सार्वजनिक जगहों पर कूड़ा करना अपराधिक कृत्य-मनुस्मृति के आधार चिंत्तन लेख


            हमारे देश में सार्वजनिक स्थानों, मार्गों तथा उद्यानों में भारी गदंगी होने के समाचार आते हैं। अनेक पुराने लोग यह शिकायत करते मिलते हैं जो राजतंत्र के समय शहर के साफ होने की बात कहते हुए आधुनिक लोकतंत्र में व्यवस्था चौपट होने का दावा करते हैं पर सच यह है कि उस समय उपभोग की ऐसी प्रवृत्ति नहीं थी जैसी कि आज है।  लोगों का खान पान अब घर से अधिक बाहर हो गया है।  अंडे, मांस, सिगरेट, शराब, तथा तैयार  खान पान के सामानों का उपभोग बाजारों में धड़ल्ले से होने लगा है जिससे कचरे का भंडार कहीं भी देखा जा सकता है।  ऐसा नहीं है कि बाजारों में ऐसी वस्तुओं का उपभोग बढ़ा हो वरन् लोग घरों में मंगवाकर भी इन्हें सड़क पर ही फेंकते हैं।

            वर्षा ऋतु में पिकनिक मनाने की परंपरा बन गयी है, यह अलग बात है कि यही ऋतु भोजन के पाचन की दृष्टि से संकटमय मानी जाती है।  आजकल पंचसितारा निजी चिकित्सालयों में इसी ऋतु में भीड़ लगती है।  हर जगह कचरा कीचड़ में तब्दील हो जाता है और इससे महत्वपूर्ण जलस्थल तथा उद्यान सामान्य पर्यटकों के सामने बुरे दृश्य लेकर उपस्थित रहते हैं।  कहा जाता है कि प्लास्टिक कभी नष्ट नहीं होती मगर सभी वस्तुओं को इसी में बांधकर उपभोक्ता को दिया जाता है। अनेक शहरों में  इस प्लास्टिक ने सीवर लाईनों को अवरुद्ध करने के साथ ही नदियों और नालों को प्रदूषित कर दिया है।  हमारे यहां पर्वतों तथा नदियों को पूज्यनीय बताया जाता है पर हिमालय और उससे निकलने वाली नदियों पर जाने वाले कथित भक्तों ने किस तरह वहां अपनी उपभोग प्रवृत्तियों से प्रदूषण फैलाया है उस पर अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ नाखुशी जताते रहते हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

———–

समुत्सृजेद्राजमार्गे यस्त्वऽमध्यमनापदि।

स द्वौ कार्यापर्णे दद्यादमेध्यं चाशुशेधयत्।।

            हिन्दी में भावार्थ-सार्वजनिक मार्ग पर कूड़ा फेंकने वाले ऐसे नागरिक जो अस्वस्थ न हों उन पर अर्थ दंड देने के साथ ही उसकी सफाई भी करवाना चाहिये।

आपद्गतोऽधवा वृद्धो गर्भिणो बाल एव वा।

परिभाषणमर्हन्ति तच्च शोध्यमिति स्थितिः।।

            हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई संकट ग्रस्त, वृद्ध, गर्भवती महिला तथा बालक सड़क पर कचरा फैंके तो उसे धमकाकर सफाई कराना चाहिये।

            हमारे देश में मनस्मृति का विरोध एक बुद्धिमानों का समूह करता है। यह समूह कथित रूप से आम आदमी की आजादी को सर्वोपरि मानता है।  उस लगता है कि मनुस्मृति में जातिवादी व्यवस्था है जबकि सच यह है कि इसमें ऐसे अनेक महत्वपूर्ण संदेश है जो आज के समय भी अत्यंत प्रासांगिक हैं। एक तरफ समाज प्लास्टिक के रंग बिरंगे रूपों में बंधे सामानों को देखकर विकास पर आत्ममुग्ध हो रहा है  जबकि अनेक प्रकार के विषाक्त, मिलावटी तथा सड़े खानपान से जो बीमारियां पैदा हो रही हैं उस पर किसी का ध्यान नहीं है।  उससे अधिक यह महत्वपूर्ण बात है कि अनेक लोग सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने की बजाय वहां कचरा डालकर न केवल अपने लिये वरन् दूसरों को भी कष्ट देते हैं।  इसलिये जागरुक लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि वह कचरा उचित स्थान पर डालकर पुण्य का काम करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

टिप्पणियाँ

  • Ramchandra  On सितम्बर 9, 2014 at 4:44 अपराह्न

    (कितने बदल गए तुम)
    चाँद सूरज कोई न बदले पहले जैसे दिखते हैं!
    केवल मानब बदल रहे सब झूंथी शान दिखाते हैं!!
    निर्धन को तुम एक रुपैया दान नहीं कर सकते हो!
    बेटर को टिप देने में अपनी शान समझते हो!!
    पंगत में बैठ कर खाना दकियानूसी लगता है!
    पार्टी में छीना झपटी कर भोजन अच्छा लगता है!!
    फुट पाथ पै सब्जी लेने से इज़्ज़त घट जाती है!
    शापिंग माल में जेव कताना बात गर्व की लगती है!!
    सगी बहन कुछ लगे माँगने खर्च फिजूल समझते हो!
    गिर्ल फ्रेंड अगर माँगें अपना सौभाग्य समझते हो!!
    माँ बाप को एक गिलास पानी नहीं दे सकते हो!
    नेता के पीछॆ नीर लिए बेटर बन कर फिरते हो!!
    अपनी माँ के स्तन का जितना दूध पी जाते हो!
    उसे भैंस के थन का आधा दूध पिला न पाते हो!!
    माँ बाप को जीवित पै भोजन न खिलबा सकते हो !
    उनके मरने पै ब्राह्मण भोज खूब कर बाते हो!!
    बाप मरने पै अपना सिर मुंड बाने से कतराते हो!
    गजनी लुक दिखलाने हर मास शीश मुंड बाते हो!!

    Sent from my iPad

  • Ramchandra Gupta.  On सितम्बर 9, 2014 at 4:47 अपराह्न

                                  (कितने बदल गए तुम)
    चाँद सूरज  कोई  न बदले पहले जैसे दिखते हैं!
                       केवल मानब  बदल रहे सब झूंथी शान दिखाते हैं!!
    निर्धन को तुम एक रुपैया दान नहीं कर सकते हो!
                         बेटर को टिप देने में अपनी शान  समझते हो!!
    पंगत में बैठ कर खाना दकियानूसी लगता है!
                       पार्टी में छीना झपटी कर भोजन अच्छा लगता है!!
    फुट पाथ पै सब्जी लेने से इज़्ज़त घट जाती है!
                        शापिंग माल में जेव कताना बात गर्व की लगती है!!
    सगी बहन कुछ लगे माँगने खर्च फिजूल समझते हो!
                        गिर्ल फ्रेंड अगर माँगें अपना सौभाग्य समझते हो!!
    माँ बाप को एक गिलास पानी नहीं दे सकते हो!
                           नेता के पीछॆ नीर लिए बेटर बन कर फिरते हो!!
    अपनी माँ के स्तन का जितना दूध पी जाते हो!
                             उसे भैंस के थन का आधा दूध पिला न  पाते हो!!
    माँ बाप को जीवित पै भोजन न  खिलबा सकते हो !
                         उनके मरने पै ब्राह्मण भोज खूब कर बाते हो!!
    बाप मरने पै अपना सिर मुंड बाने से कतराते हो!
                         गजनी लुक दिखलाने हर मास शीश मुंड बाते हो!!

  • satyamchansoriya  On सितम्बर 14, 2014 at 6:27 अपराह्न

    आया कैसा समय देखो भाई जब कुत्तो से ज्यादा रात में इंसान भोकते हैं
    नशे में पड़कर मानवता की कब्र खोदते हैं
    आया कैसा समय देखो भाई जब कुत्तो से ज्यादा रात में इंसान भोकते हैं
    इन नव संस्कृतिक नशेड़ियो से आवारा कुत्ते भी डरते हैं
    आया कैसा समय देखो भाई जब कुत्तो से ज्यादा रात में इंसान भोकते हैं
    शायद शराब बनाने वालो ने भी इस नई नस्ल के बारे में ना सोचा था
    आया कैसा समय देखो भाई जब कुत्तो से ज्यादा रात में इंसान भोकते हैं
    कुत्ते भी इंसानो के हमदर्द माने जाते हैं
    पर ये नये कुत्ते तो ह्य्वॉनो को भी शर्मिंदा कर जाते हैं
    आया कैसा समय देखो भाई जब कुत्तो से ज्यादा रात में इंसान भोकते हैं
    आवारा कुत्तो को तो फिर भी रोटी की ज़दोजहद है
    पर इनके लिये तो मानो शराब ही अहम है
    आया कैसा समय देखो भाई जब कुत्तो से ज्यादा रात में इंसान भोकते हैं
    रात की तन्हाई को जो बदरंग किया करते है
    आया कैसा समय देखो भाई जब कुत्तो से ज्यादा रात में इंसान भोकते हैं

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: