भारत स्वच्छ अभियान की सफलता में कचरे के निष्पादन के लिये आधुनिक तकनीकी का उपयोग आवश्यक-हिन्दी चिंत्तन लेख


            भारत स्वच्छ अभियान प्रारंभ हो गया है।  प्रचार माध्यमों ने इस पर जमकर चर्चा और बहसें कर अपने विज्ञापन प्रसारण का समय बहुत अच्छे ढंग से पास किया।  अगर हम बहस में भाग लेने वाले विद्वान तथा संयोजकों के विचारों को देखें तो ऐसा लगता है कि जैसे यह पांच वर्षीय अभियान का प्रतीकात्मक प्रारंभ न होकर कोई एक दिवसीय  कार्यक्रम हो।  गांधी जयंती पर प्रारंभ इस अभियान पर स्वच्छता रखने की शपथ तो ली गयी पर आजकल कचड़ा किस प्रकृत्ति का है यह किसी ने न बताया न सुना।  जिस तरह विज्ञान ने मनुष्य जीवन के रहन सहन का रूप बदला है वैसे ही कचड़े ने भी अपना रूप बदला है। पहले कचड़ा प्राकृतिक पदार्थों से ही-पेड़ के पत्ते, पुट्ठा और कागज तथा खाने पीने के फैंके गये अवशेष-का ही होता था जबकि अब प्लास्टिक ने कचड़े को एकदम क्रूरतम रूप प्रदान कर दिया है।  मार्ग में आवारा घूमने वाले पशु खाद्य पदार्थों के अवशेषों के साथ उसमें पडी प्लस्टिक भी थैलियां भी खा जाते हैं जो अंततः उनका जीवन ही संकटमय हो जाता है।

            बहसों में कुछ लोगों महत्वपूर्ण बातें बतायीं। उनमें तो एक यह थी  जिन देशों मे ंकचड़ा उठाने और नष्ट करने के लिये आधुनिक यंत्रो का प्रयोग किया जाता है उनके शहर और गांव स्वच्छ दिखते हैं।  इन विदेशी शहरों के चित्रों या चलचित्रों में उनकी चकाचौंध देखकर हमारे देश का सामान्य नागरिक आहें भरने लगता है।  यह आरोप तो हम सभी पर है कि कचरा फैलाने में उस्ताद हैं इसलिये अगर हमें स्वच्छ भारत रखना है तो कचरा उचित जगह पर फैंके, यही शर्त पूरी कर अपनी शपथ निभा सकते हैं।  आजकल खाने पीने का सामान प्लास्टिक में बंद मिलता है।  उपयोग करो और फैंकों पर चल रही हमारी उपभोग नीति के चलते हमारी बुद्धि ऐसे मार्ग पर चल रही है जिसमें स्चच्छता के लिये हमें शपथ लेनी पड़ी है।  सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने से हमें बचना चाहिये। यह विचार करना चाहिये कि हम तो गंदगी फैंककर चले जायेंगे पर दूसरे की आंखों और नाक को इससे परेशानी होगी।

            यह तो नागरिकों की जिम्मेदारी वाली बात हुई।  अब आती है कचरा निष्पादन करने वाली सरकारी, अर्द्धसरकारी या फिर उन निजी कंपनियों की जिन्होंने सार्वजनिक स्थानों की सफाई का ठेका लिया है क्या वह इसके लिये तैयार हैं?  भारत में गंदगी दिखने का यह भी एक कारण है कि कचरा का निष्पादन करने के लिये मशीनों के उपयोग के अधिक उपयोग की जानकारी नहीं है। खासतौर से प्लास्टिक वाले कचरे के बढ़ते उपयोग की वजह से कचरा निष्पादन के लिये आधुनिक यंत्रों का उपयोग अत्यंत जरूरी माना जाने लगा है।  नागरिकों पर इसका जिम्मा डालना गलत होगा।  कहने का अभिप्राय यह है कि कहीं न कहीं अंततः जिम्मा राज्य कर्मियों पर आयेगा।  इसके लिये युद्धस्तर पर प्रयास करने होंगे।  वैसे प्लास्टिक का कचरा कई बार दर्दनाकर दृश्य भी पैदा करता है। अनेक बार चार पांच बच्चों के झुंड इस तरह के कचड़े को अपने कंधे पर रखे थैले में भरते देखे जा सकते हैं।  यह लोग इतने मैले कपड़े पहने रहते हैं कि आवारा कुत्ते उन पर भौंकने लगते हैं।  कुछ वीरता पूर्वक उनके बीच से निकलते हैं तो कुछ रास्ता बदल जाते हैं। रेल्वे स्टेशनों पर पानी की फैंकी गयी प्लास्टिक बोतलों को समेटकर कर उनमें फिर पानी भरने के समाचार भी आते हैं।

            कचरा उचित स्थान पर फैंकना नागरिक की जिम्मेदारी है-यह बात हम दोहराते हैं। लोग इसे अपनी आदत बना लें।  बाहर ही नहीं घर में भी किसी सामान का अवशेष फैंकना हो तो अपने घर में कचरे के डिब्बे में ही फैंकें। हमारा तो अनुभव यह है कि हम सोने, बैठने और काम करने के दौरान अगर अस्वच्छ जगह पर होते हैं तो वह उससे मानसिक कष्ट होता है पर इसे पहचान नहीं पाते।  साफ सुथरे स्थान पर सोने, बैठने और काम करने का सुख भी पता नहीं चलता।  यह भी संभव है जब ध्यान आदि जैसी  अध्यात्मिक विधा का अभ्यास के साथ ही  एकांत में आत्ममंथन करें।  बाहरी आंखों से देखें तो अंतर्मन में विचार भी करें।  एक बात तय रही है कि स्वच्छता ही स्वर्ग का पर्याय है। अपनी संवेदनशील इंद्रियों से साक्षात्कार करें तो इसका आभास सहजता से हो सकता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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