श्रीमद्भागवत गीता के सैद्धांतिक सूत्रों का व्यवहार में परीक्षण आवश्यक-हिन्दी चिंत्तन लेख


            श्रीमद्भागवत्गीता ग्रंथ की रचना के 5151 वर्ष पूरे हो गये हैं ऐसा कुछ विद्वानों ने बताया है। कम से कम एक बात तो समाज ने मान ली कि भगवान श्रीकृष्ण का लीलाकाल इससे अधिक पुराना नहीं।  इधर कुछ ज्योतिष और खगोल शास्त्रियों ने भी मिलकर भगवान श्रीराम के लीला काल को सात हजार वर्ष पुराना प्रमाणित करने का प्रयास किया है।  यह भी माना जा रहा है कि भारत श्रीलंका के बीच निर्मित रामसेतु  भी स्वाभाविक रूप से बना है।  भारतीय अध्यात्म के दो महानायकों के बारे में खोज चलना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। रामायण में जहां भगवान श्री राम ने सामाजिक मर्यादा का ज्ञान कराया तो महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन के रहस्यों से परिचय कराया।  यह अलग बात है कि भगवान श्रीराम और कृष्ण के प्रति आस्था दिखाकर अपने लिये अर्थसिद्ध करने वाले ठेकेदारों की हमारे देश में कमी नहीं है।

            आजकल हमारे देश में विश्व गुरु के रूप में पुनः प्रतिष्ठत करने का नारा चल रहा है।  हमारी दृष्टि से तो रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा श्रीमद्भागवत गीता तथा प्राचीन ग्रंथों   की उपस्थिति तथा उनकी वैश्विक स्वीकार्यता के कारण हमें यह श्रेय वैसे भी मिलता है।  यह अलग बात है कि हमने स्वयं ही पाश्चात्य में सृजित संस्कृति, साहित्य और साधनों को अपना इष्ट मानकर उनसे विरक्ति कर ली है पर इसके बावजूद हमारा विश्व गुरु का पद बना हुआ है।  जरूरत हमें अपनी पुरानी राह चलने की है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार हमें विज्ञान का भी ज्ञाता होना ही चाहिये। केवल ज्ञान के शब्दकोष के सहारे जीवन गुजारना से नीरसता आती है।  हमने नये विज्ञान पर अपनी पूरी बुद्धि निछावर कर दी है और ज्ञान को धारण करने का संकल्प त्याग ही दिया है।

            श्रीगीता के ज्ञान साधकों के लिये यह ग्रंथ ही वास्तविक गुरू होता है। कुछ लोग मानते  हैं कि पाश्चात्य सभ्यता-जिसे हम अंग्रेजी भी कहते हैं- अत्यंत व्यापक दृष्टिकोण वाली है और उसने भारत में आकर समाज सुधार किया है। हमारा विचार इससे विपरीत है।  हमारा मानना है कि जब यहां परिवहन के साधन सीमित थे तब भी लोग मध्य एशिया तक यहां से गये और वहां ये आये।  उस समय कोई परिवहन के तीव्रगति वाले साधन नहीं थे तब भी लोगों का भ्रमण बिना वीजा और पासपोर्ट के होता था।  भारत में पुर्तगााली, फ्रांसिसी और अंग्रेजों के आने के बाद संकीर्णता ही बढ़ी है हमारा ऐसा मानना है।  मनुष्य का मन आकाश में उड़ने को करता है। नहीं उड़ पाता तो दूर तक जाने की इच्छा तो होती है।  पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से हुआ यह कि अब अमृतसर से लाहौर और मुंबई से कराची जाने जाने के लिये वीजा और पासपोर्ट चाहिये जबकि कभी उन्मुक्त भाव से आना जाना हो सकता था।

            श्रीमद्भागवत गीता आत्म संयम रखने की ऐसी कला सिखाती है जिसे जीवन उन्मुक्त भाव से व्यतीत किया जा सकता है वरना  त्रिगुणमयी माया इस तरह फंसाये रहती है कि आदमी विषयों को छोड़ता और पकड़ता रहता है। जब मन विषयों से तंग होता है तो फिर मनोरंजन के लिये भी वही विषय चुनता है जिनसे दूर होना चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान का सैद्धांतिक अर्थ सभी जानते हैं वह उसे व्यवहार में कैसे लाया जाये यह कला सभी को नहीं आती। सीधी बात कहें तो ज्ञान होना और उसे धारण करना दो प्रथक विषय हैं।  जब तक  श्रीगीता के संदेशों का व्यवहारिक प्रयोग नहीं करेंगे तब तक तत्वज्ञान समझ में नहीं आ सकता।  जिस तरह विज्ञान के सभी छात्र सिद्धांत तो समझ लेते हैं पर व्यवहारिक प्रयोग में उनकी योग्यता परिलक्षित होती है।  इस पर गीता तो ज्ञान के साथ ही विज्ञान के संदेशों से भी भरी हुई है उसे व्यवहार में लाकर ही बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। ऐसा महान पवित्र ग्रंथ को किसी सांसरिक पुरुष की महत्व के बखान या प्रचार की सहायता की आवश्यकता नहीं होती वरन् सांसरिक विषयों में में लिप्त लोगों को ही उसके ज्ञान समझने की आवश्यकता है। श्रीमद्भागवत गीता का महत्व बखान करने का अर्थ यह कदापि नही है कि प्रचारक उसका ज्ञान भी समझते हैं।  भगवान श्रीकृष्ण ने श्री गीता के संदेशों को अपने ही भक्त में सुनाने का प्रतिबंध भी इसलिये ही लगाया हुआ है क्योंकि यह केवल उनके समझ में ही आ सकती है। 5151 वर्ष पूर्व सृजित गीता के संदेश प्रारंभ में पढ़ने पर उकताहट आ सकती है पर जब इसका ज्ञान व्यवहारिक प्रयोगों के साथ मस्तिष्क धारण करता है तब इसका हर  श्लोक रुचिकर लगता है। इतना ही नहीं अगर श्रीमद्भागवत गीता का अगर रोज अध्ययन किया जाये तो ऐसा लगता है कि हर बार नयी बात सामने आ रही है।  इसका ज्ञाता क्षेत्रज्ञ भी कहलाता है। पश्चिमी विज्ञान अभी तक प्रकृति का पूरा क्षेत्र नहीं जान  सका है पर जो श्रीगीता पढ़ लेगा वह पूरी सृष्टि का सत्य जान लेगा।  भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति के भाव तथा ज्ञान धारण करने के संकल्प के साथ पढ़ने पर ही श्रीमद्भागवत गीता का महत्व समझ में आ सकता है। तब उसका प्रचार करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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