संत कबीर दर्शन-ज्ञान रटने वाले बहुत पर जितेंद्रिय कम ही मिलते है


      पूरे विश्व में शाब्दिक धर्मों के  के नाम पर प्रचार करने वालों की संख्या इतनी अधिक है कि उसे देखते यह सुखद कल्पना उपजती है कि संसार पूरी तरह से अपराध रहित तथा  सुखमय  होना चाहिये।  देखा जाये तो हमारे दर्शन के अनुसार धर्म का आशय केवल उच्च मानवीय आचरण से है जिसका कोई दूसरा रूप नहीं हो सकता। धर्म शब्द पवित्र हृदय से मनुष्य की आदर्श सक्रियता की परिभाषा देने वाला है पर इस संसार में धर्म के विभिन्न रूप बना दिये गये हैं।  इतना ही नहीं हर धर्म के सर्वशक्तिमान के दरबारों का रूप भी अलग अलग है। पुस्तकों के नाम और उसमें कथित ज्ञानमय  विषय सामग्री की प्रस्तुति की शैली भी अलग है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हर शब्दिक धर्म के सर्वशक्तिमान के प्रथक प्रथक रूप और उनको मानने वालों के बीच एक मध्यस्थ भी रहता है जो बताता है कि उन्हें किस तरह उच्च जीवन बिताना चाहिये? इन मध्यस्थों ने हर धर्म के प्रतीक विशेष रंगों का पवित्रीकरण किया है और उसमें ही रंगे वस्त्र पहनते हैं।  राह चलते हुए पता लग जाता है कि वह किस शाब्दिक धर्म से सम्बंधित  करते है।  मजे की बात यह है कि जब कहीं समाज में एकता की बात आती है तो सर्वधर्मभाव का नारा लगाते हुए जनसमूहों के बीच अपनी छवि फरिश्ते जैसी बनाने के लिये चले आते हैं। समाज को बांटकर दिखाने की इनकी नीयत जगजाहिर है पर एकता का प्रपंच कर यह हास्य ही फैलाते हैैं।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि

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पढ़ी गुनी ब्राह्मण भये, कर्ति भई संसार।

वस्तू की तो समूझ नहीं, ज्यूं खर चन्दन भार।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में अनेक विद्वान प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर लोगों को उपदेश देते हुए प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं परंतु विषय और वस्तु का सत्य ज्ञान के अभाव में उनको गधे के ऊपर लगे चंदन के टीके की तरह भार समझा जाता है।

ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पण्डित कवी अनेक।

राम रता इन्द्री जिता, कोटी मध्ये एक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में कथित रूप से ज्ञानी, विद्वान तथा कवि तो  मिलते हैं पर परमात्मा के नाम में रत जितेंद्रिय पुंरुष करोड़ों मे एक होता है।

      हमारे महान संत कवियों के अनुसार सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप का निरंतर स्मरण तथा जीवन में उच्च नैतिक सिद्धांतों का पालन करना ही धर्म है।  कथित शाब्दिक धर्मों की पुस्तकों का अध्ययन कर उनका प्रचार करने वाले यह नहीं जानते कि वह अपने अंदर ज्ञानी होने का जो भाव पैदा करते हैं वह भारतीय ज्ञान साधकों की दृष्टि से  अहंकार का प्रमाण होता है। आमतौर से अध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से श्रीमद्भागवत गीता के समक्ष कोई अन्य ग्रंथ नहीं है पर होता यह है कि तमाम तरह के शाब्दिक ग्रंथों का नाम लेकर उसकी तुलना की जाती है। हैरानी की बात यह है कि सभी  ग्रंथों से श्रीगीता की तुलना करने वाले भारतीय धर्म को ही मानने वाले वह लोग हैं जिनको गीता के ंसंदेश तो रटे हुए है पर उनका आशय समझ से परे है।  इतना ही नहंीं श्रीमद्भागवत गीता के ंसंदेशों के अनुसार ही ज्ञान का होना ही आवश्यक नहीं वरन् उसका आचरण पथ पर प्रदर्शित होना भी जरूरी है इसका अभास चंद लोगों को ही है।  यही कारण है कि तत्वज्ञान साधक अपने ही सभी धर्म समूहों के  पाखंडियों से संबंध रखने में बचते हैं।

      ज्ञान की पहचान वाणी से प्रकट करने में नहीं वरन् व्यवहार में अपनी धारणा शक्ति की प्रबलता होने से बनती है।  इसलिये जहां तक हो सके भारत के प्राचीन अध्यात्मिक ग्रथों को अध्ययन कर उनके संदेशों का प्रयोग अपने जीवन में करना चाहिये। अपना ज्ञान बघारने में अपनी ऊर्जा नष्ट करने की अपेक्षा धर्म पथ पर चलकर शक्ति का संचय करना ही एक श्रेयस्कर काम है। निरंतर अध्ययन, मनन, चित्तन और साधना करने से जब अभ्यास हो जाता है तब जीवन आनंदमय हो जाता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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