गुणवान और राजा एक दूसरे की परवाह नहीं करते-रहीम दर्शन के आधार पर संदेश


      श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार इस संसार  में तीन प्रकृत्तियों के लोग पाये जाते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी।  इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि इन तीन प्रकार की प्रकृत्ति के लोग संसार में हमेशा मौजूद रहेंगे और कोई कितना भी ज्ञान ध्यान कर ले किसी भी एक प्रकार की  मनुष्यों की प्रकृत्ति को यहां से विलुप्त नहीं कर सकता।  तामसी प्रकृत्ति के लोग इस संसार में न स्वयं को बल्कि दूसरों को भी कष्ट देते हैं पर अगर कोई चाहे कि अपने अभियान या आंदोलन से सारे संसार के मनुष्यों को सात्विक या राजसी प्रकृत्ति का बना दे तो वह संभव नहीं है। यह अलग बात है कि कथित रूप से अनेक धर्मों के ठेकेदार अपने कथित शांति अभियानों में पूरे विश्व में स्वर्ग की स्थापना का सपना दिखाते हैं।

      इस संसार में सात्विक लोगों की अपेक्षा राजसी प्रकृत्ति के लोगों की संख्या अधिक रहती है।  इसका कारण यह है कि इस देह का भरणपोषण करने के लिये अर्थकर्म में राजसी प्रकृत्ति से ही सक्रिय रहा जा सकता है।  यहीं से सात्विक और राजसी प्रकृत्ति का अंतर्द्वंद्व प्रारंभ हो जाता है।  सात्विक प्रकृत्ति के लोग एक सीमा तक ही राजसी कर्म करने के बाद अपनी मूल सात्विक प्रकृत्ति में स्थिर हो जाते हैं जबकि राजसी प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही उसमें लिप्त रहते हैं।  राजसी कर्म में सीमा तक सक्रिय रहने के कारण सात्विक लोग उच्च राजसी पुरुषों की परवाह नहीं करते तो राजसी पुरुष उनकी सीमित आर्थिक उपलब्धियों तथा गतिविधियों  के कारण उनका सम्मान नहीं करते।

 

कविवर रहीम कहते हैं कि

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भूप गनत लघु गुनिन को, गुनी गनत लघु भूप।

रहिमन गिर तें भूमि लौं, लखो तो एकै रूप।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-राजा गुणीजनों को अपने से छोटा मानता है तो गुणीजन भी राजा की परवाह नहीं करते। सच्चाई यह है धरती से पर्वत तक सभी लोग एक समान ही है।

      एक बात सत्य है कि इस विश्व में सभी लोग एक समान हैं। सभी का दाता राम है।  राजसी पुरुषों में यह खुशफहमी रहती है कि वह अपने परिवार तथा समाज का संचालन कर रहे हैं जबकि सात्विक प्रकृत्ति तो अकर्मण्यता के भाव की जनक है। इतना ही नहीं वह सात्विक लोगों को स्वार्थपरक या उदासीन कहकर निंदा भी करते हैं।  इसके विपरीत सात्विक लोग यह मानते हैं कि राजसी कर्म में अधिक लिप्पता तथा उपलब्धि अनावश्यक रूप से संकट पैदा करती है।  इस प्रकार का द्वंद्व स्वाभाविक है पर सात्विक लोग इसे एक सहज संबंध मानते हैं तो राजसी पुरुष इस द्वंद्व में उपेक्षासन के माध्यम से अपनी नाराजगी दिखाते हैं।  वह सात्विक लोगों से मुंह फेरकर यह दिखाते हैं कि समाज में उनकी श्रेष्ठ छवि है। चालाक राजसी प्रकृत्ति के मध्यम कर्म में लिप्त लोग उनकी चाटुकारिता अपना कार्य साधते हैं जिससे उच्च राजसी पुरुषों को अधिक भ्रम हो जाता है। यही भ्रम कालांतर में उनके लिये संकट का कारण बनता है। सात्विक लोग किसी भ्रम में न पड़कर सत्य तथा ज्ञान के साथ जीवन आनंद से बिताते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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