संत कबीर के दोहे-कष्ट और कलह की जड़ है गाली देना (gali dena galat-kabir ke dohe


आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।
कहैं कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब गाली आती है तो एक ही होती है पर उसका जवाब देने पर उसकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर कोई मूर्ख आदमी गाली बकता है तो बुद्धिमान का काम है कि वह चुप हो जाये तो एक ही गाली होकर रह जायेगी।

गारी ही से ऊपजै,कलह कष्ट और मीच।
हारि चले जो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गालियां बकने से ही कलह और कष्ट पैदा होता है। गाली सुनकर जो उसका जवाब न दे वह संत और जो लड़ मरे वह नीच है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-गालियां देना एक तरह से फैशन हो गया है। अपढ़ या गंवार ही नहीं बल्कि जिनको शिक्षित और सभ्य समझा जाता है वह लोग भी आपसी बातचीत में गालियों का प्रयोग करते हैं। कई बार तो वार्तालाप के दौरान ही लोग अनावश्यक रूप से गालियां प्रयोग करते हुए इस बात का उनको आभास तक नहीं होता कि उससे उनका पूरा वाक्य अर्थहीन हो जाता है। श्रोता का दिमाग गाली सुनकर उसी पर केंद्रित हो जाने के कारण वाक्य के अन्य शब्दों का अर्थ समझने में असमर्थ रहता है या उनका उसकी दृष्टि में महत्व कम हो जाता है।
इसके अलावा अधिकतर वाद विवाद हिंसा में इसलिये ही बदल जाते हैं कि गालियों का प्रयोग प्रारंभ होने से दोनों पक्ष अपना संयम खो बैठते हैं। अगर एक आदमी गाली देता है तो उसके प्रत्तयुत्तर में दूसरा भी गाली देता है और इस तरह उनकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर गाली का जवाब नही दिया जाये तो वह एक ही होकर रह जाती है। गाली देने वाला मूर्ख और उसे सुनकर जवाब न देने वाला संत ही कहा जाता है।
कुछ लोगों की आदत होती है कि वह आपसी बातचीत में गालियाँ अनावश्यक रूप से प्रयोग करते हैं। ऐसे लोगों की बातचीत की गंभीरता को स्वयं ही समाप्त करते हैं।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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