मंदिर और उद्यानों में समय बिताना लाभप्रद-हिंदी सामाजिक चिंत्तन लेख


                        आमतौर से हर मनुष्य देखने में एक जैसे ही लगते हैं पर आचार, विचार, रहन सहन, खाने पीने तथा व्यवहार की दृष्टि से उनमें भिन्नता का आभास तब  होता है जब उसने कोई दूसरा व्यक्ति उनसे संपर्क करता है। अनेक बार दो लोग एक जैसे लगते हैं तो अनेक लोग भी एक जैसे स्वभाव के नहीं लगते।  इसके दो कारण है एक तो यह कि लोग अपने रहन सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार के अनुसार ही हो जाते हैं। दूसरा कारण उल्टा भी होता है कुछ लोग अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही रहन, सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार करने लगते हैं।  इन दोनों कारणों में श्रीमद्भागवत गीता का गुण और कर्म विभाग सिद्धांत लागू होता है। एक तो मनुष्य वह होता है जो अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार सात्विक, राजस तथा तामसी कार्य करता है तो दूसरा वह होता है जो अपने कर्म के अनुसार ही अपने स्वभाव की प्रकृत्ति का हो जाता है। इस चक्र को योग तथा ज्ञान साधक अनुभव कर सकते हैं।

                        हम देखते हैं कि सहकर्म में लिप्त लोगों के बीच आपसी संपर्क सहजता से बनता है। जिसको निंदा करनी है उसे निंदक मिल जाते हैं दूसरे प्रशंसा करते हैं तो उनको प्रशंसक मिल जाते हैं। यही स्थिति आदतों की भी है। जो जुआ खेलते हैं उनको जुआरी और जो शराब पीते हैं उन्हें शराबी मिल जाते है। स्थिति यह है कि व्यसन में फंसा मनुष्य कुंऐं के मेंढक की तरह हो जाता है जिसे अज्ञान का अंधेरा ही पसंद होता है।  आमतौर से हम देखते भी हैं कि बुरी संगत सहजता से मिलती है पर अच्छी संगत के लिये प्रयास करने पड़ते है।  बाज़ार में सहजता से व्यसनी मिल जाते हैं  पर सत्संगी को ढूंढना पड़ता है। ऐसे में समस्या यह आती है कि हम सहज प्रकृत्ति के लोग कहां ढूंढे।

                        हमारा मानना है कि हमें मंदिरों और पार्कों में सहज प्रकृत्ति के लोग मिल ही जाते हैं। दरअसल मंदिरों और पार्कों में आया व्यक्ति कहीं न कहीं से मन से स्वच्छ होता ही है भले ही वह पूरे दिन असहज वातावरण में रहता हो।  जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां आये लोग अत्यंत शांत और सद्भाव से संपन्न  होने के कारण हमारे मन तथा चक्षुओं को आकर्षित करते हैं। वहां कोई मित्र मिल जाये तो उसे  भी प्रसन्नता होती है तो हमें भी अधिक सुख  मिलता है। इस प्रसन्नता का सामान्य सुख से ज्यादा मोल है। यह भी कह सकते हैं कि इस प्रसन्नता का सुख अनमोल है।  उसी तरह प्रातःकाल किसी उद्यान में आया व्यक्ति भी निर्मल भाव से जुड़ जाता है। वहां घूमते हुए लोग एक दूसरे को अत्यंत निर्मल भाव से देखते हैं। यह अलग बात है कि इसकी उनको स्वतः अनुभूति नहीं होती। उनमें अनेक लोग तो केवल इसलिये एक दूसरे को जानने लगते हैं क्योंकि दोनों ही वहां प्रतिदिन मिलते हैं। इस प्रकार की आत्मीयता मिलना एक संयोग है जो कि व्यसन के दुर्योग से मिली संगति से कहीं बेहतर है।

                        हमने देखा है कि योग शिविरों में जाने पर अनेक ऐसे लोगों से मिलने और उनको सुनने का सौभाग्य मिलता है जिनकी कल्पना सामान्य जीवन में नहीं की थी।  इसी अनुभव के आधार पर हम यह लेख लिख रहे है। हमारे कहने का अभिप्राय यही है कि अगर आप यह चाहते हैं कि आप एक बेहतर जीवन जियें तो पहले अपनी देह तथा मन  के लिये अनुकूल  वातावरण, मित्र तथा आत्मीय लोगों का चयन करें।  वातावरण, रहन सहन, आचार विचार, तथा खान पान के साथ ही संगति के अनूकूल बनने के बाद जीवन को सुखमय बनाने का कोई दूसरा उपाय करना शेष नहीं रह जाता।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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संत कबीर दर्शन-ज्ञान रटने वाले बहुत पर जितेंद्रिय कम ही मिलते है


      पूरे विश्व में शाब्दिक धर्मों के  के नाम पर प्रचार करने वालों की संख्या इतनी अधिक है कि उसे देखते यह सुखद कल्पना उपजती है कि संसार पूरी तरह से अपराध रहित तथा  सुखमय  होना चाहिये।  देखा जाये तो हमारे दर्शन के अनुसार धर्म का आशय केवल उच्च मानवीय आचरण से है जिसका कोई दूसरा रूप नहीं हो सकता। धर्म शब्द पवित्र हृदय से मनुष्य की आदर्श सक्रियता की परिभाषा देने वाला है पर इस संसार में धर्म के विभिन्न रूप बना दिये गये हैं।  इतना ही नहीं हर धर्म के सर्वशक्तिमान के दरबारों का रूप भी अलग अलग है। पुस्तकों के नाम और उसमें कथित ज्ञानमय  विषय सामग्री की प्रस्तुति की शैली भी अलग है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हर शब्दिक धर्म के सर्वशक्तिमान के प्रथक प्रथक रूप और उनको मानने वालों के बीच एक मध्यस्थ भी रहता है जो बताता है कि उन्हें किस तरह उच्च जीवन बिताना चाहिये? इन मध्यस्थों ने हर धर्म के प्रतीक विशेष रंगों का पवित्रीकरण किया है और उसमें ही रंगे वस्त्र पहनते हैं।  राह चलते हुए पता लग जाता है कि वह किस शाब्दिक धर्म से सम्बंधित  करते है।  मजे की बात यह है कि जब कहीं समाज में एकता की बात आती है तो सर्वधर्मभाव का नारा लगाते हुए जनसमूहों के बीच अपनी छवि फरिश्ते जैसी बनाने के लिये चले आते हैं। समाज को बांटकर दिखाने की इनकी नीयत जगजाहिर है पर एकता का प्रपंच कर यह हास्य ही फैलाते हैैं।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि

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पढ़ी गुनी ब्राह्मण भये, कर्ति भई संसार।

वस्तू की तो समूझ नहीं, ज्यूं खर चन्दन भार।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में अनेक विद्वान प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर लोगों को उपदेश देते हुए प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं परंतु विषय और वस्तु का सत्य ज्ञान के अभाव में उनको गधे के ऊपर लगे चंदन के टीके की तरह भार समझा जाता है।

ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पण्डित कवी अनेक।

राम रता इन्द्री जिता, कोटी मध्ये एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में कथित रूप से ज्ञानी, विद्वान तथा कवि तो  मिलते हैं पर परमात्मा के नाम में रत जितेंद्रिय पुंरुष करोड़ों मे एक होता है।

      हमारे महान संत कवियों के अनुसार सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप का निरंतर स्मरण तथा जीवन में उच्च नैतिक सिद्धांतों का पालन करना ही धर्म है।  कथित शाब्दिक धर्मों की पुस्तकों का अध्ययन कर उनका प्रचार करने वाले यह नहीं जानते कि वह अपने अंदर ज्ञानी होने का जो भाव पैदा करते हैं वह भारतीय ज्ञान साधकों की दृष्टि से  अहंकार का प्रमाण होता है। आमतौर से अध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से श्रीमद्भागवत गीता के समक्ष कोई अन्य ग्रंथ नहीं है पर होता यह है कि तमाम तरह के शाब्दिक ग्रंथों का नाम लेकर उसकी तुलना की जाती है। हैरानी की बात यह है कि सभी  ग्रंथों से श्रीगीता की तुलना करने वाले भारतीय धर्म को ही मानने वाले वह लोग हैं जिनको गीता के ंसंदेश तो रटे हुए है पर उनका आशय समझ से परे है।  इतना ही नहंीं श्रीमद्भागवत गीता के ंसंदेशों के अनुसार ही ज्ञान का होना ही आवश्यक नहीं वरन् उसका आचरण पथ पर प्रदर्शित होना भी जरूरी है इसका अभास चंद लोगों को ही है।  यही कारण है कि तत्वज्ञान साधक अपने ही सभी धर्म समूहों के  पाखंडियों से संबंध रखने में बचते हैं।

      ज्ञान की पहचान वाणी से प्रकट करने में नहीं वरन् व्यवहार में अपनी धारणा शक्ति की प्रबलता होने से बनती है।  इसलिये जहां तक हो सके भारत के प्राचीन अध्यात्मिक ग्रथों को अध्ययन कर उनके संदेशों का प्रयोग अपने जीवन में करना चाहिये। अपना ज्ञान बघारने में अपनी ऊर्जा नष्ट करने की अपेक्षा धर्म पथ पर चलकर शक्ति का संचय करना ही एक श्रेयस्कर काम है। निरंतर अध्ययन, मनन, चित्तन और साधना करने से जब अभ्यास हो जाता है तब जीवन आनंदमय हो जाता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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खबर या नाटक-दो हिंदी क्षणिकाएँ


पर्दे पर पटकथा लिखकर बनी खबरे

रोज हमारे सामने आती हैं,

बहलता है कुछ देर मन

बहुत जल्द ही महंगी हुई चीजों की

यादें दिमाग को सताती हैं।

कहें दीपक बापू आम आदमी की चिंतायें बढ़ी हैं

खबर नाटक की तरह हो

या नाटक ही खबर हो

ज्यादा देर दिल बहलाना होता कठिन

चिंतायें रोज  अपना रूप बढ़ाकर सामने आती हैं।

—————-

सिंहासन का स्वाद जिसने एक बार चखा

वह विलासिता का आदी हो जाता है,

दिन दरबार में बजाता चैन की बंसी

रात को राजमहल में निद्रा वासी हो जाता है।

कहें दीपक बापू दुनियां चल रही भगवान भरोसे

बादशाह अपने फरिश्ते होने की गलतफहमी मे रहते

आम आदमी अपने कड़वे सच में भी

भगवान दरबार में जाकर भक्ति का आनंद उठाता है।

——–

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-समाज की रक्षा में ही राष्ट्र की अखंडता निहित(kautilya ka


      हम जब किसी राष्ट्र की स्थिरता की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि उसमें सक्रिय सामाजिक समूहों में भी स्थिरता होना चाहिये।  समाज की  परिवारों  और परिवारों  की स्थिरता व्यक्ति में अंतर्निहित होती है।  हम आज जब देश की स्थिति को देखते हैं तो राष्ट्र की स्थिरता को लेकर भारी चिंत्तायें व्याप्त हैं। इधर हमारे यहां विकास के दावे भी किये जा रहे हैं उधर राष्ट्र में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक तनावों की चर्चा भी हो रही है। यह विरोधाभास हमारी उन नीतियों का ही परिणाम है जिसमें किसी मनुष्य के लिये  अर्थार्जन ही एक श्रेष्ठ और अंतिम लक्ष्य माना जाता है।  अर्थार्जन में भी केवल पेट की रोटी तक ही सीमित लक्ष्य माना गया है।  यह आज तक समझा नहीं गया कि उदर की भूख की शांत होने के बाद भी मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी  सीमित नहीं रहते। सभी जीवों मे नरमादा होते हैं और जो कहीं न कहीं अगली पीढ़ी का सृजन करते हैं।  यह कामुक प्रवृत्ति सभी में होती हैं पर मनुष्य को उसके लिये भी अर्थ का सृजन संचय के लिये  करना पड़ता है। पशु पक्षी विवाह पद्धति नहीं अपनाते जबकि मनुष्य को इसे सामाजिक बाध्यता के रूप में स्वीकार करना ही पड़ता है। मनुष्य की संचयी प्रवृत्ति का ऐसे अर्थशास्त्री कतई अध्ययन नहीं करते जिनका लालन पालन धनपति करते हैं।

      हमारे देश के कुछ विद्वान अर्थशास्त्री गरीबी रेखा की सीमा के लिये एक राशि तय करते हैं। उसमें वह मनुष्य के खाने और कपड़े का ही हिसाब रखते हैं। उनका मानना है कि एक मनुष्य को खाने और कपड़े के अलावा जिंदा रहने के लिये कुछ अन्य नहीं चाहिये।  वातानुकूलित कक्षों में उनके इस चिंत्तन को मजाक ही माना जाता है।  वह मनुष्य में व्यापत उस संचयी प्रवृत्ति का आभास होते हुए भी तार्किक नहीं मानते जिसमें वह विश्ेाष अवसरों पर व्यय करने के लिये बाध्य होता है। वह मनुष्य को केवल एक पशु की श्रेणी में रखकर अपनी राय देते हैं।  इस तरह के चिंत्तन ने ही देश की अर्थव्यवस्था को भारी निराशाजनक दौर में पहुंचा दिया है। महंगाई, बेरोजगारी तथा अपराध देश में बढ़ते जा रहे हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

————

जलान्नायुधयन्त्राछृर्य धीरयोधरधिष्ठितं।

निवासाय प्रशस्यन्ते भमुजां भूतिच्छितां।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जल, अन्न, शस्त्र और यन्त्रों से सम्पन्न, धीर वीर योद्धाओं के साथ ही योग्य मंत्रियों तथा आचार्यों से रक्षित दुर्ग की ही महत्ता होती है।

      एक तरह से हम देश में शुद्ध रूप से पूंजी पर आधारित अर्थव्यवस्था  का एक विकट रूप देख रहे हैं जिसमें मानवीय संवेदनाओं के साथ ही संस्कृति, संस्कार और परंपराओं के निर्वाह की बाध्यता को कोई स्थान नहीं है। सच बात तो यह है कि अमीर और गरीब के बीच स्थित एक समन्वित कड़ी मध्यम वर्ग रहा है जिसकी परवाह किसी को नहीं है।  यह लड़खड़ा रहा है और इससे जो समाज में अस्थिरता का वातावरण है वह अत्यंत चिंत्ताजनक है।  यह वर्ग अन्य दोनों वर्गों की बौद्धिक सहायता करने के साथ ही अपने श्रम के साथ ही सक्रिय भी रहता है।

      हम यहां इस वर्ग के लिये कोई याचना नहीं कर रहे बल्कि इतना कहना चाहते हैं कि देश की स्थिरता में इसी वर्ग का अन्य दोनों की अपेक्षा कहीं अधिक योगदान रहता है। अगर देश में समाज में निजी पूंजी का प्रभाव बढ़ा और मध्यम वर्ग केवल कंपनियों की नौकरी के इर्दगिर्द ही सिमटा तो कालांतर में ऐसे संकट उत्पन्न होंगे जिसकी कल्पना तक हम अभी नहीं कर सकते।  इसलिये देश के आर्थिक रणनीतिकारों को इस तरफ ध्यान जरूर देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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भर्तृहरि नीति शतक-ज्ञानवान लोग सत्ता संघर्ष से दूर रहते हैं


      जैसे जैसे 2014 के लोकसभा  चुनाव का समय पास आता जा रहा है वैसे टीवी चैनलों तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं की खबरों में इससे संबंधित जानकारी दिलचस्प होती जा रही है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य समाज में राजपद की स्थापना की अनिवार्यता की शर्त पूरी करने के लिये सभी नागरिकों को अपनी भागीदारी निभानी ही होगी। कोई जनप्रतिनिधि पद का प्रत्याशी तो  कोई मतदाता के रूप में अपनी भागीदारी निभायेगा।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये सभी प्रत्याशी अपनी तरह से कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।  सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि इन चुनावों में धर्म के नाम पर कार्यरत कुछ विद्वान इस चुनावी राजनीति में अपने व्यक्तिगत प्रभाव के लिये सक्रिय होना चाहते हैं। पहली बात तो हम यहां यह बता दें कि धर्म से हमारा आशय उच्च आचरण से होता है।  इस आचरण के भी तीन रूप हैं-सात्विक, राजस और तामस।  एक चौथा रूप भी होता है- वह है योगी या सन्यासी- जिसकी चर्चा बहुत कम होती है यह अलग बात है कि धर्म के नाम पर सक्रिय कुछ पेशेवर लोग यही रूप धारण कर समाज में विशेष रंग के कपड़े पहनकर विचरते हैं।

      चुनावी राजनीति में सामान्य लोग भी सक्रिय होते हैं और कहीं न कहीं उन पर भी अन्य की तरह इन विशेष वस्त्रधारी कथित धर्म विशेषज्ञों के प्रति रुझान रहता हैं। चुनावी राजनीति में सक्रिय शिखर पुरुष भी  यह मानकर चलते हैं कि इन कथित धर्म रक्षकों के पास शिष्यों का  एक ऐसा समुदाय रहता है जो चुनाव को प्रभावित कर सकता हैं।  इसलिये अभी तक वह इनके इर्दगिर्द मंडराते थे पर अब तो यह हालत हो गयी है कि अनेक धर्मों के कथित विशेषज्ञ बाकायदा चुनाव मैदान में उतरने के लिये इन शीर्ष पुरुषों से संपर्क रखने लगे हैं। टिकट मिलने पर अपने धर्म की जीत और न मिलने पर संकट बताकर अपने समुदाय को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि वह उनके बताये अनुसार मतदान करे।  हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि यह राजसी आचरण है।  इसे सत्वगुण या योग से तो कतई नहीं जोड़ा जा सकता है।  जब यह कथित पेशेवर धार्मिक विद्वान यह दावा करते हैं कि उनका आचरण सात्विक है या वह स्वयं सन्यासी हैं तब उनका इस तरह का व्यवहार उनकी निष्ठा पर ही संदेह पैदा करता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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रम्यं हर्म्यतलं न किं वसतये श्रव्यं न गवादिकं किंवा प्राणसमासमगमसुखं नवाधिकप्रीतये।

किं तद्भ्रान्तपत्पतङ्गपवनव्यालोलदीपाङ्करच्छायचञ्वलामाकरूय सकलं सन्तो वनान्तं गताः।।

     हिन्दी में भावार्थ-क्या प्राचीन समय में संतों को रहने के लिये सुंदर महल नहीं थे? क्या उनके सुनने के लिये संगीत नहीं था। क्या उन्हें प्राण प्रिय सुंदर स्त्रियों से समागम हृदय को प्रिय नहीं लगता था? जो उन्होंने संसार को गिरते पतंगे के पंखों की हवा से विचलित हुई दीपक का लौ की छाया के समान विचलित मानकर त्याग दिया।

      हमारा मानना है कि आम आदमी की चिंतायें उसके परिवार के इर्दगिर्द ही रहती हैं।  धर्म के नाम पर वह अपने इष्ट की आराधना से अधिक कुछ नहीं करता। अधिक से अधिक अपने आसपास किसी पर विपत्ति होने पर आदमी उसकी सहायता कर अपने सात्विक होने का बोध अवश्य कराता है पर उसमें  हमेशा ही राजसी वृत्तियां ही उपस्थित रहती हैं।  वह इन कथित पेशेवर धार्मिक लोगों को इस डर से सम्मान देता है कि वह कहीं उसे धर्मद्रोही घोषित कर समाज में बदनाम न कर दें। वह इन मध्यस्थों को सर्वशक्तिमान का रूप माने यह सोचना ही भ्रम है। अनेक धर्म के ऐसे व्यवसायी यह जानते हैं इसलिये अपने साथ समाज पर नियंत्रण रखने के लिये दबंग तथा प्रभावशाली लोग साथ लेकर चलते हैं। वह सद्भाव से प्रीति की बजाय भय बिन भये न प्रीति का सिद्धांत मानते हैं।

      समस्या यह है कि श्रीमद्भागवत गीता का कर्म तथा गुण विभाग का ज्ञान आम लोगों को नहीं है । जिनसे वह श्रीगीता ज्ञान ग्रहण करते हैं वह केवल शाब्दिक अर्थ बताते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में यह ज्ञान किस तरह प्रासांगिक है इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है।

 राजनीति एक व्यापक शब्द है जिसका चुनावी राजनीति एक रूप है।  परिवार, रिश्तेदारी, व्यवसाय, नौकरी तथा खेल में भी बिना राजनीति के किसी को सफलता नहीं मिलती। जहां प्रतिफल की आशा है वह अपनायी जाने वाली नीति ही राजनीति है। पहले राजतंत्र था तो राजा अपने जीवन तक बना रहता था पर आजकल लोकतंत्र है और उसमें अदलाबदली होती रहती है। यह अदलाबदली चुनाव से ही होती है।  इस चुनावी राजनीति में धार्मिक पहचान वालों के शामिल होने  पर प्रश्न चिन्ह केवल ज्ञानी ही उठा सकते हैं पर उनको सुनने या पढ़ने वाली भीड़ तो अपने इन्ही शीर्ष पुरुषों के पीछे रहती है इसलिये कोई प्रभाव नहीं होता।

      देखा जाये तो वर्तमान काल में कोई देहधारी मनुष्य  हमारे देश में कोई धार्मिक रूप से लोकप्रिय या जनमानस में प्रतिष्ठत नहीं है। जब तक प्रचार माध्यम सीमित थे तब लोगों के सामने कथित रूप से अनेक महापुरुष विराजमान थे पर धीमे धीमे यह पता लगा कि इनमें बहुत लोग  पाखंडी और व्यापारी हैं। इन लोगों को देखकर हमें प्राचीन महापुरुषों की याद आती है जो सभी सुखों का त्यागकर सत्य की खोज में निकले। उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर समाज को चिंत्तन शक्ति प्रदान की। उन्होंने राजसुख का इस तरह त्याग किया कि राजा लोग भी उनके सामने नतमस्तक हो गये।  अब इन नवीन धार्मिक पुरुषों से यह पूछने का साहस कौन कर सकता है कि वह किसलिये राजसी सुखों के चक्कर में पड़े हैं? इससे उनके समाज को कौनसा अध्यात्मिक लाभ होने वाला है? बहरहाल ज्ञान साधकों के लिये चुनावी राजनीति में सक्रिय होने की इन पेशेवर धार्मिक लोगों की कोशिश दिलचस्पी का विषय होती है। 

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-पराक्रमी आदमी ही समाज का भला कर सकता है।


            अनेक कथित धार्मिक गुरु यह तो कहते हैं कि मोह, माया, अहंकार तथा क्रोध का त्याग करें पर न तो वह स्वयं उनके प्रभाव से मुक्त हैं न वह अपने शिष्यों को कोई विधि बता पाते हैं। सत्य और माया के बीच केवल अध्यात्मिक ज्ञानी और साधक ही समन्वय बना पाते हैं। एक बात तय है कि सत्य के ज्ञान का विस्तार नहीं है पर माया का ज्ञान अत्यंत विस्तृत है।  कोई ऐसा बुरा काम नहीं करना चाहिये दूसरे को पीड़ा यह सत्य का ज्ञान है यह सभी जानते हैं पर माया के पीछे जाते हुए अनेक ऐसे काम करने पड़ते हैं जिनके उचित या अनुचित होने ज्ञान सभी को नहीं होता।  माया के अनेक रूप हैं सत्य का कोई रूप नहीं है। अनेक रूप होने के कारण धन, संपदा तथा उच्च के पद की प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार के मार्ग हैं।  हर मार्ग का ज्ञान अलग है। स्थिति यह है कि लोग धन और संपत्ति प्राप्त करने के मार्ग बताने वालों को ही धार्मिक गुरु मान लेते हैं। मजे की बात तो यह है कि ऐसे गुरु श्रीमद्भागवत गीता से निष्काम कर्म तथा निष्प्रयोजन का संदेश नारे के रूप में देते देते ही मायावी संसार का ज्ञान देने लगते हैं।  इस संसार में माया की संगत जरूरी है पर सत्य का ज्ञान हो तो माया दासी होकर सेवा करते हैं वरना स्वामिनी होकर नचाने लगती है।

कौटिल्य महाराज ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि

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वे शूरा येऽपि विद्वांतो ये च सेवाविपिश्चितः।

तेषा मेव विकाशिन्यों भोग्या नृपतिसम्भवः।।

            हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य में वीरता, विद्वता और सेवा करने का गुण है वही भोग के लिये  सम्पत्ति प्राप्त करता है।

कुलं वृत्तञ् शौर्य्यञ्च सर्वमेतन्ना गभ्यते।

दुवृतेऽश्न्यकुलीनेऽप जनो दातरि रज्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-कुल, चरित्र और वीरता को भी कोई ऐसे नहीं सराहता। दुष्ट तथा अकुलीन भी अगर दातार हो तो सामान्य जन उसमें अनुराग रखते हैं।

            अध्यात्मिक ज्ञानी मानते हैं कि मनुष्य अगर अपने अंदर ज्ञान साधना कर सत्य समझ ले तो उसमें वीरता और पराक्रम के गुण स्वतः आ जाते हैं और तब वह इस संसार में माया का स्वामी बनता है पर उसे अपनी स्वामिनी बनकर नचाने का अवसर नहीं देता।  दूसरी बात यह है कि ज्ञानी आदमी धन का व्यय इस तरह करता है कि उसके आसपास के लोग भी प्रसन्न रहें। वह दान और सहायता के रूप में ऐसे लोगों को धन या वस्तुऐं देता है जो उसके लिये सुपात्र हों। जिन लोगों के पास अध्यात्म ज्ञान नहीं है वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा के मद में दूसरों को छोटा समझकर उनकी उपेक्षा कर देते हैं जिससे उनके प्रति समाज में विद्रोह का भाव निर्माण होता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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गुणवान और राजा एक दूसरे की परवाह नहीं करते-रहीम दर्शन के आधार पर संदेश


      श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार इस संसार  में तीन प्रकृत्तियों के लोग पाये जाते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी।  इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि इन तीन प्रकार की प्रकृत्ति के लोग संसार में हमेशा मौजूद रहेंगे और कोई कितना भी ज्ञान ध्यान कर ले किसी भी एक प्रकार की  मनुष्यों की प्रकृत्ति को यहां से विलुप्त नहीं कर सकता।  तामसी प्रकृत्ति के लोग इस संसार में न स्वयं को बल्कि दूसरों को भी कष्ट देते हैं पर अगर कोई चाहे कि अपने अभियान या आंदोलन से सारे संसार के मनुष्यों को सात्विक या राजसी प्रकृत्ति का बना दे तो वह संभव नहीं है। यह अलग बात है कि कथित रूप से अनेक धर्मों के ठेकेदार अपने कथित शांति अभियानों में पूरे विश्व में स्वर्ग की स्थापना का सपना दिखाते हैं।

      इस संसार में सात्विक लोगों की अपेक्षा राजसी प्रकृत्ति के लोगों की संख्या अधिक रहती है।  इसका कारण यह है कि इस देह का भरणपोषण करने के लिये अर्थकर्म में राजसी प्रकृत्ति से ही सक्रिय रहा जा सकता है।  यहीं से सात्विक और राजसी प्रकृत्ति का अंतर्द्वंद्व प्रारंभ हो जाता है।  सात्विक प्रकृत्ति के लोग एक सीमा तक ही राजसी कर्म करने के बाद अपनी मूल सात्विक प्रकृत्ति में स्थिर हो जाते हैं जबकि राजसी प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही उसमें लिप्त रहते हैं।  राजसी कर्म में सीमा तक सक्रिय रहने के कारण सात्विक लोग उच्च राजसी पुरुषों की परवाह नहीं करते तो राजसी पुरुष उनकी सीमित आर्थिक उपलब्धियों तथा गतिविधियों  के कारण उनका सम्मान नहीं करते।

 

कविवर रहीम कहते हैं कि

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भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघु भूप।

रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-राजा गुणीजनों को अपने से छोटा मानता है तो गुणीजन भी राजा की परवाह नहीं करते। सच्चाई यह है धरती से पर्वत तक सभी लोग एक समान ही है।

      एक बात सत्य है कि इस विश्व में सभी लोग एक समान हैं। सभी का दाता राम है।  राजसी पुरुषों में यह खुशफहमी रहती है कि वह अपने परिवार तथा समाज का संचालन कर रहे हैं जबकि सात्विक प्रकृत्ति तो अकर्मण्यता के भाव की जनक है। इतना ही नहीं वह सात्विक लोगों को स्वार्थपरक या उदासीन कहकर निंदा भी करते हैं।  इसके विपरीत सात्विक लोग यह मानते हैं कि राजसी कर्म में अधिक लिप्पता तथा उपलब्धि अनावश्यक रूप से संकट पैदा करती है।  इस प्रकार का द्वंद्व स्वाभाविक है पर सात्विक लोग इसे एक सहज संबंध मानते हैं तो राजसी पुरुष इस द्वंद्व में उपेक्षासन के माध्यम से अपनी नाराजगी दिखाते हैं।  वह सात्विक लोगों से मुंह फेरकर यह दिखाते हैं कि समाज में उनकी श्रेष्ठ छवि है। चालाक राजसी प्रकृत्ति के मध्यम कर्म में लिप्त लोग उनकी चाटुकारिता अपना कार्य साधते हैं जिससे उच्च राजसी पुरुषों को अधिक भ्रम हो जाता है। यही भ्रम कालांतर में उनके लिये संकट का कारण बनता है। सात्विक लोग किसी भ्रम में न पड़कर सत्य तथा ज्ञान के साथ जीवन आनंद से बिताते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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अपना मनोबल ऊंचा रखकर कामयाबी पाई जा सकती है-हिन्दी चिंत्तन लेख


      हमारे देश में 65 प्रतिशत से ज्यादा जनंसख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। इस दृष्टि से विश्व में हमारा देश युवा कहा जा सकता है। इतना ही नहीं जिस दृष्टि से हमारे यहां कथित विकास की धारा बहने का दावा किया जाता है उसके आधार पर हमारे देश को विश्व का शक्तिशाली राष्ट्र भी कहा जाता है पर सच यह है कि इसके बावजूद हमार समाज में लोगों का मनोबल गिरा हुआ है। जागरुक चिंत्तक देश के कथित आर्थिक विकास के साथ ही समाज में  वैचारिक, वैयक्तिक तथा व्यवहार में गिरते हुए स्तर को लेकर अधिक सोचते हैं।  एक समय था जब हमारे देश के लोगं पश्चिमी जगत में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति तथा जापान जैसे अमीर राष्ट्र में हाराकिरी की परंपरा को लेकर हैरान होते थे। उस समय यह माना जाता था कि भारत में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रभाव के कारण लोगों में जिंदगी के प्रति एक अलग नजरिया रहता है। अब वह बात नहीं है।  हमारे देश में आये दिन ऐसी घटनायें होती हैं। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि हमारे देश के लोगों में धनबल बढ़ रहा है पर उनका मनोबल गिरता जा रहा है। वैसे भी कहा जाता है कि धनियों में आत्मविश्वास कम भय की प्रवृत्ति अधिक होती है। स्पष्टतः उनका मनोबल गरीब के मुकाबले कम ही रहता है।

विदुर नीति में कहा गया है कि

————–

कान्तरि, वनदुर्गेष कृच्छ्रास्यापत्सु सम्भ्रमे।

डद्वतेषु च शस्त्रेषु नास्ति सत्तयवतां भयम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-घने जंगल, दुर्गम रास्ता तथा कठिन समय, अस़्त शस्त्र के प्रहार के लिये समक्ष उपस्थित होने पर भी जिस मनुष्य का मनोबल बढ़ा रहता है वह निर्भय हो जाता है।

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादां घृतिः स्मृतिः।

समीक्ष्य च समारम्भौ विद्धि मूलं भवस्यं तु।।

हिन्दी में भावार्थ-उद्योग, संयम, प्रवीणता, सतर्कता, धैर्य, स्मृति और सोच विचारकर कार्य आरंभ करना ही उन्नति का मूल मंत्र है।

      हमारे देश में आत्महत्या की घटनाओं में युवा वर्ग के सदस्य अधिक शामिल पाये जा रहे हैं।  सच बात तो यह है कि युवा वर्ग से जहां न केवल उनके परिवार बल्कि समाज भी अपेक्षायें करता है वही उसके मनोबल बढ़ाने की सोचता भी नहीं है। भोग संस्कृति में लिप्त समाज केवल उपलब्धियों को सब मानते हुए युवा वर्ग के सदस्यों पर यह दबाव डालता है कि वह अधिक से अधिक धन, उच्च पद या प्रतिष्ठा प्राप्त करें। मध्यम  वर्ग का हर सदस्य अधिक से अधिक संपदा, उच्च पद तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता और यही शिक्षा वह अगली पीढ़ी को दे रहा है।  यह दबाव मनोबल तोड़ने का काम करता है।

      छोटी आयु में कुछ लोग  ने सफलता प्राप्त कर लेते हैं पर सभी के लिये यह संभव नहीं है। सफलता के लिये यह आवश्यक है कि न केवल संबंधित व्यवसाय का ज्ञान हो वरन् सफलता मिलने की प्रतीक्षा का धीरज भी होना चाहिए। दूसरी बात यह कि दूसरे की सफलता देखकर अपना लक्ष्य वैसा ही निर्धारित करने की बजाय अपनी क्षमता के अनुसार ही विचार करना चाहिये। उससे अधिक लक्ष्य तय करना न केवल निराशा पैदा करता है वरन् मनोबल भी गिरा देता है। याद रखें मनुष्य की पहचान उसका मन है और उसी का बल ही उसे शक्तिशाली बनाता है तो कमजोर होने पर आत्महीन बना देता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

 

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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मन पर नियंत्रण करने पर ही जीवन में सुख की अनुभूति संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख


      इस समय सर्दी का मौसम चल रहा है। कहने को बसंत ऋतु आ गयी है पर अचानक बर्फबारी होने से शीतलहर का प्रकोप पहले से अधिक हो गया है। ऐसे में बर्फीले पर्यटन स्थलों पर सैलानियों के उमड़ने की खबर आती है तो हैरानी नहीं होती।  हमारे देश में जिंदगी से उकताये लोगों की कमी नहीं है। जिंदगी से वही लोग उकताते हैं जिनके पास पैसा खूब है पर करने के लिये कुछ नही है। गरीब या मध्यम वर्ग के लोगों की जिंदगी का संघर्ष प्रतिदिन चलता है और देखा जाये तो इसमें उनके लिये मनोरंजन भले ही न हो पर दिमाग को व्यस्त रखता है। इसलिये वह अपने मस्तिष्क में ं इधर उधर भागकर मन बहलाने का विचार तक नहीं ला पाते।  दूसरे वह लोग भी उकताये रहते हैं जो सुबह भ्रमण नहीं करते या फिर अपने शहर को ही समझ पाते।  यह विचार इस लेखक के एक मित्र के पर्यटन से लौटने के बाद इस टिप्पणी के बाद उपजे जिसमें उसने कहा कि ‘‘देाा जाये तो बाहर जाकर घूमने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि इतना आनंद तो हम अपने शहर में ही लेते है। बाहर जाकर घूमने का तनाव होने के बाद घर लौटने पर हुई थकान से तो यह सीखा जा सकता है।

      देखा जाये तो ठंड हमेशा ही देह की संवेदनक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डालती है यानि नर्वस सिस्टम पर शीत लहर का बुरा प्रभाव होता है।  जुकाम, खांसी और बुखार की संभावना अधिक रहती है।  सर्दी  में स्वेटर, टोपा और हाथ के दास्ताने पहनकर स्कूटर पर रात को निकलना एक तरह से स्वयं स्वीकारी सजा की तरह लगता है।  हमारा घर मुख्य शहर के  बाहरी इलाके में है जहां गर्मी और सर्दी की हवायें अब शरीर को भारी कष्ट देती हैं। अब यह उम्र का परिणाम है या वातावरण प्रदूषित होने से कि हमारा मौसम से संघर्ष होता ही है।  गर्मी में जब शाम को सात बजे घर लौटते हैं तो गर्म हवायें ऐसी लगती हैं जैसे कि भट्टी के पास से निकल रहे हों। अब तो यह लगने लगा है कि कार लें तभी सामान्य रूप से बाहर निकल पाये। दूसरा उपाय यह है कि स्कूटर की बजाय हम ऑटो या पैदल सफर करें।   कहने का अभिप्राय यह है कि अब या तो अमीरों के लिये या फिर गरीबों के लिये ही मौसम रह गया है।  मध्यम वर्ग के लिये वैसा ही संकट है जैसा कि आजकल भारतीय अर्थव्यवस्था की वजह से उसके घर का है।

      उस दिन हम एक दिन के लिये दिल्ली प्रवास पर थे।  वहां ऐसा नहीं लगा कि जैसे कहीं बाहर घूम रहे हैं।  अनेक बार ऐसा लगा कि अपने शहर में ही घूम रहे। सड़कें, घर और मंदिरों को देखकर कोई नया आकर्षण पैदा नहीं हो रहा था।  घर लौटे तब याद आया कि हम दिल्ली से लौटे हैं। तब संत रविदास का यह संदेश ध्यान आया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। सुबह योग साधना और उद्यान का भ्रमण करना की दिनचर्या अगर बाधित हो तो हमारा मन खराब हो जाता है। ऐसे में कहीं बाहर जाना पड़े तो हमारे लिये मनोरंजन का धन ऋण पत्रक बराबर ही रहता है।  एक तरह से कहें तो वह ऋणात्मक यानि माइनस हो जाता है। वैसे देखा जाये तो सरस्वती माता की कृपा होने से जो यह लिखने की कला मिली है उसके आगे कोई भी प्राकृतिक उपहार मूल्यवान नहीं लगता।  हमारे लिये लिखना सत्संग की तरह हो गया है। पहले सत्संग में जाकर जो आनंद मिलता था वह लिखने से मिलता है।  हमने एक सत्संगी के मुख से सुना था कि अपनी घोल तो नशा होय। टीवी पर जब कोई मनोरंजक कार्यक्रम देखते हैं तो लगता है कि वक्त खराब करने की बजाय इंटरनेट पर एक कविता ही लिख डालें।

      हालांकि कहते हैं कि कंप्यूटर का नशा भी बुरा है। हालांकि हमें यह पता है पर फिर भी लगता है कि जायें तो कहां जायें? इससे निजात पाकर फुर्सत हो तो हो ध्यान लगाकर इससे प्राप्त विकृतियों का विध्वंस करते हैं। ध्यान लगाने से  कंप्यूटर से हुई थकान तुरंत फुर्र हो जाती है।  यही कारण है कि हमारा चिंत्तन चलता रहता है उसी से इस बात की अनुभूति  हुई कि इंसान के मन के सौदागर बहुत है और वह विभिन्न विषयों का सृजन इस तरह करते हैं कि किसी को इस बात का पता ही नहीं चले कि सत्य से असत्य की तरफ कैसे जा रहा है?

      अनेक मिलने वाले लोग आकर देश के प्रसिद्ध मंदिरों में चलने का प्रस्ताव देते हैं हम हां तो करते हैं पर मन नहीं करता।  जितने भी प्रसिद्ध सर्वशक्तिमान के रूप हैं उनके बड़े मंदिर हमारे शहर में ही हैं। हम अक्सर वहां जाकर ध्यान लगाकर अपने मन की प्रसन्नता पा ही लेते हैं।  हमारे मित्र लोग जो ऐसे मंदिरों पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं दरअसल वह कभी इस तरह अपने अवकाश का उपयोग नहीं करते। अवकाश के दिन भी वह सासंरिक विषयों में उसी तरह समय बिताते हैं तब उनको कहां शांति मिलनी है?

      जब इस तरह का चिंतन हमारे मन में चलता है तब संत रविदास की याद आती है जिन्होंने का मन का विज्ञान बताने वाला यह मंत्र दिया था मन चंगा तो कठौती में गंगा।उनकी जयंती हाल ही में मनायी गयी थी। उनकी यह एक पंक्ति ही संसार का सच बयान कर देती है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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चाणक्य नीति दर्शन-हमेशा ही गरीब दीन और अमीर वीर नहीं होता


            हमारे देश में गरीब, मजदूर तथा निम्न आय वाले व्यवसायियों के साथ हमदर्दी का एक बकायदा अभियान आजादी के साठ वर्षों से चल रहा है।  पश्चिम में जन्मे कार्ल मार्क्स ने अपना एक ग्रंथ लिखकर मजदूरों के मसीहा की छवि पायी और उसके भारतीय अनुयायी प्रायः देश में व्याप्त आर्थिक विरोधाभासों पर टिप्पणियां कर यह प्रमाणित करने का प्रयास करते है भारी मात्रा में पूंजीपतियों के अलावा वह सभी वर्ग और वर्ण के लोगों सरंक्षण की सोचते है। इन्हें जनवादी या वामपंथी बौद्धिक समुदाय का सदस्य कहा जाता है। इन्हंी के विचारों का अनुरकरण प्रगतिशील या समाजवादी बौद्धिक लोगों भी करते हैं। जनवादी तथा प्रगतिशील विचारकों में बस इतना ही अंतर है कि जनवादी संपूर्ण प्रजा और उसकी गतिविधियों पर राज्य का नियंत्रण चाहते हैं और प्रगतिशील आंशिक रूप से ही इसे स्वीकार करते हैं।

            आमतौर पश्चिम में एकदम खुली अर्थव्यवस्था है जिसमें राज्य की भूमिका बहुत अधिक नहीं रहती। कार्ल मार्क्स ने गरीबों और मजदूरों के भले को लेकर जो दर्शन प्रस्तुत किया है उसमें यह माना गया है कि मनुष्य केवल भौतिक तत्वों से जुड़कर ही प्रसन्न रह सकता है और राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह समस्त प्रजा का स्वयं लालन पालन करे। हमारे देश के बुद्धिमानों ने उसका आधा विचार इसलिये माना क्योंकि उनको लगा कि भारत में जहां अध्यात्म ज्ञान की प्रधानता है वहां मार्क्स दर्शन पूरी तरह से अपनाना की बात करना स्वयं को विद्वान के रूप में प्रतिष्ठित करने के बाधा पैदा करना होगी। यही कारण है कि गरीब और मजदूर के भले का नारा देते हुए अनेक लोगों ने प्रतिष्ठा, पद और पैसा पाया। भारत में समाज कल्याण का नारा भले ही लोकप्रिय है पर फिर भी लोग अपने प्राचीन ग्रंथों से विमुख नहीं हुए। यही कारण है कि हमारे इस देश में भौतिकता का जाल फैलने के बावजूद लोग आज भी अध्यात्म ज्ञान में अपनी रुचि रखते हैं।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि

———-

धनहीनो न हीनश्च धनिकः सुनिश्चयः।

विद्यारत्नेन वो हीनः सर्ववस्तुषु।।

            हिन्दी में भावार्थ-हमेशा ही धन रहित व्यक्ति हीन नहीं होता और न ही धनवान दृढ़ व्यक्तित्व का स्वामी होता है।

            हमारे यहां आर्थिक विकास का महत्व तभी माना जाता है जब मनुष्य का चारित्रिक, वैचारिक तथा व्यक्तित्व की छवि का आधार भी मजबूत हो।  किसी के पास बहुत धन सपंदा हो मगर उसका चरित्र, वैचारिक तथा मानसिक तत्व पतनशील हो तो उसे सम्मान नहीं मिलता।  पाश्चात्य अर्थशास्त्र के अनुसार मनुष्य भी अन्य जीवों की तरह ही केवल दैहिक क्रियाओं तक ही सीमित रहता है इसलिये उसे केवल सांसरिक विषयों पर ही सुविधा देना राज्य का दायित्व है जबकि हमारे देशी अर्थशास्त्र के अनुसार मनुष्य का मन भी होता है जो भौतिकता से प्रथक विषयों पर विचरण करना चाहता है। रोटी दैहिक अंतिम सत्य है पर मन की भूख उससे कहीं ज्यादा होती है। मुख्य बात यह है कि श्रम के आधार पर जीवन जीने वाले गरीब, मजदूरी या छोटे व्यवसायी धन की दृष्टि से हीन होते हैं पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह भिखारी या अज्ञानी हैं।  देखा यह जा रहा है कि जन कल्याण का नारा देने वाले यही समझते हैं कि जिसके पास अल्प धन है उसे हेय मानते हुए उसे संपन्नता प्रदान करने का दायित्व राज्य ले।  इतना ही नहीं अनेक कथित समाज सेवी तो गरीबों की सेवा करने का दावा इस तरह करते है जैसे कि वह भिखारियों को दान देते हों। सच बात तो यह कि किसी भी समाज का सही संचालन श्रमिक वर्ग करता है भले ही वह स्वयं धन अधिक अर्जित नहीं कर पाता मगर सारी गतिविधियों का आधार वही होता है।

            कहने का अभिप्राय यह है कि धन के आधार पर आदमी गरीब या अमीर नहीं होता। चरित्र, विचार तथा व्यवहार के आधार पर व्यक्ति की छवि बनती और बिगड़ती है। अगर ऐसा नहीं होता तो गरीब श्रम नहीं करते और हमारे देश में भिखारियों की संख्या कहीं अधिक होती। इसका मतलब यह है कि हमारे देश में गरीबों, मजदूरों और छोटे व्यवसायियों का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो धन कम मिलने के बावजूद भीख मांगने की बजाय  श्रम में रत रहना पसंद करता है और इससे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के सशक्त होने की पुष्टि भी होती है। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

समाज का भला करने वाले नाटक नहीं करते-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


      भारत में लोकसभा चुनाव 2014 के लिये कार्यक्रम घोषित किये जा चुका है।  शुद्ध रूप से राजसी कर्म में प्रवृत्त लोगों को लिये एक तरह से यह चुनाव कुंभ का मेला होता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई मनुष्य  पूर्ण रूप से सात्विक  या तामसी प्रवृत्ति का हो अपने जीवन निर्वाह के लिये अर्थार्जन का कार्य करना ही पड़ता है जो कि एक तरह से राजसी प्रकृत्ति का ही होता है।  दूसरी बात यह भी है कि राजसी कर्म करते समय मनुष्य को राजसी प्रकत्ति का ही अनुसरण करना चाहिये इसलिये ज्ञानी या सात्विक प्रकृत्ति के व्यक्ति में अर्थार्जन के लिये उचित साधन होने पर उसकी क्रियाओं में दोष देखकर यह मान लेना कि वह अपनी मूल प्रकृत्ति से दूर हो गया, यह विचार धारण करना गलत होगा।  ज्ञानी और सात्विक व्यक्ति राजसी कर्म करने के बावजूद उसमें अपने मूल भाव का तत्व अवश्य प्रकट करते हैं। इसके विपरीत जो राजसी प्रकृत्ति मे हैं वह राजसी कर्म करते समय किसी सिद्धांत का पालन करें यह आवश्यक नहीं होता।  उनके लिये अपना ही लक्ष्य सर्वोपरि होता है। देखा जाये तो सामान्य गृहस्थ हो या राजकीय कर्म करने वाला विशिष्ट व्यक्ति दोनों का लक्ष्य अर्थोपार्जन करना ही होता है।  सामान्य गृहस्थ जहां अपनी गृहस्थी का राजा होता है वहीं राजकीय व्यक्ति को किसी उपाधि की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।  राजकीय कर्म तो राजसी प्रकृत्ति से ही किये जा सकते हैं इसलिये वहां पूर्ण सैद्धांतिक शुचिता के पालन की अनिवार्यता की आशा व्यर्थ ही की जाती है। 

भृर्तहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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पद्माकरं दिनकरो विकची क्ररीति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवातम्।।

नाभ्यार्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-सूर्य बिना याचना किये ही कमल को खिला देता है, चंद्रमा कुमुदिनी को प्रस्फुटित कर देता है। बादल भी बिना याचना के ही पानी बरसा देते हैं। इसी तरह सत्पुरुष अपनी ही अंतप्रेरणा से ही परोपकार करते हैं।

      लोकतंत्र में चुनावों के लिये उतरने वाले लोग आम जनमानस को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं।  अनेक तरह के वादे तथा आश्वासन देने के साथ ही वह आमजनों को धरती पर ही स्वर्ग दिखाने का सपना दिखाते हैं। एक तरह से देखा जाये तो लोकतांत्रिक राजकीय प्रणाली ने विश्व में पेशेवर शासकों की पंरपरा स्थापित की है। प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति या अन्य कोई जनप्रतिनिधि वह खजाने से अपने व्यय के लिये प्रत्यक्ष रूप से धन नहीं ले सकता वरन् वह एक सेवक की तरह उसे वेतना प्रदान किया जाता है।  यह अलग बात है कि जितना बड़ा राजकीय पद हो वहां विराजमान व्यक्ति को राज्य के धनपति, साहुकार, तथा उद्योगपति उसी के स्तर के अनुसार भेंट देने के लिये तत्पर रहते हैं जैसे पहले राजाओं को मिलते थे।  हमारे ग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण है जब राजपद धारण करने पर राज्य के जमीदार, साहुकार तथा धनवान अपने राजा को भेंट देते थे।  इस तरह की भेंट लेना कम से कम हम जैसे अध्यात्मिक दृष्टि से कोई गलत नहीं है। यह  अलग बात है कि राजपद पाने के लिये उत्सुक लोग स्वयं को एक त्यागी व्यक्ति के रूप में प्रचारित कर जनमानस का हृदय जीतने का प्रयास करते हैं।  त्याग का भाव सात्विक कर्म का परिचायक है जिसकी उपस्थिति राजसी कर्म  में नहीं की जा सकती।

      यही से आधुनिक लोकतंत्र में अनेक नाटकों का प्रारंभ हो जाता है। इधर उदारीकरण ने निजी क्षेत्र को अधिक अवसर प्रदान किये हैं।  तेल से लेकर खेल तक और संचार साधनों से लेकर प्रचार माध्यमों तक पूंजीपतियों का एकछत्र राज्य हो गया है। मनोरंजन कार्यक्रमों में फूहड़ कामेडी तो समाचारों में नाटकीय घटनाक्रम को महत्व मिल रहा है।  कभी कभी तो यह लगता है कि फिल्म के अभिनेता फिल्म या धारावाहिक में पटकथा के आधार पर जिस तरह अभिनय करते हैं उसी तरह खिलाड़ी भी मैच खेलते हैं।  उससे ज्यादा मजेदार बात यह है कि अनेक लोग तो केवल इसलिये समाज सेवा या राजकीय उपक्रम इस तरह करते हैं ताकि उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता रहे।  हालांकि प्रचार माध्यम उनकी मजाक उड़ाते हैं पर फिर भी उनके बयानों पर बहस और चर्चा करते हैं जिसके दौरान उनके विज्ञापनों का समय खूब पास होता है। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रचार प्रबंधक और बाज़ारों के स्वामियों का कोई संयुक्त उपक्रम हैं जो इस तरह के नाटकीय पात्रों का सृजन कर रहा है जिससे समाज अपनी समस्याओं को भूलकर मनोरंजन में लीन रहे।  कोई जनविद्रोह यहां न फैले वरन् यथास्थिति बनी रहे।

      अब तो समाचार और नाटकों में कोई अंतर ही नहीं दिख रहा।  जैसे जैसे यह चुनाव पास आयेंगे उसी तरह नाटकीय का दौर बढ़ेगा यह बात प्रचार माध्यमों के प्रबंधक स्वयं कह रहे हैं। योग तथा अध्यात्मिक साधकों ने जिज्ञासावश नहीं वरन् कौतूहल से इस नाटकीयता को देखें।  यह नाटकीय लोग देश और समाज की फिक्र करते दिखते हैं। आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को जनोन्मुखी बनाने का दावा करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि समाज सेवा का व्रत इस तरह लिया है जिसमें चंदा और भेंट मिलती रहे। हम यह समझ लेना चाहिये कि परोपकारी लोग कोई प्रचार नहीं करते। वह कोई योजना नहीं बनाते।  सबसे बड़ी बात यह है कि वह कोई दावा नहीं करते।  हमारा देश तो वैसे भी भगवत्कृपा से संपन्न है।  इसे कोई संपन्न क्या बनायेगा? गरीबों को कोई अमीर बना नहीं सकता और कोई लालची अमीरों के आगे हाथ फैलाने से कोई बच नहीं सकता।  कुछ लोग गरीब हैं पर वह भिखारी नहीं है जिसे यह लोग संपन्न बनाने का दावा करते हैं। गरीब अपने श्रम पर जिंदा हैं और इनमें से अधिकतर जानते हैं कि उनके भले का नारा लगाकर कोई भी राजकीय पद प्राप्त कर लें पर फायदा देने वाला नहीं है।  अंततः उनको अपने श्रम का पैसा किसी धनी से ही मिलता है इसलिये उसके मिटने की कामना भी वह नहीं करते। राज्य बना रहे यही कामना उनकी भी रहती है ताकि उनका जैसा भी घर चल रहा है वैसे चलता भी रहे। परोपकार का दावा करने वालों से वह भीख मांगने नहीं जाते यह अलग बात है कि इस तरह के ढोंग में लीन लोगों को अपने लोकप्रिय होने की खुशफहमी प्रचार की वजह से हो जाती है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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देश में व्याप्त तनाव से मुंह फेरना ठीक नहीं-तुलसीदास के दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख


      भारत में लोकसभा के चुनाव 2014 में होने हैं।  इसके लिये देश में प्रचार अभियान जोरों पर है।  एक तरफ सत्ता पक्ष दावा करता है कि उसने देश के विकास का काम जमकर किया है दूसरी तरफ विपक्ष जमकर यह प्रचार कर रहा है कि सत्ता पक्ष ने कुछ काम नहीं किया।  इस बहस का निष्कर्ष तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता लगेगा पर एक बात तय है कि आर्थिक उदारीकरण की कथित प्रणाली देश के समाज को आंदोलित कर दिया है।  जहां हम यह देख रहे हैं कि भौतिक साधनों का उपभोग बड़ा है जिसे विकास कहा जाता है तो वहीं आर्थिक असमानता ने देश में एक भारी कलह की स्थिति भी पैदा की है। मुदा्रस्फीति की दर के साथ ही महंगाई भी बढ़ी है जिसने मध्यम वर्गीय परिवारों को निम्न वर्ग में लाकर खड़ा कर दिया है। मजे की बात यह है कि जहां से धन लेना है वहां तो मध्यम वर्गीय लोग गरीब कहलाने के लिये तैयार हैं पर जहां उपभोग का प्रश्न आये तो वहां सभी एक दूसरे से होड़ करना चाहते हैं।  बैंक या बाज़ार से कर्ज लेकर स्वयं को सभ्य कहलाने के लिये उनके यह प्रयास अच्छे लगते हैं पर जब उसे चुकाने की बात आती है तो उनकी हवा निकल जाती है।

संत तुलसीदास कहते हैं कि

—————-

कलह न जानब छोट करि, कलह कठिन परिनाम।

गत अगिनि लघु नीच गृह, जरत धनिक धन धाम।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-कलह को कभी छोटा विषय नहीं मानना चाहिये। कलह का परिणाम अत्यंत भयानक होता है। एक छोटे आदमी के घर में लगी आग धनिकों के महल तक नष्ट कर देती है।

      आर्थिक विशेषज्ञ भले ही देश के विकसित होने की बात करते हों पर सामाजिक विशेषज्ञों की दृष्टि से देश में इस कारण जो जातीय, भाषाई, क्षेत्रीय, धार्मिक तथा आर्थिक आधार पर जो कलह या वैमनस्य का वातावरण बन गया है वह अत्यंत चिंताजनक है।  दूसरी बात यह भी है कि जिन लोगों ने धन का प्रचुर मात्रा में संग्रह किया है उन्होंने अपने आसपास आर्थिक विपन्नता की उपस्थिति से मुंह फेर लिया है।  इससे अल्प धनिक लोगों के मन में संपन्न लोगो के प्रति जो निराशा तथा वैमनस्य  का भाव है उसका अनुमान सामाजिक विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।  हमारे देश में अनेक समाज सेवक उस कलह को रेखांकित करते हैं जो अंततः अपराध को जन्म देती है।  यह अपराध चाहे स्वयं के प्रति हो या दूसरे के प्रति अंततः उसका परिणाम समाज को ही भोगना होता है।  प्रचार  माध्यमों में इस विषय पर चर्चा या बहस होती तो है पर उसका स्तर सतही रहता है।  सच बात तो यह है कि देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, भाषाई तथा क्षेत्रीय कलह को निपटाने का गंभीर प्रयास होना चाहिये तभी देश में खुशहाली लायी जा सकती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख-समाज में व्याप्त असंतोष को अनदेखा करना खतरनाक


      भारत में लोकसभा के चुनाव 2014 में होने हैं।  इसके लिये देश में प्रचार अभियान जोरों पर है।  एक तरफ सत्ता पक्ष दावा करता है कि उसने देश के विकास का काम जमकर किया है दूसरी तरफ विपक्ष जमकर यह प्रचार कर रहा है कि सत्ता पक्ष ने कुछ काम नहीं किया।  इस बहस का निष्कर्ष तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता लगेगा पर एक बात तय है कि आर्थिक उदारीकरण की कथित प्रणाली देश के समाज को आंदोलित कर दिया है।  जहां हम यह देख रहे हैं कि भौतिक साधनों का उपभोग बड़ा है जिसे विकास कहा जाता है तो वहीं आर्थिक असमानता ने देश में एक भारी कलह की स्थिति भी पैदा की है। मुदा्रस्फीति की दर के साथ ही महंगाई भी बढ़ी है जिसने मध्यम वर्गीय परिवारों को निम्न वर्ग में लाकर खड़ा कर दिया है। मजे की बात यह है कि जहां से धन लेना है वहां तो मध्यम वर्गीय लोग गरीब कहलाने के लिये तैयार हैं पर जहां उपभोग का प्रश्न आये तो वहां सभी एक दूसरे से होड़ करना चाहते हैं।  बैंक या बाज़ार से कर्ज लेकर स्वयं को सभ्य कहलाने के लिये उनके यह प्रयास अच्छे लगते हैं पर जब उसे चुकाने की बात आती है तो उनकी हवा निकल जाती है।

संत तुलसीदास कहते हैं कि

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कलह न जानब छोट करि, कलह कठिन परिनाम।

गत अगिनि लघु नीच गृह, जरत धनिक धन धाम।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-कलह को कभी छोटा विषय नहीं मानना चाहिये। कलह का परिणाम अत्यंत भयानक होता है। एक छोटे आदमी के घर में लगी आग धनिकों के महल तक नष्ट कर देती है।

      आर्थिक विशेषज्ञ भले ही देश के विकसित होने की बात करते हों पर सामाजिक विशेषज्ञों की दृष्टि से देश में इस कारण जो जातीय, भाषाई, क्षेत्रीय, धार्मिक तथा आर्थिक आधार पर जो कलह या वैमनस्य का वातावरण बन गया है वह अत्यंत चिंताजनक है।  दूसरी बात यह भी है कि जिन लोगों ने धन का प्रचुर मात्रा में संग्रह किया है उन्होंने अपने आसपास आर्थिक विपन्नता की उपस्थिति से मुंह फेर लिया है।  इससे अल्प धनिक लोगों के मन में संपन्न लोगो के प्रति जो निराशा तथा वैमनस्य  का भाव है उसका अनुमान सामाजिक विशेषज्ञ ही कर सकते हैं।  हमारे देश में अनेक समाज सेवक उस कलह को रेखांकित करते हैं जो अंततः अपराध को जन्म देती है।  यह अपराध चाहे स्वयं के प्रति हो या दूसरे के प्रति अंततः उसका परिणाम समाज को ही भोगना होता है।  प्रचार  माध्यमों में इस विषय पर चर्चा या बहस होती तो है पर उसका स्तर सतही रहता है।  सच बात तो यह है कि देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, भाषाई तथा क्षेत्रीय कलह को निपटाने का गंभीर प्रयास होना चाहिये तभी देश में खुशहाली लायी जा सकती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

समाजसेवा पेशेवर लोग कर रहे हैं-संत कबीर दास के दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख


      हमारे देश में समाज सेवा एक पेशा हो गयी है।  अनेक कथित स्वयंसेवी संगठन इस देश में बन गये हैं जिनके कर्ताधर्ता प्रचार तो यह करते हैं कि सेवा भाव से इस क्षेत्र में आये हैं पर दरअसल वह दूसरों से चंदा लेकर अपना काम चलाते है। इतना ही नहीं वह चंदा तो लेते हैं समाज सेवा के नाम पर अपनी यात्राओं तथा रहने के लिये भी उसमें से पैसा लेते हैं।  अनेक संगठन अपनी ईमानदारी दिखाने के लिये खाते सार्वजनिक करते हैं और उसमें इसका उल्लेख भी रहता है कि उन्होंने सेवा करते हुए अपने निजी जीवन पर  भी खर्च किया। यह कर्ताधर्ता सेवा के लिये कहीं जाने पर अपने किये गये खर्च को भी सेवा कार्य का  हिस्सा मानते हैं।  इससे यह तो स्पष्ट होता है कि वह सेवा के नाम पर घूमने फिरने की नीयत रखते हैं। इतना ही नहीं अनेक बार प्रचार माध्यम अनेक सामाजिक संगठनों का प्रचार भी इस तरह करते हैं कि वह वास्तव में निस्वार्थ से ओतप्रोत लोगों का समूह है।

संत कबीर दास जी कहते हैं कि

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निज स्वारथ के कारनै, सेव करै संसार।

बिन स्वारथ भक्ति करै, सो भावे करतार।।

                        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-संसार में स्वार्थ की वजह से सेवा की जाती है। बिना स्वार्थ तो भक्ति होती है जो परमात्मा की हो सकती है।

      आजकल इन कथित स्वयंसेवी संगठनों की बाढ़ आयी है और मजे की बात यह है कि इसके कर्ताधर्ता प्रचार कर स्वयं को महान साबित करने का प्रयास करते हैं, इसके विपरीत जो परंपरागत स्वयंसेवी संगठन या लोग हैं वह कभी भी इस तरह के प्रचार का काम नहीं करते।  वह अपने ही धन से लोगों को दान तथा सहायता देते हैं।  देखा जाये तो हमारा देश चल ही उन लोगों की वजह से जो निष्प्रयोजन दया करते हैं।  सेवा का मूल तत्व भी यही है। जब दूसरे से पैसा लेकर कोई काम करता है तो इसका सीधा आशय यही है कि वह व्यक्तिगत स्वार्थ से समाज सेवा करने वाला व्यक्ति है।  निष्काम समाज सेवी कभी अपने प्रयासों का प्रचार न करते हैं न उसका लाभ किसी पर प्रभाव डालते हैं।  इसके विपरीत पेशेवर समाज सेवी एक तरह से अपनी छवि का राजनीतिकरण भी करते हैं। चह चाहते हैं कि राजनीति क्षेत्र में वह एक समाज सेवी की तरह प्रशंसित हों।  ऐसे लोगों  का पहला लक्ष्य अपनी छवि चमकाना तथा धन संचय करना होता है।  इसलिये जिन लोगों को समाज सेवा करना चाहते हों उन्हें पहले अपने अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

     

बन्दर जैसे मन को अध्यात्मिक शक्ति से काबू करें-हिंदी धार्मिक चिंत्तन


      ध्यान की पहली सीढ़ी मौन है।  मौन की शक्ति इंद्रियों के नियंत्रण में है। इंद्रियों का स्वामी है मन  सहजता से काबू में नहीं आता। अपने वचन और कर्म पर बहुत कम लोग स्वयं नियंत्रण रखते हैं। उनकी देह का रथ मन सारथी के रूप में जहां चाहे खींच लेता है।  देख जाये तो योग  तो सभी करते हैं पर जो मन के वश में वह असहज रहते हैं। जिनका मन पर नियंत्रण है वह सहज योग की क्रिया के स्वतः ही रत रहते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि इंसान सहज अथवा असहज योग की क्रिया से जुड़ा ही रहता है। योग साधना का अभ्यास करने वालों को यह पता है कि मन पर नियंत्रण किया जाये तो वह पर्वत के समान साथ होता है नहीं तो बंदर की तरह इधर उधर नाचता और नचाता है।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि

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कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जाना।

टांकी प्रेम की, निकसी कंचन की खान।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-मन तो पर्वत के समान है। उसमें प्रेम की टांकी लगाये जाये तो स्वर्णिम भंडार निकल आता है।

कबीर मन मरकट भया, नेक न कहूं ठहराय।

राम नाम बांधै, जित भावै तित जाय।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-मन बंदर के समान इधर उधर भटकता है उसे अगर राम के नाम से बांध दिया जाये तो नियंत्रण में आ जाता है।

      मन पर निंयत्रण ध्यान से ही संभव है। श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एकांत तथा शुद्ध स्थान पर आसन लगाकर प्राणायाम के बाद भृकुटि पर ध्यान रखने की क्रिया करने के साथ ही ओम (ॐ) शब्द जापने वाला कालांतर में ज्ञानी बन जाता है।  ज्ञानी का आशय सांसरिक विषयों से पलायन करने वाला नहीं होता वरन् उसमें लिप्तता की सीमा रखने वाला ही यह उपाधि धारण करने योग्य है। संसार के विषय मनुष्य को इतना व्यस्त रखते हैं कि उसे अध्यात्म का ज्ञान ही नहीं रहता।  यह अलग बात है कि इन विषयों में प्रारंभिक रूप से प्राप्त अमृतमय रस बाद में विष का रूप धारण कर लेता है। इस विषय के निवारण ध्यान से ही किया जा सकता है।

      आमतौर से ध्यान को लेकर अनेक विधियां होने की बात कही जाती है पर श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार भृकुटि पर ध्यान क्रेद्रित करने पर सहज अनुभूति होती है। इस तरह ध्यान से मन पर नियंत्रण के बाद यही संसार जो विषयों में आसक्ति से मिले रस के अमृतमय लगने के बाद जब उसके विष के रूप में परिवर्तित होता है तब मुक्ति दिलाता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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