Tag Archives: family

अल्पायु में मौत की बढ़ती घटनायें चिंता का विषय-हिन्दी लेख


                      आमतौर से बड़ी आयु में मौत होना ही स्वाभाविक माना जाता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य राजरोगों से एक सामान्य मनुष्य एक आयु तक स्वयं ही लड़ लेता है पर बड़ी उम्र होने पर वह हथियार डाल देता है। अब छोटी आयु में मौतें भी अधिक होने लगी हैं जिस पर शायद ही कोई अधिक चिंतित होता हो।  सड़क हादसों में अनेक युवा काल कवलित होते देखे गये हैं।  अगर बड़ी आयु के लोग अपनी स्मरण शक्ति पर बोझ डालें तो उन्हें लगेगा कि अपनी युवा अवस्था से अधिक उम्र के इस पड़ाव अनेक  गोदें सूनी होते देख रहे हैं।   बहरहाल तीस से चालीस के बीच अगर सड़क हादसे की बजाय बीमारी से किसी की मौत हो तो अब भी स्वाभाविक मानना कठिन लगता है पर जिस तरह तंबाकू के पाउचों का प्रचलन हुआ है उस पर अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। अनेक लोग तो इन पाउचों को धीमे विष जैसा मानते हैं। ऐसे में जागरुक लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिये।

                              इस लेखक ने एक चिकित्सक मित्र को एक अस्वस्थ युवक के पिता से यह कहते सुना था कि‘अगर तुम्हारा लड़का इस पाउच का सेवन बंद नहीं करता तो समझ लेना कि वह तुम्हें दुनियां का सबसे बड़ा दर्द देने वाला है।’ अतः यह जरूरी है कि इस विषय पर गंभीरता से अनुसंधान कर लोगों को जानकारी दी जाये।

                              शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी। इस लेखक के एक मित्र न मात्र 42 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से दम तोड़ा होगा।  वह ऐसे पाउचों का सेवन करता था।  उससे एक दो वर्ष पूर्व एक लड़के ने इन पाउचों के सेवन का दुष्परिणाम बताया था। उसने पाउच की पूरी सामग्री एक ग्लास में भरते हुए पानी के साथ ही चार आल्पिनें उसमें डाल दीं। सुबह वह चारों आल्पिने गुम थीं।  मित्र की  मौत के बाद इस लेखन ने कम उम्र में हृदयाघात से मरने वालों की जानकारी लेना प्रारंभ किया।  दस में से सात इसके सेवन में लिप्त पाये गये। पिछले बीस पच्चीस वर्ष से यह पाउच प्रचलन में आया है इसलिये अनेक बड़ी आयु के भी इसका शिकार होते हैं तो बड़ी बात नहीं पर चूंकि उनकी मौत स्वाभाविक मानी जाती है इसलिये कोई चर्चा नहीं करतां।

—————-

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

पूजा पर एकता भाषा में अनेकता-हिन्दी लेख


                                   इधर गणेशचतुर्थी का पर्व आया और उधर महाराष्ट्र में एक  बार फिर हिन्दी मराठी भाषा विवाद प्रारंभ हो गया।  इस समय हमारे देश में महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध तथा आतंकवाद के विषय इतने विस्फोटक हैं कि हर प्रदेश का हर भाषी सामान्य नागरिक चिंतित है। जिन लोगों के पास समस्याओं से निपटने की दायित्व है उनके पास कोई योजना नहीं है पर अपनी आवश्यकता बनाये रखने के लिये वह वर्ग, वर्ण और भाषा के समूहों को आपसी विवाद में फंसाये रखने का प्रयास करते हैं। करना कुछ नहीं चाहते या कर नहीं सकते पर अपनी जिम्मेदारी से बचने के ढेर सारे बहाने उनके सामने होते हैं। इस पर ट्विटर पर कुछ लिखा वह यहां प्रस्तुत है।

                भारतराष्ट्र और हिन्दीभाषा की अस्मिता नहीं बची तो किसी भी प्रदेश वह किसी भी उसकी भाषा की अस्मिता बच नहीं सकती। श्रीमद्भागवतगीता की शब्द रचना में श्रीगणेश जी के योगदान के लिये उनका नमन। उन्हें इष्ट मानने वालों का भी अभिनंदन। भगवानगणेशजी ने श्रीगीता में वेदव्यास की वाणी को शब्द रूप देकर भारतीय अध्यात्मिक पर्वत की स्थापना की जहां से अलौकिक ज्ञानगंगा आज भी अविरल प्रवाहित है। श्रीगणेशजी विद्वता के प्रतीक हैं और उनके सच्चे भक्त सहजभावी होते हैं। समाज में भेद लाने वाले तो केवल पाखंडी होते हैं। श्रीगणेशजी की हस्तलिपि में रचित श्रीमद्भागवत गीता में किसी के रोजगार का हरण करना आसुरी वृत्ति माना गया है। हिन्दी मराठी भाषाविवाद पैदा करने वाले श्रीगणेशजी की हस्तलिपि वाली गीता देखें जिसमें किसी का रोजगारका हरण पाप बताया गया है। भारत में जनसपंर्क की दृष्टि से अब केवल हिन्दी भाषा ही हो सकती है अगर इस सत्य को स्वीकार नहीं किया जाता तो वह समाज के लिये आत्मघाती होगा।

—————–

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग

3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

 5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 

श्रीमद्भागवतगीता केअध्ययन से अपना हृदय शुद्ध करना ही पर्याप्त-हिन्दी लेख


                                   श्रीमद्भागवतगीता पर लिखने और बोलने वाले यह हमेशा देख लिया करें कि उनके शब्द श्रीकृष्ण के मतानुसार जस की तस है कि नहीं। इस लेखक ने योग साधना का अभ्यास करते करते जब श्रीमद्भागवतगीता का अध्ययन प्रारंभ किया तब एक ज्ञानी मित्र ने सलाह दी कि श्रीगीता की पुस्तक वह लेना जिसमें महात्म्य न हो इससे अध्ययन में सुविधा होगी। महात्मय वाली कथायें किसी पाठ का महत्व तो बताती हैं पर वास्तविक ज्ञान विस्मृत कर देती हैं।

                                   उसकी बात मानकर जब केवल संदेशों वाली गीता खरीद करअध्ययन किया तब से उस मित्र को हर मुलाकात में धन्यवाद देते हैं।  श्रीमद्भागवतगीता में इस संसार का रहस्य  बताने के साथ ही उसे पार करने की कला भी बतायी गयी है। संभव है यह इस लेखक का अल्पज्ञान हो फिर जब भी कहीं गीता का नाम लेकर अच्छी बात कही जाती है तो ऐसा लगता है कि वह तोड़मरोड़कर पेश की गयी है। सच बात तो यह है कि गीता में किसी काम को अच्छा या बुरा नहीं कहा गया है बल्कि उसमें कर्म और उसका परिणाम का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। उसके अनुसार आप जैसा जीवन जीना चाहते हैं उसके अनुसार अपने हृदय में संकल्प स्थापित करें। फिर उसके अनुसार आचरण करें।  आप लोगों के लिये हृदय में सद्भाव रखेंगे तो वह भी रखेंगे।  आप दूसरे से मधुर व्यवहार करेंगे तो दूसरा भी करेगा पर यह बातें स्पष्ट रूप से नहीं कही गयी है। गीता में कहीं भी नहीं कहा गया कि कर्म  ही मेरी पूजा है-उसमें निष्काम कर्म का सिद्धांत है जिसे व्यापक अर्थों मे समझने की आवश्यकता है। गीता में दया करने के स्पष्ट संदेश की बजाय  निष्प्रयोजन दया का सिद्धांत है   जिसे आमतौर से  गीतावाचक स्पष्ट नहीं कर पाते।

                                   गीता में सहज जीवन के लिये नारे नहीं वरन् संदेश हैं जिन पर चलने पर ही आनंद का अनुभव होता है। अगर हम कहते हैं गीता में सभी पर दया दिखाने, सभी से  मधुर बोलने, सभी को समान समझने तथा सभी का हित करने के लिये कहा गया है तो तय बात है कि हमने गीता का सार नहीं समझा।  गीता के आधार पुरुष श्रीकृष्ण का मंतव्य यह है कि सत्कर्म कर मनुष्य किसी पर अहसान नहीं करता वरन् अपने लिये सहज वातावरण बनाता है। जब हम दूसरे पर दया करने की बात कहते हैं तो हम सामने वाले को शक्तिशाली होने की अनुभूति भी कराकर उसमें अहं पैदा करते हैं जो गलत है, जबकि श्रीगीता के अनुसार तो हर मनुष्य गुणों के वशीभूत एक कमजोर जीव है-यही बात समझाने की है। मनुष्य सत्कर्म से किसी की सहायता नहीं करता वरन् अपना उद्धार करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण का मंतव्य है-ऐसा गीता में स्पष्ट नहीं कहा गया पर हम भक्ति भाव से गीता का अध्ययन करने के बाद ऐसा समझ पाये हैं।

————

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

भक्तों को भोला या मूर्ख समझना अज्ञानता का प्रमाण-हिन्दी चिंत्तन लेख


                                   11 किलो सोने के आभूषण पहनने वाला एक बाबा 25 सुरक्षाकर्मियों के साथ चलता है तो एक कथित महिला धार्मिक संत बिकनी पहनकर फोटा खिंचवाती है़।  दोनों के पास कथित रूप से भक्तों का जमावड़ा है पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारतीय धर्म के लोग मूर्ख हैं।  इस तरह तो हम उन लोगों को भी मूर्ख कह सकते हैं जो फिल्मों में पैसा खर्च कर मनोरंजन करने जाते हैं।  दरअसल हर मनुष्य में मनोरंजन की भूख होती है और धर्म की आड़ में आकर्षण पैदा कर अपनी रोजी रोटी चलाने वाले उसका लाभ उठाते हैं।  यह बुरा है या अच्छा यह अलग से चर्चा का विषय है पर इतना तय है कि अध्यात्मिक ज्ञानी ऐसे लोगों के पास जाने वालों  को मूर्ख या भोला नहीं मानते।

                                   भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि भक्त चार प्रकार के होते हैं-अर्थार्थी, आर्ती, जिज्ञासु और ज्ञानी। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ज्ञानी भक्त ही मुझे सबसे प्रिय हैं। ज्ञानी ऐसे संतों के पास नहीं जाते पर निरंकार का उपासक होने के बावजूद कभी कभी ज्ञानार्जन और भक्ति के लिये साकार भक्ति के उपासना स्थल पर चले जाते है। । जहां तक धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वालों की बात है तो सच तो यह है कि राजसी वृत्ति के लोग अपने काले धंधे ऐसे ही लोगों के नाम पर कर रहे हैं जो उनके सामने किराये की भीड़ लगाकर उनके प्रचार का काम करते हैं। इसी प्रचार से अनेक लोग यह तमाशा देखने की इच्छा से चले जाते हैं।

                                   कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे संतों पर चाहे जैसी टिप्पणियां कर लें पर भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा मानने वालों को भोला या मूख कतई न कहें। जो कहेगा हमारी दृष्टि से अज्ञानी होगा।

————–

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

बेहतर #राज्यप्रबंध की जरूरत को समझना जरूरी-#हिन्दीलेख


                                   15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस 2015 को मनाया जायेगा। इस अवसर पर टीवी तथा अन्य प्रचार माध्यमों में  वास्तविक स्वतंत्रता या आजादी पर चर्चा सुनने का मौका भी मिलेगा। इस विषय पर पुराने तर्क या इतिहास सुनाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गांधीजी के अनेक भक्त मानते हैं कि अभी स्वतंत्रता या आजादी मिलना बाकी है। गांधी भक्तों में वर्तमान काल के सबसे ज्यादा लोकप्रिय समाज सेवी श्री अन्ना हजारे भी मानते हैं सच्ची आजादी मिलना अभी शेष है। जिस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये गांधीजी के नेतृत्व मे आंदोलन चला वैसे ही आंदोलन आज भी हो रहे हैं। यह अलग बात है कि उस तरह के आंदोलन किसान, छात्र तथा महिलाओं के हितों की रक्षा को लेकर होते हैं पर उनके संचालन वही अहिंसक रूप है जैसा गांधीजी ने बनाया था। इससे एक बात तो निश्चित कही जा सकती है कि जैसी कल्पना स्वतंत्रता के बाद सर्वजनहिताय राज्य प्रबंध व्यवस्था की कल्पना देश भक्त दीवानों ने की थी वैसा हो नहीं पाया।

                                   आमतौर से भारत में महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के विषय पर  अर्थशास्त्री अपने अपने ढंग से वक्तव्य देते हैं पर सच यह है कि यह समस्यायें नहीं वरन  हमारे देश में व्याप्त अकुशल प्रबंध की समस्याओं के परिणाम है।  हमने देखा है कि हमारे देश में कोई अपराधिक घटना होती है तो उसे रोकने के लिये नया कानून बनता है जबकि विशेषज्ञ कहते हैं कि पुराने कानूनों पर ही अमल किया जाये तो बढ़ते अपराधों से छुटकारा मिलता है। समस्या यह नहीं है कि किसी अपराध के विरुद्ध कानून नही है वरन् उसे अमल में लाने की व्यवस्था में दोष है जिससे अपराधी निशंक रहते हैं।  हमारे देश मेें जल, अन्न और खनिज संपदा का अपार भंडार है पर वितरण में कुशल प्रबंध व्यवस्था की अभाव में धन का असमान वितरण से गरीब और अमीर के बीस भारी अंतर की स्थिति बन गयी है। हैरानी की बात है कि किसी अर्थशास्त्री ने कभी अकुशल प्रबंध की समस्या से निजात पाने के उपाय नहीं बताये।

                                   राज्य प्रबंध एक गंभीर विषय है पर लगता नहीं है कि अंग्र्रेजों की गुलामी करते हुए यह बात हम समझ पाये। अंग्रेजों से वस्तुओं के भोग के तरीके तो सीख लिये पर सृजन का योग नहीं सीखा। नतीजा वही होना था जो सामने है। 15 अगस्त पर अनेक प्रकार की चर्चायें होंगी और हम यह देखना चाहेंगे कि क्या कोई इस अकुशल प्रबंध की समस्या पर कोई गंभीर विचार रखता है या नहीं।

——————-

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

कर्म में अकर्म देखने से आंनद मिलता है-हिन्दी चिंत्तन लेख


                   हर मनुष्य में यह भाव रहता है कि अन्य मनुष्य उसका सम्मान करें। वह जो काम करे उसकी कोई प्रशंसा करे। यह पूज्यता का भाव है। इसका गुण यह है कि हर मनुष्य सक्रिय रहता है ताकि उस पर परिवार, समाज तथा निजी मित्रों की दृष्टि बने रहे। इस भाव का दुर्गुण यह है कि चालाक लोग झूठी प्रशंसा या आग्रह कर सज्जन लोगों से भी अपना काम निकाल लेते हैं। अनेक ऐसे लोग हैं जो बहुत चालाक हैं और दूसरे की झूठी प्रशंसा कर अपना काम निकाल लेते है और फिर राह चलते हुए अभिवादन तक करने से बचते हैं-उनका प्रयास यही रहता है कि जिससे काम निकल गया उसे अब दृष्टि भी न मिले तो अच्छा है।

            पूज्यता का यह भाव राजसी प्रवृत्ति के लोगों में अधिक होता है। जो लोग श्रेष्ठ राजसी कर्म करते हैं उनसे लधु कर्म में लगे लोग दबते हैं।  लघु राजसी कर्म करने वालों का जीवन हमेशा ही उच्च राजसी पद पर सक्रिय मनुष्य की कृपा से चलतर है।  इसलिये वह उनकी चाटुकारिता करते हैं। आवश्यकता हो तो सर्वशक्तिमान की बजाय उनकी आरती भी उतारते हैं। श्रेष्ठ राजसी पुरुषों के पास धन की मात्रा अधिक, उच्च पद और प्रतिष्ठा व्यापक होती है इसलिये उनके इर्दगिर्द लघु राजसी पुरुषों का एक घेरा बना जाता है। इन लघु मनुष्यों की चाटुकारिता तथा आरती भाव श्रेष्ठ पुरुषों को अहंकार के साथ ही मोह में डाल देता है जिससे उनके अंदर अपनी उपेक्षा करने वालों के प्रति क्रोध का भाव पैदा होता है। धीरे धीरे वही श्रेष्ठ पुरुष पतन की तरफ जाते हैं।  इतिहास ऐसे श्रेष्ठ राजसी पुरुषों के पतन का गवाह है जो भले चंगे थे पर अंततः पतन की गर्त में समा गये।

                 ज्ञानी पुरुष वह है जो राजसी कर्म में अपनी आवश्यकता तक ही सक्रिय रहता है। वह प्रकृत्ति के तत्व को पहचानता है-जिसका मूल स्वभाव ही परिवर्तनशीलता है। जो कल था वह आज नहीं है, जो आज है वह कल नहीं होगा, इसलिये किसी एक व्यक्ति, विषय या वस्तु का मोह पालना ठीक नहीं है।  हमें अपना कर्म करना है कोई प्रशंसा करे या निंदा इस पर विचार नहीं करना है। यही निष्कर्म का सिद्धांत भी है। जहां किसी ने अन्य मनुष्यों से प्रतिफल या प्रशंसा पाने में मोह में कर्म करना प्रारंभ किया वहीं उसके सामने भविष्य में निराशा का भय भी पैदा होता है। जहां कोई आशा न हो वहां वह कर्म ही नहीं करता इससे वह निष्क्रिय भाव में स्थित हो जाता है जो कि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। राजसी पुरुष ही कई बार तामसी हो जाते हैं। सात्विक मनुष्य यह जानते हैं  इसलिये हमेशा ही कर्म में अकर्म तथा निष्कर्म में सुख की संभावना के साथ जीवन यात्रा करते हैं।

———————

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

टीवी का नहीं अपना रिमोट भी हाथ में रखेें-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              टीवी का रिमोट आपके हाथ में है, आपका स्वयं का रिमोट आपके आज्ञा चक्र-भृकुटि, नाक के ठीक ऊपर-होता है। टीवी पर किसी चैनल के बदलने से आपके मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है जरा गौर फरमायें।

                              आज यह लेखक सत्संग से लौटा। कुछ देर शवासन के बाद टीवी खोला। मन में विचार आया कि शवासन करते हुए चलो  मनोरंजन के लिये समाचार सुन लें।  जिस टीवी चैनल को खोला वहां एक फांसी प्राप्त व्यक्ति के-मृत्यु के बाद आदमी अपने अपराधों से मुक्त हो जाता है इसलिये उसके लिये कोई कड़ा शब्द लिखना ठीक नहीं है-समर्थक एक धार्मिक राजनीतिक नेता का चेहरा दिखाई दिया।  समझ में आया कि यह इन्हीं क्लेशी महाशय के सहारे इस रविवार को  आकर्षक-सुपर संडे (super sunday)-का रूप प्रदान करेंगे। थोड़ी देर में मन में कांटे चुभते लगे। तब हमने चैनल बदला तो उस पर महामृत्यंजय जाप का संगीत के साथ प्रसारण हो रहा था।  हम फिर शवासन में चले गये। उस जाप से मन आनंदित हो उठा। वाह क्या बात है?

                              कंप्यूटर पर बैठते ही यह विषय मन में आया कि टीवी के रिमोट से ज्यादा शक्तिशाली तो स्वयं का ही रिमोट है जो नाक के ठीक ऊपर लगा हुआ है। अक्सर हम ध्यान करते हैं और उसमें आनंद भी मिलता है।  निर्बीज ध्यान में समस्त विषयों से परे हो जाते हैं तब अध्यात्मिक आनंद आता है।  कभी कभी न चाहते हुए भी सबीज ध्यान लग जाता  है।  चाहे जैसा भी लगे सह अनुभव करना चाहिये कि  ध्यान में अपने रिमोट की स्वतः  साफ सफाई हो रही है। पहले हमें तय करना चाहिये कि चाहते क्या हैं? आज्ञा चक्र प्रभावशाली-विकार रहित-होगा तब हमें सुख की चाहत परेशान नहीं करती क्योंकि तब उसका वही बटन दबता है जो उस स्थान की तरफ ले जाता है जहां आनंद मिलता है।  जहां बेजान पड़ा है वहां वह बटन तो स्वत दबा रहता है जो क्लेश की तरफ मन को ले जाता है।

                              आखिरी बात कोई बतायेगा कि रिमोट को हिन्दी में क्या कहते हैं?

—————–

सभी को मानसिक रूप से गुलाम समझना गलत-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              अंग्रेजी संस्कारों ने हमारे देश में रविवार को सामान्य अवकाश का दिन बना दिया है। रविवार के दिन सुबह भजन या अध्यात्मिक सत्संग प्रसारित करने वाले टीवी चैनल खोलकर देखें तो वास्तव में शांति मिलती है। चैनल ढूंढने  के लिये रिमोट दबाते समय अगर कोई समाचार चैनल लग जाये तो दिमाग में तनाव आने लगता है-उसमें वही भयानक खबरें चलती हैं जो एक दिन पहले दिख चुकी हैं- और जब तक मनपसंद चैनल तक पहुंचे तक वह बना ही रहता है।  बाद में भजन या सत्संग के आनंद से मिले अमृत पर ही उस तनाव का निवारण हो पता है।

                              वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार सभी दिन हरि के माने जाते हैं पर अंग्रेजों ने गुलामी से मुक्ति देते समय शिक्षा, राजकीय प्रबंध व्यवस्था तथा रहन सहन के साथ ही भक्ति में भी अपने सिद्धांत सौंपे जिसे हमारे सुविधाभोगी शिखर पुरुषों से सहजता से स्वीकार कर लिय।  जैसा कि नियम है शिखर पुरुषों  का अनुसरण  समाज करता ही है।  हमें याद है पहले अनेक जगह मंगलवार को दुकानें बंद रहती थीं।  वणिक परिवार का होने के नाते मंगलवार हमारा प्रिय दिन था।  बाद में चाकरी में रोटी की तलाश शुरु हुई तो रविवार का दिन ही अध्यात्मिक के लिये मिलने लगा।  इधर हमारे धार्मिक शिखर पुरुषों-उनके अध्यात्मिक ज्ञानी होने का भ्रम कतई न पालें-ने जब देखा कि उनके पास आने वाली भीड़ में नौकरी पेशा तथा बड़ा व्यवसाय या उद्योग चलाने वाले ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो रविवार के दिन ही  अवकाश लेते हैं तो उन्होंने उसे ही मुख्य दिवस बना दिया।

                              इधर प्रचार माध्यम भी रविवार के दिन ‘सुपर संडे’ बनाने का प्रयास करते हैं और उनके स्वामियों के प्रायोजित अनेक संगठन इसी दिन कोई प्रदर्शन आदि कर उनके लिये प्रचार सामग्री बनाते हैं या फिर कोई बंदा सनसनीखेज बयान देता है जिससे उन्हें सारा दिन प्रचारित कर बहस चलाने का अवसर मिल जाता है।  अन्ना आंदोलन और चुनाव के दौरान इन प्रचार माध्यमों को ऐसे अवसर खूब मिले पर अब लगता है कि अब शायद ऐसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी महिलाओं के प्रति धटित अपराध अथवा धार्मिक नेताओं के बयानों से यह अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री निकालने का प्रयास कर रहे हैं। यह अलग बात कि जम नहीं पा रहा है।

                              इधर बाहुबली फिल्म की सफलता के अनेक अर्थ निकाले जा रहे हैं।  यह अवसर भी प्रचार माध्यम स्वयं देते है-यह पता नहीं कि वह अनजाने में करते हैं या जानबुझकर-जब बॉलीवुड के सुल्तान और बादशाह से बाहूबली फिल्म के नायक की चर्चा कर रहे हैं। तब अनेक लोगों के दिमाग में यह बात आती तो है कि अक्षय कुमार, अजय देवगन, सन्नी देयोल, अक्षय खन्ना और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेता भी हैं जो फिल्म उद्योग को भारी राजस्व कमा कर देते हैं।  अक्षय कुमार के लिये इनके पास कोई उपमा ही नहीं होती।  यह अभिनेता अनेक बार आपस में काम कर चुके हैं पर उसकी चर्चा इतने महत्व की नहीं होती जैसी सुल्तान और बादशाह के आपस में अभिवादन करने पर ही हो जाती है।  अंततः फिल्म और टीवी भावनाओं पर ही अपना बाज़ार चमकाते हैं और इससे जुड़े लोगों का पता होना चाहिये कि उनके इस तरीके पर समाज में जागरुक लोग रेखांकित करते हैं।  सभी तो उनके मानसिक गुलाम नहीं हो सकते। हम ऐसा नहीं सोचते पर ऐसा सोचने वाले लोगों की बातें सुनी हैं इसलिये इस विशिष्ट रविवारीय लेख में लिख रहे हैं।

हरिओम, जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण

—————-

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

बाहूबली फिल्म पर व्यवसाय से इतर चर्चायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


        बाहुबली फिल्म ने भारतीय मनोरंजन जगत में तहलका मचा दिया है। दक्षिण की हिन्दी भाषा में अनुवादित वाणी से सुसज्जित फिल्म बाहुबली ने जो व्यापार किया है उससे मुंबईया फिल्मों की असलियत सामने आ गयी है। दरअसल दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग शुद्ध रूप से सार्वजनिक व्यवसायिक सिद्धांतों पर आधारित है जबकि मुंबईया फिल्म वाले उसे पारिवारिक दुकान की तरह चलाते हैं। आप नज़र डालिये तो पायेंगे कि  वर्तमान के अधिकतर फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के होने के काम पा जाते हैं। सामान्य परिवार के युवक और युवतियेां के लिये इस क्षेत्र में अवसर एकदम बंद कर दिये गये हैं। अनेक अभिनेता तो पचास पार करने के बाद भी नवयौवनाओं के साथ नायकों का अभिनय कर रहे हैं। ऐसे में सवाल आता है कि क्या देश में आकर्षक और प्रतिभाशाली युवकों की क्या कमी है? मगर मुंबईया फिल्म व्यवसाय रूढ़िवादी हो गया है।  अनेक अभिनरेता तो केवल चेहरे की सज्जा के कारण नायक बनते है वरना अधिकतर की आंखें सपाट हैं। इनके अभिनय में स्वाभाविकता का अभाव दिखता है। इसके विपरीत दक्षिण भारतीय अभिनेता और अभिनेत्रियों स्वभाविकता के साथ अपना काम करते हैं। उनमें आकर्षण भी अधिक होता है।

                              जिन लोगों ने टीवी पर दक्षिण भारतीय अतिभनेता और अभिनेता का काम देखा है वह हिन्दी भार्षी दर्शक इस बात को अब समझते हैं कि मुंबईया फिल्म व्यवसाय अब अपने बुढ़ापे को ढो रहा हैै। बाहुबली फिल्म देखकर आने वाले लोगो का कहना है कि अगर इसी तरह दक्षिणी फिल्मों का हिन्दी में तत्काल प्रसारण होता रहा तो  मुंबईया फिल्म के लिये भारी संकट खड़ा हो सकता है। यह सभी जानते हैं कि मुंबईया फिल्म उद्योग के पीछे की शक्तियां येनकेन प्रकरेण उसके संकटों का निवारण करने के लिये प्रयास करती है। हमने कहीं पढ़ा  था कि  एक समय अंग्रेजी फिल्मों के हिन्दी अनुवाद के प्रसारण दौर शुरु हुआ और उस समय जब मुंबईया फिल्म उद्योग के लिये संकट खड़ा होता दिखा तो उसे रोकने के  प्रयास हुए। कुछ समय बाद वह दौर थमा तो नहीं पर कम जरूर हो गया। बहरहाल बाहुबली फिल्म की सफलता के बहुत सारे अर्थ निकाले जा रहे हैं पर हमारा मानना है कि फिल्मों के प्रभाव क्षणिक ही होते हैं। ऐसी फिल्मों की निरंतरता ही बुढ़ा चुके मुंबईया फिल्म उद्योग को व्यवसायिक चुनौती दे सकती है।

————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

अन्य ब्लाग

1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

राजसी कर्म से अहंकार और क्रोध गुण जुड़ा ही है-हिन्दी चिंत्तन लेख


             अध्यात्मिक दर्शन का संबंध आंतरिक मनस्थिति से है। उसके ज्ञान से  व्यक्ति सात्विक भाव धारण करता है या फिर इस संसार में विषयों से सीमित संबंध रखते हुए योग भाव को प्राप्त होता है।  एक बात तय रही कि दैहिक विषयों से राजसी भाव से ही  राजसी कर्म के साथ संपर्क रखा जा सकता है। ज्ञान होने पर व्यक्ति अधिक सावधानी से राजसी कर्म करता है और न होने पर वह उसके लिये परेशानी का कारण भी बन जाता हैं।  हम देख यह रहे है कि लोग अपने साथ उपाधि तो सात्विक की लगाते हैं पर मूलतः राजसी प्रवृत्ति के होते हैं। ज्ञान की बातें आक्रामक ढंग से इस तरह करेंगे कि वह उन्हीं के पास है पर उनमें धारणा शक्ति नाममात्र की भी नहीं होती और राजसी सुख में लिप्त रहते हैं। राजसी कर्म और उसमें लिप्त लोगों में लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अतः उनसे सात्विक व्यवहार करने और विचार रखने की आशा करना ही अज्ञान का प्रमाण है। सात्विकता के साथ राजसी कर्म करने वालों की संख्या नगण्य ही रहती है।

                      धर्म, अर्थ, समाज सेवा, पत्रकारिता और कला क्षेत्र में धवल वस्त्र पहनकर अनेक लोग सेवा का दावा करते हैं। उनके हृदय में शासक की तरह का भाव रहता है। स्वयंभू सेवकों की भाषा में अहंकार प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। प्रचार में विज्ञापन देकर वह नायकत्व की छवि बना लेते हैं।  शुल्क लेकर प्रचार प्रबंधक जनमानस में उन्हें पूज्यनीय बना देते हैं। कुछ चेतनावान लोग इससे आश्चर्यचकित रहते हैं पर ज्ञान के अभ्यासियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। राजसी कर्म में लोग फल की आशा से ही लिप्त होते हैं-उनमें पद, प्रतिष्ठा पैसा और प्रणाम पाने का मोह रहता ही है। हमारे तत्वज्ञान के अनुसार यही सत्य है।

                  सामान्य जन उच्च राजसी कर्म और पद पर स्थित शिखर पुरुषों से सदैव परोपकार की आशा करते हैं पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस संसार में सभी मनुष्य अपने और परिवार के हित के बाद ही अन्य बात सोचते हैं। परोपकार की प्रवृत्ति सात्विक तत्व से उत्पन्न होती है और वह केवल अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली मनुष्यों में संभव है। सात्विक लोगों में बहुत कम लोग ही राजसी कर्म में अपनी दैहिक आवश्यकता से अधिक संपर्क रखने का प्रयास करते हें। उन्हें पता है कि व्यापक सक्रियता काम, क्रोध, मोह लोभ तथा अहंकार के पंचगुण वाले  मार्ग पर ले जाती है। ऐसे ज्ञान के अभ्यासी कभी भी राजसी पुरुषों की क्रियाओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी नहीं करते क्योंकि उनको इसका पता है कि अंततः सभी की देह त्रिगुणमयी माया के अनुसार ही संचालित होती है। उनके लिये अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को वह राजसी कर्म से उत्पन्न गुण ही मानते हैं।

————

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

६.ईपत्रिका

७.दीपकबापू कहिन

८.जागरण पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

शासकीय चिकित्सालय तथा विद्यालय में सफाई अनिवार्य हो-हिन्दी चिंत्तन लेख


                     सरकारी अस्पताल में जब चिकित्सक हड़ताल करते हैं तो सबसे अधिक कमजोर आयवर्ग के लोग प्रभावित होते हैं। उसी तरह जब सरकारी विद्यालयों में शिक्षक हड़ताल करते हैं तब इसी वर्ग के छात्र परेशान होते हैं।  यह आर्थिक वैश्वीकरण का परिणाम है कि जिन गरीबों के कल्याण के लिये धनवादी नीतियां लायी गयीं वही उनकी शत्रु हो गयी हैं।

                  एक समय था जब सरकारी अस्पताल और विद्यालय जनमानस की दृष्टि में प्रतिष्ठित थे पर समय के साथ बढ़ती आर्थिक असमानता ने समाज में गरीब तथा अमीर के बीच विभाजन कर दिया है । यह विभाजन अमीरों का निजी तथा गरीबों का सरकारी क्षेत्र के प्रति मजबूरी वश झुकाव के रूप में स्पष्टतः दिखाई देता है। हमें याद है जब पहले बच्चों को शासकीय विद्यालयों में भर्ती इस विचार से कराया जाता था कि वहां पढ़ाई अच्छी होती है। उसी तरह इलाज भी सरकारी अस्पतालों में वहां के चिकित्सक तथा नर्सों के प्रति विश्वास के साथ कराया जाता था।  अब अल्प धनी सरकार और अधिक धनी निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने लगा है।  सरकारी अस्पतालों में कभी जाना हो तो वहां इतनी गंदगी मिलती है कि लाचार गरीब का रहना तो सहज माना जा सकता है पर वेतनभोगी नर्स, कंपाउंडर और डाक्टर किस तरह वहां दिन निकालते होंगे यह प्रश्न मन में उठता ही है। कहा जाता है कि जिस वातावरण में आदमी रहता है उसका उस पर प्रभाव पड़ता ही है।  ऐसे गंदे वातावरण में चिकित्सा कर्मी अपना मन अच्छा रख पायें यह आशा करना व्यर्थ है। यही स्थिति सरकारी विद्यालयों में है। देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है पर अभी हमें अस्पतालों और विद्यालयों में उसके आगमन की प्रतीक्षा है।

—————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

६.ईपत्रिका

७.दीपकबापू कहिन

८.जागरण पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका

भारत और चीन अध्यात्मिक दृष्टि से मित्र राष्ट्र हैं-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


       प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन तथा मंगोलिया यात्रा में भगवान बुद्ध तथा उनके चरित्र की चर्चा का राजनीतिक रूप से कोई महत्व अभी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है लेकिन वैश्विक पटल के ऊपर इसके प्रभाव कालांतर में अप्रत्याशित रूप से दिखेंगे। चीन में सबसे अधिक बुद्ध धर्म मानने वाले हैं पर वैश्विक पर्दे पर वह वामपंथी विचाराधारा का प्रतीक बना रहा। अहिंसा के सबसे बड़े प्रवर्तक भगवान बौद्ध की विश्व में उस तरह चर्चा नहीं हुई जितनी पश्चिम धर्म प्रवर्तकों की दिखती रही। पश्चिम के दोनों धर्मो की चर्चा खूब हुई पर बुद्ध धार्मिक विचाराधारा का प्रवाह अपेक्षा के अनुकूल नहीं हुआ। चीन से अनेक लोग विदेश गये पर अपनी धार्मिक पहचान का महत्व साथ नहीं लाये। इससे तो हिन्दू धार्मिक लोग बेहतर रहे जिन्होंने विश्व में अपनी धार्मिक  पहचान कम नहीं होने दी।

        हमारा अनुमान है कि जिस तरह चीन की जो राजकीय विचाराधारा रही है उसमें धर्म अध्यात्म का कोई महत्व नहीं रहा और अभी तक वहां  के लोगों ने शायद ही कभी अपने राजपुरुषों की मंदिर में उपस्थिति की तस्वीर देखी हो पर श्रीनरेद्रमोदी की यात्रा ये यह अवसर उन्हें मिला। विश्व पटल पर चीन के राजपुरुषों की मंदिरों में श्रीमोदी के साथ उपास्थिति वहां के देश की अध्यात्मिक छवि भी बना सकती है। अंततः यह बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक होकर उसका विस्तार कर सकती है। सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दू तथा बौद्ध की संयुक्त  छवि विश्व में प्रचारित पश्चिमी धर्मो के लिये चुनौती बन सकती है। अभी तक यह देखा गया है कि एक धर्म से दूसरे धर्म में जाने की पंरपरा अधिक रही है। बौद्ध तथा हिन्दू धर्म की संयुक्त छवि न होने से पश्चिम में लोगों के पूर्वी धर्म कभी आकर्षक विकल्प नहीं बने जो अब संभावना बन सकती है। मुख्य बात यह कि भारतीय अध्यात्म्कि दर्शन अधिक तेजी से वैश्विक पटल पर छा सकता है जो पश्चिम के दो धर्मों के आपसी संघर्ष के बीच तीसरी विचाराधारा के रूप पहले से ही मौजूद है।

………………….

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

दृदय में संयम करें तो चित्त का ज्ञान हो जाता है-पतंजलि योग साहित्य पर आधारित चिंत्तन लेख


      हमारी इंद्रियां स्वतः काम करती हैं जबकि हमारा भ्रम यह रहता है कि हम उन्हें चला रहे हैं।  कान, नाक, आंख, जीभ बुद्धि तथा हाथ पांव स्वचालित हैं।  हम सोते हैं तब भी वह प्रयासरत रहते हैं जबकि उस समय हम मोक्ष की स्थिति में होने के कारण उन पर अंतदृष्टि नहीं रख पाते।  ऐसे में जाग्रत अवस्था में उनकी सक्रियता देखकर यह सोचते हैं कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं।  इन इंद्रियों के स्वतंत्र होने का यह भी प्रमाण है कि रात्रि को ऐसे विचित्र स्वप्न आते हैं जिनके बारे में हम जाग्रत अवस्था में सोच भी नहीं पाते। जैसा कि आधुनिक विज्ञान कहता है कि सोते समय मनुष्य का वह दिमाग काम करता है जो जाग्रत अवस्था में सुप्त होता है।

      इसकी अनुभूति हम तभी कर सकते हैं जब अपने हृदय की तरफ दृष्टिपात करें।  यह क्रिया ध्यान से ही हो सकती है। जब हम शांत होकर अपना ध्यान हृदय की तरफ केंद्रित करेंगे तब हमारी सारी इंद्रिया शिथिल हो जाती है।  जब ध्यान की चरम स्थिति समाधि आती है तब हमारा संपर्क अपने आप यानि आत्मा से हो जाता है। उस समय यह पता चलता है कि बुद्धि और हृदय में भेद है। इस भेद का ज्ञान न होने पर इंद्रियां जिन भोगों के साथ संपर्क करती हैं वह हमारे प्रतीत होते हैं।  ऐसा लगता है कि हम भोग कर रहे हैं। सच यह है कि इंद्रियां सांसरिक विषयों से संपर्क स्वाभाविक रूप से करती हैं और हम उनको अपना भोग समझ बैठते हैं। देह को जीवित रखने का प्रयास इंद्रियां स्वचालित ढंग से करती हैं और हमें लगता है कि हम सारी क्रियायें कर रहे हैं। इसे तभी समझा जा सकता है जब हम हृदय के विषय में निरंतर ध्यान के माध्यम से उसकी क्रियायें देखते रहें।

 

पतंजलि योग दर्शन में कहा गया है कि

———–

हृदये चित्त संवित्।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-हृदय में संयम करने से चित्त के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है।

सत्त्वपुरुषयोरत्न्तासंकीर्णयोः प्रत्यायाविशेषो भोगःपराथत्स्वार्थसंयमकात्पुरुषज्ञानम्।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-बुद्धि और पुरुष परस्पर भिन्न हैं। इन दोनों के भेद प्रतीत न होना ही भोग है। परार्थ प्रतीति से भिन्न जो स्वार्थ प्रतीति है उसमें संयम करने से संयम हो जाता है।

      अक्सर हमारे अंतर्मन में अच्छा भोजन करने, सुंदर दृश्य देखने, सुगंध के नासिका में आने, कानों से मधुर स्वर सुनने और हाथों से प्रिय वस्तु या व्यक्ति को छूने की इच्छा होती है। यह सब हमारे मन और बुद्धि का खेल है। जाग्रत अवस्था में इंद्रियां इन्हीं इंद्रियों के वशीभूत होकर काम करती है तो रात्रि में इनके बिना भी उनकी सक्रियता बंद नहीं होती।  हम सोते समय भी सांस ग्रहण करते हैं और मस्तिष्क सपने देखता है तो हाथ पांव भी हिलते हैं पर ज्ञान के अभाव में यह सत्य नहीं समझ पाते कि यह उनका स्वाभाविक कर्म है। उस समय हमारा हृदय शांत होता है इसलिये उसकी अनुभूति नहीं कर पाते। अगर हम योगासन, ध्यान, मंत्र जाप और अध्यात्मिक पाठ  निरंतर करते रहें तब जाग्रत अवस्था में इन इंद्रियों की सक्रियता से कभी स्वयं को जुड़ाव अनुभव नहीं होगा। पुरुष और बुद्धि का भेद जानने के बाद हम   उन पर नियंत्रण कर सकते हैं। इतना ही नहीं निरंतर योगाभ्यास करने पर  यह अनुभव भी कर सकते हैं कि हम एक नहीं दो लोग हैं।  एक अध्यात्मिक पुरुष और दूसरा देहधारी! यह विचार आने पर हमारा आत्मविश्वास बढ़ जाता है।  हम लोगों ने देखा होगा कि योगी लोग कभी अपने अकेलेपन को लेकर चिंतित नहीं होते। योगाभ्यास तथा ज्ञान साधना से उनके बाह्य ही नहीं बल्कि आंतरिक व्यक्तित्व में दृढ़ता आती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

 

वास्तविक समाज सेवा करने वाले कम ही मिलते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन


            आधुनिक प्रचार माध्यमों के आत्म विज्ञापन की सुविधा प्रदान की है जिसका वह लोग लाभ उठाते हैं जिनके पास बृहद आर्थिक संगठन हैं।  स्थिति यह है कि  आर्थिक शिखर पुरुष  छोड़ भलाई सारे काम करते हैं पर अपने प्रचार प्रबंधकों के माध्यम से अपनी छवि देवत्व की बना लेने में सफल हो जाते हैं।  इतना ही नहीं  अपने श्रमिकों, कर्मचारियों और पूरे समाज को शोषण करने के बावजूद ऐसे धनपति प्रचार माध्यमों से अपनी छवि इस तरह बनाते हैं जैसे कि वह अत्यंत विनम्र और दयालु हों।  इसके अलावा भी कला, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म तथा समाज के क्षेत्र में भी कथित रूप से नायकत्व वाली छवि धारण किये अनेक लोग आत्म विज्ञापन के जरिये ही अपना कार्य व्यापार चला रहे हैं। कुछ लोग तो ऐसे हैं जो स्वयं कभी परमार्थ नहीं कर पाते मगर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय अन्य लोगों की निंदा कर यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि वह स्वयं ही श्रेष्ठ है। इतना ही धार्मिक क्षेत्र में भी अब विज्ञापन के जरिये कथित सिद्ध सामग्री बेचने के ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिसे देखकर अध्यात्मिक ज्ञानियों की आंखें फटी रह जाती है।

भर्तृहरि नीति शातक में कहा गया है कि

———————————-

मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः|
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः||

     हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में कितने हैं?

     वैसी देखा जाए तो दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। ‘मैंने यह अच्छा काम किया’ या ‘मैंने उसको दान दिया’ जैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता है?

      इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं। आत्म प्रचार में लगे लोगों को अपने छवि बनाने के प्रयासों से ही समय नहीं मिलता तब वह समाज से कैसे कर सकते हैं?

——————————–

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

 

मंदिर और उद्यानों में समय बिताना लाभप्रद-हिंदी सामाजिक चिंत्तन लेख


                        आमतौर से हर मनुष्य देखने में एक जैसे ही लगते हैं पर आचार, विचार, रहन सहन, खाने पीने तथा व्यवहार की दृष्टि से उनमें भिन्नता का आभास तब  होता है जब उसने कोई दूसरा व्यक्ति उनसे संपर्क करता है। अनेक बार दो लोग एक जैसे लगते हैं तो अनेक लोग भी एक जैसे स्वभाव के नहीं लगते।  इसके दो कारण है एक तो यह कि लोग अपने रहन सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार के अनुसार ही हो जाते हैं। दूसरा कारण उल्टा भी होता है कुछ लोग अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही रहन, सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार करने लगते हैं।  इन दोनों कारणों में श्रीमद्भागवत गीता का गुण और कर्म विभाग सिद्धांत लागू होता है। एक तो मनुष्य वह होता है जो अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार सात्विक, राजस तथा तामसी कार्य करता है तो दूसरा वह होता है जो अपने कर्म के अनुसार ही अपने स्वभाव की प्रकृत्ति का हो जाता है। इस चक्र को योग तथा ज्ञान साधक अनुभव कर सकते हैं।

                        हम देखते हैं कि सहकर्म में लिप्त लोगों के बीच आपसी संपर्क सहजता से बनता है। जिसको निंदा करनी है उसे निंदक मिल जाते हैं दूसरे प्रशंसा करते हैं तो उनको प्रशंसक मिल जाते हैं। यही स्थिति आदतों की भी है। जो जुआ खेलते हैं उनको जुआरी और जो शराब पीते हैं उन्हें शराबी मिल जाते है। स्थिति यह है कि व्यसन में फंसा मनुष्य कुंऐं के मेंढक की तरह हो जाता है जिसे अज्ञान का अंधेरा ही पसंद होता है।  आमतौर से हम देखते भी हैं कि बुरी संगत सहजता से मिलती है पर अच्छी संगत के लिये प्रयास करने पड़ते है।  बाज़ार में सहजता से व्यसनी मिल जाते हैं  पर सत्संगी को ढूंढना पड़ता है। ऐसे में समस्या यह आती है कि हम सहज प्रकृत्ति के लोग कहां ढूंढे।

                        हमारा मानना है कि हमें मंदिरों और पार्कों में सहज प्रकृत्ति के लोग मिल ही जाते हैं। दरअसल मंदिरों और पार्कों में आया व्यक्ति कहीं न कहीं से मन से स्वच्छ होता ही है भले ही वह पूरे दिन असहज वातावरण में रहता हो।  जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां आये लोग अत्यंत शांत और सद्भाव से संपन्न  होने के कारण हमारे मन तथा चक्षुओं को आकर्षित करते हैं। वहां कोई मित्र मिल जाये तो उसे  भी प्रसन्नता होती है तो हमें भी अधिक सुख  मिलता है। इस प्रसन्नता का सामान्य सुख से ज्यादा मोल है। यह भी कह सकते हैं कि इस प्रसन्नता का सुख अनमोल है।  उसी तरह प्रातःकाल किसी उद्यान में आया व्यक्ति भी निर्मल भाव से जुड़ जाता है। वहां घूमते हुए लोग एक दूसरे को अत्यंत निर्मल भाव से देखते हैं। यह अलग बात है कि इसकी उनको स्वतः अनुभूति नहीं होती। उनमें अनेक लोग तो केवल इसलिये एक दूसरे को जानने लगते हैं क्योंकि दोनों ही वहां प्रतिदिन मिलते हैं। इस प्रकार की आत्मीयता मिलना एक संयोग है जो कि व्यसन के दुर्योग से मिली संगति से कहीं बेहतर है।

                        हमने देखा है कि योग शिविरों में जाने पर अनेक ऐसे लोगों से मिलने और उनको सुनने का सौभाग्य मिलता है जिनकी कल्पना सामान्य जीवन में नहीं की थी।  इसी अनुभव के आधार पर हम यह लेख लिख रहे है। हमारे कहने का अभिप्राय यही है कि अगर आप यह चाहते हैं कि आप एक बेहतर जीवन जियें तो पहले अपनी देह तथा मन  के लिये अनुकूल  वातावरण, मित्र तथा आत्मीय लोगों का चयन करें।  वातावरण, रहन सहन, आचार विचार, तथा खान पान के साथ ही संगति के अनूकूल बनने के बाद जीवन को सुखमय बनाने का कोई दूसरा उपाय करना शेष नहीं रह जाता।

———————-

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका