पूजा पर एकता भाषा में अनेकता-हिन्दी लेख


                                   इधर गणेशचतुर्थी का पर्व आया और उधर महाराष्ट्र में एक  बार फिर हिन्दी मराठी भाषा विवाद प्रारंभ हो गया।  इस समय हमारे देश में महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध तथा आतंकवाद के विषय इतने विस्फोटक हैं कि हर प्रदेश का हर भाषी सामान्य नागरिक चिंतित है। जिन लोगों के पास समस्याओं से निपटने की दायित्व है उनके पास कोई योजना नहीं है पर अपनी आवश्यकता बनाये रखने के लिये वह वर्ग, वर्ण और भाषा के समूहों को आपसी विवाद में फंसाये रखने का प्रयास करते हैं। करना कुछ नहीं चाहते या कर नहीं सकते पर अपनी जिम्मेदारी से बचने के ढेर सारे बहाने उनके सामने होते हैं। इस पर ट्विटर पर कुछ लिखा वह यहां प्रस्तुत है।

                भारतराष्ट्र और हिन्दीभाषा की अस्मिता नहीं बची तो किसी भी प्रदेश वह किसी भी उसकी भाषा की अस्मिता बच नहीं सकती। श्रीमद्भागवतगीता की शब्द रचना में श्रीगणेश जी के योगदान के लिये उनका नमन। उन्हें इष्ट मानने वालों का भी अभिनंदन। भगवानगणेशजी ने श्रीगीता में वेदव्यास की वाणी को शब्द रूप देकर भारतीय अध्यात्मिक पर्वत की स्थापना की जहां से अलौकिक ज्ञानगंगा आज भी अविरल प्रवाहित है। श्रीगणेशजी विद्वता के प्रतीक हैं और उनके सच्चे भक्त सहजभावी होते हैं। समाज में भेद लाने वाले तो केवल पाखंडी होते हैं। श्रीगणेशजी की हस्तलिपि में रचित श्रीमद्भागवत गीता में किसी के रोजगार का हरण करना आसुरी वृत्ति माना गया है। हिन्दी मराठी भाषाविवाद पैदा करने वाले श्रीगणेशजी की हस्तलिपि वाली गीता देखें जिसमें किसी का रोजगारका हरण पाप बताया गया है। भारत में जनसपंर्क की दृष्टि से अब केवल हिन्दी भाषा ही हो सकती है अगर इस सत्य को स्वीकार नहीं किया जाता तो वह समाज के लिये आत्मघाती होगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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