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अल्पायु में मौत की बढ़ती घटनायें चिंता का विषय-हिन्दी लेख


                      आमतौर से बड़ी आयु में मौत होना ही स्वाभाविक माना जाता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य राजरोगों से एक सामान्य मनुष्य एक आयु तक स्वयं ही लड़ लेता है पर बड़ी उम्र होने पर वह हथियार डाल देता है। अब छोटी आयु में मौतें भी अधिक होने लगी हैं जिस पर शायद ही कोई अधिक चिंतित होता हो।  सड़क हादसों में अनेक युवा काल कवलित होते देखे गये हैं।  अगर बड़ी आयु के लोग अपनी स्मरण शक्ति पर बोझ डालें तो उन्हें लगेगा कि अपनी युवा अवस्था से अधिक उम्र के इस पड़ाव अनेक  गोदें सूनी होते देख रहे हैं।   बहरहाल तीस से चालीस के बीच अगर सड़क हादसे की बजाय बीमारी से किसी की मौत हो तो अब भी स्वाभाविक मानना कठिन लगता है पर जिस तरह तंबाकू के पाउचों का प्रचलन हुआ है उस पर अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। अनेक लोग तो इन पाउचों को धीमे विष जैसा मानते हैं। ऐसे में जागरुक लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिये।

                              इस लेखक ने एक चिकित्सक मित्र को एक अस्वस्थ युवक के पिता से यह कहते सुना था कि‘अगर तुम्हारा लड़का इस पाउच का सेवन बंद नहीं करता तो समझ लेना कि वह तुम्हें दुनियां का सबसे बड़ा दर्द देने वाला है।’ अतः यह जरूरी है कि इस विषय पर गंभीरता से अनुसंधान कर लोगों को जानकारी दी जाये।

                              शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी। इस लेखक के एक मित्र न मात्र 42 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से दम तोड़ा होगा।  वह ऐसे पाउचों का सेवन करता था।  उससे एक दो वर्ष पूर्व एक लड़के ने इन पाउचों के सेवन का दुष्परिणाम बताया था। उसने पाउच की पूरी सामग्री एक ग्लास में भरते हुए पानी के साथ ही चार आल्पिनें उसमें डाल दीं। सुबह वह चारों आल्पिने गुम थीं।  मित्र की  मौत के बाद इस लेखन ने कम उम्र में हृदयाघात से मरने वालों की जानकारी लेना प्रारंभ किया।  दस में से सात इसके सेवन में लिप्त पाये गये। पिछले बीस पच्चीस वर्ष से यह पाउच प्रचलन में आया है इसलिये अनेक बड़ी आयु के भी इसका शिकार होते हैं तो बड़ी बात नहीं पर चूंकि उनकी मौत स्वाभाविक मानी जाती है इसलिये कोई चर्चा नहीं करतां।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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पूजा पर एकता भाषा में अनेकता-हिन्दी लेख


                                   इधर गणेशचतुर्थी का पर्व आया और उधर महाराष्ट्र में एक  बार फिर हिन्दी मराठी भाषा विवाद प्रारंभ हो गया।  इस समय हमारे देश में महंगाई, भ्रष्टाचार, अपराध तथा आतंकवाद के विषय इतने विस्फोटक हैं कि हर प्रदेश का हर भाषी सामान्य नागरिक चिंतित है। जिन लोगों के पास समस्याओं से निपटने की दायित्व है उनके पास कोई योजना नहीं है पर अपनी आवश्यकता बनाये रखने के लिये वह वर्ग, वर्ण और भाषा के समूहों को आपसी विवाद में फंसाये रखने का प्रयास करते हैं। करना कुछ नहीं चाहते या कर नहीं सकते पर अपनी जिम्मेदारी से बचने के ढेर सारे बहाने उनके सामने होते हैं। इस पर ट्विटर पर कुछ लिखा वह यहां प्रस्तुत है।

                भारतराष्ट्र और हिन्दीभाषा की अस्मिता नहीं बची तो किसी भी प्रदेश वह किसी भी उसकी भाषा की अस्मिता बच नहीं सकती। श्रीमद्भागवतगीता की शब्द रचना में श्रीगणेश जी के योगदान के लिये उनका नमन। उन्हें इष्ट मानने वालों का भी अभिनंदन। भगवानगणेशजी ने श्रीगीता में वेदव्यास की वाणी को शब्द रूप देकर भारतीय अध्यात्मिक पर्वत की स्थापना की जहां से अलौकिक ज्ञानगंगा आज भी अविरल प्रवाहित है। श्रीगणेशजी विद्वता के प्रतीक हैं और उनके सच्चे भक्त सहजभावी होते हैं। समाज में भेद लाने वाले तो केवल पाखंडी होते हैं। श्रीगणेशजी की हस्तलिपि में रचित श्रीमद्भागवत गीता में किसी के रोजगार का हरण करना आसुरी वृत्ति माना गया है। हिन्दी मराठी भाषाविवाद पैदा करने वाले श्रीगणेशजी की हस्तलिपि वाली गीता देखें जिसमें किसी का रोजगारका हरण पाप बताया गया है। भारत में जनसपंर्क की दृष्टि से अब केवल हिन्दी भाषा ही हो सकती है अगर इस सत्य को स्वीकार नहीं किया जाता तो वह समाज के लिये आत्मघाती होगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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श्रीमद्भागवतगीता केअध्ययन से अपना हृदय शुद्ध करना ही पर्याप्त-हिन्दी लेख


                                   श्रीमद्भागवतगीता पर लिखने और बोलने वाले यह हमेशा देख लिया करें कि उनके शब्द श्रीकृष्ण के मतानुसार जस की तस है कि नहीं। इस लेखक ने योग साधना का अभ्यास करते करते जब श्रीमद्भागवतगीता का अध्ययन प्रारंभ किया तब एक ज्ञानी मित्र ने सलाह दी कि श्रीगीता की पुस्तक वह लेना जिसमें महात्म्य न हो इससे अध्ययन में सुविधा होगी। महात्मय वाली कथायें किसी पाठ का महत्व तो बताती हैं पर वास्तविक ज्ञान विस्मृत कर देती हैं।

                                   उसकी बात मानकर जब केवल संदेशों वाली गीता खरीद करअध्ययन किया तब से उस मित्र को हर मुलाकात में धन्यवाद देते हैं।  श्रीमद्भागवतगीता में इस संसार का रहस्य  बताने के साथ ही उसे पार करने की कला भी बतायी गयी है। संभव है यह इस लेखक का अल्पज्ञान हो फिर जब भी कहीं गीता का नाम लेकर अच्छी बात कही जाती है तो ऐसा लगता है कि वह तोड़मरोड़कर पेश की गयी है। सच बात तो यह है कि गीता में किसी काम को अच्छा या बुरा नहीं कहा गया है बल्कि उसमें कर्म और उसका परिणाम का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। उसके अनुसार आप जैसा जीवन जीना चाहते हैं उसके अनुसार अपने हृदय में संकल्प स्थापित करें। फिर उसके अनुसार आचरण करें।  आप लोगों के लिये हृदय में सद्भाव रखेंगे तो वह भी रखेंगे।  आप दूसरे से मधुर व्यवहार करेंगे तो दूसरा भी करेगा पर यह बातें स्पष्ट रूप से नहीं कही गयी है। गीता में कहीं भी नहीं कहा गया कि कर्म  ही मेरी पूजा है-उसमें निष्काम कर्म का सिद्धांत है जिसे व्यापक अर्थों मे समझने की आवश्यकता है। गीता में दया करने के स्पष्ट संदेश की बजाय  निष्प्रयोजन दया का सिद्धांत है   जिसे आमतौर से  गीतावाचक स्पष्ट नहीं कर पाते।

                                   गीता में सहज जीवन के लिये नारे नहीं वरन् संदेश हैं जिन पर चलने पर ही आनंद का अनुभव होता है। अगर हम कहते हैं गीता में सभी पर दया दिखाने, सभी से  मधुर बोलने, सभी को समान समझने तथा सभी का हित करने के लिये कहा गया है तो तय बात है कि हमने गीता का सार नहीं समझा।  गीता के आधार पुरुष श्रीकृष्ण का मंतव्य यह है कि सत्कर्म कर मनुष्य किसी पर अहसान नहीं करता वरन् अपने लिये सहज वातावरण बनाता है। जब हम दूसरे पर दया करने की बात कहते हैं तो हम सामने वाले को शक्तिशाली होने की अनुभूति भी कराकर उसमें अहं पैदा करते हैं जो गलत है, जबकि श्रीगीता के अनुसार तो हर मनुष्य गुणों के वशीभूत एक कमजोर जीव है-यही बात समझाने की है। मनुष्य सत्कर्म से किसी की सहायता नहीं करता वरन् अपना उद्धार करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण का मंतव्य है-ऐसा गीता में स्पष्ट नहीं कहा गया पर हम भक्ति भाव से गीता का अध्ययन करने के बाद ऐसा समझ पाये हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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भक्तों को भोला या मूर्ख समझना अज्ञानता का प्रमाण-हिन्दी चिंत्तन लेख


                                   11 किलो सोने के आभूषण पहनने वाला एक बाबा 25 सुरक्षाकर्मियों के साथ चलता है तो एक कथित महिला धार्मिक संत बिकनी पहनकर फोटा खिंचवाती है़।  दोनों के पास कथित रूप से भक्तों का जमावड़ा है पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारतीय धर्म के लोग मूर्ख हैं।  इस तरह तो हम उन लोगों को भी मूर्ख कह सकते हैं जो फिल्मों में पैसा खर्च कर मनोरंजन करने जाते हैं।  दरअसल हर मनुष्य में मनोरंजन की भूख होती है और धर्म की आड़ में आकर्षण पैदा कर अपनी रोजी रोटी चलाने वाले उसका लाभ उठाते हैं।  यह बुरा है या अच्छा यह अलग से चर्चा का विषय है पर इतना तय है कि अध्यात्मिक ज्ञानी ऐसे लोगों के पास जाने वालों  को मूर्ख या भोला नहीं मानते।

                                   भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि भक्त चार प्रकार के होते हैं-अर्थार्थी, आर्ती, जिज्ञासु और ज्ञानी। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ज्ञानी भक्त ही मुझे सबसे प्रिय हैं। ज्ञानी ऐसे संतों के पास नहीं जाते पर निरंकार का उपासक होने के बावजूद कभी कभी ज्ञानार्जन और भक्ति के लिये साकार भक्ति के उपासना स्थल पर चले जाते है। । जहां तक धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वालों की बात है तो सच तो यह है कि राजसी वृत्ति के लोग अपने काले धंधे ऐसे ही लोगों के नाम पर कर रहे हैं जो उनके सामने किराये की भीड़ लगाकर उनके प्रचार का काम करते हैं। इसी प्रचार से अनेक लोग यह तमाशा देखने की इच्छा से चले जाते हैं।

                                   कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे संतों पर चाहे जैसी टिप्पणियां कर लें पर भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा मानने वालों को भोला या मूख कतई न कहें। जो कहेगा हमारी दृष्टि से अज्ञानी होगा।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है-गुरू पूर्णिमा पर विशेष हिन्दी लेख


            आजकल एक संत को भगवान मानने या मानने के विषय को  लेकर प्रचार माध्यमों पर बहस चली रही है। हमारे यहां इतिहास में अनेक कथित चमत्कारी संत हुए हैं पर जिन संत की चर्चा हो रही है उन पर बाज़ार के सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों की विशेष श्रद्धा रही है। आज के आधुनिक युग में बाज़ार तथा प्रचार का संयुक्त उपक्रम किसी को भी भगवान बना सकता है और मामला बिगड़े तो शैतान भी बना सकता है।  बहरहाल अध्यात्मिक और योग साधकों के लिये ऐसी उन संत के भगवान होने या न होने पर चर्चा मनोरंजक हो सकती है तो साथ ही अपनी साधना पर चिंत्तन करने का अवसर भी प्रदान करती है।

            इस बहस में कथित रूप से अनेक धार्मिक विद्वान शामिल हो रहे हैं।  भारतीय अध्यात्म के पुरोधा होने का दावा करने वाले अनेक श्वेत और केसरिया वस़्त्र पहनने वाले सन्यासी भी इस बहस में प्रचार के लोभ की वजह से शामिल हो रहे हैं। चर्चित संत को मानने वाले इस देश में बहुत हैं पर एक बात तय है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से उनका कोई महत्व नहीं है।  उनके नाम पर कोई एक समाज नहीं रहा  पर बहस कर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई अलग समूह है जो केवल आर्त भाव की भक्ति में लीन रहना चाहता है। हमारा तो यह मानना है यह बहस ही प्रायोजित है क्योंकि चुनाव के बाद इस समय कोई सनसनीखेज विषय नहीं है जिस पर प्रचार माध्यम अपना विज्ञापन का समय पास कर सकें इसलिये धर्म से जुड़ा विषय ले लिया है।

संत कबीरदास कहते हैं कि

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हरि सुमिरन सांची कथा, कोइ न सुनि है कान|

कलिजुग पूजा दंभ की, बाजारी का मान||

            सरल हिन्दी में व्याख्या-यदि कोई श्रद्धापूर्वक हरि की कथा कहे तो उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है और धर्म का बाज़ारीकरण वाले को सम्मान मिलता है।

कालि का स्वामी लोभिया, पीतल की खटाय।

राज दुवारें यौं फिरै, ज्यों हरियाई गाय।

            सरल हिन्दी में व्याख्या-इस कलियुग का स्वामी लोभ है जहां पीतल को खटाई में रखकर चमकाया जाता है। लोभी स्वामी राज दरबारों का रुख उसी तरह करते हैं जैसे गाय हरियाली की तरफ जाती है।

            अगर हम भारतीय समाज के अध्यात्म यात्रा को देखें तो हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ है जो पूज्यनीय तथा पठनीय है पर श्रीमद्भागवत गीत ने सभी का सार ले लिया है।  इसलिये यह माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का सबसे मजबूत आधार उसके संदेशों पर ही टिका है।  श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने वालों को इस तरह की बहस में अपनी राय व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता और न ही वह चाहते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों से इतर लोगों में इस पर चर्चा करना निषिद्ध किया है।

            अनेक सन्यासी इस बहस में आ रहे हैं पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अवलोकन करें तो उनके सन्यासत्व पर ही प्रश्न उठ सकते हैं।  उनका व्यवहार इस तरह है जैसे कि वह कोई धर्म के बहुत बड़े प्रवर्तक हैं।  एक बात यह सन्यासी भूल रहे हैं है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त हमेशा ही रहेंगे-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जब इस समय महंगाई, बेकारी, बीमारी तथा अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है तो भय और आशंकाओं से ग्रसित लोग उससे उपजे तनाव के विसर्जन  के लिये नये मार्ग ढूंढ रहे हैं तो यह उनका अधिकार है। हमारे यहां भगवान की आरती की परंपरा रही जो कि अंततः आर्त भाव का ही परिचायक है। उसके बाद अर्थार्थी भाव के भक्तों का नंबर आता है। लोगों के अंदर जल्दी से जल्दी उपलब्धियां पाने की लालसा बढ़ी है इसलिये वह धर्म के नाम पर सिद्ध स्थानों का रास्ता पकड़ते हैं।  संसार के विषयों की स्थिति यह होती है कि समय आ गया तो काम सिद्ध नहीं तो इंतजार करो।  इस इंतजार में बीच लोग  दूसरा सिद्ध स्थान ढूंढने जाते है।  काम बन गया तो भक्त सिद्ध स्थान का स्थाई पर्यटक बन जाता है।  ज्ञान साधकों के लिये यह स्थिति अचंभित करने वाली नहीं होती। भक्त भी तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी-यह जानने वाले ज्ञानी कभी किसी की भक्ति पर टिप्पणी नहीं करते। इन तीनों से आगे होते हैं योगी जिनको ज्ञान भक्ति का प्रतीक माना जाता है जो ध्यान के माध्यम से अपनी आत्मा और मन का संपर्क करने में सफल होते हैं तब उन्हेें किसी अन्य प्रकार की भक्ति से प्रयोजन नहीं रह जाता-वह निरंकार परमात्मा का स्मरण करते हैं जो सामान्य मनुष्य के लिये सहज नहीं होती।  यह अलग बात है कि गेरुए और श्वेत वस्त्र धारण करने वाले अनेक लोग धर्म का झंडा उठाये स्वयं के योग होने का प्रचार करते हुए शिष्य समुदाय का संग्रंह का प्रचार करवाते हैं।

            हमारे यहां अनेक ऐसे कथित संत हुए हैं जिनके भगवान होने का प्रचार कर बाज़ार तथा प्रचार समूह अपना व्यवसायिक हित साधते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां भक्ति में फैशन आ जाता है। यह अलग बात है कि हमारे यहां प्राचीन अध्यात्मिक पुरुषों-भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण-की ऐसी महत्ता है कि भारतीय जनमानस उसे कभी विस्मृत नहीं कर सकता।  इसी दृढ़ विश्वास के कारण अध्यात्मिक ज्ञान तथा योग साधक कभी किसी के भगवान होने के दावे पर चिंतित नहीं होते और न ही उनकी भक्ति तथा भक्तों पर प्रतिकूल टिप्पणी कर अपने ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं।

 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

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समाज का भला करने वाले नाटक नहीं करते-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


      भारत में लोकसभा चुनाव 2014 के लिये कार्यक्रम घोषित किये जा चुका है।  शुद्ध रूप से राजसी कर्म में प्रवृत्त लोगों को लिये एक तरह से यह चुनाव कुंभ का मेला होता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई मनुष्य  पूर्ण रूप से सात्विक  या तामसी प्रवृत्ति का हो अपने जीवन निर्वाह के लिये अर्थार्जन का कार्य करना ही पड़ता है जो कि एक तरह से राजसी प्रकृत्ति का ही होता है।  दूसरी बात यह भी है कि राजसी कर्म करते समय मनुष्य को राजसी प्रकत्ति का ही अनुसरण करना चाहिये इसलिये ज्ञानी या सात्विक प्रकृत्ति के व्यक्ति में अर्थार्जन के लिये उचित साधन होने पर उसकी क्रियाओं में दोष देखकर यह मान लेना कि वह अपनी मूल प्रकृत्ति से दूर हो गया, यह विचार धारण करना गलत होगा।  ज्ञानी और सात्विक व्यक्ति राजसी कर्म करने के बावजूद उसमें अपने मूल भाव का तत्व अवश्य प्रकट करते हैं। इसके विपरीत जो राजसी प्रकृत्ति मे हैं वह राजसी कर्म करते समय किसी सिद्धांत का पालन करें यह आवश्यक नहीं होता।  उनके लिये अपना ही लक्ष्य सर्वोपरि होता है। देखा जाये तो सामान्य गृहस्थ हो या राजकीय कर्म करने वाला विशिष्ट व्यक्ति दोनों का लक्ष्य अर्थोपार्जन करना ही होता है।  सामान्य गृहस्थ जहां अपनी गृहस्थी का राजा होता है वहीं राजकीय व्यक्ति को किसी उपाधि की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।  राजकीय कर्म तो राजसी प्रकृत्ति से ही किये जा सकते हैं इसलिये वहां पूर्ण सैद्धांतिक शुचिता के पालन की अनिवार्यता की आशा व्यर्थ ही की जाती है। 

भृर्तहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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पद्माकरं दिनकरो विकची क्ररीति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवातम्।।

नाभ्यार्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति संतः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-सूर्य बिना याचना किये ही कमल को खिला देता है, चंद्रमा कुमुदिनी को प्रस्फुटित कर देता है। बादल भी बिना याचना के ही पानी बरसा देते हैं। इसी तरह सत्पुरुष अपनी ही अंतप्रेरणा से ही परोपकार करते हैं।

      लोकतंत्र में चुनावों के लिये उतरने वाले लोग आम जनमानस को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं।  अनेक तरह के वादे तथा आश्वासन देने के साथ ही वह आमजनों को धरती पर ही स्वर्ग दिखाने का सपना दिखाते हैं। एक तरह से देखा जाये तो लोकतांत्रिक राजकीय प्रणाली ने विश्व में पेशेवर शासकों की पंरपरा स्थापित की है। प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति या अन्य कोई जनप्रतिनिधि वह खजाने से अपने व्यय के लिये प्रत्यक्ष रूप से धन नहीं ले सकता वरन् वह एक सेवक की तरह उसे वेतना प्रदान किया जाता है।  यह अलग बात है कि जितना बड़ा राजकीय पद हो वहां विराजमान व्यक्ति को राज्य के धनपति, साहुकार, तथा उद्योगपति उसी के स्तर के अनुसार भेंट देने के लिये तत्पर रहते हैं जैसे पहले राजाओं को मिलते थे।  हमारे ग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण है जब राजपद धारण करने पर राज्य के जमीदार, साहुकार तथा धनवान अपने राजा को भेंट देते थे।  इस तरह की भेंट लेना कम से कम हम जैसे अध्यात्मिक दृष्टि से कोई गलत नहीं है। यह  अलग बात है कि राजपद पाने के लिये उत्सुक लोग स्वयं को एक त्यागी व्यक्ति के रूप में प्रचारित कर जनमानस का हृदय जीतने का प्रयास करते हैं।  त्याग का भाव सात्विक कर्म का परिचायक है जिसकी उपस्थिति राजसी कर्म  में नहीं की जा सकती।

      यही से आधुनिक लोकतंत्र में अनेक नाटकों का प्रारंभ हो जाता है। इधर उदारीकरण ने निजी क्षेत्र को अधिक अवसर प्रदान किये हैं।  तेल से लेकर खेल तक और संचार साधनों से लेकर प्रचार माध्यमों तक पूंजीपतियों का एकछत्र राज्य हो गया है। मनोरंजन कार्यक्रमों में फूहड़ कामेडी तो समाचारों में नाटकीय घटनाक्रम को महत्व मिल रहा है।  कभी कभी तो यह लगता है कि फिल्म के अभिनेता फिल्म या धारावाहिक में पटकथा के आधार पर जिस तरह अभिनय करते हैं उसी तरह खिलाड़ी भी मैच खेलते हैं।  उससे ज्यादा मजेदार बात यह है कि अनेक लोग तो केवल इसलिये समाज सेवा या राजकीय उपक्रम इस तरह करते हैं ताकि उनको प्रचार माध्यमों में स्थान मिलता रहे।  हालांकि प्रचार माध्यम उनकी मजाक उड़ाते हैं पर फिर भी उनके बयानों पर बहस और चर्चा करते हैं जिसके दौरान उनके विज्ञापनों का समय खूब पास होता है। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रचार प्रबंधक और बाज़ारों के स्वामियों का कोई संयुक्त उपक्रम हैं जो इस तरह के नाटकीय पात्रों का सृजन कर रहा है जिससे समाज अपनी समस्याओं को भूलकर मनोरंजन में लीन रहे।  कोई जनविद्रोह यहां न फैले वरन् यथास्थिति बनी रहे।

      अब तो समाचार और नाटकों में कोई अंतर ही नहीं दिख रहा।  जैसे जैसे यह चुनाव पास आयेंगे उसी तरह नाटकीय का दौर बढ़ेगा यह बात प्रचार माध्यमों के प्रबंधक स्वयं कह रहे हैं। योग तथा अध्यात्मिक साधकों ने जिज्ञासावश नहीं वरन् कौतूहल से इस नाटकीयता को देखें।  यह नाटकीय लोग देश और समाज की फिक्र करते दिखते हैं। आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था को जनोन्मुखी बनाने का दावा करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि समाज सेवा का व्रत इस तरह लिया है जिसमें चंदा और भेंट मिलती रहे। हम यह समझ लेना चाहिये कि परोपकारी लोग कोई प्रचार नहीं करते। वह कोई योजना नहीं बनाते।  सबसे बड़ी बात यह है कि वह कोई दावा नहीं करते।  हमारा देश तो वैसे भी भगवत्कृपा से संपन्न है।  इसे कोई संपन्न क्या बनायेगा? गरीबों को कोई अमीर बना नहीं सकता और कोई लालची अमीरों के आगे हाथ फैलाने से कोई बच नहीं सकता।  कुछ लोग गरीब हैं पर वह भिखारी नहीं है जिसे यह लोग संपन्न बनाने का दावा करते हैं। गरीब अपने श्रम पर जिंदा हैं और इनमें से अधिकतर जानते हैं कि उनके भले का नारा लगाकर कोई भी राजकीय पद प्राप्त कर लें पर फायदा देने वाला नहीं है।  अंततः उनको अपने श्रम का पैसा किसी धनी से ही मिलता है इसलिये उसके मिटने की कामना भी वह नहीं करते। राज्य बना रहे यही कामना उनकी भी रहती है ताकि उनका जैसा भी घर चल रहा है वैसे चलता भी रहे। परोपकार का दावा करने वालों से वह भीख मांगने नहीं जाते यह अलग बात है कि इस तरह के ढोंग में लीन लोगों को अपने लोकप्रिय होने की खुशफहमी प्रचार की वजह से हो जाती है।

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