शरीर धरती है जिसमें अच्छे बीज बोयें-गुरु ग्रंथ साहिब के आधार पर चिंत्तन लेख


            अनेक लोगों में अध्यात्मिक भाव है प्राकृतिक रूप से विद्यमान होता है पर कभी उनका ध्यान इस तरफ नहीं जाता।  विषयों के रसस्वादन से उत्पन्न विषरूप मानसिक तनाव और अध्यात्मिक अमृत से दूरी के बीच वह झूलते हैं।  उन्हें यह समझ में नहीं आता कि वह कैसे सुख अनुभव करें।  जीवन के सुख का सारा सामान जुटाने के बावजूद उन्हें सुख अनुभव नहीं होता। ऐसे लोगों को एकांत चिंत्तन अवश्य करना चाहिये तब उनकी ज्ञानेंद्रियां स्वतः जागत हो जाती हैं। हमारे देश में को कथायें, सत्संग और धार्मिक त्यौहार इतने होते हैं कि लोगों में श्रवण, पठन पाठन, तथा दृश्यों से उनमें ज्ञान की धारा स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है।  अनेक लोग मंदिरों में जाकर भी अपनी आस्था को जीवंत बनाये रखने का प्रयास करते हैं जिससे उनके अंदर अध्यात्मिक तत्व तो बना रहता है फिर भी उन्हें शांति नहीं मिलती है। आजकल तो योग साधना का प्रचार भी हो रहा है जिसके अभ्यास से लोगों में देह तथा मन में पवित्र आती है।  फिर भी ज्ञान के अभाव का दृश्य दिखाई देता है।

श्री गुरू ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि

——————-

इहु तनु धरती बीजु करमा करो सलिल आपाउ सारिंगपाणी।

मन किरसाणु हरि रिदै जंमाइ लै इउ पावसि पटु निरवाणी।।

            हिन्दी में भावार्थ-हमारी मनुष्य देह धरती के समान है, एक किसान की तरह इसमें  शुभ भाव के बीज बोकर परमात्मा के नाम स्मरण रूपी पानी से खेती की जाये तो जीवन धन्य हो जाता है।

विखै विकार दूसट किरखा करे इन तजि आतमै होइ धिआई।

जपु तपु संजमु होहि जब राखे कमलु विबसै मधु अजमाई।।

            हिन्दी में भावार्थ-विषय विकार तो ऐसे पौद्ये जिनमें मन लगाना व्यर्थ है उन्हें उखाड़कर जप, तप और संयम के पौद्ये हृदय में कमल की भाव रूप वृक्ष उगायें जिनसे मधुर रस टपकता है।

            इसका कारण यह है कि सामान्य जनों में उस तत्वज्ञान को धारण करने की शक्ति का अभाव है जो केवल ध्याना, धारणा और समाधि से आती है।  परमात्मा की हार्दिक भक्ति से लाभ होता है पर हृदय और आत्मा का मिलन किस तरह हो, यह ज्ञान बहुत कम लोगों हैं। किसी की कहने या स्वयं के सोचने से हार्दिक भक्ति नहीं हो पाती।  इसके लिये यह आवश्यक है कि यह बात समझ ली जाये कि संसार के विषयों से हम सदैव संपर्क नहीं रख सकते।  हमें जीवन में जो सुख सुविधायें मिलती हैं वह हमारा अध्यात्मिक लक्ष्य नहीं होती। अनेक लोगों ने आकर्षक भवन बनाये हैं।  उनमें पेड़ पौद्ये और बाग लगे होने के साथ ही फव्वारी भी होते हैं।  अगर कोई लघु श्रेणी का व्यक्ति देखे तो आह भरकर रह जाये पर इस सच को सभी जानते हैं कि ढेर सारी भौतिक उपलब्धियों के बावजूद संपन्न लोग सुख का अनुभव नहीं कर पाते।

            इसका एक ही तरीका है कि अध्यात्मिक अभ्यास के समय सांसरिक विषयों के प्रति एकदम निर्लिप्पता का भाव हृदय में लाया लाये।  कहने में सहज लगने वाली बात प्रारंभ में अत्यंत कठिन लगती है मगर निरंतर ध्यान की प्रक्रिया अपनाने के बाद धीमे धीमे ऐसा अभ्यास हो जाता है कि मनुष्य का मन भोग की बजाय योग की तरफ इस तरह प्रवृत्त होता है कि उसका जीवन चरित्र ही बदल जाता है।  मूल बात संकल्प की है। मन में कहीं बाहर से लाकर बोया नहीं जा सकता।  हम अगर निरंतर बाहरी विषयों की तरफ ध्यान लगायेंगे तो मन में भोग के बीज पैदा होंगे। वहां से मन हटाते रहे तो स्वतः ही अंतर्मन से योग के बीज मन में आयेंगे।  इसे हम ज्ञान और विज्ञान का संयुक्त सिद्धांत भी कह सकते हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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नियमित संयम से विवेक का ज्ञान हो ता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर हिन्दी चिंत्तन लेख


            यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने सामने किसी दृश्य, व्यक्ति या वस्तु को देखता है तो उस पर अपनी तत्काल प्रतिक्रिया देने या राय कायम करने को तत्पर हो जाता है। इस उतावली में अनेक बार मनुष्य के मन, बुद्धि तथा विचारों में भ्रम तथा तनाव के उत्पन्न होता है।  इस तरह की प्रतिक्रिया अनेक बार कष्टकर होती है और बाद में उसका पछतावा भी होता है।

            वर्तमान समय में हमारे यहां युवा वर्ग में जिस तरह रोजगार, शिक्षा तथा कला के क्षेत्र में शीघ्र सफलता प्राप्त करने के लिये सामूहिक प्रेरणा अभियान चल रहा है उसमें धीरज से सोचकर काम करने की कला का कोई स्थान ही नहीं है।  लोग अनेक तरह के सपने तो देखते हैं पर उन्हें पूरा करने की उनको उतावली भी रहती है। यही कारण है कि सामान्य लोगों में  धीरज रखने की प्रवृत्ति करीब करीब समाप्त ही हो गयी है।  जिस कारण नाकामी मिलने पर अनेक लोग भारी कष्ट के कारण मानसिक संताप भोगते हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

————–

क्षणत्तक्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्।

            हिन्दी में भावार्थ-क्षण क्षण के क्रम से संयम करने पर विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।

जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः।

            हिन्दी में भावार्थ-जिन विषयों का जाति, लक्षण और क्षेत्र का भेद नहीं किया जा सकता उस समय जो दो वस्तुऐं एक समान प्रतीत होती हैं उनकी पहचान विवेक ज्ञान से की जा सकती है।

            प्रकृति ने मनुष्य और पशुओं के बीच अंतर केवल विवेक शक्ति का ही रखा है।  मन, बुद्धि तथा अहंकार तो पशुओं में भी पाये जाते हैं पर अपने से संबद्ध विषय की भिन्नता, उनके  लक्षण तथा  उपयोग करने की इच्छा का निर्धारण करने की क्षमता केवल मनुष्य में ही है।  इसके लिये आवश्यक है कि जब मनुष्य के सामने कोई वस्तु, विषय या व्यक्ति दृश्यमान होता है तब उस पर संयम के साथ हर क्षण दृष्टि जमाये रखना चाहिये। यह क्रिया तब तक करना चाहिये जब तक यह तय न हो जाये कि उस दृष्यमान विषय की प्रकृत्ति, लक्षण तथा उससे संपर्क रखने का परिणाम किस तरह का हो सकता है?

            इसे हम विवेक संयम योग भी कह सकते हैं।  ऐसा अनेक बार होता है कि हमाने सामने दृश्यमान विषय के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती।  एक साथ दो विषय समान होने पर यह निर्णय लेना कठिन हो जाता है कि उनकी प्रकृति समान है या नहीं! अनेक अवसर पर किसी भी विषय, वस्तु तथा व्यक्ति की मूल प्रंकृत्ति, रूप तथा भाव को छिपाकर उसे हमारे सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह हमें अनुकूल लगे जबकि वह भविष्य में उसके हमारे प्रतिकूल होने की आशंका होती है।

            इनसे बचने का एक ही उपाय है कि हमारे सामने जब कोई नया विषय, वस्तु या व्यक्ति आता है तो पहले उस पर बाह्य दृष्टि के साथ ही अंतदृष्टि भी लंबे क्षणों तक केंद्रित करें।  प्रतिक्रिया देने से पहले निरंतर हर क्षण संयम के साथ उस पर विचार करें। धीमे धीमे हमारा विवेक ज्ञान जाग्रत होता है  जिससे दृश्यमान विषय के बारे में वह ज्ञान स्वाभाविक रूप से  होने लगता है जो उसके पीछे छिपा रहता है। इस हर क्षण संयम रखने की प्रक्रिया को हम विवेक योग भी कह सकते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की यात्रा सुखद रही-हिन्दी चिंत्तन लेख


            आज हमारी अमृतसर से वापसी हुई।  अभी तक हमने जो भी पर्यटन, धर्म तथा अन्य भाव से यात्रायें की उनमें सबसे सुखानुभूति देने वाली थी।  इसका मुख्य कारण यह है कि बचपन से ही धर्म भीरु होने के कारण कहीं न कहीं हमारे अंदर एक ऐसा अध्यात्मिक भाव था जिसे ऐसी यात्रा में जाना ही था।  इस पर भगवान विष्णु की उपासना तथा गुरुनानक देव के प्रति आस्था का संयुक्त भाव ऐसा रहा कि कभी उसमें विरोधाभास नहीं था।  कभी ऐसा भी नहीं लगा कि दो अलग छवियां हमारा आदर्श हैं। जिंदगी के हर दौर में यह लगा कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमें सहारा दे रही है।  कालांतर में योग तथा गीता में रुचि होने के बावजूद भी अपने बचपन के भाव कभी विलोपित नहीं हुए।  एक लेखक से चिंत्तक या दार्शनिक बन जाने पर निरंतर अभ्यास और अनुभव से यह निष्कर्ष निकाला कि अगर धर्म या अध्यात्म के प्रति बचपन से रुचि जाग्रत नहीं हुई तो बड़ी उम्र हो जाने पर भक्ति तथा ज्ञान दोनों से ही संपर्क रखना संभव नहीं है। दूसरी बात यह कि कुछ लोग भक्ति आदि में रुचि नहीं लेते यह कहते हुए कि हम तो व्यवहार में ही शुद्धता बरतते हैं इसलिये उसकी कोई जरूरत नहीं है पर सच यह है कि सांसरिक विषयों में निरंतरता से वह उकता ही जाते हैं। भगवान के प्रति भक्ति भाव न हो तो उन्हें अध्यात्मिक ज्ञान तो होना ही चाहिये। हां, यह भी सच है कि धर्म के अनुसार व्यवहार करना और अध्यात्मिक का ज्ञान होना तो अलग अलग विषय हैं।  एक मुश्किल जरूर है कि भक्ति के बिना तत्वज्ञान के प्रति झुकाव हो ही नहीं सकता। इसके लिये कोई दैहिक गुरु या होना चाहिये या फिर पवित्र गं्रथों को ही गुरु मान लेना चाहिये।

            बहरहाल अमृतसर का मंदिर बचपन से हमारे दिल में बसा था।  गुरुनानक देव जी के प्रति हमारे मन में आत्मिक श्रद्धा है पर अभी जाना अभी तक भाग्य में नहीं बंधा था।  बुलावा आया तो चल दिये। स्वर्णमंदिर में इतने सारे लोगों की श्रद्धामय उपस्थिति के बीच भजन और गुरुवाणी का स्वर हृदय में ऐसा भाव पैदा करता है जिसका वर्णन करना संभव ही नहीं है।  मस्तिष्क में आये शब्द स्वर  किसी भी गति से बाहर आ सकते हैं पर हृदय के भाव अंदर से अंदर ही जाकर ऐसा आंनद देते हैं जिसको शब्द रूप देना सहज नहीं होता।  इस पर यात्रा पर आगे भी लिखेंगे। सत् श्री अकाल! वाहि गुरु की फतह! जय श्री कृष्ण जय श्री राम!

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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ज्ञानी सभी पदार्थों में परमात्मा का तत्व देखते हैं-चाणक्य नीति के आधार पर हिन्दी चिंत्तन लेख


            जकल धर्म के नाम पर समाज में  कथित एकता स्थापित करने के लिये  यह नारा दिया जाता है कि ईश्वर एक है। वैसे तो  चाहे जिस स्वरूप की आराधना करें उसमें एक ही  ईश्वर के प्रति  ही आस्था का भाव स्वीकार किया जाना चाहिये। वैसे भारतीय अध्यात्म दर्शन में भी कुछ इस तरह ही कहा गया है पर अगर हम उसमें वर्णित संदेशों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि ईश्वर अनंत है।  उसके स्वरूप, गुण, विचार, तथा क्रियाओं को प्रत्यक्ष देखना लगभग असंभव है।  वह एक भी हो सकता है और अनेक भी।  वह अदृश्य है इसलिये उसके बारे में निश्चित रूप से कहना ठीक नहीं हैं। अन्य धर्मों के विद्वानों की क्या कहें स्वयं भारतीय धर्म के अनेक विद्वान आपस में उलझ जाते हैं।  एक वर्ग कहता है कि ईश्वर एक है और उसकी जिस रूप में आराधना की जाये अच्छा है, दूसरा कहता है कि उसकी लीला अनंत और अपरंपार है जिसे जानने की बजाय उसकी निराकार भक्ति करना ही श्रेष्ठ है।

            इस तरह के विवादों पर कोई निष्कर्ष न निकलता है न आगे संभावना है पर एक बात तय है कि ज्ञानी और साधक इस तरह की बहसों में मौन रहकर अपनी योग्यता का ही प्रमाण देते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से भक्ति तथा भक्तों के चार रूप बताये गये हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  इसका सीधा मतलब यही है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त मौजूद रहेंगे और किसी पर कटाक्ष करना या किसी की भक्ति में दोष देखना अज्ञान का ही प्रमाण है।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि

————————

अग्रिर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।

प्रतिमा स्पल्पबुछीनां सर्वत्र समदिर्शनाम्।।

            हिन्दी में भावार्थ-द्विजाति के देव अग्नि, मुनियों का देव हृदय तथा अल्पबुद्धिमानों का देव मूर्तियों में निवास करता है पर तत्वज्ञानी समदर्शी होते हैं इसलिये उनका देव हर जगह बसता है।

            भारतीय धार्मिक परंपराओं में भी अनेक प्रकार की उपासना पद्धतियां प्रचलित हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने हर उपासना पद्धति को मान्यता दी है पर यह भी माना है कि तत्वज्ञानी तो उनका ही स्वरूप है। कहने का अभिप्राय यह है कि जो वास्तव में तत्वज्ञानी है उसके लिये परमात्मा सभी जगह है।  वह किसी विशेष स्थान को सिद्ध मानकर वहां उपस्थिति देने की बाध्यता अनुभव नहीं करता यह अलग बात है कि जिज्ञासावश ज्ञानी ऐसे स्थानों पर जाते हैं। धाार्मिक बहसों में स्वयं को धार्मिक विद्वान साबित करना या जगह जगह ज्ञान बघारकर शिष्य संचय करना ज्ञानियों का स्वाभाविक कर्म कभी नहीं बन पाता।  न ही वह आश्रम बनाकर स्वयं को गुरु पद पर प्रतिष्ठत करते हैं। ज्ञानी तो श्रीमद्भागवत गीता के गुण तथा कर्म विभाग के सिद्धांतों को जानने के बाद सांसरिक विषयों में निर्लिप्त भाव से इस तरह व्यस्त होते हैं जैसे कीचड़ में कमल रहता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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भारत स्वच्छ अभियान की सफलता में कचरे के निष्पादन के लिये आधुनिक तकनीकी का उपयोग आवश्यक-हिन्दी चिंत्तन लेख


            भारत स्वच्छ अभियान प्रारंभ हो गया है।  प्रचार माध्यमों ने इस पर जमकर चर्चा और बहसें कर अपने विज्ञापन प्रसारण का समय बहुत अच्छे ढंग से पास किया।  अगर हम बहस में भाग लेने वाले विद्वान तथा संयोजकों के विचारों को देखें तो ऐसा लगता है कि जैसे यह पांच वर्षीय अभियान का प्रतीकात्मक प्रारंभ न होकर कोई एक दिवसीय  कार्यक्रम हो।  गांधी जयंती पर प्रारंभ इस अभियान पर स्वच्छता रखने की शपथ तो ली गयी पर आजकल कचड़ा किस प्रकृत्ति का है यह किसी ने न बताया न सुना।  जिस तरह विज्ञान ने मनुष्य जीवन के रहन सहन का रूप बदला है वैसे ही कचड़े ने भी अपना रूप बदला है। पहले कचड़ा प्राकृतिक पदार्थों से ही-पेड़ के पत्ते, पुट्ठा और कागज तथा खाने पीने के फैंके गये अवशेष-का ही होता था जबकि अब प्लास्टिक ने कचड़े को एकदम क्रूरतम रूप प्रदान कर दिया है।  मार्ग में आवारा घूमने वाले पशु खाद्य पदार्थों के अवशेषों के साथ उसमें पडी प्लस्टिक भी थैलियां भी खा जाते हैं जो अंततः उनका जीवन ही संकटमय हो जाता है।

            बहसों में कुछ लोगों महत्वपूर्ण बातें बतायीं। उनमें तो एक यह थी  जिन देशों मे ंकचड़ा उठाने और नष्ट करने के लिये आधुनिक यंत्रो का प्रयोग किया जाता है उनके शहर और गांव स्वच्छ दिखते हैं।  इन विदेशी शहरों के चित्रों या चलचित्रों में उनकी चकाचौंध देखकर हमारे देश का सामान्य नागरिक आहें भरने लगता है।  यह आरोप तो हम सभी पर है कि कचरा फैलाने में उस्ताद हैं इसलिये अगर हमें स्वच्छ भारत रखना है तो कचरा उचित जगह पर फैंके, यही शर्त पूरी कर अपनी शपथ निभा सकते हैं।  आजकल खाने पीने का सामान प्लास्टिक में बंद मिलता है।  उपयोग करो और फैंकों पर चल रही हमारी उपभोग नीति के चलते हमारी बुद्धि ऐसे मार्ग पर चल रही है जिसमें स्चच्छता के लिये हमें शपथ लेनी पड़ी है।  सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने से हमें बचना चाहिये। यह विचार करना चाहिये कि हम तो गंदगी फैंककर चले जायेंगे पर दूसरे की आंखों और नाक को इससे परेशानी होगी।

            यह तो नागरिकों की जिम्मेदारी वाली बात हुई।  अब आती है कचरा निष्पादन करने वाली सरकारी, अर्द्धसरकारी या फिर उन निजी कंपनियों की जिन्होंने सार्वजनिक स्थानों की सफाई का ठेका लिया है क्या वह इसके लिये तैयार हैं?  भारत में गंदगी दिखने का यह भी एक कारण है कि कचरा का निष्पादन करने के लिये मशीनों के उपयोग के अधिक उपयोग की जानकारी नहीं है। खासतौर से प्लास्टिक वाले कचरे के बढ़ते उपयोग की वजह से कचरा निष्पादन के लिये आधुनिक यंत्रों का उपयोग अत्यंत जरूरी माना जाने लगा है।  नागरिकों पर इसका जिम्मा डालना गलत होगा।  कहने का अभिप्राय यह है कि कहीं न कहीं अंततः जिम्मा राज्य कर्मियों पर आयेगा।  इसके लिये युद्धस्तर पर प्रयास करने होंगे।  वैसे प्लास्टिक का कचरा कई बार दर्दनाकर दृश्य भी पैदा करता है। अनेक बार चार पांच बच्चों के झुंड इस तरह के कचड़े को अपने कंधे पर रखे थैले में भरते देखे जा सकते हैं।  यह लोग इतने मैले कपड़े पहने रहते हैं कि आवारा कुत्ते उन पर भौंकने लगते हैं।  कुछ वीरता पूर्वक उनके बीच से निकलते हैं तो कुछ रास्ता बदल जाते हैं। रेल्वे स्टेशनों पर पानी की फैंकी गयी प्लास्टिक बोतलों को समेटकर कर उनमें फिर पानी भरने के समाचार भी आते हैं।

            कचरा उचित स्थान पर फैंकना नागरिक की जिम्मेदारी है-यह बात हम दोहराते हैं। लोग इसे अपनी आदत बना लें।  बाहर ही नहीं घर में भी किसी सामान का अवशेष फैंकना हो तो अपने घर में कचरे के डिब्बे में ही फैंकें। हमारा तो अनुभव यह है कि हम सोने, बैठने और काम करने के दौरान अगर अस्वच्छ जगह पर होते हैं तो वह उससे मानसिक कष्ट होता है पर इसे पहचान नहीं पाते।  साफ सुथरे स्थान पर सोने, बैठने और काम करने का सुख भी पता नहीं चलता।  यह भी संभव है जब ध्यान आदि जैसी  अध्यात्मिक विधा का अभ्यास के साथ ही  एकांत में आत्ममंथन करें।  बाहरी आंखों से देखें तो अंतर्मन में विचार भी करें।  एक बात तय रही है कि स्वच्छता ही स्वर्ग का पर्याय है। अपनी संवेदनशील इंद्रियों से साक्षात्कार करें तो इसका आभास सहजता से हो सकता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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सम्मान पाने की चाह ही बनती है संकट का कारण-हिन्दी चिंत्तन लेख


            मानव स्वभाव है कि वह दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहता है।  इसके लिये वह कई उपाय करता है। इनमें एक है सर्वशक्तिमान के प्रति भक्ति के स्वरूप के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना। विश्व के करीब करीब सभी धर्मों में धरती के बाहर स्वर्ग की कल्पना की चर्चा की जाती है हालांकि भारतीय धर्मों में भी कहीं कहीं इस तरह की चर्चा है पर श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि इस तरह का विचार अज्ञान का प्रमाण है।  यही कारण है कि  हमारे तत्वज्ञानी मानते हैं कि अगर आदमी संयम के साथ जीवन बिताये तो वह इसी धरती पर ही सुख के साथ जीवन बिता सकता है जो कि स्वर्ग भोगने के समान है।  मगर कुछ लोगों को इस बात की बेचैनी रहती है कि वह समाज में श्रेष्ठता साबित करें। वही दूसरों के सामने अपनी भक्ति का प्रचार करते हैं।

संत कबीर दास कहते हैं कि

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मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।

            हिंदी में भावार्थ-संतकबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लियेपरमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इससंसार में ही दोष निकालने लगते हैं।

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।

      हिंदी में भावार्थ-संतशिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकरतो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है।सतगुरु की शरण लेकरउनकी कृपा से जो गरीब असहायकी सहायता करता है, वही सुखी है।

     इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्तिका दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लियेशिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्तिकरने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करतेहैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं।

     भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।

      फिरभक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमीसंसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहींहै बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्धहोकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश होजाता है।निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारणबनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तोहोगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःखभी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है।जहां सम्मान है वहां अपमान भी है।अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।

      इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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मनुस्मृति-मनुष्य शरीर में 12 प्रकार की गंदगी को पहचाने


            कहा जाता है कि भौतिक विकास के कारण समाज में विभिन्न आयुवर्ग के लोगों में एक पीढ़ीगत अंतर स्वाभाविक रूप से होता है। आजकल तो यह भी कहा जाता है कि बच्चे अक्षर ज्ञान से पहले ही टीवी, मोबाइल और अन्य आधुनिक उपभोग के सामानों का चलाना सीख लेते हैं।  इस बहिर्मुखी जानकारी को अब बौद्धिक विकास का प्रतीक माना जाने लगा है जबकि आंतरिक ज्ञान से-जिसके बिना जीवन में हमेशा ही आनंद उठाने का अवसर मिलता है-सभी परे हो गये हैं। यही कारण है कि समाज में तनाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  सबसे बड़ी बात यह कि जिस देह को धारण कर इस संसार में गुजारना है उसके बारे में कोई नहीं जानता।

            हमारे शरीर के विकार मन को प्रभावित करते हैं जिससे बुद्धि संचालित होती है।  अक्सर अनेक बुद्धिमान और विद्वान समाज के लोगों को नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव देते हैं पर जिसकी देह और मन में विकार होंगे वह किस तरह सकारात्मक दृष्टिकोण अपना सकता है भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अभाव में वह स्वयं भी नहीं जानते।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

————

वसाशुक्रमसृङ्मज्जरमूत्रविङ्घ्राणकर्णविट्।

श्लेषामाश्रृदूषिकास्वेदा द्वाशैते नृणां मलाः।।

हिन्दी में भावार्थ-चर्बी, वीर्य, रक्त, मज्जा, मूत्र, मल, आंखों का कीचड़, नाक की गंदगी, कान का मैल, आंसू, कफ तथा पसीना यह बारह प्रकार के मल हैं।

ऊर्ध्व नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः।

यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलाश्चयुताः।।

            हिन्दी में भावार्थ-नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियां-हाथ, कान, नाक, आंख तथा जीभ पवित्र मानी जाती हैं। नाभि के नीचे की इंद्रियां-गुदा, लिंग, तथा पैर एवं शरीर से निकलने वाले मल, मूत्र, विष्टा पसीना, खोट आदि अपवित्र हैं।

            महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपनी नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियों के उपयोग करते समय यह नहीं जानते कि नीचे की इंद्रियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उच्च इंद्रियां ग्रहण करती हैं और निम्न इंद्रियां उसके संपर्क से  मिले कचड़े का निवारण करती हैं। हमारी देह में सात चक्र हैं-सहस्त्रात, आज्ञा, विशुद्धि, अनहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार-जो निरंतर घूमते रहते हैं। हम अपनी इंद्रियों से बाहरी विश्व का उपभोग करते हैं पर इसमें नियमितता तभी तक संभव रह पाती है जब तक यह सभी चक्र काम करते हैं।

            इसलिये हम उच्च इंद्रियों से केवल उन्हीं व्यक्तियों, वस्तुओं और विषयों से संपर्क करें जिनसे हमारी देह का कोई चक्र दृष्प्रभाव का शिकार न हो। हम इन्हीं इंद्रियों से अपने कर्म फल का निर्माण करते हैं यह नहीं भूलना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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प्राचीन ज्ञान से विमुख होना समाज के लिए कष्टकर-भर्तृहरि नीति शतक


      अंग्रेजों ने भारत में जिस शिक्षा पद्धति को स्थापित किया उसका प्रचलन निर्बाध गति से हमारे देश में अब भी जारी है।  इस पद्धति को अपनाये रखने का कारण यह है कि इसके आधार पर विद्याध्यन करने के पश्चात् जो उपाधियां प्राप्त होती हैं उसी से निजी तथा सरकारी क्षेत्रों में नौकरियां करने का अवसर आधुनिक गुलामों को मिलता है।  यह अलग बात है कि हमारे शैक्षणिक क्षेत्र के विद्वान आज भी देश में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या को देखते हुए शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुखी बनाने की मांग करते हैं।

      पहले तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा करने वालों को भी नौकरी ढूंढने के अभियान में लगना पड़ता था पर उदारीकरण ने ऐसी स्थिति बना दी है कि तकनीकी महाविद्यालायों मेें अध्ययन करने के दौरान ही नौकरी देने वाले शिविर लगाकर छात्रों का भावी गुलाम कें रूप में चयन किया जाने लगा है। आजकल  किसी भी शैक्षणिक संस्थान की प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने  अपने यहां अध्ययनरत कितने अधिक छात्रों को गुलामी का अवसर का लाभ उठाने की सुविधा प्रदान की।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

—————

पुरा विद्वत्तासीदुषशमवतां क्लेशहेतयेगता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।

इदानीं सम्प्रेक्ष्य क्षितितलभुजः शास्त्रविमुखनहो कष्ट साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशत।।

     हिन्दी भावार्थ-पहले लोग मानसिक रूप से दृढ़ होने के लिये विद्याध्ययन करते थे। कालांतर में विषयों में आसक्त होने पर सुख प्राप्त करने के लिये उसका अनुकरण किया। अब तो लोग शास्त्रों से विमुख हो गये हैं। वह उनका नाम भी नहीं सुनना चाहते थे। राजाओं ने भी शास्त्रों में मुंह फेर लिया है। इस तरह यह प्रथ्वी रसातल में जा रही है वह चिंत्ता का विषय है।

      आमतौर से हमारे यहां के धार्मिक विद्वान शास्त्रों से विमुख होने की शिकायत करते हैं पर यह कोई नयी बात नहीं है। हमारे समाज में भले ही प्राचीन ग्रंथो को मान्यता प्राप्त है पर उसमें स्वाध्याय करने का मन सहजता से नहीं लगता। यही कारण है कि जो उनका अध्ययन करते हैं वह उसका व्यवसायिक उपयोग करते समाज में गुरु पद पर प्रतिष्ठित हों जाते हैं।  लोग फुर्सत के समय उनके प्रवचन सुनकर मनोरंजन के रूप में आनंद उठाते हैं।

        दरअसल प्राचीन ग्रंथों का अध्यात्मिक अध्ययन प्रारंभ में विषतुल्य प्रतीत होता है पर कालांतर में उसके आधार पर इस मायावी संसार के नाटकीय दृश्य देखकर उनका विश्लेषण करने की सुविधा मिलती है जो अत्यंत मनोरंजक होती है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भाव के त्याग का अत्यंत महत्व प्रतिपादित करने के साथ ही यह भी बताया गया है कि भोग का सुख क्षणिक होने के साथ कालांतर में उसका  प्रभाव विकार के रूप में प्रकट होता है।  अज्ञान के अभाव में लोग भोग के स्वरूप को ही जीवन का आनंद समझते हैं।  इतना ही नहीं लोगों में सबसे बड़ा भोगी बनने की होड़ लगी है।  यही कारण है कि देश में दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रोगियों की संख्या बढ़ी है।

      आज के समय हम प्राचीन शिक्षा पद्धति की बात तो कर ही नहीं सकते।  कारण यह है कि भारत में मानव श्रम अधिक मात्रा में है और उसका निर्यात भी होता है।  हम जिन लोगों को विदेशों में नोक्री करते देखते हैं वह मानव श्रम के निर्यात का ही रूप है।  अंग्रेजी भाषा का इसलिये अपनाये रखा गया है ताकि श्रम निर्यात करने की सुविधा बनी रहे।  ऐसे में शिक्षा के पाठयक्रम में भारतीय ग्रंथों को समाहित करने का विचार प्रकट करने पर सामान्य व्यक्ति भी हंसेगा तब अंग्रेजी शिक्षा से उच्च पद पर लोगों से समर्थन की आशा करना भी व्यर्थ है।

      यह अलग बात है कि समाज में नैतिक, भावनात्मक तथा वैचारिक पतन का रोना सभी होते हैं। हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने अपने परिश्रम से जीवन के सत्य की खोज कर प्रस्तुत कर दी है।  नया कोई सत्य दृष्टिागोचर नहीं होता।  ऐसे में जिन लोगों को ज्ञान के आधार पर जीवन का आंनद उठाना है उन्हें प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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सार्वजनिक जगहों पर कूड़ा करना अपराधिक कृत्य-मनुस्मृति के आधार चिंत्तन लेख


            हमारे देश में सार्वजनिक स्थानों, मार्गों तथा उद्यानों में भारी गदंगी होने के समाचार आते हैं। अनेक पुराने लोग यह शिकायत करते मिलते हैं जो राजतंत्र के समय शहर के साफ होने की बात कहते हुए आधुनिक लोकतंत्र में व्यवस्था चौपट होने का दावा करते हैं पर सच यह है कि उस समय उपभोग की ऐसी प्रवृत्ति नहीं थी जैसी कि आज है।  लोगों का खान पान अब घर से अधिक बाहर हो गया है।  अंडे, मांस, सिगरेट, शराब, तथा तैयार  खान पान के सामानों का उपभोग बाजारों में धड़ल्ले से होने लगा है जिससे कचरे का भंडार कहीं भी देखा जा सकता है।  ऐसा नहीं है कि बाजारों में ऐसी वस्तुओं का उपभोग बढ़ा हो वरन् लोग घरों में मंगवाकर भी इन्हें सड़क पर ही फेंकते हैं।

            वर्षा ऋतु में पिकनिक मनाने की परंपरा बन गयी है, यह अलग बात है कि यही ऋतु भोजन के पाचन की दृष्टि से संकटमय मानी जाती है।  आजकल पंचसितारा निजी चिकित्सालयों में इसी ऋतु में भीड़ लगती है।  हर जगह कचरा कीचड़ में तब्दील हो जाता है और इससे महत्वपूर्ण जलस्थल तथा उद्यान सामान्य पर्यटकों के सामने बुरे दृश्य लेकर उपस्थित रहते हैं।  कहा जाता है कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती मगर सभी वस्तुओं को इसी में बांधकर उपभोक्ता को दिया जाता है। अनेक शहरों में  इस प्लास्टिक ने सीवर लाईनों को अवरुद्ध करने के साथ ही नदियों और नालों को प्रदूषित कर दिया है।  हमारे यहां पर्वतों तथा नदियों को पूज्यनीय बताया जाता है पर हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों पर जाने वाले कथित भक्तों ने किस तरह वहां अपनी उपभोग प्रवृत्तियों से प्रदूषण फैलाया है उस पर अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ नाखुशी जताते रहते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

———–

समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमध्यमनापदि।

स द्वौ कार्यापर्णे दद्यादमेध्यं चाशुशेधयत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-सार्वजनिक मार्ग पर कूड़ा फेंकने वाले ऐसे नागरिक जो अस्वस्थ न हों उन पर अर्थ दंड देने के साथ ही उसकी सफाई भी करवाना चाहिये।

आपद्गतोऽधवा वृद्धो गर्भिणो बाल एव वा।

परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः।।

            हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई संकट ग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बालक सड़क पर कचरा फैंके तो उसे धमकाकर सफाई कराना चाहिये।

            हमारे देश में मनस्मृति का विरोध एक बुद्धिमानों का समूह करता है। यह समूह कथित रूप से आम आदमी की आजादी को सर्वोपरि मानता है।  उस लगता है कि मनुस्मृति में जातिवादी व्यवस्था है जबकि सच यह है कि इसमें ऐसे अनेक महत्वपूर्ण संदेश है जो आज के समय भी अत्यंत प्रासांगिक हैं। एक तरफ समाज प्लास्टिक के रंग बिरंगे रूपों में बंधे सामानों को देखकर विकास पर आत्ममुग्ध हो रहा है  जबकि अनेक प्रकार के विषाक्त, मिलावटी तथा सड़े खानपान से जो बीमारियां पैदा हो रही हैं उस पर किसी का ध्यान नहीं है।  उससे अधिक यह महत्वपूर्ण बात है कि अनेक लोग सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने की बजाय वहां कचरा डालकर न केवल अपने लिये वरन् दूसरों को भी कष्ट देते हैं।  इसलिये जागरुक लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वह कचरा उचित स्थान पर डालकर पुण्य का काम करें।

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तरक्की और तमीज-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


एकरसता में जीने का आदी विलासिता में फंसा समाज,

मौसम के बदलने से परेशान हो रहा है आज।

वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपनी ऊंची हैसियत पर

इतराते लोग भूख पर बहस में होते मशगूल,

बेबात के विषय को देते जोरदार तूल,

जिनके पेट चिकनी रोटी से भरे हैं,

महंगाई पर चर्चा करते हुए उनकी आंखों में आंसु भरे हैं,

कहें दीपक बापू सभी दे रहे हैं अपने अपने बयान

किसके हाथ में है हालातों पर काबू करने की ताकत

यह अभी तक बना हुआ राज है।

————-

तमीज नहीं आयी खाने पीने की मगर तरक्की हो गयी,

लड़खड़ाते कदम नशे में मगर सभ्य समाज में

बैठने की उनकी जगह पक्की हो  गयी।

उनके पास इतनी दौलत है कि लुटने का भय नहीं सताता,

खर्च करते हैं पानी की तरह मगर फिर भी मजा नहीं आता।

आसमान के सितारों जैसा स्वयं के  होने का उनको वहम है,

ज़माने पर ज्यादितयों से फेरते मुंह गोया उनका दिल नरम है।

चेहरे थे जिनके फुंके बल्ब की तरह अब चांद जैसे लगते हैं,

अंधेरे में रहते थे अब उनके घर शेर की मांद  जैसे लगते हैं।

कहें दीपक बापू दौलत और शौहरत खेलती इंसानों से

अपने खिलाड़ी होने पर लोग यूं ही इतराते हैं

गिर गयी नीयत भले ही हालात में तरक्की हो गयी।

————-

ज्ञानी लोगों का ईश्वर सभी जगह मौजूद-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख


            जकल धर्म के नाम पर समाज में  कथित एकता स्थापित करने के लिये  यह नारा दिया जाता है कि ईश्वर एक है। वैसे तो  चाहे जिस स्वरूप की आराधना करें उसमें एक ही  ईश्वर के प्रति  ही आस्था का भाव स्वीकार किया जाना चाहिये। वैसे भारतीय अध्यात्म दर्शन में भी कुछ इस तरह ही कहा गया है पर अगर हम उसमें वर्णित संदेशों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि ईश्वर अनंत है।  उसके स्वरूप, गुण, विचार, तथा क्रियाओं को प्रत्यक्ष देखना लगभग असंभव है।  वह एक भी हो सकता है और अनेक भी।  वह अदृश्य है इसलिये उसके बारे में निश्चित रूप से कहना ठीक नहीं हैं। अन्य धर्मों के विद्वानों की क्या कहें स्वयं भारतीय धर्म के अनेक विद्वान आपस में उलझ जाते हैं।  एक वर्ग कहता है कि ईश्वर एक है और उसकी जिस रूप में आराधना की जाये अच्छा है, दूसरा कहता है कि उसकी लीला अनंत और अपरंपार है जिसे जानने की बजाय उसकी निराकार भक्ति करना ही श्रेष्ठ है।

            इस तरह के विवादों पर कोई निष्कर्ष न निकलता है न आगे संभावना है पर एक बात तय है कि ज्ञानी और साधक इस तरह की बहसों में मौन रहकर अपनी योग्यता का ही प्रमाण देते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से भक्ति तथा भक्तों के चार रूप बताये गये हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  इसका सीधा मतलब यही है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त मौजूद रहेंगे और किसी पर कटाक्ष करना या किसी की भक्ति में दोष देखना अज्ञान का ही प्रमाण है।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि

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अग्रिर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।

प्रतिमा स्पल्पबुछीनां सर्वत्र समदिर्शनाम्।।

            हिन्दी में भावार्थ-द्विजाति के देव अग्नि, मुनियों का देव हृदय तथा अल्पबुद्धिमानों का देव मूर्तियों में निवास करता है पर तत्वज्ञानी समदर्शी होते हैं इसलिये उनका देव हर जगह बसता है।

            भारतीय धार्मिक परंपराओं में भी अनेक प्रकार की उपासना पद्धतियां प्रचलित हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने हर उपासना पद्धति को मान्यता दी है पर यह भी माना है कि तत्वज्ञानी तो उनका ही स्वरूप है। कहने का अभिप्राय यह है कि जो वास्तव में तत्वज्ञानी है उसके लिये परमात्मा सभी जगह है।  वह किसी विशेष स्थान को सिद्ध मानकर वहां उपस्थिति देने की बाध्यता अनुभव नहीं करता यह अलग बात है कि जिज्ञासावश ज्ञानी ऐसे स्थानों पर जाते हैं। धाार्मिक बहसों में स्वयं को धार्मिक विद्वान साबित करना या जगह जगह ज्ञान बघारकर शिष्य संचय करना ज्ञानियों का स्वाभाविक कर्म कभी नहीं बन पाता।  न ही वह आश्रम बनाकर स्वयं को गुरु पद पर प्रतिष्ठत करते हैं। ज्ञानी तो श्रीमद्भागवत गीता के गुण तथा कर्म विभाग के सिद्धांतों को जानने के बाद सांसरिक विषयों में निर्लिप्त भाव से इस तरह व्यस्त होते हैं जैसे कीचड़ में कमल रहता है।

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रहीम दर्शन-सभी खुशी देने वाला ही राज्य सराहनीय


                      हमारे देश में राजपद पाने की लालसा अनेक लोग राजनीति में सक्रिय करते हैं।  जिनके पास पैसा, प्रतिष्ठा और पराक्रम है वह आधुनिक लोकतंत्र में पद पाकर समाज में अपना प्रभाव बढ़ने को उत्सुक रहते हैं।  यह पद की चाहत अपने मन में पूज्यता का भाव शांत करने के लिये पैदा होती है। सच बात तो यह है कि राजपद पाना हमारे देश में एक उपलब्धि तो माना जाता है पर उसके साथ जो दायित्व हैं उन पर किसी की दृष्टि नहीं जाती।  किसी भी राज्य का प्रबंध सहज नहीं होता उस पर भारत जैसे विशाल तथा विविधताओं वाले देश में तो सुशासन बनाय रखना एक बड़ी चुनौती होती है पर कभी यह नहीं लगता कि राजपद की कामना रखने अनेक लोगों को इसका आभास होता है।

कविवर रहीम कहते हैं कि

————

रहिमन राज सराहिए, ससि सम सुखद जो होय।

कहा बापुरो भानु है, तपै तरैयन खोय।।

                   हिन्दी में भावार्थ-वही राज्य सराहनीय है जिसमें सभी लोग वर्ग के लोग खुश रहें। जहां सभी को आगे बढ़ने का अवसर मिले और जहां सभी को अपने काम काम पूरा दाम मिले वही राज्य सुशासित कहलाता है।

                      राज्य प्रमुख का यह कर्तव्य रहता है कि वह अपने अंतर्गत रहने वाले विभिन्न वर्ग, वर्ण तथा विचार वाले लोगों की रक्षा करे।  सभी को आगे बढ़ने के समान अवसर मिले। हम देख रहे हैं भारत में आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली होने के बावजूद वैसी अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं जैसी अपेक्षा की गयी थी।  देखा यह गया कि इस लोकतंत्र की आड़ में वैसी राजशाही, वंशवाद तथा वणिक वृत्ति राज्यकर्म में व्याप्त हो गयी है जैसे पहले हुआ करती थी।  हालांकि अभी हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव के परिणामों में आम लोगों ने यह जता दिया है कि वह देश में एक सच्चा लोकतंत्र चाहते हैं।  इन चुनाव परिणामों से यही संदेश मिला है कि लोग इस देश में राज्य से अपने विकास तथा रक्षा की अपेक्षा करते हैं।  वह छोटी छोटी बातों से बहलने वाले नहीं है। न ही कथित नारे उनको प्रभावित कर सकते हैं।  यह अलग बात है  कि इस संदेश को राजपद पाने का मोह रखने वाले लोग कितना समझ पाते हैं।

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कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है-गुरू पूर्णिमा पर विशेष हिन्दी लेख


            आजकल एक संत को भगवान मानने या मानने के विषय को  लेकर प्रचार माध्यमों पर बहस चली रही है। हमारे यहां इतिहास में अनेक कथित चमत्कारी संत हुए हैं पर जिन संत की चर्चा हो रही है उन पर बाज़ार के सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों की विशेष श्रद्धा रही है। आज के आधुनिक युग में बाज़ार तथा प्रचार का संयुक्त उपक्रम किसी को भी भगवान बना सकता है और मामला बिगड़े तो शैतान भी बना सकता है।  बहरहाल अध्यात्मिक और योग साधकों के लिये ऐसी उन संत के भगवान होने या न होने पर चर्चा मनोरंजक हो सकती है तो साथ ही अपनी साधना पर चिंत्तन करने का अवसर भी प्रदान करती है।

            इस बहस में कथित रूप से अनेक धार्मिक विद्वान शामिल हो रहे हैं।  भारतीय अध्यात्म के पुरोधा होने का दावा करने वाले अनेक श्वेत और केसरिया वस़्त्र पहनने वाले सन्यासी भी इस बहस में प्रचार के लोभ की वजह से शामिल हो रहे हैं। चर्चित संत को मानने वाले इस देश में बहुत हैं पर एक बात तय है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से उनका कोई महत्व नहीं है।  उनके नाम पर कोई एक समाज नहीं रहा  पर बहस कर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई अलग समूह है जो केवल आर्त भाव की भक्ति में लीन रहना चाहता है। हमारा तो यह मानना है यह बहस ही प्रायोजित है क्योंकि चुनाव के बाद इस समय कोई सनसनीखेज विषय नहीं है जिस पर प्रचार माध्यम अपना विज्ञापन का समय पास कर सकें इसलिये धर्म से जुड़ा विषय ले लिया है।

संत कबीरदास कहते हैं कि

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हरि सुमिरन सांची कथा, कोइ न सुनि है कान|

कलिजुग पूजा दंभ की, बाजारी का मान||

            सरल हिन्दी में व्याख्या-यदि कोई श्रद्धापूर्वक हरि की कथा कहे तो उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है और धर्म का बाज़ारीकरण वाले को सम्मान मिलता है।

कालि का स्वामी लोभिया, पीतल की खटाय।

राज दुवारें यौं फिरै, ज्यों हरियाई गाय।

            सरल हिन्दी में व्याख्या-इस कलियुग का स्वामी लोभ है जहां पीतल को खटाई में रखकर चमकाया जाता है। लोभी स्वामी राज दरबारों का रुख उसी तरह करते हैं जैसे गाय हरियाली की तरफ जाती है।

            अगर हम भारतीय समाज के अध्यात्म यात्रा को देखें तो हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ है जो पूज्यनीय तथा पठनीय है पर श्रीमद्भागवत गीत ने सभी का सार ले लिया है।  इसलिये यह माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का सबसे मजबूत आधार उसके संदेशों पर ही टिका है।  श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने वालों को इस तरह की बहस में अपनी राय व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता और न ही वह चाहते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों से इतर लोगों में इस पर चर्चा करना निषिद्ध किया है।

            अनेक सन्यासी इस बहस में आ रहे हैं पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अवलोकन करें तो उनके सन्यासत्व पर ही प्रश्न उठ सकते हैं।  उनका व्यवहार इस तरह है जैसे कि वह कोई धर्म के बहुत बड़े प्रवर्तक हैं।  एक बात यह सन्यासी भूल रहे हैं है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त हमेशा ही रहेंगे-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जब इस समय महंगाई, बेकारी, बीमारी तथा अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है तो भय और आशंकाओं से ग्रसित लोग उससे उपजे तनाव के विसर्जन  के लिये नये मार्ग ढूंढ रहे हैं तो यह उनका अधिकार है। हमारे यहां भगवान की आरती की परंपरा रही जो कि अंततः आर्त भाव का ही परिचायक है। उसके बाद अर्थार्थी भाव के भक्तों का नंबर आता है। लोगों के अंदर जल्दी से जल्दी उपलब्धियां पाने की लालसा बढ़ी है इसलिये वह धर्म के नाम पर सिद्ध स्थानों का रास्ता पकड़ते हैं।  संसार के विषयों की स्थिति यह होती है कि समय आ गया तो काम सिद्ध नहीं तो इंतजार करो।  इस इंतजार में बीच लोग  दूसरा सिद्ध स्थान ढूंढने जाते है।  काम बन गया तो भक्त सिद्ध स्थान का स्थाई पर्यटक बन जाता है।  ज्ञान साधकों के लिये यह स्थिति अचंभित करने वाली नहीं होती। भक्त भी तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी-यह जानने वाले ज्ञानी कभी किसी की भक्ति पर टिप्पणी नहीं करते। इन तीनों से आगे होते हैं योगी जिनको ज्ञान भक्ति का प्रतीक माना जाता है जो ध्यान के माध्यम से अपनी आत्मा और मन का संपर्क करने में सफल होते हैं तब उन्हेें किसी अन्य प्रकार की भक्ति से प्रयोजन नहीं रह जाता-वह निरंकार परमात्मा का स्मरण करते हैं जो सामान्य मनुष्य के लिये सहज नहीं होती।  यह अलग बात है कि गेरुए और श्वेत वस्त्र धारण करने वाले अनेक लोग धर्म का झंडा उठाये स्वयं के योग होने का प्रचार करते हुए शिष्य समुदाय का संग्रंह का प्रचार करवाते हैं।

            हमारे यहां अनेक ऐसे कथित संत हुए हैं जिनके भगवान होने का प्रचार कर बाज़ार तथा प्रचार समूह अपना व्यवसायिक हित साधते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां भक्ति में फैशन आ जाता है। यह अलग बात है कि हमारे यहां प्राचीन अध्यात्मिक पुरुषों-भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण-की ऐसी महत्ता है कि भारतीय जनमानस उसे कभी विस्मृत नहीं कर सकता।  इसी दृढ़ विश्वास के कारण अध्यात्मिक ज्ञान तथा योग साधक कभी किसी के भगवान होने के दावे पर चिंतित नहीं होते और न ही उनकी भक्ति तथा भक्तों पर प्रतिकूल टिप्पणी कर अपने ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

 

अमीर लोग कमाते ज्यादा दान कम करते हैं-संत कबीर दर्शन


   हमारे देश भारत में जैसे जैसे आर्थिक विकास बढ़ता गया है वैसे ही लोगों में धार्मिक प्रवृत्ति के प्रति अधिक रुझान भी देखा जा रहा है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कथित रूप से धर्म प्रचार करने वाले न केवल लोगों से चंदा और दान लेते हैं वरन् अपने ज्ञान सुनाने के लिये आधुनिक महंगे तथा अत्यंत तकनीकी साधनों का भरपूर उपयोग भी करते हैं।  सबसे बड़ा ज्ञानी वही है जिसके पास धन है। सबसे प्रभावशाली वह माना जाता है जिसके चरण कमल उच्च पद पर स्थित हैं।  सबसे शक्तिशाली वही है जो अपने बाहुबल का उपयोग कमजोर को दबाने के लिये करता है।  कभी कभी तो यह लगता है कि आधुनिक सभ्यता में शीर्ष पर पहुंचे लोग भौतिक रूप से तो जितने शक्तिशाली हो गये हैं उतने ही मानसिक रूप से कमजोर हुए हैं।  उनका पूरा श्रम, समय तथा चिंत्तन अपनी स्थिति बनाये रखने तक ही सिमट गया है।  यही कारण है कि सामाजिक रूप से बदलाव की बातें सभी करते हैं पर उनके शब्द महत्वहीन ही रहते हैं। यह शक्तिशीली शीर्ष पुरुष समाज के हित का दिखावा केवल इसलिये करते हैं ताकि उनके विरुद्ध लोगों में मन वैमनस्य का भाव बढ़ न जाये।

 

संत कबीर दास ने कहा है कि

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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान

      संतशिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दानकर अपने मनमेंप्रसन्न होते हुएफिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्गमें ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।

 

आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

 

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द दूर ही  रह जाते हैं और सिर के बाल  सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है  साथ ही माया के जाल में फंसा रहता है।

      हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

http://zeedipak.blogspot.com

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निष्काम समाज सेवक विरले ही होते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


            आधुनिक प्रचार माध्यमों के आत्म विज्ञापन की सुविधा प्रदान की है जिसका वह लोग लाभ उठाते हैं जिनके पास बृहद आर्थिक संगठन हैं।  स्थिति यह है कि  आर्थिक शिखर पुरुष  छोड़ भलाई सारे काम करते हैं पर अपने प्रचार प्रबंधकों के माध्यम से अपनी छवि देवत्व की बना लेने में सफल हो जाते हैं।  इतना ही नहीं  अपने श्रमिकों, कर्मचारियों और पूरे समाज को शोषण करने के बावजूद ऐसे धनपति प्रचार माध्यमों से अपनी छवि इस तरह बनाते हैं जैसे कि वह अत्यंत विनम्र और दयालु हों।  इसके अलावा भी कला, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म तथा समाज के क्षेत्र में भी कथित रूप से नायकत्व वाली छवि धारण किये अनेक लोग आत्म विज्ञापन के जरिये ही अपना कार्य व्यापार चला रहे हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो स्वयं कभी परमार्थ नहीं कर पाते मगर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय अन्य लोगों की निंदा कर यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि वह स्वयं ही श्रेष्ठ है। इतना ही धार्मिक क्षेत्र में भी अब विज्ञापन के जरिये कथित सिद्ध सामग्री बेचने के ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिसे देखकर अध्यात्मिक ज्ञानियों की आंखें फटी रह जाती है।

भर्तृहरि नीति शातक में कहा गया है कि

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मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः|
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः||

     हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में कितने हैं?

     वैसी देखा जाए तो दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। ‘मैंने यह अच्छा काम किया’ या ‘मैंने उसको दान दिया’ जैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता है?

      इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं। आत्म प्रचार में लगे लोगों को अपने छवि बनाने के प्रयासों से ही समय नहीं मिलता तब वह समाज से कैसे कर सकते हैं?

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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