मंदिर और उद्यानों में समय बिताना लाभप्रद-हिंदी सामाजिक चिंत्तन लेख


                        आमतौर से हर मनुष्य देखने में एक जैसे ही लगते हैं पर आचार, विचार, रहन सहन, खाने पीने तथा व्यवहार की दृष्टि से उनमें भिन्नता का आभास तब  होता है जब उसने कोई दूसरा व्यक्ति उनसे संपर्क करता है। अनेक बार दो लोग एक जैसे लगते हैं तो अनेक लोग भी एक जैसे स्वभाव के नहीं लगते।  इसके दो कारण है एक तो यह कि लोग अपने रहन सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार के अनुसार ही हो जाते हैं। दूसरा कारण उल्टा भी होता है कुछ लोग अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही रहन, सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार करने लगते हैं।  इन दोनों कारणों में श्रीमद्भागवत गीता का गुण और कर्म विभाग सिद्धांत लागू होता है। एक तो मनुष्य वह होता है जो अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार सात्विक, राजस तथा तामसी कार्य करता है तो दूसरा वह होता है जो अपने कर्म के अनुसार ही अपने स्वभाव की प्रकृत्ति का हो जाता है। इस चक्र को योग तथा ज्ञान साधक अनुभव कर सकते हैं।

                        हम देखते हैं कि सहकर्म में लिप्त लोगों के बीच आपसी संपर्क सहजता से बनता है। जिसको निंदा करनी है उसे निंदक मिल जाते हैं दूसरे प्रशंसा करते हैं तो उनको प्रशंसक मिल जाते हैं। यही स्थिति आदतों की भी है। जो जुआ खेलते हैं उनको जुआरी और जो शराब पीते हैं उन्हें शराबी मिल जाते है। स्थिति यह है कि व्यसन में फंसा मनुष्य कुंऐं के मेंढक की तरह हो जाता है जिसे अज्ञान का अंधेरा ही पसंद होता है।  आमतौर से हम देखते भी हैं कि बुरी संगत सहजता से मिलती है पर अच्छी संगत के लिये प्रयास करने पड़ते है।  बाज़ार में सहजता से व्यसनी मिल जाते हैं  पर सत्संगी को ढूंढना पड़ता है। ऐसे में समस्या यह आती है कि हम सहज प्रकृत्ति के लोग कहां ढूंढे।

                        हमारा मानना है कि हमें मंदिरों और पार्कों में सहज प्रकृत्ति के लोग मिल ही जाते हैं। दरअसल मंदिरों और पार्कों में आया व्यक्ति कहीं न कहीं से मन से स्वच्छ होता ही है भले ही वह पूरे दिन असहज वातावरण में रहता हो।  जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां आये लोग अत्यंत शांत और सद्भाव से संपन्न  होने के कारण हमारे मन तथा चक्षुओं को आकर्षित करते हैं। वहां कोई मित्र मिल जाये तो उसे  भी प्रसन्नता होती है तो हमें भी अधिक सुख  मिलता है। इस प्रसन्नता का सामान्य सुख से ज्यादा मोल है। यह भी कह सकते हैं कि इस प्रसन्नता का सुख अनमोल है।  उसी तरह प्रातःकाल किसी उद्यान में आया व्यक्ति भी निर्मल भाव से जुड़ जाता है। वहां घूमते हुए लोग एक दूसरे को अत्यंत निर्मल भाव से देखते हैं। यह अलग बात है कि इसकी उनको स्वतः अनुभूति नहीं होती। उनमें अनेक लोग तो केवल इसलिये एक दूसरे को जानने लगते हैं क्योंकि दोनों ही वहां प्रतिदिन मिलते हैं। इस प्रकार की आत्मीयता मिलना एक संयोग है जो कि व्यसन के दुर्योग से मिली संगति से कहीं बेहतर है।

                        हमने देखा है कि योग शिविरों में जाने पर अनेक ऐसे लोगों से मिलने और उनको सुनने का सौभाग्य मिलता है जिनकी कल्पना सामान्य जीवन में नहीं की थी।  इसी अनुभव के आधार पर हम यह लेख लिख रहे है। हमारे कहने का अभिप्राय यही है कि अगर आप यह चाहते हैं कि आप एक बेहतर जीवन जियें तो पहले अपनी देह तथा मन  के लिये अनुकूल  वातावरण, मित्र तथा आत्मीय लोगों का चयन करें।  वातावरण, रहन सहन, आचार विचार, तथा खान पान के साथ ही संगति के अनूकूल बनने के बाद जीवन को सुखमय बनाने का कोई दूसरा उपाय करना शेष नहीं रह जाता।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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