अध्ययन करें तो ग्रंथ भी गुरु बन सकते हैं-गुरु पूर्णिमा पर विशेष संदेश लेख


                    आज 31 जुलाई 2015 गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरे देश में मनाया जा रहा है। किसी भी मनुष्य के लिये अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये अपनी  इंद्रियों को निरंतर सक्रिय रखना पड़ता है।  उसे दर्शन, श्रवण अध्ययन, चिंत्तन और मनन के साथ ही अनुसंधान कर इस संसार के भौतिक तथा अध्यात्मिक दोनों तत्वों का ज्ञान करना चाहिये।  भौतिक तत्वों का ज्ञान देने वाले तो बहुत मिल जाते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान समझाने वाले गुरु बहुत कठिनाई से मिलते हैं। यहां तक कि जिन पेशेवर धार्मिक प्रवचनकारों को गुरु माना जाता है वह भी धन या शुल्क लेकर उस श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान रटकर सुनाते हैं जो निष्काम कर्म का अनुपम सिद्धांत बताती है।  उनके दर्शन और और वचन श्रवण का प्रभाव कामनाओं की अग्नि में जलकर नष्ट हो जाता है।

                    ऐसे मेें अपने प्राचीन ग्रथों का अध्ययन कर ही ज्ञानार्जन करना श्रेष्ठ  लगता है। श्रीमद्भागवत गीता को अध्ययन करते समय यह अनुुभूति करना चाहिये कि हम अपने गुरु के शब्द ही पढ़ रहे हैं। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में गंुरू की महिमा बताई गयी है पर पेशेवर ज्ञानी केवल दैहिक या भौतिक आधारों तक ही सीमित रखकर अपनी पूजा करवाते हैं। इस संबंध में हमारे एक आदर्श शिष्य के रूप में एकलव्य का उदाहरण हमेशा विद्यमान रहता  है, जिन्होंने गुरू द्रोणाचार्य की प्रस्तर प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या सीखी।  इसका सीधा अर्थ यही है कि केवल देहधारी गुरु होना ही आवश्यक नहीं है।  जिस तरह प्रतिमा गुरु बन सकती है उसी तरह पवित्र शब्द ज्ञान से सुसज्जित ग्रंथ भी हृदय से अध्ययन करने पर हमारे गुरु बन जाते हैं।  एक बात तय रही कि इस संसार में विषयों के विष का प्रहार अध्यात्मिक ज्ञान के अमृत से ही झेला जा सकता है और उसके लिये कोई गुरु-व्यक्ति, प्रतिमा और किताब होना आवश्यक है।

                    इस पावन पर्व पर सहयोगी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकोें, फेसबुक और ट्विटर के अनुयायियों के साथ ही  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा मानने वाले सभी सहृदय जनों को हार्दिक बधाई।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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सभी को मानसिक रूप से गुलाम समझना गलत-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              अंग्रेजी संस्कारों ने हमारे देश में रविवार को सामान्य अवकाश का दिन बना दिया है। रविवार के दिन सुबह भजन या अध्यात्मिक सत्संग प्रसारित करने वाले टीवी चैनल खोलकर देखें तो वास्तव में शांति मिलती है। चैनल ढूंढने  के लिये रिमोट दबाते समय अगर कोई समाचार चैनल लग जाये तो दिमाग में तनाव आने लगता है-उसमें वही भयानक खबरें चलती हैं जो एक दिन पहले दिख चुकी हैं- और जब तक मनपसंद चैनल तक पहुंचे तक वह बना ही रहता है।  बाद में भजन या सत्संग के आनंद से मिले अमृत पर ही उस तनाव का निवारण हो पता है।

                              वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार सभी दिन हरि के माने जाते हैं पर अंग्रेजों ने गुलामी से मुक्ति देते समय शिक्षा, राजकीय प्रबंध व्यवस्था तथा रहन सहन के साथ ही भक्ति में भी अपने सिद्धांत सौंपे जिसे हमारे सुविधाभोगी शिखर पुरुषों से सहजता से स्वीकार कर लिय।  जैसा कि नियम है शिखर पुरुषों  का अनुसरण  समाज करता ही है।  हमें याद है पहले अनेक जगह मंगलवार को दुकानें बंद रहती थीं।  वणिक परिवार का होने के नाते मंगलवार हमारा प्रिय दिन था।  बाद में चाकरी में रोटी की तलाश शुरु हुई तो रविवार का दिन ही अध्यात्मिक के लिये मिलने लगा।  इधर हमारे धार्मिक शिखर पुरुषों-उनके अध्यात्मिक ज्ञानी होने का भ्रम कतई न पालें-ने जब देखा कि उनके पास आने वाली भीड़ में नौकरी पेशा तथा बड़ा व्यवसाय या उद्योग चलाने वाले ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो रविवार के दिन ही  अवकाश लेते हैं तो उन्होंने उसे ही मुख्य दिवस बना दिया।

                              इधर प्रचार माध्यम भी रविवार के दिन ‘सुपर संडे’ बनाने का प्रयास करते हैं और उनके स्वामियों के प्रायोजित अनेक संगठन इसी दिन कोई प्रदर्शन आदि कर उनके लिये प्रचार सामग्री बनाते हैं या फिर कोई बंदा सनसनीखेज बयान देता है जिससे उन्हें सारा दिन प्रचारित कर बहस चलाने का अवसर मिल जाता है।  अन्ना आंदोलन और चुनाव के दौरान इन प्रचार माध्यमों को ऐसे अवसर खूब मिले पर अब लगता है कि अब शायद ऐसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी महिलाओं के प्रति धटित अपराध अथवा धार्मिक नेताओं के बयानों से यह अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री निकालने का प्रयास कर रहे हैं। यह अलग बात कि जम नहीं पा रहा है।

                              इधर बाहुबली फिल्म की सफलता के अनेक अर्थ निकाले जा रहे हैं।  यह अवसर भी प्रचार माध्यम स्वयं देते है-यह पता नहीं कि वह अनजाने में करते हैं या जानबुझकर-जब बॉलीवुड के सुल्तान और बादशाह से बाहूबली फिल्म के नायक की चर्चा कर रहे हैं। तब अनेक लोगों के दिमाग में यह बात आती तो है कि अक्षय कुमार, अजय देवगन, सन्नी देयोल, अक्षय खन्ना और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेता भी हैं जो फिल्म उद्योग को भारी राजस्व कमा कर देते हैं।  अक्षय कुमार के लिये इनके पास कोई उपमा ही नहीं होती।  यह अभिनेता अनेक बार आपस में काम कर चुके हैं पर उसकी चर्चा इतने महत्व की नहीं होती जैसी सुल्तान और बादशाह के आपस में अभिवादन करने पर ही हो जाती है।  अंततः फिल्म और टीवी भावनाओं पर ही अपना बाज़ार चमकाते हैं और इससे जुड़े लोगों का पता होना चाहिये कि उनके इस तरीके पर समाज में जागरुक लोग रेखांकित करते हैं।  सभी तो उनके मानसिक गुलाम नहीं हो सकते। हम ऐसा नहीं सोचते पर ऐसा सोचने वाले लोगों की बातें सुनी हैं इसलिये इस विशिष्ट रविवारीय लेख में लिख रहे हैं।

हरिओम, जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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बाहूबली फिल्म पर व्यवसाय से इतर चर्चायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


        बाहुबली फिल्म ने भारतीय मनोरंजन जगत में तहलका मचा दिया है। दक्षिण की हिन्दी भाषा में अनुवादित वाणी से सुसज्जित फिल्म बाहुबली ने जो व्यापार किया है उससे मुंबईया फिल्मों की असलियत सामने आ गयी है। दरअसल दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग शुद्ध रूप से सार्वजनिक व्यवसायिक सिद्धांतों पर आधारित है जबकि मुंबईया फिल्म वाले उसे पारिवारिक दुकान की तरह चलाते हैं। आप नज़र डालिये तो पायेंगे कि  वर्तमान के अधिकतर फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के होने के काम पा जाते हैं। सामान्य परिवार के युवक और युवतियेां के लिये इस क्षेत्र में अवसर एकदम बंद कर दिये गये हैं। अनेक अभिनेता तो पचास पार करने के बाद भी नवयौवनाओं के साथ नायकों का अभिनय कर रहे हैं। ऐसे में सवाल आता है कि क्या देश में आकर्षक और प्रतिभाशाली युवकों की क्या कमी है? मगर मुंबईया फिल्म व्यवसाय रूढ़िवादी हो गया है।  अनेक अभिनरेता तो केवल चेहरे की सज्जा के कारण नायक बनते है वरना अधिकतर की आंखें सपाट हैं। इनके अभिनय में स्वाभाविकता का अभाव दिखता है। इसके विपरीत दक्षिण भारतीय अभिनेता और अभिनेत्रियों स्वभाविकता के साथ अपना काम करते हैं। उनमें आकर्षण भी अधिक होता है।

                              जिन लोगों ने टीवी पर दक्षिण भारतीय अतिभनेता और अभिनेता का काम देखा है वह हिन्दी भार्षी दर्शक इस बात को अब समझते हैं कि मुंबईया फिल्म व्यवसाय अब अपने बुढ़ापे को ढो रहा हैै। बाहुबली फिल्म देखकर आने वाले लोगो का कहना है कि अगर इसी तरह दक्षिणी फिल्मों का हिन्दी में तत्काल प्रसारण होता रहा तो  मुंबईया फिल्म के लिये भारी संकट खड़ा हो सकता है। यह सभी जानते हैं कि मुंबईया फिल्म उद्योग के पीछे की शक्तियां येनकेन प्रकरेण उसके संकटों का निवारण करने के लिये प्रयास करती है। हमने कहीं पढ़ा  था कि  एक समय अंग्रेजी फिल्मों के हिन्दी अनुवाद के प्रसारण दौर शुरु हुआ और उस समय जब मुंबईया फिल्म उद्योग के लिये संकट खड़ा होता दिखा तो उसे रोकने के  प्रयास हुए। कुछ समय बाद वह दौर थमा तो नहीं पर कम जरूर हो गया। बहरहाल बाहुबली फिल्म की सफलता के बहुत सारे अर्थ निकाले जा रहे हैं पर हमारा मानना है कि फिल्मों के प्रभाव क्षणिक ही होते हैं। ऐसी फिल्मों की निरंतरता ही बुढ़ा चुके मुंबईया फिल्म उद्योग को व्यवसायिक चुनौती दे सकती है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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राजसी कर्म से अहंकार और क्रोध गुण जुड़ा ही है-हिन्दी चिंत्तन लेख


             अध्यात्मिक दर्शन का संबंध आंतरिक मनस्थिति से है। उसके ज्ञान से  व्यक्ति सात्विक भाव धारण करता है या फिर इस संसार में विषयों से सीमित संबंध रखते हुए योग भाव को प्राप्त होता है।  एक बात तय रही कि दैहिक विषयों से राजसी भाव से ही  राजसी कर्म के साथ संपर्क रखा जा सकता है। ज्ञान होने पर व्यक्ति अधिक सावधानी से राजसी कर्म करता है और न होने पर वह उसके लिये परेशानी का कारण भी बन जाता हैं।  हम देख यह रहे है कि लोग अपने साथ उपाधि तो सात्विक की लगाते हैं पर मूलतः राजसी प्रवृत्ति के होते हैं। ज्ञान की बातें आक्रामक ढंग से इस तरह करेंगे कि वह उन्हीं के पास है पर उनमें धारणा शक्ति नाममात्र की भी नहीं होती और राजसी सुख में लिप्त रहते हैं। राजसी कर्म और उसमें लिप्त लोगों में लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अतः उनसे सात्विक व्यवहार करने और विचार रखने की आशा करना ही अज्ञान का प्रमाण है। सात्विकता के साथ राजसी कर्म करने वालों की संख्या नगण्य ही रहती है।

                      धर्म, अर्थ, समाज सेवा, पत्रकारिता और कला क्षेत्र में धवल वस्त्र पहनकर अनेक लोग सेवा का दावा करते हैं। उनके हृदय में शासक की तरह का भाव रहता है। स्वयंभू सेवकों की भाषा में अहंकार प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। प्रचार में विज्ञापन देकर वह नायकत्व की छवि बना लेते हैं।  शुल्क लेकर प्रचार प्रबंधक जनमानस में उन्हें पूज्यनीय बना देते हैं। कुछ चेतनावान लोग इससे आश्चर्यचकित रहते हैं पर ज्ञान के अभ्यासियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। राजसी कर्म में लोग फल की आशा से ही लिप्त होते हैं-उनमें पद, प्रतिष्ठा पैसा और प्रणाम पाने का मोह रहता ही है। हमारे तत्वज्ञान के अनुसार यही सत्य है।

                  सामान्य जन उच्च राजसी कर्म और पद पर स्थित शिखर पुरुषों से सदैव परोपकार की आशा करते हैं पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस संसार में सभी मनुष्य अपने और परिवार के हित के बाद ही अन्य बात सोचते हैं। परोपकार की प्रवृत्ति सात्विक तत्व से उत्पन्न होती है और वह केवल अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली मनुष्यों में संभव है। सात्विक लोगों में बहुत कम लोग ही राजसी कर्म में अपनी दैहिक आवश्यकता से अधिक संपर्क रखने का प्रयास करते हें। उन्हें पता है कि व्यापक सक्रियता काम, क्रोध, मोह लोभ तथा अहंकार के पंचगुण वाले  मार्ग पर ले जाती है। ऐसे ज्ञान के अभ्यासी कभी भी राजसी पुरुषों की क्रियाओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी नहीं करते क्योंकि उनको इसका पता है कि अंततः सभी की देह त्रिगुणमयी माया के अनुसार ही संचालित होती है। उनके लिये अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को वह राजसी कर्म से उत्पन्न गुण ही मानते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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शासकीय चिकित्सालय तथा विद्यालय में सफाई अनिवार्य हो-हिन्दी चिंत्तन लेख


                     सरकारी अस्पताल में जब चिकित्सक हड़ताल करते हैं तो सबसे अधिक कमजोर आयवर्ग के लोग प्रभावित होते हैं। उसी तरह जब सरकारी विद्यालयों में शिक्षक हड़ताल करते हैं तब इसी वर्ग के छात्र परेशान होते हैं।  यह आर्थिक वैश्वीकरण का परिणाम है कि जिन गरीबों के कल्याण के लिये धनवादी नीतियां लायी गयीं वही उनकी शत्रु हो गयी हैं।

                  एक समय था जब सरकारी अस्पताल और विद्यालय जनमानस की दृष्टि में प्रतिष्ठित थे पर समय के साथ बढ़ती आर्थिक असमानता ने समाज में गरीब तथा अमीर के बीच विभाजन कर दिया है । यह विभाजन अमीरों का निजी तथा गरीबों का सरकारी क्षेत्र के प्रति मजबूरी वश झुकाव के रूप में स्पष्टतः दिखाई देता है। हमें याद है जब पहले बच्चों को शासकीय विद्यालयों में भर्ती इस विचार से कराया जाता था कि वहां पढ़ाई अच्छी होती है। उसी तरह इलाज भी सरकारी अस्पतालों में वहां के चिकित्सक तथा नर्सों के प्रति विश्वास के साथ कराया जाता था।  अब अल्प धनी सरकार और अधिक धनी निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने लगा है।  सरकारी अस्पतालों में कभी जाना हो तो वहां इतनी गंदगी मिलती है कि लाचार गरीब का रहना तो सहज माना जा सकता है पर वेतनभोगी नर्स, कंपाउंडर और डाक्टर किस तरह वहां दिन निकालते होंगे यह प्रश्न मन में उठता ही है। कहा जाता है कि जिस वातावरण में आदमी रहता है उसका उस पर प्रभाव पड़ता ही है।  ऐसे गंदे वातावरण में चिकित्सा कर्मी अपना मन अच्छा रख पायें यह आशा करना व्यर्थ है। यही स्थिति सरकारी विद्यालयों में है। देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है पर अभी हमें अस्पतालों और विद्यालयों में उसके आगमन की प्रतीक्षा है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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भारत और चीन अध्यात्मिक दृष्टि से मित्र राष्ट्र हैं-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


       प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन तथा मंगोलिया यात्रा में भगवान बुद्ध तथा उनके चरित्र की चर्चा का राजनीतिक रूप से कोई महत्व अभी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है लेकिन वैश्विक पटल के ऊपर इसके प्रभाव कालांतर में अप्रत्याशित रूप से दिखेंगे। चीन में सबसे अधिक बुद्ध धर्म मानने वाले हैं पर वैश्विक पर्दे पर वह वामपंथी विचाराधारा का प्रतीक बना रहा। अहिंसा के सबसे बड़े प्रवर्तक भगवान बौद्ध की विश्व में उस तरह चर्चा नहीं हुई जितनी पश्चिम धर्म प्रवर्तकों की दिखती रही। पश्चिम के दोनों धर्मो की चर्चा खूब हुई पर बुद्ध धार्मिक विचाराधारा का प्रवाह अपेक्षा के अनुकूल नहीं हुआ। चीन से अनेक लोग विदेश गये पर अपनी धार्मिक पहचान का महत्व साथ नहीं लाये। इससे तो हिन्दू धार्मिक लोग बेहतर रहे जिन्होंने विश्व में अपनी धार्मिक  पहचान कम नहीं होने दी।

        हमारा अनुमान है कि जिस तरह चीन की जो राजकीय विचाराधारा रही है उसमें धर्म अध्यात्म का कोई महत्व नहीं रहा और अभी तक वहां  के लोगों ने शायद ही कभी अपने राजपुरुषों की मंदिर में उपस्थिति की तस्वीर देखी हो पर श्रीनरेद्रमोदी की यात्रा ये यह अवसर उन्हें मिला। विश्व पटल पर चीन के राजपुरुषों की मंदिरों में श्रीमोदी के साथ उपास्थिति वहां के देश की अध्यात्मिक छवि भी बना सकती है। अंततः यह बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक होकर उसका विस्तार कर सकती है। सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दू तथा बौद्ध की संयुक्त  छवि विश्व में प्रचारित पश्चिमी धर्मो के लिये चुनौती बन सकती है। अभी तक यह देखा गया है कि एक धर्म से दूसरे धर्म में जाने की पंरपरा अधिक रही है। बौद्ध तथा हिन्दू धर्म की संयुक्त छवि न होने से पश्चिम में लोगों के पूर्वी धर्म कभी आकर्षक विकल्प नहीं बने जो अब संभावना बन सकती है। मुख्य बात यह कि भारतीय अध्यात्म्कि दर्शन अधिक तेजी से वैश्विक पटल पर छा सकता है जो पश्चिम के दो धर्मों के आपसी संघर्ष के बीच तीसरी विचाराधारा के रूप पहले से ही मौजूद है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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ओम शब्द को योग साधना से प्रथक नहीं किया जा सकता-21 जून पर विश्व योग दिवस पर विशेष लेख


21 जून को पूरे विश्व में योग दिवस मनाया जा रहा है। हम यहां यह स्पष्ट कर दें कि पूरे विश्व के साथ भारत को भी योग दिवस विशेष रूप से मनाना अवश्य मनायें पर आचार्यगण आगे भी अपनी नियमित गतिविधियों तथा अभियान  नियमित रूप से जारी रखना भूलें नहीं। वह यह न सोचें कि बस अपना लक्ष्य पाल लिया। अनेक धार्मिक विद्वान हमेशा पाश्चात्य संस्कृति के प्रतीक मातृदिवस, पितृदिवस, मित्र दिवस तथा प्रेम दिवस को भारत में मनाने का विरोध यह कहते हुए  करते हैं कि हमारे पारपारिक संबंध नियमित जीवन का भाग होते हैं इसलिये उनके लिये विशिष्टता दिखाना ही पाखंड है। योग दिवस का प्रस्तावक भारत ही है इसलिये यहां उस दिन विशेष चर्चायें तथा गतिविधियां दिखाना इसलिये आवश्यक है क्योंकि हमारे यहां अभी भी योग साधकों की संख्या नगण्य ही लगती है।

     जहां पूरा विश्व योग दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है वहीं भारत में यहीं की अध्यात्मिक विचारधारा के परंपरागत विरोधी इसमें सूर्य नमस्कार तथा मंत्रजाप की वजह से इसके विरुद्ध विषवमन भी कर रहे हैं। उनके भय के मारे में कुछ लोग सूर्यनमस्कार तथा मंत्रजाप के विषय प्रथक रखकर योग साधना में शामिल होने की सोच रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह कि भारतीय योग को विश्व पटल पर लाने की जल्दी में अनेक प्रचारक भी यह सोचकर संतुष्ट है कि चलो आगे देख लेंगे। इस विचार के चलते योेग का विषय केवल दैहिक स्वास्थ्य की सीमा तक ही सिमट रहा है। मानसिक तथा वैचारिक शुद्धता की बात ही नहीं हो रही है जिनका संबंध ध्यान और मंत्रजाप से है।

      पाकिस्तान के इस्लामाबाद में एक शिविर चलने का समाचार देखने को मिला। वहां अभ्यास करने वाले कुछ योग साधकों ने इसके लाभों की चर्चा की तो अच्छा लगा। वहां के शिक्षक ने कहा कि योग को धर्म से जोड़ना ठीक नहीं है पर अपने अभ्यास में वह ओम मंत्र तथा सूर्य के नाम के जाप नहीं कराते। दरअसल भारतीय धार्मिक विचाराधारा से प्रथक रहने वालों को यहां की पूजा पद्धति ही नहीं वरन् उसमें लिये जाने वाले नाम तथा मंत्रों से भी विरोध है। हम यहां स्पष्ट कर दें कि ओम योग का अभिन्न भाग है। जिन लोगों को ओम शब्द से परहेज है उनके लिये योग साधना एक अधूरा अभ्यास है। महत्वपूर्ण बात यह कि जब हम प्राणायाम के दौरान  वायु अंदर बाहर ग्रहण करते हैं तब ओम शब्द की ध्वनि स्वाभाविक रूप नजर आती है। जब सांस अंदर लेते हैं तो ऊपर की तरफ बढ़ते हुए ओ और जब बाहर निकालते हैं तो म की ध्वनि अंदर से बाहर आती है। जब कोई प्राणायाम कर रहा है तो वह ओम शब्द से स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है। अंतर इतना है कि इसकी अनुभूति करने वाले साधक का मन अधिक प्रसन्न होता है।

जिन लोगों में भारतीय धार्मिक विचाराधारा के प्रति चिढ़ है उन्हें समझाना तो कठिन है पर जो योगाभ्यास करते हैं उन्हें प्राणायाम के अभ्यास के समय इस ओम ध्वनि की मधुरता का अनुभव अवश्य करना चाहिये।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
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भारत के आम हिन्दू में तत्वज्ञान रहता ही है-हिन्दी चिंत्तन लेख


            अभी हाल ही में एक फिल्म से हमारे देश के धार्मिक संगठनों के लिये हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया।  इस फिल्म के विरोध अभियान चलाते समय में रणनीति तथा धरातल के सत्य का उनको ज्ञान नहीं था-यह बात साफ प्रतीत होती है।  एक सामान्य फिल्म जो तीन दिन में दम तोड़ देती एक निरर्थक विरोध अभियान ने उसने इतिहास के सबसे अधिक राजस्व कमाने वाली फिल्म बना दिया।  अगर हिन्दू धर्म की रक्षा का अभियान इन कथित लोगों को युद्ध स्तर पर चलाना है तो नीतियां भी व्यवहारिक अपनाना चाहिए। बिना रणनीति के कोई रण नहीं जीता जा सकता।  कम से कम उन्हें इस विषय में चाणक्य और विदुर नीति का अध्ययन तो अवश्य करना चाहिये।

      जब कोई सेनापति युद्ध के लिये जब निकलता है तो अपने अस्त्र शस्त्र के भंडार के साथ ही अपने सैनिकों के पराक्रम की व्यापकता और सीमा दोनों का ही अध्ययन कर लेता है।  इतना ही नहीं वह अपनी प्रजा की मानसिकता का भी विचार करता है।  हमारे भारत में कथित धर्म रक्षक हवा में ही शब्द बाण छोड़कर आत्ममुग्ध हो जाते हैं।  उन्हें न तो अपने समाज के संपूर्ण विचारों का ज्ञान है न यह जानते हैं कि आर्थिक, सामाजिक तथा पारिवारिक कारणों से वह मध्यम वर्ग कितने भारी तनाव में सांस ले रहा है जो धर्म के लिये बौद्धिकता का दान देता है। उसी तरह उस निम्न वर्ग के लिये अपने अस्तित्व का संघर्ष अत्यंत जटिल हो गया है जो धर्म की रक्षा के लिये अपना श्रम दान करता है।  पैसा दान करने वाला उच्च वर्ग भी अब अपने सात्विक लक्ष्य पाने की बजाय स्वार्थवश ही करता है।  सामाजिक तथा आर्थिक विषयों में तीनों वर्ग समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे-बल्कि कहीं कहीं वैमनस्य की भावना भी बढ़ रही है।

      ऐसे में फिल्म को लेकर कथित धर्म रक्षकों का अभियान न केवल टांय टांय फिस्स हुआ वरन् उससे फिल्म बनाने वालों को कमाई अधिक ही हो गयी।  उससे भी अधिक अब हंसी महिलाओं को चार बच्चे पैदा करने की प्रेरणा देने पर उड़ रही है। जिस तरह महिलाओं को एक वस्तु मानकर यह बात कही गयी है वह अत्यंत अपमानजनक है।  इन लोगों का एक तरह से इसी तरह की मान्यता है कि महिलायें तो केवल बच्चे पैदा करने की मशीन है। इससे ज्यादा उसका महत्व नहीं है।

      चार बच्चे पैदा करने की प्रेरणा के लिये विचित्र बातें कही जा रही हैं।

      1-चार बच्चे इसलिये पैदा करो क्योंकि दूसरे समूह के लोग चालीस कर रहे हैं।

      2-एक बच्चा सीमा पर भेज दो। एक संतों को दे दो। दो अपने पास रख लो।

      निहायत ही हास्यास्पद तर्क हैं। पहली बात तो यह कि बच्चे से आशय इनका लड़के से ही है।  क्या यह मानते हैं कि इनकी राय पर चलने वाली औरते केवल लड़के को ही जन्म देंगी? क्या गर्भवती होने पर वह भ्रुण परीक्षण कराने जायेंगी।  क्या जब तक चार लड़के जन्म लें तब तक लड़कियों का जन्म उनको स्वीकार्य होगा? इससे तो बच्चों की संख्या आठ से दस तक जा सकती है।  आज स्वास्थ्य का जो स्तर है उसमें यह संभव नहीं लगता।  इस तरह तो कन्या भ्रुण हत्या को प्रोत्साहन मिलेगा?। हमें मालुम है कि देश की सामान्य महिलायें समझदार हैं और इस तरह के बयानवीरों की असलियत जानती हैं।  दूसरी बात यह कि सीमा पर जाने का मतलब सेना में भर्ती होने से ही है।  उस पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि देश में बेरोजगारी इतनी है कि किसी स्थान विशेष पर चार या पांच सौ सैनिकों की भर्ती के लिये शिविर लगता है तो वहां चालीस से पचास हजार लड़के भर्ती होने के लिये आ जाते हैं।  अनेक जगह तो भीड़ बेकाबू होने से उपद्रव भी हो चुके हैं।  पहले तो इस देश के युवकों को पूरी तरह भर्ती करा लें जो मौजूद हैं।  संतों को देने का सवाल एकदम अधार्मिक है।  कहीं भी किसी जगह इस तरह का संदेश नहीं है।

      हम यहां यह स्पष्ट कर दें कि भारत की विश्व में पहचान श्रीमद्भागवत गीता के कारण अधिक है।  उसमें जो अध्यात्मिक ज्ञान है वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पूर्व काल में था।  धार्मिक वस्त्र पहनकर स्वयं को विद्वान समझने वाले लोगों को अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में कितना पता है यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि उनमें अपने समाज को लेकर आत्मविश्वास की भारी कमी है। वह शायद नहीं जानते कि भारत का आम हिन्दू अध्यात्मिक रूप से ज्ञानी है।

प्रस्तुत है इस पर एक कविता

————————–

सच्चाई यह है कि
संख्या बल से
युद्ध नहीं जीते जाते।

पराक्रमियों का संरक्षण
समाज अगर न पा सके
शांति से दिन नहीं बीते जाते।

कहें दीपक बापू बुद्धि के वीरों पर
दो गुणा दो बराबर चार का सिद्धांत
असर नहीं करता
एक और ग्यारह की योजना से
करते किला फतह,
भीड़ बढ़ाकर नहीं चाहते कलह,
अपनी सोच से बढ़ते आगे
बांटते हैं वह सभी को प्रसन्नता
स्वयं भी सुख पीते जाते।

———————

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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श्रीमद्भागवत गीता के सैद्धांतिक सूत्रों का व्यवहार में परीक्षण आवश्यक-हिन्दी चिंत्तन लेख


            श्रीमद्भागवत्गीता ग्रंथ की रचना के 5151 वर्ष पूरे हो गये हैं ऐसा कुछ विद्वानों ने बताया है। कम से कम एक बात तो समाज ने मान ली कि भगवान श्रीकृष्ण का लीलाकाल इससे अधिक पुराना नहीं।  इधर कुछ ज्योतिष और खगोल शास्त्रियों ने भी मिलकर भगवान श्रीराम के लीला काल को सात हजार वर्ष पुराना प्रमाणित करने का प्रयास किया है।  यह भी माना जा रहा है कि भारत श्रीलंका के बीच निर्मित रामसेतु  भी स्वाभाविक रूप से बना है।  भारतीय अध्यात्म के दो महानायकों के बारे में खोज चलना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। रामायण में जहां भगवान श्री राम ने सामाजिक मर्यादा का ज्ञान कराया तो महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन के रहस्यों से परिचय कराया।  यह अलग बात है कि भगवान श्रीराम और कृष्ण के प्रति आस्था दिखाकर अपने लिये अर्थसिद्ध करने वाले ठेकेदारों की हमारे देश में कमी नहीं है।

            आजकल हमारे देश में विश्व गुरु के रूप में पुनः प्रतिष्ठत करने का नारा चल रहा है।  हमारी दृष्टि से तो रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा श्रीमद्भागवत गीता तथा प्राचीन ग्रंथों   की उपस्थिति तथा उनकी वैश्विक स्वीकार्यता के कारण हमें यह श्रेय वैसे भी मिलता है।  यह अलग बात है कि हमने स्वयं ही पाश्चात्य में सृजित संस्कृति, साहित्य और साधनों को अपना इष्ट मानकर उनसे विरक्ति कर ली है पर इसके बावजूद हमारा विश्व गुरु का पद बना हुआ है।  जरूरत हमें अपनी पुरानी राह चलने की है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार हमें विज्ञान का भी ज्ञाता होना ही चाहिये। केवल ज्ञान के शब्दकोष के सहारे जीवन गुजारना से नीरसता आती है।  हमने नये विज्ञान पर अपनी पूरी बुद्धि निछावर कर दी है और ज्ञान को धारण करने का संकल्प त्याग ही दिया है।

            श्रीगीता के ज्ञान साधकों के लिये यह ग्रंथ ही वास्तविक गुरू होता है। कुछ लोग मानते  हैं कि पाश्चात्य सभ्यता-जिसे हम अंग्रेजी भी कहते हैं- अत्यंत व्यापक दृष्टिकोण वाली है और उसने भारत में आकर समाज सुधार किया है। हमारा विचार इससे विपरीत है।  हमारा मानना है कि जब यहां परिवहन के साधन सीमित थे तब भी लोग मध्य एशिया तक यहां से गये और वहां ये आये।  उस समय कोई परिवहन के तीव्रगति वाले साधन नहीं थे तब भी लोगों का भ्रमण बिना वीजा और पासपोर्ट के होता था।  भारत में पुर्तगााली, फ्रांसिसी और अंग्रेजों के आने के बाद संकीर्णता ही बढ़ी है हमारा ऐसा मानना है।  मनुष्य का मन आकाश में उड़ने को करता है। नहीं उड़ पाता तो दूर तक जाने की इच्छा तो होती है।  पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से हुआ यह कि अब अमृतसर से लाहौर और मुंबई से कराची जाने जाने के लिये वीजा और पासपोर्ट चाहिये जबकि कभी उन्मुक्त भाव से आना जाना हो सकता था।

            श्रीमद्भागवत गीता आत्म संयम रखने की ऐसी कला सिखाती है जिसे जीवन उन्मुक्त भाव से व्यतीत किया जा सकता है वरना  त्रिगुणमयी माया इस तरह फंसाये रहती है कि आदमी विषयों को छोड़ता और पकड़ता रहता है। जब मन विषयों से तंग होता है तो फिर मनोरंजन के लिये भी वही विषय चुनता है जिनसे दूर होना चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान का सैद्धांतिक अर्थ सभी जानते हैं वह उसे व्यवहार में कैसे लाया जाये यह कला सभी को नहीं आती। सीधी बात कहें तो ज्ञान होना और उसे धारण करना दो प्रथक विषय हैं।  जब तक  श्रीगीता के संदेशों का व्यवहारिक प्रयोग नहीं करेंगे तब तक तत्वज्ञान समझ में नहीं आ सकता।  जिस तरह विज्ञान के सभी छात्र सिद्धांत तो समझ लेते हैं पर व्यवहारिक प्रयोग में उनकी योग्यता परिलक्षित होती है।  इस पर गीता तो ज्ञान के साथ ही विज्ञान के संदेशों से भी भरी हुई है उसे व्यवहार में लाकर ही बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। ऐसा महान पवित्र ग्रंथ को किसी सांसरिक पुरुष की महत्व के बखान या प्रचार की सहायता की आवश्यकता नहीं होती वरन् सांसरिक विषयों में में लिप्त लोगों को ही उसके ज्ञान समझने की आवश्यकता है। श्रीमद्भागवत गीता का महत्व बखान करने का अर्थ यह कदापि नही है कि प्रचारक उसका ज्ञान भी समझते हैं।  भगवान श्रीकृष्ण ने श्री गीता के संदेशों को अपने ही भक्त में सुनाने का प्रतिबंध भी इसलिये ही लगाया हुआ है क्योंकि यह केवल उनके समझ में ही आ सकती है। 5151 वर्ष पूर्व सृजित गीता के संदेश प्रारंभ में पढ़ने पर उकताहट आ सकती है पर जब इसका ज्ञान व्यवहारिक प्रयोगों के साथ मस्तिष्क धारण करता है तब इसका हर  श्लोक रुचिकर लगता है। इतना ही नहीं अगर श्रीमद्भागवत गीता का अगर रोज अध्ययन किया जाये तो ऐसा लगता है कि हर बार नयी बात सामने आ रही है।  इसका ज्ञाता क्षेत्रज्ञ भी कहलाता है। पश्चिमी विज्ञान अभी तक प्रकृति का पूरा क्षेत्र नहीं जान  सका है पर जो श्रीगीता पढ़ लेगा वह पूरी सृष्टि का सत्य जान लेगा।  भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति के भाव तथा ज्ञान धारण करने के संकल्प के साथ पढ़ने पर ही श्रीमद्भागवत गीता का महत्व समझ में आ सकता है। तब उसका प्रचार करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।

—————–

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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ताकतवर भारत बनाने के लिये नशे का त्याग करो-हिन्दी चिंत्तन लेख


            भारत एक विशाल प्राकृतिक संपन्न देश है। विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से अनेक बड़े देश हैं पर उनमें प्राकृतिक और मानवीय संसाधन की दृष्टि से अनेक दोष हैं। भारत में सभी प्रकार के खनिज पाये जाते हैं तो जलसंपदा भी यहां बहुत है।  उनके दोहन के लिये जनसंपदा भी कम नहंी है। अनेक देश बड़े हैं और उनकी उनके पास प्राकृत्तिक संपदा भी बहुत है पर जनसंख्या अधिक नहीं है जिससे वह उसका पूर्ण दोहन नहीं कर पाते।  अनेक देशों का क्षेत्रफल बड़ा है पर वहां जमीन में न पानी है  और न ही खनिज संपदा।  उन बड़े  देशों में संपन्नता है पर भारत जैसा अध्यात्मिक ज्ञान नहंी है। भारत विश्व मे अपने अध्यात्मिक ज्ञान के कारण भी जाना जाता है।  यही कारण है कि भारत के विरोधी राष्ट्र उस पर शासन करने के लिये यहां भेदनीति अपनाते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के कारण  आम भारतीय धर्मभीरु व्यक्ति  बौद्धिक रूप से दृढ़ होता है इसलिये यहां के समाज पर शासन सहज नहीं है।  यही कारण है कि यहां नये मानसिक भौतिक तथा मानसिक व्यसन निर्यात किये जाते हैं।

            कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफीम की तरह होता है।  यह पाश्चात्य विचाराधाराओं पर पूर्णतः सही लगता है भारत में धर्म निजी नियंत्रण बनाये रखना वाला सिद्धांत है।  भारत में विदेशी विचाराधाराओं की तरह मार्क्सवाद भी आया है।  इसके मानने वाले समाज सेवा को व्यसन की तरह करते हैं।  उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन अफीम का तत्व लगता है।  इतना ही नहीं मार्क्स के शिष्य हर विदेशी राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक विचार को भारतीय विचाराधाराओं से  श्रेष्ठ मानते हैं।  अंग्रेंजोें ने भारत को गुलाम बनाये रखने के लिये ऐसी शिक्षा पद्धति अपनाई कि आज हर शिक्षार्थी नौकरी यानि गुलामी के लिये तत्पर रहता है।  उससे भी काम न चला तो क्रिकेट जैसा खेल थोप दिया। भारत की बुद्धि का हरण उन्होंने इस कदर किया कि फिल्म और क्रिकेट के नायक यहां भगवत्स्वरूप प्रचारित हो रहे हैं।  प्रचार माध्यम उनकी आड़ में ढेर सारी आय अर्जित कर रहे हैं। धर्म, अर्थ और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय शिखर पुरुष धनार्जन के नशे में लग ेहुए हैं तो आम लोग मनोरंजन के दास हो गये हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

————–

स्फीतं त्रीणि बलं शक्यमाधातुं पानवर्त्मनि।

हृस्वप्रयासव्यायामादितिसैन्यं समुत्पतेत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-शत्रु की सेना अगर बल में अधिक हो तो उसे मद्यपान के व्यसन में लगाकर  व्यायाम में लग होने पर उसे आक्रमण कर दें।

            अभी हाल ही में भारत में बढ़ते मादक द्रव्य पर समाचार आये थे।  चार दिन चर्चा चली पर नतीजा वही ढाक के तीन पात!  अंग्रेजों ने यहां शासन कर यह समझ लिया था कि यहां का अध्यात्मिक ज्ञान जितना प्रबल उतना ही यहा लोग मानसिक रूप से कमजोर है।  उनकी कमजोरियों पर  अनुसंधान के कारण ही यहां के ऋषि, मुनि और तपस्वियों ने महान ज्ञान स्थापित किया। इस ज्ञान के रहते भारतीयों पर शासन कठिन है इसलिये उन्होंने विदेशी विचारधाराऐं यहां प्रवाहित कीं।  अंग्रेजों ने इसलिये ही अपनी शिक्षा पद्धति, खेल तथा मनोरंजन के साधन के रूप में स्थापित किया ताकि यहां से जाने के बाद भी उनका प्रभाव बना रहे।  इधर यह भी चर्चा होती रही कि फिल्मों के प्रदर्शन, क्रिकेट में सट्टे और मादक द्रव्यों से आतंकवादी संगठन पैसा अर्जित कर रहे हैं फिर भी हमारे देश के लोग मनोरंजन के दासत्व से मुक्त नहीं हो पा  रहे।  एक तरह से मद्यपान-फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्य-इस देश पर विदेशी कब्जा हो गया है। हमारा मानना है कि अगर हमारे देश के लोग कम से कम दो वर्ष फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्यों से दूर रहें तो यहां वातावरण अत्यंत सहज हो जायेगा।  भारत को व्यसनों में धकेलने वाले तब निराश हो कर चुप हो जायेंगे।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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विवेकानंद जयंती पर सूर्य नमस्कार का आयोजन सराहनीय-हिन्दी चिंत्तन लेख


            आज विवेकानंद जयंती पर मध्य प्रदेश के विद्यालयों में सूर्य नमस्कार का आयोजन किया गया है।  यह एक अच्छा प्रयास है। सूर्य नमस्कार योगासनों में पद्मासन, वज्रासन तथा सर्वांगासन की तरह देह, मन तथा विचारों में दृढ़ तत्व स्थापित करता है।  विधि के अनुसार करने पर सूर्य नमस्कार करने वाले साधक को स्वतः ही अपने अंदर तेज के संचालन का अनुभव होता है। हमारा मानना है कि इस तरह का आयोजन प्रतीकात्मक होने के साथ ही नियमित अभ्यास का विषय होना चाहिये। सूर्य नमस्कार से तन, मन और विचारों की व्याधियों से मुक्ति मिलती है।  व्याधियों से मुक्त व्यक्ति ही समाज में सम्मान प्राप्त कर सकता है।

            वैसे तो भारत में योग विद्या के जानकार कम नहीं है पर एक शिक्षक के रूप में अपने छात्र को पारंगत करने की कला सभी को नहीं आती।  अनेक पेशेवर तथा स्वयंसेवी योग शिक्षक हमारे देश में सक्रिय हैं। भारतीय योग संस्थान इस विषय में बिना प्रचार के काम करता है और उससे जुड़े निष्काम योग शिक्षक बिना किसी लाभ के लिये न केवल स्वयं अभ्यास करते हैं वरन् अपने शिविर में अन्य लोगों को अभ्यास कराने का भी आनंद लेते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है

————-

युध्येताभृतमत्यर्थ तदात्वे कृतवेतन।

न व्याधितमकर्मण्यं व्याधितं परिभूयते।।

            हिन्दी में भावार्थ-युद्ध के समय वेतन देने से सेना उत्साह से युद्ध करती है।  जिनकी देह में व्याधियां है वह किसी कर्म के योग्य नहीं रहते।  व्याधि वाले मनुष्य का सम्मान भी नहीं होता।

            अनेक लोग शैक्षणिक संस्थानों में योग साधना के विषय का अभ्यास को धार्मिक नज़रिए से देखते हैं।  हमें उनसे बहस में नहीं उलझना वरन् देश में समाज को स्वास्थ्य, नैतिक, वैचारिक तथा ज्ञान की दृष्टि से गिरते स्तर से बचाने का प्रयास करना है। हम मनुष्य का भौतिक स्वरूप भले ही स्थिर देख रहे हैं पर आंतरिक दृढ़ता तथा मानसिक संवेदनाओं के अप्रकट भंडार की कमी बहुत अनुभव होने लगी है।  दैहिक व्याधियों का बढ़ता प्रकोप प्रकट है पर मानसिक कमजोरी नहीं दिख रही।  ऐसे में किसी से अन्य व्यक्ति के सम्मान की आशा करना व्यर्थ है उसे व्यक्ति से नहीं की जा सकती जिसके अंदर आत्मसम्मान का भाव ही नहीं है।  जीवन के प्रति आत्मविश्वास का अभाव सभी में दिख रहा है।

            हम जैसे नियमित योग तथा ज्ञान साधक अपने अनुभव के आधार पर योगाभ्यास को जीवन जीने की ऐसी कला मानते हैं जिसका अन्य कोई विकल्प नहीं है।  इसलिये यह अपेक्षा करते हैं कि मध्यप्रदेश के विद्यालयों मेें सूर्य नमस्कार के बाद भी छात्र घर पर इसका अभ्यास कर अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। सभी को विवेकानंद जयंती तथा सूर्य नमस्कार के अभ्यास पर बधाई।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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ताकतवर राष्ट्र के लिये व्यसनों का त्याग जरूरी-हिन्दी चिंत्तन लेख


            भारत एक विशाल प्राकृतिक संपन्न देश है। विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से अनेक बड़े देश हैं पर उनमें प्राकृतिक और मानवीय संसाधन की दृष्टि से अनेक दोष हैं। भारत में सभी प्रकार के खनिज पाये जाते हैं तो जलसंपदा भी यहां बहुत है।  उनके दोहन के लिये जनसंपदा भी कम नहंी है। अनेक देश बड़े हैं और उनकी उनके पास प्राकृत्तिक संपदा भी बहुत है पर जनसंख्या अधिक नहीं है जिससे वह उसका पूर्ण दोहन नहीं कर पाते।  अनेक देशों का क्षेत्रफल बड़ा है पर वहां जमीन में न पानी है  और न ही खनिज संपदा।  उन बड़े  देशों में संपन्नता है पर भारत जैसा अध्यात्मिक ज्ञान नहंी है। भारत विश्व मे अपने अध्यात्मिक ज्ञान के कारण भी जाना जाता है।  यही कारण है कि भारत के विरोधी राष्ट्र उस पर शासन करने के लिये यहां भेदनीति अपनाते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के कारण  आम भारतीय धर्मभीरु व्यक्ति  बौद्धिक रूप से दृढ़ होता है इसलिये यहां के समाज पर शासन सहज नहीं है।  यही कारण है कि यहां नये मानसिक भौतिक तथा मानसिक व्यसन निर्यात किये जाते हैं।

            कार्ल मार्क्स ने कहा था कि धर्म अफीम की तरह होता है।  यह पाश्चात्य विचाराधाराओं पर पूर्णतः सही लगता है भारत में धर्म निजी नियंत्रण बनाये रखना वाला सिद्धांत है।  भारत में विदेशी विचाराधाराओं की तरह मार्क्सवाद भी आया है।  इसके मानने वाले समाज सेवा को व्यसन की तरह करते हैं।  उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन अफीम का तत्व लगता है।  इतना ही नहीं मार्क्स के शिष्य हर विदेशी राजनीतिक, धार्मिक तथा सामाजिक विचार को भारतीय विचाराधाराओं से  श्रेष्ठ मानते हैं।  अंग्रेंजोें ने भारत को गुलाम बनाये रखने के लिये ऐसी शिक्षा पद्धति अपनाई कि आज हर शिक्षार्थी नौकरी यानि गुलामी के लिये तत्पर रहता है।  उससे भी काम न चला तो क्रिकेट जैसा खेल थोप दिया। भारत की बुद्धि का हरण उन्होंने इस कदर किया कि फिल्म और क्रिकेट के नायक यहां भगवत्स्वरूप प्रचारित हो रहे हैं।  प्रचार माध्यम उनकी आड़ में ढेर सारी आय अर्जित कर रहे हैं। धर्म, अर्थ और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय शिखर पुरुष धनार्जन के नशे में लग ेहुए हैं तो आम लोग मनोरंजन के दास हो गये हैं।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

————–

स्फीतं त्रीणि बलं शक्यमाधातुं पानवर्त्मनि।

हृस्वप्रयासव्यायामादितिसैन्यं समुत्पतेत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-शत्रु की सेना अगर बल में अधिक हो तो उसे मद्यपान के व्यसन में लगाकर  व्यायाम में लग होने पर उसे आक्रमण कर दें।

            अभी हाल ही में भारत में बढ़ते मादक द्रव्य पर समाचार आये थे।  चार दिन चर्चा चली पर नतीजा वही ढाक के तीन पात!  अंग्रेजों ने यहां शासन कर यह समझ लिया था कि यहां का अध्यात्मिक ज्ञान जितना प्रबल उतना ही यहा लोग मानसिक रूप से कमजोर है।  उनकी कमजोरियों पर  अनुसंधान के कारण ही यहां के ऋषि, मुनि और तपस्वियों ने महान ज्ञान स्थापित किया। इस ज्ञान के रहते भारतीयों पर शासन कठिन है इसलिये उन्होंने विदेशी विचारधाराऐं यहां प्रवाहित कीं।  अंग्रेजों ने इसलिये ही अपनी शिक्षा पद्धति, खेल तथा मनोरंजन के साधन के रूप में स्थापित किया ताकि यहां से जाने के बाद भी उनका प्रभाव बना रहे।  इधर यह भी चर्चा होती रही कि फिल्मों के प्रदर्शन, क्रिकेट में सट्टे और मादक द्रव्यों से आतंकवादी संगठन पैसा अर्जित कर रहे हैं फिर भी हमारे देश के लोग मनोरंजन के दासत्व से मुक्त नहीं हो पा  रहे।  एक तरह से मद्यपान-फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्य-इस देश पर विदेशी कब्जा हो गया है। हमारा मानना है कि अगर हमारे देश के लोग कम से कम दो वर्ष फिल्म, क्रिकेट और मादक द्रव्यों से दूर रहें तो यहां वातावरण अत्यंत सहज हो जायेगा।  भारत को व्यसनों में धकेलने वाले तब निराश हो कर चुप हो जायेंगे।

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महापुरुष का सम्मान विश्व रत्न के रूप में होता है-हिन्दी चिंत्तन लेख


            यह विचित्र बात है कि जब भी किसी शासकीय पुरस्कार की बात आती है विवाद प्रारंभ हो जाते हैं। देश में केंद्र तथा राज्य सरकारें साहित्य कला तथा खेल के क्षेत्र में पुरस्कार देती रहती हैं।  यह पुरस्कार सम्मानीय लोगों को उनके क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के रूप में दे दिया जाता है-सिद्धांतः ऐसा माना जाता है। यह अलग बात है कि बाद में उन पर अनेक प्रकार के विवाद प्रारंभ हो जाते हैं। हमारे यहां अनेक निजी प्रतिष्ठानों की तरफ से भी प्रदान किये जाने वाले-खासतौर से साहित्य और पत्रकारिता के पुरस्कार-विशुद्ध रूप से प्रबंध कौशल से निर्धारित होते हैं।

            सात वर्ष पूर्व हमारे अध्यात्मिक ब्लॉग पर एक बार एक ब्लॉग मित्र ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि मनुस्मृति पर लिखने के बाद यह आशा आप कभी न करें कि आपका कभी सम्मान नहीं होगा।  हमें हसंी आ गयी।  जब युवावस्था में लिखते थे तो सम्मान की चाह होती थी पर अंतर्जाल पर लिखना प्रारंभ करते समय सम्मान का मोह समाप्त हो चुका था।  हम तो यही मानकर चलते हैं कि दो लोग भी हमारा पढ़कर प्रसन्न हुए तो वही हमारा सम्मान है।  स्थानीय स्तर पर हमसे सम्मान लेने के सर्शत प्रस्ताव आये पर उनमें हमारी रुचि नहीं रही।  इधर अध्ययन चिंत्तन और मनन की सतत प्रक्रिया के साथ ही योगाभ्यास ने हमारे इस दृष्टिकोण को मजबूत कर दिया कि हमारी अपनी सोच भी कम अनोखी नहीं है।  यह लेख हम आत्मप्रवंचन के लिये नहीं लिख रहे वरन् अभी भारत रत्न के लिये श्रीअटल बिहारी वाजपेयी और श्री मदन मोहल मालवीय का नाम चयनित होने पर विवाद हो रहा है।  इस पर जारी चर्चाओं में अनेक लोग कुछ ऐसे महापुरुषों को भारत रत्न न देने पर प्रश्न उठा रहे हैं जो विश्व रत्न हैं-यथा, श्रीगुरू नानक देव, संत कबीर, कविवर रहीम, संत विवेकानद आदि। इस पर केवल हंसा ही जा सकता है।

            वैसे तो श्रीअटल बिहारी वाजपेयी और स्वर्गीय मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न का विरोध करना ही नहीं चाहिये अगर करना ही है तो ऐसे महापुरुषों का नाम नहीं लेना चाहिये जिनकी छवि अध्यात्मिक रूप से इतनी उज्जवल हो कि उन्हें पूरा विश्व ही रत्न मानता है।  इस चर्चा में प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों का दर्द सामने आ ही गया है क्योंकि उनकी दृष्टि से यह दोनों महानुभाव दक्षिणपंथियों के नायक हैं। उनके लिये सबसे ज्यादा दर्दनाक तो इनके साथ जुड़े हिन्दु तत्व जुड़ा होना है जिसे दक्षिण पंथ का पर्याय माना जाता है।  यही वजह है कि कथित प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों में मन में यह टीस तो होगी कि आगामी पांच वर्ष उन्हें अपनी विचारधारा के लिये केंद्रीय सम्मान की आशा छोड़नी पड़ेगी। यह टीस उनके रचनाकर्म को प्रभावित कर सकती है क्योंकि निष्काम कर्म के सिद्धांत की उनको समझ नहीं है जो कि श्रीमद्भागवत गीता उनकी दृष्टि से अध्ययन के लिये वर्जित ग्रंथ है।

            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी हमारे ग्वालियर शहर में ही जन्मे हैं इस कारण उनसे हमारा स्वाभाविक लगाव है।  बाल्यकाल में हमने जिन दो नेताओं का नाम हमने सुना था उनमें एक थे स्वर्गीय प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु अैार जनसंघ के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी।  श्री लालकृष्ण आडवाणी के हम सहभाषी जातीय समुदाय से हैं पर उनका  नाम कम से कम दस वर्ष बाद सुना था। हमारे कुल परिवार के सभी वरिष्ठ सदस्य अटल बिहारी का नाम श्रद्धा से लेते थे।  अनेक लोगों को यह भ्रम है कि सिंधी भाषी होने के कारण इस भाषा जाति के सदस्य इन दोनों महानुभावों की पार्टी के समर्थक रहे हैं पर ऐसी सोच अज्ञान का प्रमाण ही है। यही कारण है कि हम जातिवाद के आधार पर किसी समीकरण पर विचार नहीं करते जैसा कि दूसरे लोग बताते हैं। दरअसल अटल बिहारी की भाषण शैली ऐसी रही है कि उनको किसी भी जाति या भाषा के लोग आत्मीय समझने लगते हैं और यही गुण उनको रत्न रूप प्रदान करता है।

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स्मृतियों और संस्कार एक ही रूप-पतंजलि योग साहित्य


            आमतौर से सामान्य भाषा में स्मृति तथा संस्कार एकरूप नहीं होते।  स्मृतियों को पुराने विषय, व्यक्ति, दृश्य अथवा अनुभूतियों के स्मरण का भंडार माना जाता है जबकि संस्कार मस्तिष्क में स्थापित मानवीय व्यवहार के स्थापित सिद्धांतों के रूप में समझा जाता है। पतंजलि योग का अध्ययन करें तो लगता है कि संस्कार स्मृति का ही एक भाग है।  जीवन व्यवहार के सिद्धांत अंततः स्मृति समूह का ही वह भाग है जो मानव मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

पतंजलि  योग सूत्र  में कहा गया है

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जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।


     हिन्दी में भावार्थ-पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।

     हमइस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होताहै तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों सेस्वाभाविक संपर्क बनते हैं।वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जोउसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हेंस्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों मेंबनी जाती हैं।कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गयेफिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।

      यहीकारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनेबच्चों को अच्छी शिक्षा दें।संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षापर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वहउनका मार्ग प्रशस्त करती है।इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां कीभूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चेके समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्यऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।

      इसलियेहमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भीनिवास बनाने की बात कहीं जाती है।अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस काप्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित करलेते हैं।

      यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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नस्लीय गुणों को धार्मिक पहचान से ढंकने की कोशिश बेकार-पाकिस्तान के पेशावर पर आतंकवादी हमले पर हिन्दी चिंत्तन लेख


            पेशावर में सैन्य स्कूल पर हमले में घायल एक बालक ने पलंग पर सोते हुए दिये गये साक्षात्कार में कहा-‘‘मैं बदला लूंगा। उनकी पूरी नस्ल मिटा दूंगा।’

            वह बालक था जिसमें ऐसे विचार आप नहीं आ सकते।  उसके विचारों में कहीं न कहीं उसके परिवार की सोच परिलक्षित हो रही थी। तय बात है कि उसके माता पिता, दादा दादी, नाना नानी अथवा चाचा चाची में किसी विशेष नस्ल के प्रति दुराग्रह रहा होगा जो उसकी जुबान में प्रकट हो रहा था।  जब वह नस्ल मिटाने की बात कर रहा था तो वह जानता था कि वह जिन्होंने उस पर हमला किया वह किसी दूसरी नस्ल जाति, भाषा या क्षेत्र से जुड़े हैं।  भारतीय प्रचार माध्यम तथा यहां के विद्वान उसके इस वचन से दृष्टि ज्यादा देर तक नहीं रख पाये पर सच यह है कि धार्मिक विचाराधाराऐं क्षेत्र, जाति, भाषा तथा व्यवसायिक आधारों पर बने सामाजिक उपविभाजनों की सत्यता से परे नहीं ले सकीं हैं यह अब प्रमाणित हो गया है।

            मध्य एशिया में आतंकवादियों से निकाह न करने पर 150 महिलाओं को मार दिया गया।  यह खबर पाकिस्तान के पेशावर में आतंकी हमले में 141 बच्चों को मारने की घटना के तत्काल बाद हुई।  दोनों ही घटनाओं में मरने और मारने वाले एक ही धार्मिक विचाराधारा से जुड़े थे-यह तथ्य सतही बौद्धिक चिंत्तन करने वालों के लिये महत्वपूर्ण नहीं हो सकता पर तत्व ज्ञान के साधक इसमें बहुत कुछ देख सकते हैं।  कथित धार्मिक विचाराधाराऐं आकाश से प्रकट बताकर लोगों पर थोपी जाती हैं जबकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों की मानसिकता दूसरी होती है।  हम कहते हैं कि सर्वशक्तिमान ने संसार बनाया है तो याद रखें उसने यहां विभिन्न प्रकार के जलचर, नभचर और थलचर जीवों की रचना की है। आकाश में उड़ने वाले सभी कबूतर नहीं होते वरन, कौआ, चिड़िया, गिद्द तथा उल्लू भी होते हैं। सभी धरती पर आते हैं।  जलचरों में मगरमच्छ भी होते हैं तो मछलियां भी वहां विचरती हैं। जलचर भी कभी धरती पर चले आते हैं।  थलचरों को धरती पर विचरना ही है पर उनमें भी नस्ल होती है-गोरे, काले और गेहुए रंग के चेहरे ही नस्ल की पहचान होते हैं यह आवश्यक नहीं है।  वरन् जलवायु से भी उनमें नस्लीय वैविधता आती है जिसे जानने के लिये तत्व ज्ञान और विज्ञान के सूत्रों की जरूरी है।

            दो नस्लें तो स्पष्ट रूप से ही होती हैं-असुर और दैवीय।  उसके बाद जलवायु के आधार पर विभाजन होते हैं। फिर भाषा, जाति, तथा क्षेत्र के विभाजन भी सामने आते हैं।  कृत्रिम धार्मिक विचाराधाराओं के आधार पर मनुष्य जाति को समूहबद्ध करने की योजनायें काम नहीं करतीं यह अब तय हो गया है। हम यहां धार्मिक विचारधाराओं के आधार पर समूहों को देखने की कोशिश की चर्चा कर रहे हैं जिनके आधार पर मनुष्य समाज को संचालित करने के प्रयास नाकाम हो चुके हैं।  इसके विपरीत इन धार्मिक विचाराधाराओं की रेत में आज के विद्वान शुतुरमुर्ग की तरह  नस्लीय अहंकार की वजह से चल रहे संघर्षों से मुंह छिपा रहे हैं।

            प्रचार माध्यमों में हमलावरों के घटना से पूर्व का चि़त्र देखने से पता चलता है कि वह पाकिस्तान की कथित आधुनिक सभ्रांत सभ्यता से अलग वह प्राचीन पद्धति से जीने वाले लोग हैं। कहने को वह भी पाकिस्तान की राजकीय तौर से मान्यता प्राप्त धार्मिक विचाराधारा को मानने वाले थे पर कहीं न कहीं उनके अंदर अपने साथ अन्याय, भेदभाव तथा सामान्य जीवन सुविधाओं के अभाव के प्रति एक असंतोष था जो इस हमले में रूप में प्रकट हुआ। हमलावरों के समर्थक कहते हैं कि यह वजीरिस्तान में में पाक सेना की हमले का जवाब हैं जिसमें हमारे बच्चे मर रहे हैं।  स्पष्टतः पाकिस्तान के दूर दराज के उन इलाकों पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की नजर नहीं गयी जहां पाकिस्तान का पंजाब में रहने वाला सभ्रांत वर्ग अपना सम्राज्य बनाये रखने के लिये अपनी शक्ति का उपयोग धर्म तथा राज्य के नाम पर कर रहा है। पाकिस्तान में एक तरह से नस्लीय युद्ध चल रहा है।  अगर बालक किसी नस्ल को मिटाने की बात कर रहा है तो कहीं न कहीं वह समूचे पाकिस्तान के सभ्रांत वर्ग मे मौजूद विचार को ही प्रकट कर रहा है जिसके अंदर नस्लीय भाव मौजूद है।

            इससे एक बात तय हो गयी कि मनुष्य की दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति उसका सबसे बड़ा ध्येय होता है। उसमें बाधा पड़ने पर उसमें नाराजगी आती है और तब वह प्रतिकूल होकर कदम उठाता ही है।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में मनुष्य की पहचान बताई गयी है।  यही कारण है कि विश्व में सत्य की निकट सबसे अधिक हमारी ही विचाराधारा मानी जाती है। पाकिस्तान का अस्तित्व चूंकि भारत और यहां से प्रवाहित धर्मों का विरोध पर ही टिका है इसलिये उससे किसी सार्थक बदलाव की आशा करना ही व्यर्थ है। वैसे भी पाकिस्तान एक देश नहीं वरन् विभिन्न नस्लीय समुदायों और भाषाओं के समूहों पर टिका है जिसने धार्मिक विचाराधारा के आधार पर एकरूप बनने का निरर्थक प्रयास किया है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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