विदुर नीति में भी है समाजवाद का सिद्धांत


      ज के भौतिक युग में सभ्य, बुद्धिमान और ज्ञानी होने का प्रमाण केवल धनी होना ही रह गया है| जिसके पास धन, उच्च पद अथवा प्रसिद्धि है उसे चर्चे समाज में हर व्यक्ति एक नायक की तरह ही करता है|  स्थिति यह है कि धार्मिक क्षेत्र में भी सुविधा संपन्न आश्रम बनवाने, धनिक लोगों का शिष्य समुदाय एकत्रित करने  तथा प्रचार समूहों में विज्ञापन से गुरुपद  धारण करने वाले अनेक महानुभाव प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचकर समाज में भ्रम फैलाते हैं| ज्ञान का रट्टा लगाकर दूसरों से धन एकत्रित करना गुरु शब्द का पर्याय बन गया है| पर्दे के सामने किसके वचन कैसे हैं यह सभी को सुनाई देता है पर दीवारों के पीछे उनका आचरण कैसा  है यह कोई नहीं देखता| आदमी आम हो या खास अधिकतर लोगों की बुद्धि का दायरा संकुचित हो गया है और धन अच्छा है या बुरा कोई समझना भी नहीं चाहता| जिसके पास धन है उसके सर्वगुण संपन्न होने का दाम करते हुए अनेक चाटुकार लोग मिल जायेंगे|

 

विदुर नीति में कहा  गया है कि

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असंविभागो दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः।
तादृंनारिधपो लोके वर्जनीवो नारधिपः।।
हिंदी में भावार्थ-अपने व्यक्ति अपने आश्रितों में अपनी धन संपत्ति को ठीक से बंटवारा नहीं करे तो दुष्ट कृतघ्न और निर्लज्ज है उसे इस लोक में त्याग देना चाहिए।

न बुद्धिर्धनलाभाय न जाह्यमसद्धये।
लोकपर्यावृतांत प्राज्ञो जानाति नेतरः।।


हिंदी में भावार्थ- धन केवल बुद्धि से ही प्राप्त होता है या मूर्खता के कारण आदमी दरिद्र रहता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। इस संसार के नियमों को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं।

     जिन लोगों के पास धन नहीं है या अल्पमात्रा में है उन्हें धनवान लोग मूर्ख और अज्ञानी मानते हैं। अक्सर धनवान  लोग कहते हैं कि ‘अक्ल की कमी के कारण लोग गरीब होते हैं।’ इतना ही नहीं इन धनवानों के इर्दगिर्द अपने स्वार्थ कि वजह से मंडराने वाले चाटुकार लोग भी उनकी बुद्धि का महिमामंडन करते हुए नहीं थकते|

      उनका यह तर्क गलत और बेहूदा है। अगर उनका तर्क सही माना जाए तो सवाल उठता है कि  अनेक धनवान अपनी बौद्धिक त्रुटियों का कारण गरीब क्यों हो जाते हैं? जिनके पास धन और संपत्ति विपुल मात्रा में वह अपने व्यवसाय में हानि उठाने या अपने बच्चों की गलत संगत के कारण उनके द्वारा किये जा रहे अपव्यय कि वजह से संकटग्रस्त होकर निर्धनता को प्राप्त हो जाते हैं। तब उनके बारे में क्या यह कहना चाहिये कि ‘वह अक्ल के कारण ही अमीर हुए और अब उसके न रहने से गरीब हो गये।’ या ‘अब धन नहीं है तो उनके पास अक्ल भी नहीं होगी।’

      कहने का तात्पर्य है कि यह धारणा भ्रांत है कि बुद्धि या अक्ल के कारण कोई अमीर या गरीब बनता है। संसार का अपना एक चक्र है। शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलता पर माया तो महाठगिनी है। आज इस घर में सुशोभित है तो कल वह किसी दूसरे दरवाजे पर जायेगी। लक्ष्मी के नाम का एक पर्यायवाची शब्द ‘चंचला’ भी है। वह हमेशा भ्रमण करती हैं। अतः हमेशा ही अमीरों को बुद्धिमान और गरीबों को बुद्धिहीन मानने वालों को अपने विचार बदलना चाहिए।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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