तरक्की और तमीज-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


एकरसता में जीने का आदी विलासिता में फंसा समाज,

मौसम के बदलने से परेशान हो रहा है आज।

वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपनी ऊंची हैसियत पर

इतराते लोग भूख पर बहस में होते मशगूल,

बेबात के विषय को देते जोरदार तूल,

जिनके पेट चिकनी रोटी से भरे हैं,

महंगाई पर चर्चा करते हुए उनकी आंखों में आंसु भरे हैं,

कहें दीपक बापू सभी दे रहे हैं अपने अपने बयान

किसके हाथ में है हालातों पर काबू करने की ताकत

यह अभी तक बना हुआ राज है।

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तमीज नहीं आयी खाने पीने की मगर तरक्की हो गयी,

लड़खड़ाते कदम नशे में मगर सभ्य समाज में

बैठने की उनकी जगह पक्की हो  गयी।

उनके पास इतनी दौलत है कि लुटने का भय नहीं सताता,

खर्च करते हैं पानी की तरह मगर फिर भी मजा नहीं आता।

आसमान के सितारों जैसा स्वयं के  होने का उनको वहम है,

ज़माने पर ज्यादितयों से फेरते मुंह गोया उनका दिल नरम है।

चेहरे थे जिनके फुंके बल्ब की तरह अब चांद जैसे लगते हैं,

अंधेरे में रहते थे अब उनके घर शेर की मांद  जैसे लगते हैं।

कहें दीपक बापू दौलत और शौहरत खेलती इंसानों से

अपने खिलाड़ी होने पर लोग यूं ही इतराते हैं

गिर गयी नीयत भले ही हालात में तरक्की हो गयी।

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टिप्पणियाँ

  • Ramchandra  On सितम्बर 4, 2014 at 6:38 अपराह्न

    Deepak bharatdeep ko likhate hain ham namaste!
    Prbhoo Karen aap jaise Hindi prcharak rahen hanste!!
    Aap hamare pass bhejate achchi baton ki mail hai!
    Hamen to aisa lagata hai yah sajjan logon ka khil hai!!

    चढ़ बैठी सिर मंहगाई,हिम्मत न सव्जी लाने की!
    डालें अपनी आदत निर्धन,सूखी रोटी खाने की!!
    देख टमाटर की सूरत,भर आता मुख में पानी है!
    बीस रुपये में एक पाउ,मरती लेने में नानी है!!
    हाथ न रखने दे करेला,स्वाद दुष्ट का कडुआ है!
    चालीस में आधा केजी,लाने में डरती जुदुआ है!!
    पालक बथुआ व मोथी,यह गाय भैंस का चारा है!
    पाँच रुपये में एक गद्दी,लेता इनसान विचारा है!!
    देखें गौर से दल उरद,आधा तन जिसका काला है!
    चालीस में आधा केजी,देता बड़ पेटू लाला है!!
    हुई मूँग कव्जे से बाहर,दिखती ऊपर हरी हरी!
    चालीस की आधा केजी, माँगें मुद्रा बनिया खरी खरी!!
    पीएम चाहे बने कोई,मंहगाई न रुकने बाली है!
    जनता पिसती रहे सदा,यह सीता जैसे भोली है!!
    रावण राज्य अगर होगा,तो यह क्या कर पायेगी!
    अपने सीधे पन में,बिचारी बन से हर ली जायेगी!!
    राम राज्य अगर होगा,फिर भी सुख यह ना भोगेगी!
    दूर् रहेगी राम राज्य से,वन में लव कुश पालेगी!!

  • Ramchandra Gupta.  On सितम्बर 9, 2014 at 9:43 अपराह्न

    अपने मात पिता को जो सुख नहीं दे सकते हैं!
    भले बे चारों धाम करें इनसान न हो सकते हैं!!
    घमंड करें न इस काया पै भले ही अनमोली है!
    इक दिन जले मरघट में जैसे फागुन की होली है!!
    आँखें खोल के देखेंगे सांसारिक बस्तुये देखेंगे!
    बंद नैन से देखेंगे परम् पिता परमेश्वर को देखेंगे!!
    असाय की सब करें सहायता जिसमें हो जितनी शक्ति!
    इससे वद कोई हो नहीं सकती ईश्वर की कोई भक्ति!!

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