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अल्पायु में मौत की बढ़ती घटनायें चिंता का विषय-हिन्दी लेख


                      आमतौर से बड़ी आयु में मौत होना ही स्वाभाविक माना जाता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य राजरोगों से एक सामान्य मनुष्य एक आयु तक स्वयं ही लड़ लेता है पर बड़ी उम्र होने पर वह हथियार डाल देता है। अब छोटी आयु में मौतें भी अधिक होने लगी हैं जिस पर शायद ही कोई अधिक चिंतित होता हो।  सड़क हादसों में अनेक युवा काल कवलित होते देखे गये हैं।  अगर बड़ी आयु के लोग अपनी स्मरण शक्ति पर बोझ डालें तो उन्हें लगेगा कि अपनी युवा अवस्था से अधिक उम्र के इस पड़ाव अनेक  गोदें सूनी होते देख रहे हैं।   बहरहाल तीस से चालीस के बीच अगर सड़क हादसे की बजाय बीमारी से किसी की मौत हो तो अब भी स्वाभाविक मानना कठिन लगता है पर जिस तरह तंबाकू के पाउचों का प्रचलन हुआ है उस पर अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। अनेक लोग तो इन पाउचों को धीमे विष जैसा मानते हैं। ऐसे में जागरुक लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिये।

                              इस लेखक ने एक चिकित्सक मित्र को एक अस्वस्थ युवक के पिता से यह कहते सुना था कि‘अगर तुम्हारा लड़का इस पाउच का सेवन बंद नहीं करता तो समझ लेना कि वह तुम्हें दुनियां का सबसे बड़ा दर्द देने वाला है।’ अतः यह जरूरी है कि इस विषय पर गंभीरता से अनुसंधान कर लोगों को जानकारी दी जाये।

                              शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी। इस लेखक के एक मित्र न मात्र 42 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से दम तोड़ा होगा।  वह ऐसे पाउचों का सेवन करता था।  उससे एक दो वर्ष पूर्व एक लड़के ने इन पाउचों के सेवन का दुष्परिणाम बताया था। उसने पाउच की पूरी सामग्री एक ग्लास में भरते हुए पानी के साथ ही चार आल्पिनें उसमें डाल दीं। सुबह वह चारों आल्पिने गुम थीं।  मित्र की  मौत के बाद इस लेखन ने कम उम्र में हृदयाघात से मरने वालों की जानकारी लेना प्रारंभ किया।  दस में से सात इसके सेवन में लिप्त पाये गये। पिछले बीस पच्चीस वर्ष से यह पाउच प्रचलन में आया है इसलिये अनेक बड़ी आयु के भी इसका शिकार होते हैं तो बड़ी बात नहीं पर चूंकि उनकी मौत स्वाभाविक मानी जाती है इसलिये कोई चर्चा नहीं करतां।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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पूजा पर एकता भाषा में अनेकता-हिन्दी लेख


                                   इधर गणेशचतुर्थी का पर्व आया और उधर महाराष्ट्र में एक  बार फिर हिन्दी मराठी भाषा विवाद प्रारंभ हो गया।  इस समय हमारे देश में महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध तथा आतंकवाद के विषय इतने विस्फोटक हैं कि हर प्रदेश का हर भाषी सामान्य नागरिक चिंतित है। जिन लोगों के पास समस्याओं से निपटने की दायित्व है उनके पास कोई योजना नहीं है पर अपनी आवश्यकता बनाये रखने के लिये वह वर्ग, वर्ण और भाषा के समूहों को आपसी विवाद में फंसाये रखने का प्रयास करते हैं। करना कुछ नहीं चाहते या कर नहीं सकते पर अपनी जिम्मेदारी से बचने के ढेर सारे बहाने उनके सामने होते हैं। इस पर ट्विटर पर कुछ लिखा वह यहां प्रस्तुत है।

                भारतराष्ट्र और हिन्दीभाषा की अस्मिता नहीं बची तो किसी भी प्रदेश वह किसी भी उसकी भाषा की अस्मिता बच नहीं सकती। श्रीमद्भागवतगीता की शब्द रचना में श्रीगणेश जी के योगदान के लिये उनका नमन। उन्हें इष्ट मानने वालों का भी अभिनंदन। भगवानगणेशजी ने श्रीगीता में वेदव्यास की वाणी को शब्द रूप देकर भारतीय अध्यात्मिक पर्वत की स्थापना की जहां से अलौकिक ज्ञानगंगा आज भी अविरल प्रवाहित है। श्रीगणेशजी विद्वता के प्रतीक हैं और उनके सच्चे भक्त सहजभावी होते हैं। समाज में भेद लाने वाले तो केवल पाखंडी होते हैं। श्रीगणेशजी की हस्तलिपि में रचित श्रीमद्भागवत गीता में किसी के रोजगार का हरण करना आसुरी वृत्ति माना गया है। हिन्दी मराठी भाषाविवाद पैदा करने वाले श्रीगणेशजी की हस्तलिपि वाली गीता देखें जिसमें किसी का रोजगारका हरण पाप बताया गया है। भारत में जनसपंर्क की दृष्टि से अब केवल हिन्दी भाषा ही हो सकती है अगर इस सत्य को स्वीकार नहीं किया जाता तो वह समाज के लिये आत्मघाती होगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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श्रीमद्भागवतगीता केअध्ययन से अपना हृदय शुद्ध करना ही पर्याप्त-हिन्दी लेख


                                   श्रीमद्भागवतगीता पर लिखने और बोलने वाले यह हमेशा देख लिया करें कि उनके शब्द श्रीकृष्ण के मतानुसार जस की तस है कि नहीं। इस लेखक ने योग साधना का अभ्यास करते करते जब श्रीमद्भागवतगीता का अध्ययन प्रारंभ किया तब एक ज्ञानी मित्र ने सलाह दी कि श्रीगीता की पुस्तक वह लेना जिसमें महात्म्य न हो इससे अध्ययन में सुविधा होगी। महात्मय वाली कथायें किसी पाठ का महत्व तो बताती हैं पर वास्तविक ज्ञान विस्मृत कर देती हैं।

                                   उसकी बात मानकर जब केवल संदेशों वाली गीता खरीद करअध्ययन किया तब से उस मित्र को हर मुलाकात में धन्यवाद देते हैं।  श्रीमद्भागवतगीता में इस संसार का रहस्य  बताने के साथ ही उसे पार करने की कला भी बतायी गयी है। संभव है यह इस लेखक का अल्पज्ञान हो फिर जब भी कहीं गीता का नाम लेकर अच्छी बात कही जाती है तो ऐसा लगता है कि वह तोड़मरोड़कर पेश की गयी है। सच बात तो यह है कि गीता में किसी काम को अच्छा या बुरा नहीं कहा गया है बल्कि उसमें कर्म और उसका परिणाम का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। उसके अनुसार आप जैसा जीवन जीना चाहते हैं उसके अनुसार अपने हृदय में संकल्प स्थापित करें। फिर उसके अनुसार आचरण करें।  आप लोगों के लिये हृदय में सद्भाव रखेंगे तो वह भी रखेंगे।  आप दूसरे से मधुर व्यवहार करेंगे तो दूसरा भी करेगा पर यह बातें स्पष्ट रूप से नहीं कही गयी है। गीता में कहीं भी नहीं कहा गया कि कर्म  ही मेरी पूजा है-उसमें निष्काम कर्म का सिद्धांत है जिसे व्यापक अर्थों मे समझने की आवश्यकता है। गीता में दया करने के स्पष्ट संदेश की बजाय  निष्प्रयोजन दया का सिद्धांत है   जिसे आमतौर से  गीतावाचक स्पष्ट नहीं कर पाते।

                                   गीता में सहज जीवन के लिये नारे नहीं वरन् संदेश हैं जिन पर चलने पर ही आनंद का अनुभव होता है। अगर हम कहते हैं गीता में सभी पर दया दिखाने, सभी से  मधुर बोलने, सभी को समान समझने तथा सभी का हित करने के लिये कहा गया है तो तय बात है कि हमने गीता का सार नहीं समझा।  गीता के आधार पुरुष श्रीकृष्ण का मंतव्य यह है कि सत्कर्म कर मनुष्य किसी पर अहसान नहीं करता वरन् अपने लिये सहज वातावरण बनाता है। जब हम दूसरे पर दया करने की बात कहते हैं तो हम सामने वाले को शक्तिशाली होने की अनुभूति भी कराकर उसमें अहं पैदा करते हैं जो गलत है, जबकि श्रीगीता के अनुसार तो हर मनुष्य गुणों के वशीभूत एक कमजोर जीव है-यही बात समझाने की है। मनुष्य सत्कर्म से किसी की सहायता नहीं करता वरन् अपना उद्धार करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण का मंतव्य है-ऐसा गीता में स्पष्ट नहीं कहा गया पर हम भक्ति भाव से गीता का अध्ययन करने के बाद ऐसा समझ पाये हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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भक्तों को भोला या मूर्ख समझना अज्ञानता का प्रमाण-हिन्दी चिंत्तन लेख


                                   11 किलो सोने के आभूषण पहनने वाला एक बाबा 25 सुरक्षाकर्मियों के साथ चलता है तो एक कथित महिला धार्मिक संत बिकनी पहनकर फोटा खिंचवाती है़।  दोनों के पास कथित रूप से भक्तों का जमावड़ा है पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारतीय धर्म के लोग मूर्ख हैं।  इस तरह तो हम उन लोगों को भी मूर्ख कह सकते हैं जो फिल्मों में पैसा खर्च कर मनोरंजन करने जाते हैं।  दरअसल हर मनुष्य में मनोरंजन की भूख होती है और धर्म की आड़ में आकर्षण पैदा कर अपनी रोजी रोटी चलाने वाले उसका लाभ उठाते हैं।  यह बुरा है या अच्छा यह अलग से चर्चा का विषय है पर इतना तय है कि अध्यात्मिक ज्ञानी ऐसे लोगों के पास जाने वालों  को मूर्ख या भोला नहीं मानते।

                                   भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि भक्त चार प्रकार के होते हैं-अर्थार्थी, आर्ती, जिज्ञासु और ज्ञानी। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ज्ञानी भक्त ही मुझे सबसे प्रिय हैं। ज्ञानी ऐसे संतों के पास नहीं जाते पर निरंकार का उपासक होने के बावजूद कभी कभी ज्ञानार्जन और भक्ति के लिये साकार भक्ति के उपासना स्थल पर चले जाते है। । जहां तक धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वालों की बात है तो सच तो यह है कि राजसी वृत्ति के लोग अपने काले धंधे ऐसे ही लोगों के नाम पर कर रहे हैं जो उनके सामने किराये की भीड़ लगाकर उनके प्रचार का काम करते हैं। इसी प्रचार से अनेक लोग यह तमाशा देखने की इच्छा से चले जाते हैं।

                                   कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे संतों पर चाहे जैसी टिप्पणियां कर लें पर भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा मानने वालों को भोला या मूख कतई न कहें। जो कहेगा हमारी दृष्टि से अज्ञानी होगा।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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बेहतर #राज्यप्रबंध की जरूरत को समझना जरूरी-#हिन्दीलेख


                                   15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस 2015 को मनाया जायेगा। इस अवसर पर टीवी तथा अन्य प्रचार माध्यमों में  वास्तविक स्वतंत्रता या आजादी पर चर्चा सुनने का मौका भी मिलेगा। इस विषय पर पुराने तर्क या इतिहास सुनाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गांधीजी के अनेक भक्त मानते हैं कि अभी स्वतंत्रता या आजादी मिलना बाकी है। गांधी भक्तों में वर्तमान काल के सबसे ज्यादा लोकप्रिय समाज सेवी श्री अन्ना हजारे भी मानते हैं सच्ची आजादी मिलना अभी शेष है। जिस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये गांधीजी के नेतृत्व मे आंदोलन चला वैसे ही आंदोलन आज भी हो रहे हैं। यह अलग बात है कि उस तरह के आंदोलन किसान, छात्र तथा महिलाओं के हितों की रक्षा को लेकर होते हैं पर उनके संचालन वही अहिंसक रूप है जैसा गांधीजी ने बनाया था। इससे एक बात तो निश्चित कही जा सकती है कि जैसी कल्पना स्वतंत्रता के बाद सर्वजनहिताय राज्य प्रबंध व्यवस्था की कल्पना देश भक्त दीवानों ने की थी वैसा हो नहीं पाया।

                                   आमतौर से भारत में महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के विषय पर  अर्थशास्त्री अपने अपने ढंग से वक्तव्य देते हैं पर सच यह है कि यह समस्यायें नहीं वरन  हमारे देश में व्याप्त अकुशल प्रबंध की समस्याओं के परिणाम है।  हमने देखा है कि हमारे देश में कोई अपराधिक घटना होती है तो उसे रोकने के लिये नया कानून बनता है जबकि विशेषज्ञ कहते हैं कि पुराने कानूनों पर ही अमल किया जाये तो बढ़ते अपराधों से छुटकारा मिलता है। समस्या यह नहीं है कि किसी अपराध के विरुद्ध कानून नही है वरन् उसे अमल में लाने की व्यवस्था में दोष है जिससे अपराधी निशंक रहते हैं।  हमारे देश मेें जल, अन्न और खनिज संपदा का अपार भंडार है पर वितरण में कुशल प्रबंध व्यवस्था की अभाव में धन का असमान वितरण से गरीब और अमीर के बीस भारी अंतर की स्थिति बन गयी है। हैरानी की बात है कि किसी अर्थशास्त्री ने कभी अकुशल प्रबंध की समस्या से निजात पाने के उपाय नहीं बताये।

                                   राज्य प्रबंध एक गंभीर विषय है पर लगता नहीं है कि अंग्र्रेजों की गुलामी करते हुए यह बात हम समझ पाये। अंग्रेजों से वस्तुओं के भोग के तरीके तो सीख लिये पर सृजन का योग नहीं सीखा। नतीजा वही होना था जो सामने है। 15 अगस्त पर अनेक प्रकार की चर्चायें होंगी और हम यह देखना चाहेंगे कि क्या कोई इस अकुशल प्रबंध की समस्या पर कोई गंभीर विचार रखता है या नहीं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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टीवी का नहीं अपना रिमोट भी हाथ में रखेें-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              टीवी का रिमोट आपके हाथ में है, आपका स्वयं का रिमोट आपके आज्ञा चक्र-भृकुटि, नाक के ठीक ऊपर-होता है। टीवी पर किसी चैनल के बदलने से आपके मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है जरा गौर फरमायें।

                              आज यह लेखक सत्संग से लौटा। कुछ देर शवासन के बाद टीवी खोला। मन में विचार आया कि शवासन करते हुए चलो  मनोरंजन के लिये समाचार सुन लें।  जिस टीवी चैनल को खोला वहां एक फांसी प्राप्त व्यक्ति के-मृत्यु के बाद आदमी अपने अपराधों से मुक्त हो जाता है इसलिये उसके लिये कोई कड़ा शब्द लिखना ठीक नहीं है-समर्थक एक धार्मिक राजनीतिक नेता का चेहरा दिखाई दिया।  समझ में आया कि यह इन्हीं क्लेशी महाशय के सहारे इस रविवार को  आकर्षक-सुपर संडे (super sunday)-का रूप प्रदान करेंगे। थोड़ी देर में मन में कांटे चुभते लगे। तब हमने चैनल बदला तो उस पर महामृत्यंजय जाप का संगीत के साथ प्रसारण हो रहा था।  हम फिर शवासन में चले गये। उस जाप से मन आनंदित हो उठा। वाह क्या बात है?

                              कंप्यूटर पर बैठते ही यह विषय मन में आया कि टीवी के रिमोट से ज्यादा शक्तिशाली तो स्वयं का ही रिमोट है जो नाक के ठीक ऊपर लगा हुआ है। अक्सर हम ध्यान करते हैं और उसमें आनंद भी मिलता है।  निर्बीज ध्यान में समस्त विषयों से परे हो जाते हैं तब अध्यात्मिक आनंद आता है।  कभी कभी न चाहते हुए भी सबीज ध्यान लग जाता  है।  चाहे जैसा भी लगे सह अनुभव करना चाहिये कि  ध्यान में अपने रिमोट की स्वतः  साफ सफाई हो रही है। पहले हमें तय करना चाहिये कि चाहते क्या हैं? आज्ञा चक्र प्रभावशाली-विकार रहित-होगा तब हमें सुख की चाहत परेशान नहीं करती क्योंकि तब उसका वही बटन दबता है जो उस स्थान की तरफ ले जाता है जहां आनंद मिलता है।  जहां बेजान पड़ा है वहां वह बटन तो स्वत दबा रहता है जो क्लेश की तरफ मन को ले जाता है।

                              आखिरी बात कोई बतायेगा कि रिमोट को हिन्दी में क्या कहते हैं?

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सभी को मानसिक रूप से गुलाम समझना गलत-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              अंग्रेजी संस्कारों ने हमारे देश में रविवार को सामान्य अवकाश का दिन बना दिया है। रविवार के दिन सुबह भजन या अध्यात्मिक सत्संग प्रसारित करने वाले टीवी चैनल खोलकर देखें तो वास्तव में शांति मिलती है। चैनल ढूंढने  के लिये रिमोट दबाते समय अगर कोई समाचार चैनल लग जाये तो दिमाग में तनाव आने लगता है-उसमें वही भयानक खबरें चलती हैं जो एक दिन पहले दिख चुकी हैं- और जब तक मनपसंद चैनल तक पहुंचे तक वह बना ही रहता है।  बाद में भजन या सत्संग के आनंद से मिले अमृत पर ही उस तनाव का निवारण हो पता है।

                              वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार सभी दिन हरि के माने जाते हैं पर अंग्रेजों ने गुलामी से मुक्ति देते समय शिक्षा, राजकीय प्रबंध व्यवस्था तथा रहन सहन के साथ ही भक्ति में भी अपने सिद्धांत सौंपे जिसे हमारे सुविधाभोगी शिखर पुरुषों से सहजता से स्वीकार कर लिय।  जैसा कि नियम है शिखर पुरुषों  का अनुसरण  समाज करता ही है।  हमें याद है पहले अनेक जगह मंगलवार को दुकानें बंद रहती थीं।  वणिक परिवार का होने के नाते मंगलवार हमारा प्रिय दिन था।  बाद में चाकरी में रोटी की तलाश शुरु हुई तो रविवार का दिन ही अध्यात्मिक के लिये मिलने लगा।  इधर हमारे धार्मिक शिखर पुरुषों-उनके अध्यात्मिक ज्ञानी होने का भ्रम कतई न पालें-ने जब देखा कि उनके पास आने वाली भीड़ में नौकरी पेशा तथा बड़ा व्यवसाय या उद्योग चलाने वाले ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो रविवार के दिन ही  अवकाश लेते हैं तो उन्होंने उसे ही मुख्य दिवस बना दिया।

                              इधर प्रचार माध्यम भी रविवार के दिन ‘सुपर संडे’ बनाने का प्रयास करते हैं और उनके स्वामियों के प्रायोजित अनेक संगठन इसी दिन कोई प्रदर्शन आदि कर उनके लिये प्रचार सामग्री बनाते हैं या फिर कोई बंदा सनसनीखेज बयान देता है जिससे उन्हें सारा दिन प्रचारित कर बहस चलाने का अवसर मिल जाता है।  अन्ना आंदोलन और चुनाव के दौरान इन प्रचार माध्यमों को ऐसे अवसर खूब मिले पर अब लगता है कि अब शायद ऐसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी महिलाओं के प्रति धटित अपराध अथवा धार्मिक नेताओं के बयानों से यह अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री निकालने का प्रयास कर रहे हैं। यह अलग बात कि जम नहीं पा रहा है।

                              इधर बाहुबली फिल्म की सफलता के अनेक अर्थ निकाले जा रहे हैं।  यह अवसर भी प्रचार माध्यम स्वयं देते है-यह पता नहीं कि वह अनजाने में करते हैं या जानबुझकर-जब बॉलीवुड के सुल्तान और बादशाह से बाहूबली फिल्म के नायक की चर्चा कर रहे हैं। तब अनेक लोगों के दिमाग में यह बात आती तो है कि अक्षय कुमार, अजय देवगन, सन्नी देयोल, अक्षय खन्ना और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेता भी हैं जो फिल्म उद्योग को भारी राजस्व कमा कर देते हैं।  अक्षय कुमार के लिये इनके पास कोई उपमा ही नहीं होती।  यह अभिनेता अनेक बार आपस में काम कर चुके हैं पर उसकी चर्चा इतने महत्व की नहीं होती जैसी सुल्तान और बादशाह के आपस में अभिवादन करने पर ही हो जाती है।  अंततः फिल्म और टीवी भावनाओं पर ही अपना बाज़ार चमकाते हैं और इससे जुड़े लोगों का पता होना चाहिये कि उनके इस तरीके पर समाज में जागरुक लोग रेखांकित करते हैं।  सभी तो उनके मानसिक गुलाम नहीं हो सकते। हम ऐसा नहीं सोचते पर ऐसा सोचने वाले लोगों की बातें सुनी हैं इसलिये इस विशिष्ट रविवारीय लेख में लिख रहे हैं।

हरिओम, जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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राजसी कर्म से अहंकार और क्रोध गुण जुड़ा ही है-हिन्दी चिंत्तन लेख


             अध्यात्मिक दर्शन का संबंध आंतरिक मनस्थिति से है। उसके ज्ञान से  व्यक्ति सात्विक भाव धारण करता है या फिर इस संसार में विषयों से सीमित संबंध रखते हुए योग भाव को प्राप्त होता है।  एक बात तय रही कि दैहिक विषयों से राजसी भाव से ही  राजसी कर्म के साथ संपर्क रखा जा सकता है। ज्ञान होने पर व्यक्ति अधिक सावधानी से राजसी कर्म करता है और न होने पर वह उसके लिये परेशानी का कारण भी बन जाता हैं।  हम देख यह रहे है कि लोग अपने साथ उपाधि तो सात्विक की लगाते हैं पर मूलतः राजसी प्रवृत्ति के होते हैं। ज्ञान की बातें आक्रामक ढंग से इस तरह करेंगे कि वह उन्हीं के पास है पर उनमें धारणा शक्ति नाममात्र की भी नहीं होती और राजसी सुख में लिप्त रहते हैं। राजसी कर्म और उसमें लिप्त लोगों में लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अतः उनसे सात्विक व्यवहार करने और विचार रखने की आशा करना ही अज्ञान का प्रमाण है। सात्विकता के साथ राजसी कर्म करने वालों की संख्या नगण्य ही रहती है।

                      धर्म, अर्थ, समाज सेवा, पत्रकारिता और कला क्षेत्र में धवल वस्त्र पहनकर अनेक लोग सेवा का दावा करते हैं। उनके हृदय में शासक की तरह का भाव रहता है। स्वयंभू सेवकों की भाषा में अहंकार प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। प्रचार में विज्ञापन देकर वह नायकत्व की छवि बना लेते हैं।  शुल्क लेकर प्रचार प्रबंधक जनमानस में उन्हें पूज्यनीय बना देते हैं। कुछ चेतनावान लोग इससे आश्चर्यचकित रहते हैं पर ज्ञान के अभ्यासियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। राजसी कर्म में लोग फल की आशा से ही लिप्त होते हैं-उनमें पद, प्रतिष्ठा पैसा और प्रणाम पाने का मोह रहता ही है। हमारे तत्वज्ञान के अनुसार यही सत्य है।

                  सामान्य जन उच्च राजसी कर्म और पद पर स्थित शिखर पुरुषों से सदैव परोपकार की आशा करते हैं पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस संसार में सभी मनुष्य अपने और परिवार के हित के बाद ही अन्य बात सोचते हैं। परोपकार की प्रवृत्ति सात्विक तत्व से उत्पन्न होती है और वह केवल अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली मनुष्यों में संभव है। सात्विक लोगों में बहुत कम लोग ही राजसी कर्म में अपनी दैहिक आवश्यकता से अधिक संपर्क रखने का प्रयास करते हें। उन्हें पता है कि व्यापक सक्रियता काम, क्रोध, मोह लोभ तथा अहंकार के पंचगुण वाले  मार्ग पर ले जाती है। ऐसे ज्ञान के अभ्यासी कभी भी राजसी पुरुषों की क्रियाओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी नहीं करते क्योंकि उनको इसका पता है कि अंततः सभी की देह त्रिगुणमयी माया के अनुसार ही संचालित होती है। उनके लिये अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को वह राजसी कर्म से उत्पन्न गुण ही मानते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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भारत और चीन अध्यात्मिक दृष्टि से मित्र राष्ट्र हैं-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


       प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन तथा मंगोलिया यात्रा में भगवान बुद्ध तथा उनके चरित्र की चर्चा का राजनीतिक रूप से कोई महत्व अभी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है लेकिन वैश्विक पटल के ऊपर इसके प्रभाव कालांतर में अप्रत्याशित रूप से दिखेंगे। चीन में सबसे अधिक बुद्ध धर्म मानने वाले हैं पर वैश्विक पर्दे पर वह वामपंथी विचाराधारा का प्रतीक बना रहा। अहिंसा के सबसे बड़े प्रवर्तक भगवान बौद्ध की विश्व में उस तरह चर्चा नहीं हुई जितनी पश्चिम धर्म प्रवर्तकों की दिखती रही। पश्चिम के दोनों धर्मो की चर्चा खूब हुई पर बुद्ध धार्मिक विचाराधारा का प्रवाह अपेक्षा के अनुकूल नहीं हुआ। चीन से अनेक लोग विदेश गये पर अपनी धार्मिक पहचान का महत्व साथ नहीं लाये। इससे तो हिन्दू धार्मिक लोग बेहतर रहे जिन्होंने विश्व में अपनी धार्मिक  पहचान कम नहीं होने दी।

        हमारा अनुमान है कि जिस तरह चीन की जो राजकीय विचाराधारा रही है उसमें धर्म अध्यात्म का कोई महत्व नहीं रहा और अभी तक वहां  के लोगों ने शायद ही कभी अपने राजपुरुषों की मंदिर में उपस्थिति की तस्वीर देखी हो पर श्रीनरेद्रमोदी की यात्रा ये यह अवसर उन्हें मिला। विश्व पटल पर चीन के राजपुरुषों की मंदिरों में श्रीमोदी के साथ उपास्थिति वहां के देश की अध्यात्मिक छवि भी बना सकती है। अंततः यह बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक होकर उसका विस्तार कर सकती है। सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दू तथा बौद्ध की संयुक्त  छवि विश्व में प्रचारित पश्चिमी धर्मो के लिये चुनौती बन सकती है। अभी तक यह देखा गया है कि एक धर्म से दूसरे धर्म में जाने की पंरपरा अधिक रही है। बौद्ध तथा हिन्दू धर्म की संयुक्त छवि न होने से पश्चिम में लोगों के पूर्वी धर्म कभी आकर्षक विकल्प नहीं बने जो अब संभावना बन सकती है। मुख्य बात यह कि भारतीय अध्यात्म्कि दर्शन अधिक तेजी से वैश्विक पटल पर छा सकता है जो पश्चिम के दो धर्मों के आपसी संघर्ष के बीच तीसरी विचाराधारा के रूप पहले से ही मौजूद है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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रहीम के दोहेः विनम्रता का गुण ही पहचान है शक्ति का


रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभू की धाक
दांत दिखावत दी ह्यै, चलत घिसावत नाक

कविवर रहीम जी के मतानुसार हाथी के समान किसी में बल नहीं है पर वह भी भगवान की शक्ति को मानता है और अपनी नाक जमीन पर रगड़ता हुआ चलता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यहां रहीम ने विनम्रता के गुण का बखान किया है। भौतिकतावाद ने लोगों के संस्कारों को एकदम नष्ट कर दिया है। यही कारण है कि लोगों मेें अहंकार की प्रवृत्ति भयानक रूप से बढ़ गयी है। अपने आगे कोई किसी को समझता ही नहीं। सभी अपना सिर उठाये ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि उनके पास ही सारी दुनियां के सुख साधन हैं। हालत यह है कि सुविधाओं की उपलब्धि के कारण शारीरिक व्यायाम तो कम हो गया है पर किसी को पकड़ कर जमीन पर पटकने की प्रवृत्ति जोर मारने लगी है। ताकत कम गुस्सा ज्यादा मार खाने की निशानी। यही कारण है कि छोटा हो या बड़ा किसी में सहनशीलता नहीं है। जहां देखो वही झगड़े पर आमदा लोग देखे जा सकते हैं। बातचीत में विनम्रता तो है ही नहीं। सभी के शब्दों में अहंकार भरा पड़ा है।

हाथी जो सभी जीवों में शक्तिशाली है वह जमीन पर सूंढ़ को रगड़ता हुआ चलता है। यह इस बात का प्रमाण है कि शक्तिशाली व्यक्ति को विनम्र होना चाहिये। जिसमें विनम्रता नहीं है वह शक्तिशाली नहीं होता। बरगत को पेड़ झुका है तभी किसी को छाया दे पाता है। यानि शक्तिशाली लोग दूसरों को आसरा देते हैं न कि किसी को डरा घमका कर काम चलाते हैं। अगर कोई अकड़ दिखाता है समझ लो कि वह कमजोर आदमी है और उससे संपर्क रखना ही गलत है। अगर कोई विनम्रता से व्यवहार कर रहा है तो समझ लो कि वह शक्तिशाली है और ऐसे व्यक्ति से संपर्क बढ़ाने से जीवन में सहयोग की आशा भी की जा सकती है। एक बात और है कि अगर हमारे अंदर कोई विशेष गुण या वस्तु है तो उसका भी अहंकार न कर दूसरों के साथ उसका लाभ बांटना चाहिये। यही होता है आदमी की शक्ति का प्रमाण कि वह दूसरे में हौंसला और विश्वास बढ़ाये न कि उसे गिराये।
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