अधिक धन होने पर अनुशासहीनता हानिकारक-हिन्दू धर्म संदेश (dhan aur anushasan-hindu dharma sandesh)

धर्मार्थोश्यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानगुः।
श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्र स परिहीयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर के कथनानुसार जो मनुष्य धर्म और अर्थ इंद्रियों के वश में हो जाता है वह शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन, स्त्री को अपने हाथ से गंवा बैठता है।
अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।
इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।
हिन्दी में भावार्थ-
अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक लोगों को यह लगता है कि अगर अधिक धन आ गया तो जैसे सारा संसार जीत लिया। इस भ्रम में अनेक लोग धन के कारण अनुशासहीनता पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि शीघ्र ही न केवल अपना वैभव गंवाते हैं बल्कि कहीं कहीं उनको शारीरिक हानि भी झेलनी पड़ती हैं। जीवन में दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन का होना जरूरी है। अधिक धन है तो भी समाज में सम्मान प्राप्त होता है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अनुशासनहीनता बरती जाये। ऐसे ढेर सारे उदाहरण है जिसमें अनेक धनपतियों की औलादें मदांध होकर ऐसे अपराधिक कार्य इस आशय से करती हैं कि उनके पालक धन से कानून खरीद लेंगे। ऐसा होता भी है पर उसकी एक सीमा होती है जहां उसका अतिक्रमण होता है वहां फिर सींखचों के अंदर भी जाना पड़ता है। इस समय ऐसा दौर भी है जिसमें धनपति स्वयं और उनकी औलादें समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासन हीनता दिखाते हैं। धन उनकी आंखों बंद कर देता है और उनको यह ज्ञान नहीं रहता कि आजकल प्रचार माध्यम सशक्त हो गये हैं जिनकी वजह से हर समाचार बहुत जल्दी ही लोगों तक पहुंचता है। भले ही यह प्रचार माध्यम भी धनपतियों के हैं पर उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सनसनीखेज खबरों की आवश्यकता होती है और ऐसे में किसी धनी, प्रतिष्ठित या बाहुबली द्वारा किसी प्रकार के अपराध की जानकारी मिलने पर उसे जोरदार ढंग से प्रसारित भी करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि अब वह समय चला गया जब धन और वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासनहीनता बरतना आवश्यक लगता था।
आदमी के पास चाहे कितना भी धन हो उसे जीवन में अनुशासन अवश्य रखना चाहिये। याद रहे धन की असीमित शक्ति है पर देह की सीमायें हैं और किसी प्रकार की अनुशासनहीनता का दुष्परिणाम उसे ही भोगना पड़ता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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इंटरनेट पर हिन्दी लिखने का अनुभव आम जगत से अलग-हिन्दी लेख (experience of hindi writing on ineternet)

अंतर्जाल पर गद्य लिखें या पद्य अंतद्र्वंद तो इस लेखक के मन में हमेशा ही रहेगा। ब्लाग पर पहले इसलिये कवितायें लिखी क्योंकि अंग्रेजी टाईप में अधिक गति नहीं थी और रोमन में हिन्दी लिखना जरूरी लग रहा था। बाद में कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला शस्त्र मिला तो खुशी हुई कि गद्य लिखेंगे। यह खुशी जल्दी काफूर भी हो गयी जब अंतर्जाल के बढ़ते तकनीकी ज्ञान से अपने पाठों की सफलता और असफलता का विवेचन किया। पता लगा कि छोटी पर मारक कविताएं अधिक सफल हैं।
प्रारंभिक दौर में लिखी गयी कवितायें और छोटी गद्य रचनाएं अभी तक पाठक जुटा रही हैं और बड़े पाठ उनसे कमतर साबित हुए। दरअसल यह लेखक उसके मित्र उस दौर के लोग हैंे जो कविताओं से थोड़ा एलर्जी रखते हैं। कविता शब्द ही उनको ऐसा लगता है जैसे कि किसी ने करंट मार दिया हो। लिखने को भले ही लिख जायें पर पढ़ने पर अगर प्रभाव न छोड़े तो समय खराब करने पर पछतावा होता है।
निजी मित्र हमेशा ही कविता लिखने के विरोधी रहे हैं। एक मित्र महाशय तो ऐसे हैं जो स्वयं ही गज़ब के गीत और गज़ल लिखते हैं और अब उन्होंने ब्लाग भी बनाया है वह हमेशा ही कविता लिखने का विरोध करते हैे। अपने ब्लाग पर आई कुछ टिप्पणियों ने हमेशा उनकी याद आयी जैसे कि उन्होंने ही टिप्पणी लिखी हो।
बहुत पहले एक बार उन्होंने हमारी गज़ल देखकर कहा था कि
‘तुम्हारी यह रचना बहुत गहरी और दिल को छू लेने वाली है पर यह गज़ल नहीं है।’
हमने कागज हमने हाथ में ले लिया और कहा‘चाहे इसने आपके दिल की कितनी भी गहराई में उतरकर प्रभाव जमाया हो पर हमें यह अफसोस है कि यह गज़ल नहीं है।’
एक बार एक कविता उनको लिखकर दिखाई तो वह बोले-‘यार, तुम जबरदस्ती तुक क्यों मिलाते हो? इसमें कोई शक नहीं है कि इसमें कथ्य दमदार है पर यह गद्यनुमा चिंतन है। इसे कविता तो कहना मुश्किल है।’
उनके पास अधिक हिन्दी का भाषा ज्ञान है और अंतर्जाल पर भी सक्रिय उन जैसा ज्ञान रखने वाले एक दो लेखक हमारी नज़र में हैं। हम पहले उनको अपने लेख और व्यंग्य दिखाते थे तो वह यही कहते थे कि तुम तो केवल गद्य लिखा करो।
ऐसा नहीं है कि वह गद्य नहीं लिखना जानते है। हमने उनके ही एक अन्य कवि मित्र की एक कविता की पुस्तक पर उनके द्वारा लिखी गयी समीक्षा पर उनसे कहा था कि‘कविता की वह पुस्तक पता नहीं कितनी दमदार है पर आपकी समीक्षा उसमें चार चांद लगायेगी।
हिन्दी और उर्दू के शब्दों का उनका ज्ञान असंदिग्ध है और कहीं परेशान होने पर उनसे चर्चा अवश्य करते हैं। वह बहुत कम लिखते हैं और हमने उनसे कहा था कि ‘ऐसा लगता है कि जिनको भाषा का ज्ञान अधिक होता है वह कम ही लिख पाते हैं।
तब उन्होंने हंसते हुए कहा था कि ‘हां, तुम अपने को धन्य समझो कि भाषा का ज्ञान कामचलाऊ है इसलिये अधिक लिख जाते हो। वैसे तुम कविताओं से जितना हो सके बचो। तुम अपने चिंतन के लिये अधिक जाने जा सकते हो।’
अल्पज्ञानी होना तब समस्या नहीं रहता जब आपको पता लग जाता है वरना दुनियां भर में अपनी मूर्खता दिखते रहते हैं। फिर ऐसे मित्र भी कम ही मिलते हैं जो आलोचना कर रास्ता बताते हैं।
उनकी कही बातें जब ब्लाग लिखने पर टिप्पणियों के रूप में भी आयी। अव्यवसायिक लेखक होने के नाते हमने उन पर कम ध्यान दिया पर जब चिंतन करते हैं तो सब ध्यान आता है। यहां हम केवल अपनी अभिव्यक्ति प्रकट करने के लिये लिख रहे हैं इसलिये कभी कभी उन पर विचार करते हैं। कवितायें लिखने का उद्देश्य केवल विषय को संजोना भर होता है ताकि उस पर कभी गद्य लिखेंगे पर अगर वह अपने स्वरूप में ही पंसद की जायें तो क्या किया जाये?
सच बात तो यह है कि छोटे अध्यात्मिक चिंतन ओर कविताओं ने इस लेखक के सभी ब्लाग/पत्रिकाओं को बहुत आगे तक पहुंचाया है। लोगों की प्रतिकियाओं का अध्ययन करें तो वह अधिक बड़े पाठों से जल्दी उकता जाते है। अगर कोई बात आपको गद्य में कहनी है तो उसके लिये विस्तार से कहना पड़ता है पर समय नहीं है तो व्यंजना विद्या में अगर उसे लिखा गया और वह प्रभावी हुआ तो पाठक उसे पकड़ लेंगे। वर्डप्रेस पर जिन पाठों ने अधिक वोट पाये हैं वह सभी कवितायें और छोटे अध्यात्मिक चिंतन ही है।
ऐसे में एक बात लगती है कि कहीं हम अपने रवैये को लेकर जिस तरह चल रहे हैं क्या वह ठीक है? व्यंजना विद्या में कही गयी बातें लेाग समझ रहे हैं तब उसके लिये विस्तार से गद्य लिखने की क्या जरूरत है? दूसरी बात यह है कि हमारे पास लिखने का समय नहीं है तो पाठक के पास भी कितना है?
दूसरी बात यह है कि कविताओं को अनदेखा करना भी ठीक नहीं है क्योंकि हो सकता है कि नये लेखक उसमें अपनी बात कुछ अनोखे ढंग से कह रहा हो। इस लेखक ने तो अपने पाठों पर इसलिये ही आलेख या कविता लिखने की परंपरा इसलिये प्रारंभ की कि शीर्षक देखकर कोई उसे खोले और कविता मिलने पर नाराज न हो। इसका उद्देश्य यह भी था कि कविता देखकर लोग कम खोलेंगे और घटिया होने पर उनका गुस्सा अभिव्यक्त नहीं होगा। आम पाठकों ने यह भ्रम तोड़ दिया है। उनके लिये महत्वपूर्ण कथ्य, तथ्य और विषय तत्व है। स्थिति यह हो गयी है कि वर्डप्रेस के ब्लाग/पत्रिकाओं के ‘पाठकों की पसंद’ का स्तंभ कविताओं की सफलता की जा कहानी कहा रहा है उससे तो यह लगता है कि नई पीढ़ी काव्य के प्रति वैसी संकीर्ण मानसिकता नहीं रखती। शर्त यही है कि कविताओं के शब्दों का मुख बाहर खुलता हो न कि एकांकी हो। कहने का तात्पर्य यही है कि अंतर्जाल पर हिन्दी का रूप कई विविधतायें लेकर आयेगा और उससे सभी को सामंजस्य बिठाना होगा।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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संत कबीर के दोहे-भक्ति स्वरूप बदलना अपराध जैसा

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग

साधुओं के साथ नियमित संगत करने और रात दिन भगवान का नाम जाप करते हुए भी उसका रंग इसलिये नहीं चढ़ता क्योंकि आदमी अपने अंदर के विकारों से मुक्त नहीं हो पाता।

सौं बरसां भक्ति करै, एक दिन पूजै आन
सौ अपराधी आतमा, पड़ै चैरासी खान

कई बरस तक भगवान के किसी स्वरूप की भक्ति करते हुए किसी दिन दुविधा में पड़कर उसके ही किसी अन्य स्वरूप में आराधना करना भी ठीक नहीं है। इससे पूर्व की भक्ति के पुण्य का नाश होता है और आत्मा अपराधी होकर चौरासी के चक्कर में पड़ जाती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भगवान का नाम लेना और साधुओं के आश्रमों में जाकर हाजिरी देना कोई भक्ति का प्रमाण नहीं हैं। भीड़ में बैठकर भगवान का नाम लेकर शोर मचाने से भी कोई भक्ति नहीं हो जाती। लोग बरसों तक ऐसा करते हैं पर मन में फिर भी चैन नहीं पाते। मन में शांति तभी संभव है जब एकाग्र होकर हृदय भगवान के नाम का स्मरण किया जाये। ऐसा नहीं कि आंखें बंद कर मूंह से भगवान का नाम जाप कर रहे हैं और अंदर कुछ और ही विचार आ रहे हैं। कुछ लोग विशेष अवसर पर प्रसिद्ध मंदिरों और आश्रमों में जाकर मत्था टेक कर अपनी भक्ति को धन्य समझते हैं-ऐसा करना भगवान को नहीं बल्कि अपने आपको धोखा देना है। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर अपने आचरण में पवित्रता नहीं है तो इसका मतलब यह है कि भक्ति एक धोखा है। जब तक आचार विचार और व्यवहार में पवित्रता नहीं रहेगी तब तक भगवान के नाम लेने का सकारात्मक प्रभाव नहीं हो सकता।

कुछ लोग अपने जीवन में बरसों तक भगवान के किसी एक ही स्वरूप की आराधना करते हैं। धीरे धीरे उनके अंदर भक्ति का रंग चढ़ने लगता है पर अचानक ही उनको कोई दूसरे स्वरूप या गुरु को पूजने के लिये प्रेरित करता है तो वह उसकी तरफ मुड़ जाते हैं। यह उनकी बरसों से की गयी भक्ति की कमाई को नष्ट कर देता है। जब सभी कहते हैं कि भगवान तो एक ही फिर उसके लिये स्वरूप में बदलाव करना केवल धोखा है यह अलग बात है कि उसकी प्रेरणा देने वाला भक्त को कोई दे रहा है या भक्त स्वयं ही उसकी लिये उत्तरदायी है। इतना तय है कि भगवान का रूप बदलकर उसका स्मरण करना अपने कष्ट का कारण बनता है।
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संत कबीर दर्शन-पैसे देखकर सभी प्यार करते हैं (paisa aur pyar-sant kabir darshan)

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्साहित करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम में शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि सच्चा प्रेम केवल परमात्मा से किया जा सकता है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
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भ्रष्टाचार अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा क्यों नहीं बनता-व्यंग्य हिन्दी लेख (on curruption-hindi article

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन रोकने के लिये कार्बन उत्सर्जन को लेकर एक महासम्मेलन हो रहा है। पश्चिम के विकसित देश दुनियां की फिक्र बहुत करते हैं। उनके न केवल फिक्र करना चाहिये बल्कि करते हुए दिखना भी चाहिये। आखिर दुनियां के यह छह सात मुल्क ही पूरी सारे विश्व समुदाय रहनुमा बन गये हैं। गरीब, विकासशील और एशियाई देशों के शिखर पुरुष हों या आम आदमी उनकी तरफ आकर्षित होकर देखता रहता है। उनकी तूती बोलती है। जैसा सम्मेलन बुलाओ। जब बुलाओ सभी देशों के प्रतिनिधि पहुंच जाते हैं। बहुत कम लोगों को पताहोगा कि यह पश्चिमी देश भले ही औपचारिक रूप से अलग अलग हों पर उनका ऐजेंडा एक ही है कि गरीब, विकासशील देशों के आर्थिक और प्राकृतिक साधनों का दोहन इस तरह किया जाये कि उनकी खुद की अमीरी और ताकत बनी रहे।
इन देशों के नागरिकों को एक दूसरे के यहां आने जाने के लिये बहुत सारी छूट है जबकि गरीब, विकासशील और एशियाई देशों के लिये ढेर सारे प्रतिबंध है।

कई बार तो ऐसा लगता है कि ब्रिटेन और अमेरिका इन देशों के नेता है तो कभी यह भी लगता है कि बाकी पश्चिमी राष्ट्र उनकी आड़ में अपनी ताकत दिखाते हैं। कम से कम डेनमार्क के प्रस्ताव से-जिसमें विकसित राष्ट्रों को कार्बन गैस उत्सर्जन के लिये तमाम छूटें देने और गरीब और विकासशील देशों पर इस आड़ में अपना फंदा कसने वाली शर्ते शामिल हैं-यही लगता है। एक दम व्यंग्य जैसा! इस प्रस्ताव को न केवल भारत ने बल्कि उसके साथ जुड़े जी 77 देशों के प्रतिनिधियों ने खारिज भी किया बल्कि यह भी बता दिया कि अगर यह प्रस्ताव दोबारा उसने रखा तो वह इस बात को भूल जाये कि कोपेनहेगन का यह सम्मेलन आगे भी जारी रहेगा।
चीन की प्रतिक्रिया थोड़ी आक्रामक हैं पर उसमें भी मजाक लगता है। उसने कहा कि ‘वह आखिरी दम तक विकासशील देशों की हितों के लिये लड़ेगा।’
चीन की सदाशयता पर हम कोई आपत्ति नहीं कर रहे पर यह कमजोर व्यक्ति या देश की प्रतिक्रिया लगती है जिसे मालुम है कि सामने वाला आखिर उसकी दम निकाल सकता है। दूसरा यह भी कि अगर उसके पास को अंतिम समय रोकेगा पर अगर पास हो गया तो वह सिर झुकाकर मान लेगा। इसकी जगह यह भी कहा जा सकता कि अगर डेनमार्क इस प्रस्ताव को दोबारा रखेगा तो उसे काली सूची में डाल दिया जायेगा, पर यह करने की ताकत किसी एशियाई देश में नहीं लगती भले ही वह इस
महाद्वीप का रहनुमा होने का दावा करता हों। यह एशियाई देशों की कमजोरी है कि वह इन पश्चिमी देशों द्वारा आयोजित सम्मेलनों में उनके प्रस्तावों पर ही विचार करते हुए समर्थन या विरोध करते हैं। अपनी तरफ से कोई नयी सोच
या समस्या वह सामने नहीं रखते। इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्रसंध जैसी संस्था जो कि केवल पश्चिमी देशों के वर्चस्व का बढ़ावा देती है उसकी
संस्थाओं में शामिल होकर अपने को गौरवान्वित समझते हैं। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद पिछले कई सालों से कोई उल्लेखनीय रूप से कार्य नहीं कर पायी। अमेरिका चाहे जैसा प्रस्ताव पास करा लेता है और अगर विवादास्पद विषय हो तो वह बिना प्र्रस्ताव के ही अपना काम करता है। इराक और अफगानिस्तान युद्ध में सुरक्षा परिषद कोई भूमिका नहीं निभा पाया। इसके पांच स्थाई
सदस्य-अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और चीन हैं। जर्मनी, इजरायल और जापान जैसे देश इसके स्थाई सदस्य नहीं है और न इसकी परवाह करते हैं। पता नहीं अपने भारत देश के लो्ग इसका स्थाई सदस्य बनने के लिये क्यों बेताब हैं। सुनने में यह भी आया कि अगर नये स्थाई सदस्य बने होंगे तो उनके पास वीटो पावर नहीं होगा। अगर यह वीटो पावर नहीं है तो समझ लो कि स्थाई सदस्य होना या न होना बराबर है। ऐसे में सुरक्षा परिषद की स्थाई
सदस्यता भीख की तरह लेना ही बेमानी है।
बहरहाल पश्चिम के देशों की अर्थव्यस्था का वजूद अपने आंतरिक आधारों पर कम
बाह्य आधारों पर अघिक टिका है इसलिये वह अन्य देशों को ऐसे कामों में व्यस्त रखते हैं। कभी पर्यावरण पर सम्मेलन करेंगे तो कभी आतंकवाद पर! जबकि इन समस्याओं के लिये वही अधिक जिम्मेदार हैं। आप पता कर लें एशिया
के उग्रपंथियों के ठिकाने किन देशों में हैं तो पश्चिमी देशों के नाम ही सामने आयेंगे जो मानवाधिकार के पैरोकार होने का दावा करते हैं। कभी जलवायु परिवर्तन का मामला उठायेंगे तो कभी व्यापार का ताकि दूसरे देशों पर रुतवा
जमा सकें।
विश्व भर में आतंकवाद, पर्यावरण प्रदू्रषण तथा अन्य अनेक संकट हैं। इन पर विचार करना चाहिये पर यह भी देखना चाहिये कि पह किस वजह से हैं। बीमारी का इलाज करने की बात समझ में आती है पर वह किस वजह से है यह जानना भी जरूरी है। उस वजह से परे होने का उपाय करना भी जरूरी है। आतंकवाद और पर्यावरण के साथ एक विश्वव्यापी समस्या है वह है भ्रष्टाचार। अनेक विद्वान कहते हैं कि विकासशील देशों में भ्रष्टाचार चरम पर है। ऐसा नहीं है कि विकसित राष्ट्र इससे अछूते हैं पर फिर भी वह इसका विचार नहीं करते न कोई सम्मेलन करते हैं। विकासशील देशों का बहुत सारा पैसा इन देशों की बैंकों में गुप्त रूप से पहुंचता है-गाहे बगाहे इसकी चर्चा समय समय पर होती है। कुछ कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इसी पैसे से पश्चिम के विकसित राष्ट्र अपना काम चला रहे हैं। वैसे अमेरिका में सरकारी रूप से चंदा लेना और देना वैध माना जाता है कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि अंततः चंदा देने वालों को कोई न कोई लाभ मिलता है। अधिक नहीं तो इतना तो मिल ही जाता है कि बाह्य व्यापार करने वाले पूंजीपति अपनी सरकार के सहारे संबंधित देशों का प्रभाव डालते है-कहीं कहीं भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी देते हैं।
एक समय ब्रिटेन के बारे में कहा जाता था कि उसके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता है। इसका कारण यह था कि एशियाई देशों के एक बहुत बड़े भूभाग पर उसका राज्य चलता था। धीरे धीरे वह छोटा होता गया। अलबत्ता अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा पद्धति कायम की। अंग्रेजों ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि वह जो शिक्षा पद्धति इन देशों में स्थापित कर रहे हैं वह सदियों से उनके लिये इस तरह गुलाम उपलब्ध करायेगी कि सब कुछ होते हुए भी यह देश कमजोर की तरह ललकारेंगे ‘आखिरी दम तक लड़ेंगे।’
चीन एक ताकतवर मुल्क हैं वह धमका भी सकता था । वह यह भी डेनमार्क से पूछ सकता था कि ‘यह प्रस्ताव तुमने रखा यह तो बाद की बात पहले यह बताओं कि इस पर सोचा भी कैसे?’
कहने का तात्पर्य यह था कि भाषा कड़क भी हो सकती है। सुनने मे यह भी आया है कि इस प्रस्ताव के पीछे ब्रिटेन की सोच काम कर रही थी। संभवतः ब्रिटेन को यह लगा होगा कि आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक रूप से वह आज भी इतना ताकतवर है कि अन्य देश स्वतंत्र जरूर हैं पर उनका विवेक तथा पैसा तो उसका गुलाम है इसलिये चाहे जैसा प्रस्ताव पास करा लेगा।
आतंकवाद, पर्यावरण प्रदूषण, मादक द्रव्य पदार्थों का व्यापार तथा अन्य अनेक ऐसी समस्यायें हैं जिनकी जड़ में भ्रष्टाचार है। यह भ्रष्टाचार जब तब नहीं मिटेगा तब कोई समस्या हल नहीं होगी मगर इसके विरुद्ध कोई सम्मेलन
नहीं करेगा। ब्रिटेन तो कभी नहीं क्योंकि उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था से ही भ्रष्टाचार पनपा है और जिसके पास भी देश तथा समाज के प्रबंध का छोटा भी अंश है वह अपने को राजा समझता है और बाकी को गुलाम। उनके लिये बैंकों में जमा अपनी राशि इष्ट देवी है जिससे बढ़ते देख वह प्रसन होते हैं। फिर जिस तरह अंग्रेजों ने इन एशियाई देशों से पैसा कमाकर अपने देश भेजा आज उनके गुलाम यही काम रहे हैं। देखा जाये जो ब्रिटेन और अमेरिका ने आज तक भी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र के खिलाफ युद्ध नहीं जीता पर फिर उसके चीन
जैसा प्रतिद्धंदी उसके सामने नम्र भाषा में बात करता है तब संदेह होता है। यही कारण है कि इन विकसित राष्ट्रों ने भारत के प्रस्ताव को भी उसी तरह खारिज किया जबकि वह विचारणीय था और उसमें व्यंग्य जैसा कुछ भी नहीं था। बहरहाल विकासशील देशों के भ्रष्टाचार से अमीर हुए मुल्कों से यह आशा करना ही बेकार है कि वह भ्रष्टाचार पर कभी कोई महासम्मेलन करेंगे।
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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दूसरे से जलने के रोग का कोई उपाय नहीं- हिन्दी धर्म सन्देश

य ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये।
सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।।
हिंदी में भावार्थ
-जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठा से ईष्र्या करता है उसकी व्याधि की कोई औषधि नहीं है।
न कुलं वृत्तही प्रमाणमिति मे मतिः।
अन्तेध्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर प्रवृत्ति नीच हो तो ऊंचे कुल का प्रमाण भी सम्मान नहीं दिला सकता। निम्न श्रेणी के परिवार में जन्मा व्यक्ति प्रवृत्ति ऊंची का हो तो वह अवश्य विशिष्ट सम्मान का पात्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ईर्ष्या का कोई इलाज नहीं है। मनुष्य में रहने वाली यह प्रवृत्ति उसका पूरा जीवन ही नरक बना देती है। मनुष्य जीवन में बहुत सारा धन कमाता और व्यय करता है पर फिर भी सुख उससे परे रहता है। सुख कोई पेड़ पर लटका फल नहीं है जो किसी के हाथ में आ जाये। वह तो एक अनुभूति है। अगर हमारे रक्तकणों में आनंद पैदा करने वाले तत्व हों तभी सुख की अनुभूति हो सकती है। इसके विपरीत लोग तो दूसरे के सुख से जले जा रहे हैं। अपनी पीड़ा से अधिक कहीं उनको दूसरे का सुख परेशान करता है। इससे कोई विरला ही मुक्त हो पाता है। ईर्ष्या और द्वेष से मनुष्य में पैदा हुआ संताप मनुष्य को बीमार बना देता है। उसके इलाज के लिये वह चिकित्सकों के पास जाता है। फिर भी उसमें सुधार नहीं होता क्योंकि ईष्र्या और द्वेष का इलाज करने वाली कोई दवा इस संसार में बनी ही नहीं है।

जो लोग जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर सम्मान पाने का मोह पालते हैं वह मूर्ख हैं। उसी तरह पैसा, पद, और प्रतिष्ठा पाने पर अगर कोई यह भ्रम पाल लेता है कि लोग उनका सम्मान करते हैं तो वह भी नहीं रखना चाहिये। लोग दिखाने के लिये अपने से अधिक धनवान का सम्मान करते हैं पर हृदय से उसी व्यक्ति को चाहते हैं जो उनसे अधिक गुणवान होता है। गुणों की पहचान ही मनुष्य की पहचान होती हैं। इसलिये अपने अंदर सद्गुणों का संचय करना चाहिए। दूसरे का सुख और वैभव देखकर अपना खून जलाने से कोई लाभ नहीं होता।

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चाणक्य नीति शास्त्र-नयेपन का अहसास करें (chankya niti-nayepan ka ahsas

गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव चिनतयेत्।
वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः।।
हिंदी में भावार्थ-
पहले हुई घटना को याद करने से कोई लाभ नहीं है। इससे अच्छा है भविष्य की चिंता करें। बुद्धिमान लोग हमेशा ही वर्तमान काल में कार्य करने के लिये प्रवृत्त होते हैं।
अहो बत विचित्राणि चरितानि महाऽऽत्मनाम्।
लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च।।
हिंदी में भावार्थ-
अहे! महात्माओं का चरित्र भी बहुत विचित्र होता है। एक तरफ वह धन को तिनके समान मानते हैं किन्तु उसके भार से झुक जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर दिन नया है यही मानने वाले इस जीवन का आनंद उठाते हैं। पहले की न केवल बुरी बल्कि अच्छी घटनाओं का भी भुला दें। कल जो बीत गया वह लौट कर नहीं आयेगा। अपनी असफलता को ही नहीं वरन् सफलता को भी भूल जायें। यही जीवन के आनंद उठाने का नियम है।
यदि कल हुए अपमान का स्मरण किया तो आज भी तकलीफ देगा। अगर कल हुए सम्मान को दिमाग में संजोया तो आज कर्म करने के लिये मन प्रवृत्त नहीं होगा। कल अपने दैहिक कर्म से जो सांसरिक उपलब्धि पायी उस पर गर्व किया तो फिर आज कोई अच्छा कर्म नहीं कर सकते। अगर कल कहीं कोई नाकामी मिली तो उसका स्मरण किसी नये कार्य में मन नहीं लगने देगा। कहने का मतलब है कि अपने स्मृतियों से जितना दूर रहें अच्छा है वह आंनद दें या कष्ट पर अगले कार्य के लिये व्यवधान पैदा करती हैं। मनुष्य जीवन में स्वच्छंद ढंग से कार्य करने का जो अवसर मिलता है वह परमात्मा की कृपा समझना चाहिये। दुःख सुख, मान अपमान और सफलता और सफलता केवल दृश्य मात्र है और उसके दृष्टा की तरह देखें तो उनका अच्छा प्रभाव अहंकार नहीं आने देता और बुरा विचलित नहीं करता।
इस संसार में अनेक ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि धन तिनके के समान है पर उसका भार हर कोई नहीं उठा पाता। अगर सज्जन आदमी है तो धन आने पर अधिक विनम्र हो जाता है और अगर दुर्जन है तो उसे अहंकार आ जाता है। यह भी अजीब बात है कि सभी धन को सामान्य मानते हैं पर दोनों ही प्रकार के लाग उसका भार नहीं उठा पाते। सच तो यह है कि जितना इस संसार में परमात्मा की भूमिका है उतनी ही माया भी निभाती है और कभी कभी तो उससे भी ज्यादा जब उसे पाकर आदमी परमात्मा को भी भूल जाता है।
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हिन्दू अध्यात्मिक संदेश-मांसाहारी से मित्रता भी भक्ति का नाश करती है (hindu ahdyatmik sandesh-meat and religion)

मासांहारी मानवा, परतछ राछस जान।
ताकी संगति मति करै, होय भक्ति में हान।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मांसाहार मनुष्य को राक्षसीवृत्ति का स्वामी ही समझना चाहिए। उसकी संगति करने कभी न करें इससे भक्ति की हानि होती है।
मांस खाय ते ढेड़ सब, मद पीवै सो नीच।
कुल की दुरमति परिहरै, राम कहै सो ऊंच।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जो मांस खाते हैं वह सब मूर्ख और मदिरा का सेवन करने वाले नीच होते हैं। जिनके कुल में यह परंपराएं हैं उनका त्याग कर जो भगवान श्रीराम का स्मरण करते है वहीं श्रेष्ठ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहा भी जाता है कि ‘जैसा खाये अन्न वैसा हो जाये मन’। श्रीगीता में भी कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। जिस तरह का आदमी भोजन करता है वही तत्व उसके रक्त कणों में मिल जाते हैं। यही रक्त हमारी देह के सभी तरफ बहकर समस्त अंगों को संचालित करता है। उसके तत्व उन अंगों पर प्रभाव डालते हैं। जिस जीव की हत्या की गयी है मरते समय उसकी पीड़ा के अव्यक्त तत्व भी उसके मांस में रह जाते हैं। यही तत्व आदमी के पेट में पहुंच जब अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करते हैं जिससे मनुष्य में दिमागी और मानसिक विकृत्तियां पैदा होती है। पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी यह सिद्ध किया है कि मांसाहारी की बजाय शाकाहार मनुष्य अधिक उदार होते हैं।
दूसरी बात यह है कि मांस से मनुष्य की प्रवृत्ति भी मांसाहारी हो जाती है। उसमेें संवेदनशीलता के भाव की कमी आ जाती है। ऐसे लोगों से मित्रता या संगत करने से अपनी अंदर भी विकृत्तियां पैदा हो सकती हैं। अनेक ऐसे परिवार हैं जिसमें मांस भक्षण की परंपरा है पर उनमें में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो शाकाहारी होने के कारण भगवान के भक्त हो जाते हैं। ऐसे लोगों की प्रशंसा की जानी चाहिए।
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योग साधना को केवल व्यायाम न समझें-हिन्दू धर्म संदेश (yog sadhna no simple exercise-hindu dharm sandesh)

एक सर्वे के अनुसार 45 से 55 वर्ष की आयु के मध्य व्यायाम करने वालों में घुटने तथा शरीर के अन्य जोड़ों वाले भागों में दर्द होने की बात सामने आयी है। यह आश्चर्य की बात नहीं है पर यहां एक बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि भारतीय योग पद्धति का हिस्सा दैहिक आसन इस तरह के व्यायाम की श्रेणी में नहीं आते। यह व्यायाम नहीं बल्कि योगासन हैं यह अलग बात है कि इसकी कुछ क्रियायें व्यायाम जैसी लगती हैं।
इसके संबंध में एक मजेदार बात याद आ रही है। एक गैर हिन्दू धार्मिक चैनल पर एक कथित विद्वान से भारतीय योग पद्धति के बारे में पूछा गया तो उसने जवाब दिया कि ‘हमारी पवित्र किताब में भी इंसान को व्यायाम करते रहने के लिये कहा गया है।’
उन विद्वान महोदय का बयान कोई आश्चर्य जनक नहीं था क्योंकि सभी धर्मों के विद्वान हमेशा अपनी पुरानी किताबों के प्रति वफादार रहते हैं और उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह किसी भी हालत में दूसरे धर्म की किसी परंपरा की प्रशंसा करेंगे। फिर टीवी चैनलों ने भी कुछ विद्वान तय कर रखे हैं जिनके पास बहस करने के लिये आपके पास सुविधा नहीं है। बहरहाल सच बात यही है कि भारतीय येाग पद्धति के शारीरिक आसन कोई सामान्य व्यायाम नहीं बल्कि देह से विकार बाहर निकालने की एक प्रक्रिया है।
योगासनों में किसी भी शारीरिक क्रिया में शरीर ढीला नहीं होता। हर अंग में कसावट होती है और यह तनाव की बजाय राहत देती है इतना ही नहीं हर आसन में उसके अनुसार शरीर के चक्रों पर ध्यान भी लगाया जाता है-इस संबंध में भारतीय येाग संस्थान की पुस्तक उपयोग प्रतीत होती है। व्यायाम में जहां शरीर से ऊर्जा रस के निर्माण के साथ उसका क्षरण भी होता है पर योगासन में केवल देह मेें स्थित वात, कफ तथा पित के विकार ही निर्गमित होते। दूसरी बात यह है कि ध्यान की वजह से देह को ऐसी सुखानुभूति होती है जिसकी व्यायाम में नहीं की जाती। इसके अलावा व्यायाम जहां जमीन बैठकर या खड़े होकर किया जाता है जबकि योगसन में नीचे चटाई, दरी और चादर का बिछा होना आवश्यक है ताकि देह में निर्मित होने वाली ऊर्जा का बाहर विसर्जन न हो। योगासन के बारे में सबसे बड़ी दो बातें यह है कि एक तो वह इसमें शरीर को खींचा नहीं जाता बल्कि जहां तक सहजता अनुभव हो वहीं तक हाथ पांवों में तनाव लाया जाता है। दूसरा यह कि योगसन किसी भी आयु में प्रारंभ किया जा सकता है जबकि व्यायाम को एक आयु के बाद प्रारंभ करना खतरनाक माना जाता है। योगसन में सहजता का भाव आता है और व्यायाम में इसका अभाव साफ दिखाई दे्रता है क्योंकि उसमें शरीर के चक्रों पर ध्यान नहीं रखा जाता।
कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय येाग पद्धति के शारीरिक आसनों को भारतीय या पश्चिमी पद्धति के व्यायामों से तुलना करना ही ठीक नहीं है। दोनों ही एकदम पृथक विषय है-भले ही उनकी शारीरिक क्रियाओं में कुछ साम्यता दिखती है पर अनुभूति में दोनों ही अलग हैं। दूसरी बात यह है कि भारतीय योग पद्धति में आसन केवल एक विषय है पर सभी कुछ नहीं है और यही कारण है कि इसे व्यायाम मानना गलत है। अलबत्ता कुछ विद्वान इसे सीमित दृष्टिकोण से देखते हैं उनको इस बारे में जानकारी नहीं है। कई लोग अक्सर यह शिकायत करते हैं कि वह अमुक आसन कर रहे थे तो उनकी नसें खिंच गयी दरअसल वह आसनों को व्यायाम की तरह करते हैं जबकि इसके लिये पहले किसी योग्य गुरु का सानिध्य होना आवश्यक है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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संत कबीर संदेश-भगवान से रूखी रोटी ही मांगता हूं (roti-hindu dharm sandesh)

कबीर सांई मुझ को, रूखी रोटी देय।
चुपड़ी मांगत मैं डरूं, मत रूखी छिन लेय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मैं तो सांईं से रूखी सूखी रोटी की मांग करता हूं। चुपड़ी रोटी मांगने से डर लगता है कि कहीं रूखी भी छिन न जाये।
जिभ्या कर्म कछोटरी, तीनों गृह में त्याग।
कबीर पहिले त्यागि के, पीछे ले बैराग।।
संत कबीर दास का कहना है कि जिव्हा के स्वाद, कर्म तथा विषय वासना के घर त्याग दो। पहले उनका त्याग कर बाद में बैराग लो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीभ का स्वाद आदमी को जाने क्या क्या कराता है? अपने घर की रूखी रोटी खाते आदमी उससे उकता जाता है तब उसके मन में चुपड़ी रोटी खाने को मन करता है। मन तो मनुष्य से कभी खेलता है तो कभी खिलवाड़ करता है। कहते भी हैं कि सभी को दूसरे की थाली में घी अधिक नजर आता है। वैसे भोजन पेट भरने के लिये किया जाता है पर जीभ का अपना स्वाद है। इसलिये वह कई बार ऐसी चीजों के सेवन के लिये बाध्य करती है जो स्वास्थ्य के लिये अनुकूल नहीं होती। रास्ते पर चटपटी और स्वादिष्ट चीजों को देखकर उनको खाने को मन मचलता है। तब यह नहीं दिखता कि वह खुले में रखी हैं। पता नहीं कितने कीड़े मकौड़े वहां आकर बैठ चुके हैं।
शरीर का स्वास्थ्य तो सादा भोजन में है पर उसके साथ चटपटा और मीठा खाने के लिये जीभ लालायित रहती है। सच बात तो यह है कि आदमी अगर जीभ के स्वाद में न पड़े तो शायद उसको कोई बीमारी ही न हो। अनेक प्रकार के आकर्षक होटल बाजार में दिखते हैं पर उनके भोज्य पदार्थ किस तरह गंदे ढंग से बनते हैं? कौन देखने जाता है। कई होटलों में भोज्य पदार्थ परोसने वाले होटलों के कर्मचारी भी साफ सुथरे हाथों से काम नहीं करते दिखते। वह भी क्या करें? स्वामीवर्ग को तो अपने कर्मचारी और ग्राहक दोनों का दोहन करने के अलावा कुछ नहीं सूझता। कर्मचारी की स्वच्छता और ग्राहक के स्वास्थ्य से उनका कोई मतलब नहीं होता। मगर जो खा रहे हैं उनको सब देखना चाहिये। होटलों के चटपटे मसाले से बने भोज्य पदार्थ कितने भी स्वादिष्ट हों पर पेट के लिये स्वास्थ्यकर हों यह भी जरूरी है। अगर स्वास्थ्य खराब हुआ तो चटपटा तो छोड़िये फिर रूखा सूख भी खाना दुष्कर हो जाता है-चिकित्सक उससे परहेज को कहते हैं।
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संत कबीर दास संदेश-जीभ के स्वाद में ही विष है

जीभ स्वाद के कूप में, जहां हलाहल काम।
अंग अविद्या ऊपजै, जाय हिये ते नाम।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक जीभ स्वाद में गहरे कुएं में पड़ी हुई है तब विष का सेवन करेगी जिससे अविद्या और अज्ञान ही पैदा होकर मनुष्य को परमात्मा के नाम से दूर हो जाता है।
माखी गुड़ में गड़ि रही, पंख रही लपटाय।
तारी पीटै सिर धुनै, लालच बुरी बलाय।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मक्खी जब गुड़ की लालच में अपने पंख फंसा देती है तब अपने हाथ पांव पटकने और सिर धुनने के बावजूद भी उसकी मुक्ति नहीं होती। लालच वाकई बुरी बला है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल अनेक ऐसी चीजें लोग खा रहे हैं जो न तो स्वास्थ्य के लिये ठीक हैं न उनसे पेट भरता है। फास्ट फूड को पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ ही ठीक नहीं मानते पर हमारे देश में खाने पीने के विषय में अपनी सोच कम जमाने के फैशन पर लोग अधिक चलते हैं। इससे देश में बीमारियां बढ़ी रही हैं। पहले तो वर्षा के दिनों में ही चिकित्सकों के अस्पताल भरे रहते थे पर अब तो उनका व्यवसाय सदाबहार पूरे वर्ष चलने वाला हो गया है। इसके पीछे वातावरण का प्रदूषित होना अकेला कारण नहीं है बल्कि लोगों का खान पान तथा मिलावटी खाद्य पदार्थ उपयोग करना भी है। यह समझने वाली बात है कि दूध इतना महंगा हो गया है तो घी, दही, पनीर और खोवा सस्ता कैसे मिल सकता है? कई जगह दुग्ध पदार्थ नकली या मिलावट कर बेचे जाते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि लोग जानते हुए भी उनको खरीद कर उनका उपभोग करते हैं। ़दूध का महंगा होने के पीछे उसका कम उत्पादन होने के साथ ही पशुओं पर लागत मूल्य अधिक होना है इसलिये उस पर शिकायत नहीं की जा सकती पर इतना तो समझा जा सकता है कि उससे बनने वाले पदार्थ सस्ते नहीं हो सकते पर लोग हैं कि इसके बावजूद ऐसे मिलावटी और नकली पदार्थों का सेवन कर अपने लिये बीमारी मोल लेते हैं। यह जीभ का स्वाद ही है जो हमें बाद में कष्ट देता है। दूध स्वास्थ्य के लिये अच्छा है पर अगर न मिले तो केवल स्वाद के लिये नकली पीकर अपने शरीर को हानि पहुंचाने का कारण कौन समझा सकता है? शरीर दूध न पीने से अधिक स्वस्थ नहीं रहेगा पर मिलावटी या नकली पीने से तो उसकी हानि होगी। रोग प्रतिरोधक क्षमता के अभाव में हमारी देह बीमारी का प्रतिकार नहीं कर पाती-यह सामान्य तथ्य जान लेना चाहिये।
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मनु सन्देश-बाद में पछताना पड़े वह काम न करें

एकोऽहमस्मीत्यातमानं यत्तवं कल्याण मन्यसे।
नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि कोई आदमी यह सोचकर झूठी गवाही दे रहा है कि वह अकेला है और सच्चाई कोई नहीं जानता तो वह भूल करता है क्योंकि पाप पुण्य का हिसाब रखने वाला ईश्वर सभी के हृदय में रहता है।

यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैध हृदिस्थितः।
तेन चेदविवादस्ते मां गंगा मा कृरून गमः।।
हिंदी में भावार्थ-
सभी के हृदय में भगवान विवस्वान यम साक्षी रूप में स्थित रहते हैं। यदि उनसे कोई विवाद नहीं करना है तथा पश्चाताप के लिये गंगा या कुरुक्षेत्र में नहीं जाना तो कभी झूठ का आश्रय न लें।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने स्वार्थ के लिये झूठ बोलना अज्ञानी और पापी मनुष्य का लक्षण है। सभी का पेट भरने वाला परमात्मा है पर लालची, लोभी, कामी और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग झूठ बोलकर अपना काम सिद्ध करना अपनी उपलब्धि मानते हैं। अनेक लोग झूठी गवाही देते हैं या फिर किसी के पक्ष में पैसा लेकर उसका झूठा प्रचार करते हैं। अनेक कथित ज्ञानी तो कहते हैं कि सच बोलने से आज किसी का काम नहीं चल सकता। यह केवल एक भ्रम है।
यह दुनियां वैसी ही होती है जैसी हमारी नीयत है। अगर हम यह मानकर चल रहे हैं कि झूठ बोलने से अब काम नहीं चलता तो यह अधर्म की तरफ बढ़ाया गया पहला कदम है। कई लोग ऐसे है जो अपनी झूठी बेबसी या समस्या बताकर दूसरे से दान और सहायता मांगते हैं और उनको मिल भी जाती है। अब यह सोच सकते हैं कि झूठ बोलने से कमाई कर ली पर उनको यह विचार भी करना चाहिये कि दान या सहायता देने वाले ने अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही अपना कर्तव्य निभाया। इसका आशय यह है कि धर्म का अस्तित्व आज भी उदार मनुष्यों में है। इसे यह भी कहना चाहिये कि यह उदारता ही धर्म के अस्तित्व का प्रमाण है। इसलिये झूठ बोलने से काम चलाने का तर्क अपने आप में बेमानी हो जाता है क्योंकि अंततः झूठ बोलना धर्म विरोधी है।
आदमी अनेक बार झूठ बोलता है पर उसका मन उस समय कोसता है। भले ही आदमी सोचता है कि झूठ बोलते हुए कोई उसे देख नहीं रहा पर सच तो यह है कि परमात्मा सभी के हृदय में स्थित है जो यह सब देखता है। एक मजेदार बात यह है कि आजकल झूठ बोलने वाली मशीन की चर्चा होती है। आखिर वह झूठ कैसे पकड़ती है। होता यह है कि जब आदमी झूठ बोलता है तब उसके दिमाग की अनेक नसें सामान्य व्यवहार नहीं करती और वह पकड़ा जाता है। यही मशीन इस बात का प्रमाण है कि कोई ईश्वर हमारे अंदर है जो हमें उस समय इस कृत्य से रोक रहा होता है।
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रहीम सन्देश-राम का नाम लेने वालों को भी माया फंसाए रहती है (ram ka nam aur maya-rahim ke dohe)

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय

कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय लोग भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।

वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज। अब तो दुनिया में डाक्टर हो या मरीज, गुरु हो या चेला और दर्शक हो या अभिनेता सभी राम का नाम लेते हैं पर उनके हृदय में माया का वास होता है।
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चाणक्य नीति-ज्ञानी के लिए हर जगह ईश्वर (chankya niti-gyani aur bhagavan)

अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिभा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्
हिंदी में भावार्थ
-द्विजातियां अपना देव अग्नि, मुनियों का देव उनके हृदय और अल्प बुद्धिमानों के लिये देव मूर्ति में होता है किन्तु जो समदर्शी तत्वज्ञानी हैं उनका देव हर स्थान में व्याप्त है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सकाम भक्ति करने वाले हवन, यज्ञ तथा भोजन दान करते हैं। उनके लिये देवता अग्नि है। जो सात्विक भक्ति करता हैं उनके लिये सभी के दिल में भगवान है। जो लोग एकदम अज्ञानी है वह केवल मूर्तियों में ही भगवान मानकर उनकी पूजा करते है। उनको किसी अन्य प्रकार के काम से कोई मतलब नही होता-न वह किसी का परोपकार करते हैं न ही सत्संग के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उनके मन में आती है। सच्चा ज्ञानी और योगी वही है जो हर जगह उस ईश्वर का वास देखता है।
इस विश्व में अज्ञानी और स्वार्थी लोगों की भरमार है। लोगों ने धर्म से ही भाषा, ज्ञान, विचार, और व्यापार को जोड़ दिया है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग धर्म परिवर्तन करते हैं तो अपना नाम भी बदल देते हैं। वह लोग अपने इष्ट के स्वरूप में बदलाव कर उसे पूजने लगते हैं। कहने को भले ही उनका धर्म निरंकार का उपासक हो पर कर्म के आधार पर मूर्तिमान को भजते दिखते हैं-उनका देव भले ही निरंकार हो पर धर्म एक तरह से मूर्तिमान होता है। कहने को सभी धर्माचार्य यही कहते हैं कि इस विश्व में एक ही परमात्मा है पर इसके पीछे उनकी चालाकी यह होती है कि वह केवल अपने वाले ही स्वरूप को इकलौता सत्य बताते हुए प्रचार करते हैं-कभी किसी दूसरे धर्म के स्वरूप पर बोलते कोई धर्माचार्य दिखाई नहीं देता। अलबत्ता भारत धर्मों से जुड़े के कुछ तत्वज्ञानी संत कभी अपने अंदर ऐसे पूर्वाग्रह के साथ सत्संग नहीं करते। वैसे भी भारतीय धर्म की यह खूबी है कि वह इस संसार में व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं और केवल मनुष्य की बजाय सभी जीवों-यथा पशु पक्षी, जलचर, नभचर और थलचर-के कल्याण जोर दिया जाता है।  यहाँ  ज्ञानी सभी में   भगवान देखता है और किसी प्रकार का भेदभाव धर्म विरोधी प्रुवृति मानी जाती है।
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लायकी से अधिक मिले तो घमंड आ ही जाता है-विदुर नीति-(yogyata aur ghamand-hindu sandesh)

कौटिल्य महाराज के अनुसार
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उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्।
नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।।
हिंदी में भावार्थ-
जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता है।
प्रमाणश्चधिकश्यापि महत्सत्वमधष्ठितः।
पदं स दत्ते शिरसि करिणः केसरी यथा।।
हिंदी में भावार्थ-
प्रमाणित योग्यता से अधिक पद की इच्छा करने वाला व्यक्ति भी उस महापद पर विराजमान हो जाता है उसी प्रकार जैसे सिंह हाथी पर अधिष्ठित हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज के सभी क्षेत्रों में शिखर पर विराजमान पुरुषों से सामान्य पुरुष बहुत सारी अपेक्षायें करते हैं। वह उनसे अपेक्षा करते हैं कि आपात स्थिति में उनकी सहायता करें। ज्ञानी लोग ऐसी अपेक्षा नहीं करते क्योंकि वह जानते हैं कि शिखर पर आजकल कथित बड़े लोग कोई सत्य या योग्यता की सहायता से नहीं पहुंचते वरन कुछ तो तिकड़म से पहुंचते हैं तो कुछ धन शक्ति का उपयोग करते हुए। ऐसे लोग स्वयं ही इस चिंता से दीन अवस्था में रहते हैं कि पता नहीं कब उनको उस शिखर से नीचे ढकेल दिया जाये। चूंकि उच्च पद पर होते हैं इसलिये समाज कल्याण का ढकोसला करना उनको जरूरी लगता है पर वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि उससे समाज का कोई अन्य व्यक्ति ज्ञानी या शक्तिशाली न हो जाये जिससे वह शिखर पर आकर उनको चुनौती दे सके। उच्च पद या शिखर पर बैठे लोग डरे रहते हैं और डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है। यही क्रूरता ऐसे शिखर पुरुषों को निम्न कोटि का बना देती है अतः उनमें दया या परोपकार का भाव ढूंढने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
यही हाल उन लोगों का भी है जिनको योग्यता से अधिक सम्मान या पद मिल जाता है। मायावी चक्र में सम्मान और पद के भूखे लोगों से ज्ञानी होने की आशा करना व्यर्थ है। उनको तो बस यही दिखाना है कि वह जिस पद पर हैं वह अपनी योग्यता के दम पर हैं और इसलिये वह बंदरों वाली हरकतें करते हैं। अपनी अयोग्यता और अक्षमता उनको बहुत सताती है इसलिये वह बाहर कभी मूर्खतापूर्ण तो कभी क्रूरता पूर्ण हरकतें कर समाज को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वह योग्य व्यक्ति हैं। ऐसे लोगों की योग्यता को अगर कोई चुनौती दे तो वह उसे अपने पद की शक्ति दिखाने लगते हैं। अपनी योग्यता से अधिक उपलब्धि पाने वाले ऐसे लोग समाज के विद्वानों, ज्ञानियों और सज्जन पुरुषों को त्रास देकर शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। वह अपने मन में अपनी अयोग्यता और अक्षमता से उपजी कुंठा इसी तरह बाहर निकालते हैं। अतः जितना हो सके ऐसे लोगों से दूर रहा जाये। कहा भी जाता है कि घोड़े के पीछे और राजा के आगे नहीं चलना चाहिये।
आजकल हम जब किसी बड़े पदासीन व्यक्ति को देखते हैं तो यह भी नहीं समझना चाहिए कि वह कोई अधिक योग्य है क्योंकि अनेक ऐसे लोग जो अपनी योग्यता से अधिक का पद पाने  की कामना कहते हैं वह येनकेन प्रकरेन उस पद पर पहुँच जाते है,या  फिर दूसरे लोग मुखौटे की तरह उनको वहां बिठा देते हैं।
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तेरी भाषा, मेरी भाषा-व्यंग्य लेख

शाम के समय दीपक बापू अपने घर से बाहर निकल एक निकट के उद्यान में हवा खाने पहुंचे। अंदर प्रवेश करने से पहले ही द्वार पर खड़े होकर उन्होंने देखा कि आदमी को देखा जिसकी पीठ उनकी तरफ थी। उसके बाल कंधे गर्दन तक लटके हुए थे। सिर और शरीर चैड़ा था। उसने चूड़ीदार पायजामा और चमकदार पीला कुर्ता पहने रखा था। दीपक बापू का अनुमान था कि वह आलोचक महाराज ही होंगे इसलिये वह अंदर जायें कि नहीं इस विचार में खड़े हो गये। वह नहीं चाहते थे कि आलोचक महाराज के कटु शब्द वहां घूम रहे अन्य लोगों के सामने सुनकर अपनी भद्द पिटवायें।
इससे पहले वह कोई निर्णय करते उस आदमी ने अपना मुंह फेर कर उनकी तरफ किया। दीपक बापू की घिग्घी बंध गयी। वह आलोचक महाराज ही थे। दीपक बापू खीसें निपोड़ते हुए उनके पास पहुंच गये और हाथ जोड़कर बोले-नमस्ते महाराज, यह आप तफरी के लिये आये हैं! अच्छा है, इससे तंदुरस्ती बढ़ती है।’
आलोचक महाराज ने बिना किसी भूमिका बांधे कहा-‘हम तो पहले ही तंदुरस्त हैं। देखो इतनी बड़ी देह के साथ ही समाज में भी हमारी इज्जत है! तुम्हारी तरह कीकड़ी कवि नहीं है कि अनजान होकर इधर बाग में टहलने आयें। हमें पता था कि तुम शाम को यहां आते हो इसलिये ही तुम्हारा इंतजार कर रहे थे।’
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज, अभी तो हम तफरी के मूड में हैं फिर कभी बात करेंगे।’
आलोचक महाराज बोले-‘वह फंदेबाज तुम्हारा दोस्त है न! उसे जरा समझा देना। अपने किये की माफी मांग ले वरना हम तुम्हारी कविताओं को अखबार में छपना बंद करवा देंगे।’
दीपक बापू ने अपनी टोपी उतारी और सिर पर हाथ फेराने लगे। आलोचक महाराज बोले-डर गये न!’
दीपक बापू बोले-‘नहीं डरे काहे को? हम तो यह सोच रहे हैं कि कहां आपने मुसीबत ले ली। फंदेबाज हमारे गले में दोस्त की तरह फंसा है वरना हमारा उससे क्या वास्ता? उसकी बेवकूफियों की वजह से हम हास्य कवितायें लिखते हैं वरना तो जोरदार साहित्यकार होते! आप उससे सुलह कर लीजिये वरना वह आपको परेशान करेगा। वैसे आपका झगड़ा हुआ किस बात पर था?’
आलोचक महाराज ने कहा-‘तुम्हारी बात को लेकर। वह एक कार्यक्रम में पहुंच गया। वहां हमने तुम्हारा उदाहरण देकर नये कवियों को समझाया कि देखो उस फ्लाप दीपक बापू को! कभी एक विषय पर ढंग से नहीं लिखता। योजनाबद्ध ढंग से नहीं लिखता। बस वह फंदेबाज मंच पर चढ़ आया और हमें लात घूंसे दिखाने लगा। कुछ बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोल रहा था। हमने तो पहचान लिया क्योंकि उस लफंगे को कई बार तुम्हारे साथ साइकिल पर पीछे बैठे जाते देखा है।’
दीपक बापू बोले-‘शर्मनाक! उसने आप जैसे महान आदमी को अपनी गूंगी मातृभाषा में इतनी भद्दी गालियां दी। हम तो यह गालियां अपनी जुबान से भी नहीं निकाल सकते।’
आलोचक महाराज चैंके-‘वह गालियां दे रहा था! उसकी भाषा अपने समझ में नहीं आयी। हमने तो उसे कई बार अपनी भाषा में बोलते देखा है।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज उसकी मात्ृभाषा गूंगी है। उसी मेें वह आपको गालियां दे रहा था।
आलोचक महाराज-‘यह कौनसी भाषा है?’
दीपक बापू-‘हमें नहीं मालुम।’
आलोचक महाराज-‘तो तुम्हें मालुम क्या है?’
दीपक बापू-‘यही कि उसकी मातृभाषा गूंगी है। जब वह गुस्से में होता है तब यही भाषा बोलता है।’
आलोचक महाराज बोले-‘उसका मोबाइल नंबर दो। अभी उसको फोन करता हूं और जो शराब की बोतल के पैसे उसको दिये वापस मांगता हूं। मैंने यह सोचकर उस कार्यक्रम में उससे हंगामा फिक्स किया था कि वह तुम्हारा दोस्त है। इससे तुम्हें भी प्रचार मिल जायेगा और तुम कहते हो कि दोस्त नहीं है तो अब देखो उसकी क्या हालत करता हूं? हमें गूंगी भाषा में गालियां देता है। देखो तुम अपनी भाषा वाले हो। हमारा साथ देना। उसके खिलाफ बयान अखबार में देना। यह गूंगी भाषा वाला समझता क्या है?
दीपक बापू ने रुमाल आलोचक महाराज की तरफ बढ़ाते हुए कहा-‘लीजिये महाराज, आवेश में आपका पसीना निकल रहा है। यह आपका हंगामा फिक्स था तो फिर हमेें काहे धमकाने आये।’
आलोचक महाराज ने कहा-‘उसने यह शर्त रखी थी कि उसकी तरफ से तुम्हारे प्रति वफादारी का प्रमाण पत्र पेश करूं। मगर अब मामला भाषा का है। तुम हम एक हो जाते हैं।’
दीपक बापू बोले-‘कतई नहीं महाराज! आपका झगड़ा हुआ है और इसमें हम कतई नहीं पड़ेंगे। झगड़ा किसी बात पर और नाम जाति, भाषा और धर्म का लेकर लोगों को लड़ाने का प्रयास कम से कम हमारे साथ तो नहीं चलेगा। रहा अखबार में छपने का सवाल तो हम आपके पास नहीं लायेंगे अपनी रचना!
आलोचक महाराज बोले-‘नहीं तुम लाना! पर हम नहीं छपवायेंगे अखबार में। जब लाओगे और नहीं छपेगा तभी तो हमारे गुस्से का पता चलेगा? अपनी भाषा में हमारी जो इज्जत है उसकी परवाह न करने का परिणाम कैसे चलेगा तुमको?’
दीपक बापू बोले-‘महाराज हमें पता है! आप हमारी कविताओं के विषय चुराकर दूसरों को सुनाकर उनसे दूसरी रचनायें लिखवाते हो। आपके पास विषय चिंतन तो है ही नहीं। एकाध बार साल में कहीं रचना छपवाकर एहसान हम पर करते हैं! नमस्कार हम चलते हैं! वैसे आप इस विषय को यहीं बंद कर दें क्योंकि आपने यह राज उजागर कर ही दिया है कि वह हंगामा फिक्स था!’
दीपक बापू घर वापस चल पड़े। रात हो चली थी। इधर दारु की बोतल के साथ फंदेबाज भी उनको अपने ही घर के बाहर खड़ा मिला। उनको देखते ही बोला-‘आओ दीपक बापू। आज तुम्हारे लिये जोरदार खबर लाया हूं। आज मैंने आलोचक महाराज की क्या धुर उतारी है! तुम देखते तो वाह वाह कर उठते! इसी खुशी में यह बोतल खरीद कर अपने घर ले जा रहा था। सोचा तुम्हें बताता चलूं।’
दीपक बापू हंसकर बोले-‘हमें पता है! आलोचक महाराज ने गुस्से में बता दिया कि यह हंगामा फिक्स था! अब तुम अपनी सफाई मत देना।’
फंदेबाज बोला-‘उसने ऐसा किया? अभी जाकर उसकी खबर लेता हूं।’
दीपक बापू बोले-‘यह बोतल घर ले जाकर पीओ। वरना यह भी छिन जायेगी। वह बहुत गुस्से में हैं। वहां जो तुम बुर्र बुर्र और हुर्र हुर्र बोले रहे थे उसका मतलब उनके समझ में आ गया है।’
फंदेबाज बोला-‘पर वह तो मैं ऐसे ही कर रहा था1’
दीपक बापू-‘हमने उनसे कह दिया कि वह अपनी मात्ृभाषा गूंगी में आपको गालियां दे रहा था। तुम कहते भी हो कि मेरी मातृभाषा गूंगी है!’
फंदेबाज-‘वह तो इसलिये कि मेरी माताजी गूंगी है। यह कोई अलग से भाषा नहीं है। तुमने यह क्या आग लगाई।’
दीपक बापू बोले-‘लगाई तो तुमने! हमने तो बुझाई। दोनों ने हमारा नाम लेकर हंगामा किया और हमने दोनों की कराई लड़ाई।’
दीपक बापू अंदर चले गये इधर फंदेबाज बुदबुदाया-‘अब इसका क्या नशा चढ़ेगा! इनको तो पता चल गया कि यह हंगामा फिक्स था! फिर यह अपनी भाषा और गूंगी भाषा का मुद्दा चिपकाये आये हैं। वह आलोचक महाराज पूरा खब्ती है। खबरों में छपने के लिये वह कुछ भी कर सकता है। इससे पहले कि वह कुछ करे उसे समझाये आंऊ कि गूंगी कोई अलग से भाषा नहीं है। इस दीपक बापू का क्या? यह तो हास्य कविता लिखकर फारिग हो लेगा। मेरी शामत आयेगी। यह बोतल भी आलोचक महाराज को वापस कर आता हूं
वह तुरंत वहां से चल पड़ा।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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नई पीढ़ी को मौक़ा-हास्य व्यंग्य कविता

अपने विरोधी पर
शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा
‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं
लोग भी अब उनके चेहरे से थके हैं
नया चेहरा सामने नहीं आने देते
जहां मौका मिलता वहीं
अपने लिये हाथ फैला लेते हैं।
हमें देखो
अब तो सब छोड़ दिया है
नये चेहरों को जनता से जोड़ दिया है
बेटी को सौंप दिया है
पत्रकारिता का जिम्मा
बेटे को की जनसेवा की विरासत
अब हमारे घर में
कोई नहीं बचा युवा पीढ़ी में निकम्मा
हम तो करते हैं
महापुरुषों का अनुसरण
जो नयी पीढ़ी को आगे आने का मौका देते हैं।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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