अपना मनोबल ऊंचा रखकर कामयाबी पाई जा सकती है-हिन्दी चिंत्तन लेख


      हमारे देश में 65 प्रतिशत से ज्यादा जनंसख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। इस दृष्टि से विश्व में हमारा देश युवा कहा जा सकता है। इतना ही नहीं जिस दृष्टि से हमारे यहां कथित विकास की धारा बहने का दावा किया जाता है उसके आधार पर हमारे देश को विश्व का शक्तिशाली राष्ट्र भी कहा जाता है पर सच यह है कि इसके बावजूद हमार समाज में लोगों का मनोबल गिरा हुआ है। जागरुक चिंत्तक देश के कथित आर्थिक विकास के साथ ही समाज में  वैचारिक, वैयक्तिक तथा व्यवहार में गिरते हुए स्तर को लेकर अधिक सोचते हैं।  एक समय था जब हमारे देश के लोगं पश्चिमी जगत में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति तथा जापान जैसे अमीर राष्ट्र में हाराकिरी की परंपरा को लेकर हैरान होते थे। उस समय यह माना जाता था कि भारत में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रभाव के कारण लोगों में जिंदगी के प्रति एक अलग नजरिया रहता है। अब वह बात नहीं है।  हमारे देश में आये दिन ऐसी घटनायें होती हैं। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि हमारे देश के लोगों में धनबल बढ़ रहा है पर उनका मनोबल गिरता जा रहा है। वैसे भी कहा जाता है कि धनियों में आत्मविश्वास कम भय की प्रवृत्ति अधिक होती है। स्पष्टतः उनका मनोबल गरीब के मुकाबले कम ही रहता है।

विदुर नीति में कहा गया है कि

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कान्तरि, वनदुर्गेष कृच्छ्रास्यापत्सु सम्भ्रमे।

डद्वतेषु च शस्त्रेषु नास्ति सत्तयवतां भयम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-घने जंगल, दुर्गम रास्ता तथा कठिन समय, अस़्त शस्त्र के प्रहार के लिये समक्ष उपस्थित होने पर भी जिस मनुष्य का मनोबल बढ़ा रहता है वह निर्भय हो जाता है।

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादां घृतिः स्मृतिः।

समीक्ष्य च समारम्भौ विद्धि मूलं भवस्यं तु।।

हिन्दी में भावार्थ-उद्योग, संयम, प्रवीणता, सतर्कता, धैर्य, स्मृति और सोच विचारकर कार्य आरंभ करना ही उन्नति का मूल मंत्र है।

      हमारे देश में आत्महत्या की घटनाओं में युवा वर्ग के सदस्य अधिक शामिल पाये जा रहे हैं।  सच बात तो यह है कि युवा वर्ग से जहां न केवल उनके परिवार बल्कि समाज भी अपेक्षायें करता है वही उसके मनोबल बढ़ाने की सोचता भी नहीं है। भोग संस्कृति में लिप्त समाज केवल उपलब्धियों को सब मानते हुए युवा वर्ग के सदस्यों पर यह दबाव डालता है कि वह अधिक से अधिक धन, उच्च पद या प्रतिष्ठा प्राप्त करें। मध्यम  वर्ग का हर सदस्य अधिक से अधिक संपदा, उच्च पद तथा प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता और यही शिक्षा वह अगली पीढ़ी को दे रहा है।  यह दबाव मनोबल तोड़ने का काम करता है।

      छोटी आयु में कुछ लोग  ने सफलता प्राप्त कर लेते हैं पर सभी के लिये यह संभव नहीं है। सफलता के लिये यह आवश्यक है कि न केवल संबंधित व्यवसाय का ज्ञान हो वरन् सफलता मिलने की प्रतीक्षा का धीरज भी होना चाहिए। दूसरी बात यह कि दूसरे की सफलता देखकर अपना लक्ष्य वैसा ही निर्धारित करने की बजाय अपनी क्षमता के अनुसार ही विचार करना चाहिये। उससे अधिक लक्ष्य तय करना न केवल निराशा पैदा करता है वरन् मनोबल भी गिरा देता है। याद रखें मनुष्य की पहचान उसका मन है और उसी का बल ही उसे शक्तिशाली बनाता है तो कमजोर होने पर आत्महीन बना देता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

 

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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