नस्लीय गुणों को धार्मिक पहचान से ढंकने की कोशिश बेकार-पाकिस्तान के पेशावर पर आतंकवादी हमले पर हिन्दी चिंत्तन लेख


            पेशावर में सैन्य स्कूल पर हमले में घायल एक बालक ने पलंग पर सोते हुए दिये गये साक्षात्कार में कहा-‘‘मैं बदला लूंगा। उनकी पूरी नस्ल मिटा दूंगा।’

            वह बालक था जिसमें ऐसे विचार आप नहीं आ सकते।  उसके विचारों में कहीं न कहीं उसके परिवार की सोच परिलक्षित हो रही थी। तय बात है कि उसके माता पिता, दादा दादी, नाना नानी अथवा चाचा चाची में किसी विशेष नस्ल के प्रति दुराग्रह रहा होगा जो उसकी जुबान में प्रकट हो रहा था।  जब वह नस्ल मिटाने की बात कर रहा था तो वह जानता था कि वह जिन्होंने उस पर हमला किया वह किसी दूसरी नस्ल जाति, भाषा या क्षेत्र से जुड़े हैं।  भारतीय प्रचार माध्यम तथा यहां के विद्वान उसके इस वचन से दृष्टि ज्यादा देर तक नहीं रख पाये पर सच यह है कि धार्मिक विचाराधाराऐं क्षेत्र, जाति, भाषा तथा व्यवसायिक आधारों पर बने सामाजिक उपविभाजनों की सत्यता से परे नहीं ले सकीं हैं यह अब प्रमाणित हो गया है।

            मध्य एशिया में आतंकवादियों से निकाह न करने पर 150 महिलाओं को मार दिया गया।  यह खबर पाकिस्तान के पेशावर में आतंकी हमले में 141 बच्चों को मारने की घटना के तत्काल बाद हुई।  दोनों ही घटनाओं में मरने और मारने वाले एक ही धार्मिक विचाराधारा से जुड़े थे-यह तथ्य सतही बौद्धिक चिंत्तन करने वालों के लिये महत्वपूर्ण नहीं हो सकता पर तत्व ज्ञान के साधक इसमें बहुत कुछ देख सकते हैं।  कथित धार्मिक विचाराधाराऐं आकाश से प्रकट बताकर लोगों पर थोपी जाती हैं जबकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों की मानसिकता दूसरी होती है।  हम कहते हैं कि सर्वशक्तिमान ने संसार बनाया है तो याद रखें उसने यहां विभिन्न प्रकार के जलचर, नभचर और थलचर जीवों की रचना की है। आकाश में उड़ने वाले सभी कबूतर नहीं होते वरन, कौआ, चिड़िया, गिद्द तथा उल्लू भी होते हैं। सभी धरती पर आते हैं।  जलचरों में मगरमच्छ भी होते हैं तो मछलियां भी वहां विचरती हैं। जलचर भी कभी धरती पर चले आते हैं।  थलचरों को धरती पर विचरना ही है पर उनमें भी नस्ल होती है-गोरे, काले और गेहुए रंग के चेहरे ही नस्ल की पहचान होते हैं यह आवश्यक नहीं है।  वरन् जलवायु से भी उनमें नस्लीय वैविधता आती है जिसे जानने के लिये तत्व ज्ञान और विज्ञान के सूत्रों की जरूरी है।

            दो नस्लें तो स्पष्ट रूप से ही होती हैं-असुर और दैवीय।  उसके बाद जलवायु के आधार पर विभाजन होते हैं। फिर भाषा, जाति, तथा क्षेत्र के विभाजन भी सामने आते हैं।  कृत्रिम धार्मिक विचाराधाराओं के आधार पर मनुष्य जाति को समूहबद्ध करने की योजनायें काम नहीं करतीं यह अब तय हो गया है। हम यहां धार्मिक विचारधाराओं के आधार पर समूहों को देखने की कोशिश की चर्चा कर रहे हैं जिनके आधार पर मनुष्य समाज को संचालित करने के प्रयास नाकाम हो चुके हैं।  इसके विपरीत इन धार्मिक विचाराधाराओं की रेत में आज के विद्वान शुतुरमुर्ग की तरह  नस्लीय अहंकार की वजह से चल रहे संघर्षों से मुंह छिपा रहे हैं।

            प्रचार माध्यमों में हमलावरों के घटना से पूर्व का चि़त्र देखने से पता चलता है कि वह पाकिस्तान की कथित आधुनिक सभ्रांत सभ्यता से अलग वह प्राचीन पद्धति से जीने वाले लोग हैं। कहने को वह भी पाकिस्तान की राजकीय तौर से मान्यता प्राप्त धार्मिक विचाराधारा को मानने वाले थे पर कहीं न कहीं उनके अंदर अपने साथ अन्याय, भेदभाव तथा सामान्य जीवन सुविधाओं के अभाव के प्रति एक असंतोष था जो इस हमले में रूप में प्रकट हुआ। हमलावरों के समर्थक कहते हैं कि यह वजीरिस्तान में में पाक सेना की हमले का जवाब हैं जिसमें हमारे बच्चे मर रहे हैं।  स्पष्टतः पाकिस्तान के दूर दराज के उन इलाकों पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की नजर नहीं गयी जहां पाकिस्तान का पंजाब में रहने वाला सभ्रांत वर्ग अपना सम्राज्य बनाये रखने के लिये अपनी शक्ति का उपयोग धर्म तथा राज्य के नाम पर कर रहा है। पाकिस्तान में एक तरह से नस्लीय युद्ध चल रहा है।  अगर बालक किसी नस्ल को मिटाने की बात कर रहा है तो कहीं न कहीं वह समूचे पाकिस्तान के सभ्रांत वर्ग मे मौजूद विचार को ही प्रकट कर रहा है जिसके अंदर नस्लीय भाव मौजूद है।

            इससे एक बात तय हो गयी कि मनुष्य की दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति उसका सबसे बड़ा ध्येय होता है। उसमें बाधा पड़ने पर उसमें नाराजगी आती है और तब वह प्रतिकूल होकर कदम उठाता ही है।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में मनुष्य की पहचान बताई गयी है।  यही कारण है कि विश्व में सत्य की निकट सबसे अधिक हमारी ही विचाराधारा मानी जाती है। पाकिस्तान का अस्तित्व चूंकि भारत और यहां से प्रवाहित धर्मों का विरोध पर ही टिका है इसलिये उससे किसी सार्थक बदलाव की आशा करना ही व्यर्थ है। वैसे भी पाकिस्तान एक देश नहीं वरन् विभिन्न नस्लीय समुदायों और भाषाओं के समूहों पर टिका है जिसने धार्मिक विचाराधारा के आधार पर एकरूप बनने का निरर्थक प्रयास किया है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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