शिवालय और शौचालय दोनों ही आवश्यक-हिन्दी चिंत्तन लेख


इस समय प्रचार माध्यमों में शिवालय और शौचालयों पर बहस चल रही है। कभी किसी ने पहले कहा कि मंदिरों से ज्यादा महत्वपूर्ण शौचालय हैं तो अब किसी ने शिवालयों से अधिक शौचालयों को अनिवार्य बता दिया। हम यहां उन विभूतियों का नाम नहीं ले रहे भी-भले भी उन्होंने यह सदाशयतावश ही यह बयान दिये-क्योंकि हमारा मुख्य लक्ष्य इस विषय पर अपनी बात कहना है। प्रचार माध्यमों ने तो इन बयानों को महत्व इसलिये दिया क्योंकि यह प्रसिद्ध लोगों ने दिये पर ऐसे बयान अक्सर आपसी बातचीत में भी आते रहते हैं। दरअसल एक योग साधक के लिये शौचालय तथा शिवालय का प्रथक प्रथम महत्व है। दोनों के महत्व में कोई साम्यता नहीं है। अगर भारतीय अध्यात्म दृष्टि से आधुनिक संदर्भ में इस विषय को देखों तो यह विवाद ही अनावश्यक नज़र आता है।

जिस तरह संसार के दो रूप हैं एक भौतिक तथा दूसरा अध्यात्मिक उसी तरह देहधारी जीवों के भी हैं। भौतिक रूप तो वह है जिसमें भूत सक्रिय दिखता है पर देह को धारण करने वाला अध्यात्म यानि आत्मा अप्रकट है। हम संसार में जितने भी प्राणी देख रहे हैं वह भौतिक तथा अध्यात्म का संयुक्त समन्वय होते हैं। अंतर इतना है कि दो हाथ पैर वाले इंसान की बुद्धि अत्यंत रहस्यमय है इसलिये उसे लाभ भी हैं तो हानि भी दिखती है। जो मनुष्य बुद्धि का बेहतर उपयोग करता है वह अपनी रचनात्मक प्रकृत्ति से समाज को कुछ देता है जबकि उसके गलत इस्तेमाल वाला आदमी इतना खतरनाक हो जाता है कि उसे कुत्ते और सांप से खतरनाक कहा जा सकता है। मनुष्य के अलावा अन्य जीवधारियों में कुछ खतरनाक है पर उनकी सीमायें हैं। कुत्ता भौंकता है पर हमेशा काटने नहीं आता। सांप भी जब पांव पास हो तभी काटता है। यह दोनों जीव लक्ष्य कर किसी पर हमला नहीं करते। अगर कुत्ते और सांप को मालुम हो कि वह कितना खतरनाक हैं तो वह समाज में कोहराम मचा दें मगर प्रकृति ने उनकी बृद्धि को सीमित रखा है। मनुष्य की स्थिति इससे अलग है। अगर उसे लगे कि वह दूसरे की हानि कर सकता है तो वह चाहे जहां जिस पर हमला कर सकता है। अपनी गली और घर से दूर जाकर भी हमला करता है। यही कारण है कि मनुष्य की बुद्धि पर नियंत्रण करने के लिये हमारे ऋषि मुनियों से अध्यात्म ज्ञान का सृजन किया है।

हमारे देश में घर के अंदर ही शौचालय बनाने की परंपरा पुरानी नहीं है। यहां प्रकृत्ति की कृपा से सर्वत्र कृषि भूमि रही दूसरी बात यह कि उसमें मनुष्य और पशुओं के शरीर से निकलने वाली गंदगी को ठिकाने लगाने की भी शक्ति रही है। अधिकतर लोग खेती तथा पशुपालन पर निर्भर रहे इसलिये शौचालयों के लिये अलग से बनाने की परंपरा नहीं बनी। खेतों में ही शौच करने की परंपरा बन गयी। अलबत्ता बुद्धि और मन की निर्मलता के लिये जगह जगह शिवालय बने। देश के अंदर ऐसा कोई गांव नहीं होगा जहां शिवालय न बना हो।

अब आते हैं असली बात पर! आधुनिक सभ्य समाज ने शहर बनाये जिसमें घर में ही शौचालयों की अनिवार्यता अनुभव की जाती है। जब तक शहर और उसके बाज़ार सीमित रहे घर पर शौचालयों की अनिवार्यता की सीमा चली उनका विस्तार हुआ तो अब सार्वजनिक जगहों पर भी शौचालयों की आवश्यकता अनुभव होती है। ऐसा नहीं है कि सरकार या समाज का इस पर ध्यान नहीं गया। हमने देखा कि अनेक शहरों में अनेक पेशाबघर और शौचालय बने। इतना ही नहीं जब तक महिलायें घरों तक सीमित थी उनके लिये सार्वजनिक स्थानों पर अलग से व्यवस्था नहीं थी पर अब अनुभव की जाने लगी हैं। हमने तो यह अनुभव किया है कि महिलाओं के लिये बाज़ारों तथा सार्वजनिक स्थानों पर एक अभियान के साथ शौचालयों का निर्माण किया जाना चाहिये था। पहले बाज़ार में महिलायें कम घूमती दिखती थीं पर अब तो संख्या बढ़ गयी है। हमें एक बात पता है जब देह में कोई उदिग्नता उत्पन्न होती है तब उसका विसर्जन जब तक न किया जाये मस्तिष्क भारी विचलित रहता है पर बाहर कोई दूसरा मनुष्य उसे कोई पढ़ नहीं पाता। दूसरी बात यह कि अपने अंदर आये उस तनाव को बाहर जल्दी निकाल देना चाहिये यह सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं। तन का तनाव शौचालय और मन का शिवालय से दूर होता है-एक योग साधक के रूप में हमारा यह अनुभव है, दूसरे लोग इसे न माने यह उनकी मर्जी है।

दोनों की तुलना की भी जा सकती है और नहीं भी। जिन लोगों के पास योग साधना का साहित्य है वह उसमें पढ़ सकते हैं कि मनुष्य के जीवन में शौच को लेकर भी सावधानी बरतने को कहा गया है। यहां यह भी बता दें कि शौच का आशय हमेशा ही पूर्ण रूप से बाह्य या भौतिक शुद्धि से है। यह आशय भी न केवल शरीर की सफाई से है वरन जहां हम रहते हैं वहां भी स्चच्छता का वातावरण बनाये रखना इसमें शामिल है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है और स्वच्छ स्थान पर हमारी बुद्धि भी सुखद अनुभव करती है। स्वस्थ देह और स्वच्छ स्थान पर अध्यात्मिक साधना करने पर ही सहजता अनुभव की जा सकती है। हालांकि एक बात तय है कि शौचालय तो सभी मनुष्य जाते हैं पर देवालय सभी जायें यह आवश्यक नहीं है। यह तो हर किसी के अपने विवेक पर निर्भर है कि वह मन और बुद्धि के विकार किस तरह विसर्जित करता है।

एक सामान्य योग साधक कभी राज्य से यह अपेक्षा नहीं करता कि वह शिवालय बनाये पर अभ्यास के कारण क्षेत्र का ज्ञान होने के से वह जरूर चाहेगा कि राज्य व्यवस्था शहरों में नहीं वरन् गांवों में शौचालयों की सार्वजनिक जगहों पर स्थापना करे। शिवालय तो भक्त बना ही लेते हैं। इतना ही नहीं भक्ति भाव वाले ऐसे अनेक जागरुक भक्त अपने देवस्थानों के परिसर में शौचालय भी बनवाते हैं ताकि किसी भक्त की देह में विकार उत्पन्न हो तो वह उसका विसर्जन करे। अलबत्ता मुद्दा अगर सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय बनवाने का है तो यहा काम राज्य ही कर सकता है। अगर कोई दूसरा करेगा तो अतिक्रमण होने पर उसे ढहाया जा सकता है। यह अलग बात है कि अगर किसी भी धर्म का देवस्थान अगर बना हो तो उसे सहजता से कोई हटा भी नहीं सकता। एक सामान्य योग साधक शिवालय और शौचालयों के बीच चल रहे विवाद में अधिक समय तक रुद्धि नहीं ले सकता क्योंकि प्रचार माध्यमों पर प्रायोजित किसी भी विषय पर बहस के परिणाम कभी दृष्टिगोचर नहीं होते। बहरहाल सार्वजनिक स्थानों पर शौचालयों की अधिक से अधिक सुविधा हो यह मांग करते हुए यह हमारा अपने ब्लॉगों पर छठा पाठ है। ईमानदारी की बात यह है कि हम अपनी भोगी पीड़ा का बयान कर रहे हैं पर सच यह है कि यह करोड़ों लोग इसे प्रतिदिन झेलते हैं। एक अध्यात्मिक साधक होने के नाते हमारा मानना है कि तन की शुद्धता के बिना मन शुद्ध और स्वस्थ नहीं रह सकता। शिवालय तो समाज स्वयं ही बना लेता है पर सार्वजनिक स्थानों पर शौचालयों के लिये राज्य से अपेक्षा की जा सकती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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