कि हमें मंदिरों और पार्कों में सहज प्रकृत्ति के लोग मिल ही जाते हैं। दरअसल मंदिरों और पार्कों में आया व्यक्ति कहीं न कहीं से मन से स्वच्छ होता ही है भले ही वह पूरे दिन असहज वातावरण में रहता हो।  जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां आये लोग अत्यंत शांत और सद्भाव से संपन्न  होने के कारण हमारे मन तथा चक्षुओं को आकर्षित करते हैं। वहां कोई मित्र मिल जाये तो उसे  भी प्रसन्नता होती है तो हमें भी अधिक सुख  मिलता है। इस प्रसन्नता का सामान्य सुख से ज्यादा मोल है। यह भी कह सकते हैं कि इस प्रसन्नता का सुख अनमोल है।  उसी तरह प्रातःकाल किसी उद्यान में आया व्यक्ति भी निर्मल भाव से जुड़ जाता है। वहां घूमते हुए लोग एक दूसरे को अत्यंत निर्मल भाव से देखते हैं। यह अलग बात है कि इसकी उनको स्वतः अनुभूति नहीं होती। उनमें अनेक लोग तो केवल इसलिये एक दूसरे को जानने लगते हैं क्योंकि दोनों ही वहां प्रतिदिन मिलते हैं। इस प्रकार की आत्मीयता मिलना एक संयोग है जो कि व्यसन के दुर्योग से मिली संगति से कहीं बेहतर है।

                        हमने देखा है कि योग शिविरों में जाने पर अनेक ऐसे लोगों से मिलने और उनको सुनने का सौभाग्य मिलता है जिनकी कल्पना सामान्य जीवन में नहीं की थी।  इसी अनुभव के आधार पर हम यह लेख लिख रहे है। हमारे कहने का अभिप्राय यही है कि अगर आप यह चाहते हैं कि आप एक बेहतर जीवन जियें तो पहले अपनी देह तथा मन  के लिये अनुकूल  वातावरण, मित्र तथा आत्मीय लोगों का चयन करें।  वातावरण, रहन सहन, आचार विचार, तथा खान पान के साथ ही संगति के अनूकूल बनने के बाद जीवन को सुखमय बनाने का कोई दूसरा उपाय करना शेष नहीं रह जाता।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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