भारत में खज़ाना पाने की चाहत-हिंदी चिन्तन लेख


                                                एक बार फिर जमीन में गढ़े खजाने की बात सामने आयी। उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले में डोंडिया खेड़ा गांव में एक हजार टन सोने का खजाना मिलने की संभावना बन रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पुरातत्व विभाग एक संत से मिले नक्शे के आधार पर यह खुदाई कर रहा है पर इसके आधार पर यह नहीं मान लेना चाहिये कि वहां खजाना मिल ही जायेगा।  बहरहाल वहां लोगों को एक अस्थाई मेला लग गया है।  लोग खजाने की खुदाई देखने आ रहे हैं पर पुलिस की जैसी व्यवस्था है उनका खुदाई के स्थान तक जाना कठिन है।  फिर भी मेला लग रहा है।  लोग पिकनिक मनाने के लिये वहां खजाना देखने आ रहे हैं। दुकाने लग गयी है। खजाना मिल भी गया तो भी सरकारी लोग उसे वहां सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं कर पायेंगे क्योंकि संभवत उन्हें ऐसा करने की अनुमति ऊपर से नहीं मिलेगी

                        परिणाम का हमें इंतजार है पर फिलहाल यह देखकर हैरानी हो रही है कि एक खजाना जो अभी दिख नहीं रहा वहां लोग अपने ख्वाबों को साथ लेकर लोग मेला लगाने पहुंच गये हैं।  हम बात कर रहे हैं भीड़ की। भारत में किसी भी तरह कहीं भी भीड़ जुटानी हो तो किसी चमत्कार का प्रचार कर दीजिये।  अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि आखिर कथित संतों और तांत्रिकों के पास लोग जाते क्यों है? जवाब है कि लोग मेहनत के बिना कुछ पाना चाहते हैं।  ऐसा नहीं है कि लोग अज्ञानी है मगर लालच उन्हें अक्ल का अंधा बना देती है।  लोग कहते हैं कि भारत में अंधविश्वास बहुत है पर हम इसे नहीं मानते। उल्टा हमारा मानना है कि भारत के हर आदमी में ज्ञान है यह अलग बात है कि लोभ और लालच उस पर पर्दा डाल देती है।  भगवान के प्रति जो विश्वास है वह लालच के कारण अंधविश्वास में बदल जाता है लोग जानते हैं कि इस तरह कुछ होगा नहीं पर सोचते हैं कि चलो अजमाने में हर्ज क्या है?

                        खजानों पर लिखा गया यह तीसरा लेख है। इसका मतलब यह है कि हम भारत के खजानों पर दो लेखक पहले भी लिख चुके हैं।  यह लेख हम नहीं लिखते अगर एक पाठक ने पुराने एक लेखक पर टिप्पणी नहीं की होती।  उस पाठिका की टिप्पणी के बाद हमने अपने वही लेख पढ़ डाले। उस पाठिका का धन्यवाद! उसकी टिप्पणी ने  उन पाठों को  याद दिलाया तब हमने सोचा कि  कुछ दूसरा लिखो उससे पहले वाला पढ़ लो। प्रस्तुत हैं वही दोनों लेख।

 

सोने का खज़ाना और भारत का अध्यात्मिक ज्ञान-हिन्दी लेख (sone ka khazana aur bharat ka adhyatmik gyan-hindi lekh)

              केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ काखजाना बरामद हुआ है। यह खजाना त्रावणकोर या ट्रावनकोर के राजाओं का है।जहां तक हमारी जानकारी है भारत में इस तरह खजाना मिलने का यह पहला प्रसंगहै।

           अलबत्ता बचपन से अपने देश के लोगों को खजाने के पीछे पागल होतेदेखा हैं। कई लोग कहीं कोई खास जगह देख लेते हैं तो कहते हैं कि यहां गढ़ाखजाना होगा।अनेक लोग सिद्धों के यहां चक्कर भी इसी आशा से लगाते हैं किशायद कहीं किसी जगह गढ़े खजाने का पता बता दे। कुछ सिद्ध तो जाने ही इसलियेजाते हैं कि उनके पास गढ़े खजाने का पता बताने की क्षमता या सिद्धि है।

        ऐसे भी किस्से देखे हैं कि किसी ने पुराना मकान खरीदा और उसेबनवाना शुरु किया।भाग्य कहें या परिश्रम वह अपने व्यवसाय में अमीर हो गयातो लोगों ने यह कहना शुरु कर दिया कि खुदाई में उनको खजाना मिला है।

         बहरहाल केरल केपद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले सोने और हीरे जवाहरात नेभले ही किसी को चौंकाया हो पर इतिहासविद् और तत्वज्ञानियों ने लिये यह कोईआश्चर्य का विषय नहीं हो सकता।

अभी हाल ही में पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा के मंदिर में तो मात्र दो सौढाई करोड़ का खजाना मिला था तब अनेक लोगों की सांसें फूल गयी थी। अब केरलके पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले खजाने ने उसके एतिहासिक महत्व पर धूल डालदी है।

          बता रहे हैं कि केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिला यह खजानातो मात्र एक कमरे का है और अभी ऐसे ही छह कमरे अन्य भी हैं।न हमने खजानादेखा है न देख पायेंगे। न पहुंचेंगे न पहुंच पायेंगे।इस खजाने का क्याहोगा यह भी नहीं पता पर जिन्होंने उसका संग्रह किया उन पर तरस आता है। यहराजाओं का खजाना है और इसका मतलब यह है कि उन्होंने अपनी प्रजा के दम पर हीइसे बनाया होगा।नहीं भी बनाया होगा तो अपने उस राज्य के भौतिक या उसकेनाम का हीउपयोग किया तो होगा जो बिना प्रजा की संख्या और क्षमता के संभवनहीं है।

             राजा हो या प्रजा सोना, हीरा, जवाहरात तथा अन्य कीमती धातुओंइस देश के लिये हमेशा कौतुक का विषय रही हैं। पेट की भूख शांत करने के लियेइसका प्रत्यक्ष कतई नहीं हो सकता अलबत्ता चूंकि लोगों के लिये आकर्षण काविषय है इसलिये उसका मोल अधिक ही रहता है। हमारे देश में सोना पैदा नहींहोता।इसे बाहर से ही मंगवाया जाता है।जब हम प्राचीन व्यापार की बातकरते हैं तो यही बात सामने आती है कि जीवन उपयोगी वस्तुऐं-गेंहूं, चावल, दाल, कपास और उससे बना कपड़ा तथा अन्य आवश्यक वस्तुऐं-यहां से भेजी जाती थीजिनके बदले यह सोना और उससे बनी वस्तुओं जिनका जीवन में कोई उपयोग नहीं हैयहां आता होंगी। कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने।सोना दूर पैदा होताहै उससे देश का प्रेम है पर प्रकृति की जो अन्य देशों से अधिक कृपा है उसकीपरवाह नहीं है। हम कई बार लिख चुके हैं और आज भी लिख रहे हैं कि विश्व केप्रकृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में जलस्तर सबसे बेहतर है। जी हांवह जल जो जीवन का आधार है हमारे यह अच्छा है इसलिये गेंहूं, चावल, दाल, कपास और सब्जियों की बहुतायत होने के कारण हम उनका महत्व नहीं समझते वैसेही जैसे कहा जाता है किघर का ब्राह्मण बैल बराबर।यह बात भी कह चुके हैंकि निरुपयोगी पर आकर्षक चीजों के मोह में हमारा समाज इस तरह भ्रमित रहताहै कि उस पर हंसा ही जा सकता है।वैसे तो विश्व में सभी जगह अंधविश्वासफैला है पर हम भारतीय तो आंकठ उसमें डूबे रहे हैं। यहां इतना अज्ञान रहा हैकि हमारे महान ऋषियों को सत्य का अनुसंधान करने के अच्छे अवसर मिले हैं।कहा जाता है कि कांटों में गुलाब खिलता है तो कीचड़ में कमल मिलता है।अगरयह समाज इतना अज्ञानी नहीं होता तो सत्य की खोज करने की सोचता कौन? मूर्खोंपर शोध कर ही बुद्धिमता के तत्व खोजे जा सकते हैं। हम विश्व मेंअध्यात्मिक गुरु इसलिये बने क्योंकि सबसे ज्यादा मोहित समाज हमारा ही है।भौतिकता को पीछे इतना पागल हैं कि अध्यात्म का अर्थ भी अनेक लोग नहींजानते। इनमें वह भी लोग शामिल हैं जो दावा करते हैं कि उन्होंने ग्रंथों काअध्ययन बहुत किया है।

           कहा जाता है कि सोमनाथ का मंदिर मोहम्मद गजनबी ने लूटा था।उसमें भी ढेर सारा सोना था। कहते हैं कि बाबर भी यहां लूटने ही आया था। यहअलग बात है कि वहां यहीं बस गया यह सोचकर कि यहां तो जीवन पर सोने की डालपर बैठा जाये।बाद में उसके वंशज तो यहीं के होकर रह गये।यकीनन उस समयभारत में सोने के खजाने की चर्चा सभी जगह रही होगी। उस समय भगवान के बादसमाज में राजा का स्थान था तो राजा लोग मंदिरों में सोना रखते थे कि वहांप्रजा के असामाजिक तत्व दृष्टिपात नहीं करेंगे। उस समय मंदिरों में चोरीआदि होने की बात सामने भी नहीं आती।

इतना तय है कि अनेक राजाओं ने प्रजा को भारी शोषण किया। किसी की परवाह नहींकी। यही कारण कि कई राजाओं के पतन पर कहीं कोई प्रजा के दुःखी होने की बातसामने नहीं आती। यहां के अमीर, जमीदार, साहुकार और राजाओं ने प्रजा केछोटे लोगों को भगवान का एक अनावश्यक उत्पाद समझा।यही कारण है विदेशियोंने आकर यहां सभी का सफाया किया। राजा बदले पर प्रजा तो अपनी जगह रही। यहीकारण है यहां कहा भी जाता है कि कोउ भी नृप हो हमें का हानि।कुछ लोग इसभावयहां के लोगों की उदासीनता से उपजा समझते हैं पर हम इसे विद्रोह सेपनपा मानते हैं। खासतौर से तत्वज्ञान के सदंर्भ में हमारा मानना है कि जबआप स्वयं नहीं लड़ सकते तो उपेक्षासन कर लीजिये।

जिसके पास कुछ नहीं रहा उसे लुटने का खतरा नहीं था और जिन्होंने सोने केताज पहने गर्दने उनकी ही कटी।जिनकी जिंदगी में रोटी से अधिक कुछ नहीं आयाउन्होंने सुरक्षित जिंदगी निकाली और जिन्होंने संग्रह किया वही लुटे।

          अब यह जो भी खजाना मिला है यह तब की प्रजा के काम नहीं आया तोराजाओं के भी किस काम आया? ऐसे में हमारा ध्यान श्रीमद्भागवत् गीता केसंदेशों की तरफ जाता है। जिसमें गुण तथा कर्मविभाग का संक्षिप्त पर गुढ़वर्णन किया गया है। उस समय के आम और खास लोग मिट गये पर खजाना वहीं बनारहा। अब यह उन लोगों के हाथ लगा है जिनका न इसके संग्रह में प्रत्यक्ष याअप्रत्यक्ष कोई हाथ नहीं है। सच है माया अपना खेल खेलती है और आदमी समझताहै मैं खेल रहा हूं। वह कभी व्यापक रूप लेती है और कभी सिकुड़ जाती है। कभीयहां तो कभी वहां प्रकट होती है।सत्य स्थिर और सूक्ष्म है।सच्चा धनी तोवही है जो तत्वज्ञान को धारण करता है।वह तत्वज्ञान जिसका खजाना हमारेग्रंथों में है और लुटने को हमेशा तैयार है पर लूटने वाला कोई नहीं है।बहरहाल वह महान लोग धन्य हैं जो इसे संजोए रखने का काम करते रहे हैं इसलियेनहीं कि उसे छिपाना है बल्कि उनका उद्देश्य तो केवल इतना ही है कि आनेवाली पीढ़ियों के वह काम आता रहे।

      इस विषय पर लिखे गये एक व्यंग्य को अवश्य पढ़ें

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भारत आज भी सोने की चिड़िया है-हास्य व्यंग्य(bharat aaj bhi sone di chidiya hai-hasya vyangya)

          कौन कहता है कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। अब यह क्यों नहींकहते कि भारत सोने की चिड़िया है।कम से कम देश में जिस तरह महिलाओं औरपुरुषोंके गले से चैन लूटने की घटनायें हो रही हैं उसे तो प्रमाण मिल हीजाता है। हमें तो नहीं लगता किशायद का देश कोई भी शहर हो जिसके समाचारपत्रों में चैन खिंचने या लुटने की घटना किसी दिन न छपती हो।अभी तक जिनशहरों के अखबार देखे हैं उनमें वहीं की दुर्घटना और लूट की वारदात जरूरशामिल होती है इसलिये यह मानते हैं कि दूसरी जगह भी यही होगा।

          खबरें तो चोरी की भी होती हैं पर यह एकदम मामूली अपराध तो है साथही परंपरागत भी है। मतलब उनकी उपस्थिति सामान्य मानी जाती है।वैसे तोलूट की घटनायें भी परंपरागत हैं पर एक तो वह आम नहीं होती थीं दूसरे वहकिसी सुनसान इलाके में होने की बात ही सामने आती थी। अब सरेआम हो लूट कीवारदात हो रही हैं।वह भी बाइक पर सवार होकर अपराधी आते हैं।

         हमारे देश मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक व्यंग्य में लिखाथा कि हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि हमें मारने की फुरसत नहीं है। उनकामानना था कि हमसे अधिक अमीर इतनी संख्या मेंहैं कि लुटने के लिये पहलेउनका नंबर आयेगा और लुटेरे इतनी कम संख्या में है कि उनको समझ में नहीं आताकि किसे पहले लूंटें और किसे बाद में। इसलिये लूटने से पहले पूरी तरहमुखबिरी कर लेते हैं। यह बहुत पहले लिखा गया व्यंग्य था।आज भी कमोबेश यहीस्थिति है। हम ख्वामख्वाह में कहते है  कि अपराध और अपराधियों की संख्याबढ़ गयी हैं। आंकड़ें गवाह है कि देश में अमीरों की संख्या बढ़ गयी है। अब यहतय करना मुश्किल है कि इन दोनों के बढ़ने का पैमाना कितना है। अनुपात क्याहै? वैसे हमें नहीं लगता कि स्वर्गीय शरद जोशी के हाथ से व्यंग्य लिखने औरआजतक के अनुपात में कोई अंतर आया होगा।साथ ही हमारी मान्यता है कि अपराधीऔर अमीरों की संख्या इसलिये बढ़ी है क्योंकि जनसंख्या बढ़ी है। विकास की बातहम करते जरूर है पर जनसंख्या में गरीबी बढ़ी है। मतलब अपराध, अमीरी औरगरीबी तीनों समान अनुपात में ही बढ़ी होगी ऐसा हमारा अनुमान है।

          सीधी बात कहें तो चिंता की कोई बात नहीं है। सब ठीकठाक है। विकासबढ़ा, जनंसख्या बढ़ी, अमीर बढ़े तो अपराध भी बढ़े और गरीबी भी यथावत है। तबरोने की कोई बात नहीं है।फिर हम इस बात को इतिहास की बात क्यों मानतेहैं  कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी।हम यह क्यों गाते हैं कि कभी कभी डालपर करती थी सोने की चिड़िया बसेरा, वह भारत देश है मेरा। हम थे की जगह हैंशब्द क्यों नहीं उपयोग करते।अभी हमारे देश के संत ने परमधाम गमन किया तोउनके यहां से 98 किलो सोना और 307 किलो चांदी बरामद हुई।टीवी और अखबारोंके समाचारों के अनुसार कई ऐसे लोग पकड़े गये जिनके लाकरों से सोने की ईंटेमिली।

          वैसे तो सोना पूरे विश्व के लोगों की कमजोरी है पर भारत में इसेइतना महत्व दिया जाता है कि दस हजार रुपये गुम होने से अधिक गंभीर औरअपशकुन कामामला उतने मूल्य का सोना खोना या छिन जाना माना जाता है। बहुअगर कहीं पर्स खोकर आये तो वह सास को न बताये कि उसमें चार पांच हजार रुपयेथे। यह भी सोचे सास को क्या मालुम कि उसमें कितने रुपये थे पर अगर पांचहजार रुपये की चैन छिन जाये तो उसके लिये धर्म संकट उत्पन्न हो जाता हैक्योंकि वह सास के सामने हमेशा दिखती है और यह बात छिपाना कठिन है।

           एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के अनुसार भारत के लोगों के पास सबसेअधिक सोना है। इसमें शक भी नहीं है। भारत में सोने का आभूषण विवाह के अवसरपर बनवाये जाते हैं। इतने सारे बरसों से इतनी शादिया हुई होंगी।उस समयसोना इस देश में आया होगा। फिर गया तो होगा नहीं।अब कितना सोना लापता हैऔर कितना प्रचलन में यह शोध का विषय है पर इतना तय है कि भारत के लोगों केपास सबसे अधिक सोना होगा यह तर्क कुछ स्वाभाविकलगता है।

            भारत के लोग दूसरे तरीके से भी सबसे अधिक भाग्यशाली हैंक्योंकि अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ कहते हैं कि भूजल स्तर भारत में सबसे अधिकहै। यही कारण है कि हमारा देश अन्न के लिये किसी का मुंह नहीं ताकता।हमारे ऋषि मुनि हमेशा ही इस बात को बताते आये हैं पर अज्ञान के अंधेरे मेंभटकने के आदी लोग इसे नहीं समझ पाते। कहा जाता है कि भारत का अध्यात्मिकज्ञान सत्य के अधिक निकट है। हमें लगता है कि ऋषि मुनियों के लिये तत्वज्ञान की खोज करना तथा सत्य तत्व को प्रतिष्ठित करना कोई कठिन काम नहीं रहाहोगा क्योंकि मोह माया में फंसा इतना व्यापक समाज उनको यहां मिला जो शायदअन्यत्र कहीं नहीं होगा। अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान का दीपक जलाना भलाकौनसा कठिन काम रहा होगा?

             वैसे देखा जाये तो सोना तो केवल सुनार के लिये ही है। बनना होयाबेचना वही कमाता है। लोग सोने के गहने इसलिये बनवाते हैं वक्त पर कामआयेगा पर जब बाज़ार में बेचने जाते हैं तो सुनार तमाम तरह की कटौतियां तोकाट ही लेता हैं। अगर आप आज जिस भावकोई दूसरी चीज खरीदने की बजायसोनाखरीदें  और कुछ वर्ष बाद खरीदा सोना बेचें तो पायेंगे कि अन्य चीजभी उसीअनुपात में महंगी हो गयी है।मतलब वह सोना और अन्य चीज आज भी समान मूल्यकी होती है। अंतर इतना है कि अन्य चीज पुरानी होने के कारण भाव खो देती हैऔर सोना यथावत रहता है।हालांकि उसमें पहनने के कारण उसका कुछ भाग गल भीजाता है जिससे मूल्य कम होता है पर इतना नहीं जितना अन्य चीज का।संकट मेंसोने से सहारे की उम्मीद ही आदमी को उसे रखने पर विवश कर देती है।

          जब रोज टीवी पर दिख रहा है और अखबार में छप रहा है तब भी भला कोईसोना न पहनने का विचार कर रहा है? कतई नहीं! अगर महिला सोना नहीं पहनतीउसे गरीब और घटिया समझा जाता है। सोना पहने है तो वह भले घर की मानी जातीहै। भले घर की दिखने की खातिर महिलायें जान का जोखिम उठाये घूम रही है।धनके असमान वितरण ने कथित भले और गरीब घरों में अंतर बढ़ा दिया है।वैसे कुछघर अधिक भले भी हो गये हैं क्योंकि उनकी महिलाऐं चैन छिन जाने के बाद फिरदूसरी खरीद कर पहनना शुरु देती हैं।बड़े जोश के साथ बताती हैं कि सोना चलागया तो क्या जान तो बच गयी।

        भारत में वैभव प्रदर्शन बहुत है इसलिये अपराध भी बहुत है।वैभवप्रदर्शन करने वाले यह नहीं जानते कि उनके अहंकार से लोग नाखुश हैं औरउनमें कोई अपराधी भी हो सकता है।पैसे, प्रतिष्ठा और पद के अहंकार में चूरलोग यही समझते हैं कि हम ही इस संसार में है। वैसे ही जैसे बाइक पर सवारलोग यह सोचकर सरपट दौड़ते हुए दुर्घटना का शिकार होते हैं कि हम ही इस सड़कपर चल रहे हैं या सड़क पर नहीं आसमान में उड़ रहे हैं वैसे ही वैभव केप्रदर्शन पर भी अपराध का सामना करने के लिये तैयार होना चाहिए।टीवी परचैन छीनने की सीसीटीवी में कैद दृश्य देखकर अगर कुछ नहीं सीखा तो फिर कहनाचाहिए कि पैसा अक्ल मार देता है।

        कुछ संस्थाओं ने सुझाव दिया है कि देश में अनाज की बरबादी रोकने केलिये शादी के अवसर पर बारातियों की संख्या सीमित रखने का कानून बनायाजाये।इस पर कुछ लोगों ने कहा कि अनाज की बर्बादी शादी से अधिक तो उसकेभंडारण में हो रही है। अनेक जगह बरसात में हजारों टन अनाज होने के साथकहीं ढूलाई में खराब होकर दुर्गति को प्राप्त होता है और उसकी मात्रा भी कमनहीं है। हम इस विवाद में न पड़कर शादियों में बारातियों की संख्या सीमितरखने के सुझाव पर सोच रहे हैं। अगर यह कानून बन गया तो फिर इस समाज का क्याहोगा जो केवल विवाहों के अवसर के लिये अपने जीवन दांव पर लगा देता है।उसअवसर का उपयोग वह ऐसा करता है जैसे कि उसे पद्म श्री या पद्मविभूषण  मिलनेका कार्यक्रम हो रहा है।बाराती कोई इसलिये बुलाता कि उसे उनसे कोई स्नेहया प्रेम है बल्कि अपने वैभव प्रदर्शन के लिये बुलाता है। यह वैभवप्रदर्शन कुछ लोगों को चिढ़ाता है तो कुछ लोगों को अपने अपराध के लियेउपयुक्त लगता है। ऐसा भी हुआ है कि शादी के लिये रखा गया पूरा सोना चोरी होगया। सोने से जितना सामान्य आदमी का प्रेम है उतना ही डकैतों, लुटेरों औरचोरों को भी है। सौ वैभव प्रदर्शन और चोरी, लूट और डकैती का रिश्ता चलतारहेगा। पहले बैलगाड़ी और घोड़े पर आदमी चलता था तो अपराधी भी उस पर चलते थे।अब वह पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का उपयोग कर रहा है तो अपराधी भी वही कररहे हैं। जो भले आदमी की जरूरत है वही बुरे आदमी काभी सहारा है। सोना तोबस सोना है। हम इन घटनाओं को देखते हुए तो यह कहते है कि भारत आज भी सोनेकी चिड़िया है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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                                                एक बार फिर जमीन में गढ़े खजाने की बात सामने आयी। उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले में डोंडिया खेड़ा गांव में एक हजार टन सोने का खजाना मिलने की संभावना बन रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पुरातत्व विभाग एक संत से मिले नक्शे के आधार पर यह खुदाई कर रहा है पर इसके आधार पर यह नहीं मान लेना चाहिये कि वहां खजाना मिल ही जायेगा।  बहरहाल वहां लोगों को एक अस्थाई मेला लग गया है।  लोग खजाने की खुदाई देखने आ रहे हैं पर पुलिस की जैसी व्यवस्था है उनका खुदाई के स्थान तक जाना कठिन है।  फिर भी मेला लग रहा है।  लोग पिकनिक मनाने के लिये वहां खजाना देखने आ रहे हैं। दुकाने लग गयी है। खजाना मिल भी गया तो भी सरकारी लोग उसे वहां सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं कर पायेंगे क्योंकि संभवत उन्हें ऐसा करने की अनुमति ऊपर से नहीं मिलेगी

                        परिणाम का हमें इंतजार है पर फिलहाल यह देखकर हैरानी हो रही है कि एक खजाना जो अभी दिख नहीं रहा वहां लोग अपने ख्वाबों को साथ लेकर लोग मेला लगाने पहुंच गये हैं।  हम बात कर रहे हैं भीड़ की। भारत में किसी भी तरह कहीं भी भीड़ जुटानी हो तो किसी चमत्कार का प्रचार कर दीजिये।  अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि आखिर कथित संतों और तांत्रिकों के पास लोग जाते क्यों है? जवाब है कि लोग मेहनत के बिना कुछ पाना चाहते हैं।  ऐसा नहीं है कि लोग अज्ञानी है मगर लालच उन्हें अक्ल का अंधा बना देती है।  लोग कहते हैं कि भारत में अंधविश्वास बहुत है पर हम इसे नहीं मानते। उल्टा हमारा मानना है कि भारत के हर आदमी में ज्ञान है यह अलग बात है कि लोभ और लालच उस पर पर्दा डाल देती है।  भगवान के प्रति जो विश्वास है वह लालच के कारण अंधविश्वास में बदल जाता है लोग जानते हैं कि इस तरह कुछ होगा नहीं पर सोचते हैं कि चलो अजमाने में हर्ज क्या है?

                        खजानों पर लिखा गया यह तीसरा लेख है। इसका मतलब यह है कि हम भारत के खजानों पर दो लेखक पहले भी लिख चुके हैं।  यह लेख हम नहीं लिखते अगर एक पाठक ने पुराने एक लेखक पर टिप्पणी नहीं की होती।  उस पाठिका की टिप्पणी के बाद हमने अपने वही लेख पढ़ डाले। उस पाठिका का धन्यवाद! उसकी टिप्पणी ने  उन पाठों को  याद दिलाया तब हमने सोचा कि  कुछ दूसरा लिखो उससे पहले वाला पढ़ लो। प्रस्तुत हैं वही दोनों लेख।

 

सोने का खज़ाना और भारत का अध्यात्मिक ज्ञान-हिन्दी लेख (sone ka khazana aur bharat ka adhyatmik gyan-hindi lekh)

              केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ काखजाना बरामद हुआ है। यह खजाना त्रावणकोर या ट्रावनकोर के राजाओं का है।जहां तक हमारी जानकारी है भारत में इस तरह खजाना मिलने का यह पहला प्रसंगहै।

           अलबत्ता बचपन से अपने देश के लोगों को खजाने के पीछे पागल होतेदेखा हैं। कई लोग कहीं कोई खास जगह देख लेते हैं तो कहते हैं कि यहां गढ़ाखजाना होगा।अनेक लोग सिद्धों के यहां चक्कर भी इसी आशा से लगाते हैं किशायद कहीं किसी जगह गढ़े खजाने का पता बता दे। कुछ सिद्ध तो जाने ही इसलियेजाते हैं कि उनके पास गढ़े खजाने का पता बताने की क्षमता या सिद्धि है।

        ऐसे भी किस्से देखे हैं कि किसी ने पुराना मकान खरीदा और उसेबनवाना शुरु किया।भाग्य कहें या परिश्रम वह अपने व्यवसाय में अमीर हो गयातो लोगों ने यह कहना शुरु कर दिया कि खुदाई में उनको खजाना मिला है।

         बहरहाल केरल केपद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले सोने और हीरे जवाहरात नेभले ही किसी को चौंकाया हो पर इतिहासविद् और तत्वज्ञानियों ने लिये यह कोईआश्चर्य का विषय नहीं हो सकता।

अभी हाल ही में पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा के मंदिर में तो मात्र दो सौढाई करोड़ का खजाना मिला था तब अनेक लोगों की सांसें फूल गयी थी। अब केरलके पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले खजाने ने उसके एतिहासिक महत्व पर धूल डालदी है।

          बता रहे हैं कि केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिला यह खजानातो मात्र एक कमरे का है और अभी ऐसे ही छह कमरे अन्य भी हैं।न हमने खजानादेखा है न देख पायेंगे। न पहुंचेंगे न पहुंच पायेंगे।इस खजाने का क्याहोगा यह भी नहीं पता पर जिन्होंने उसका संग्रह किया उन पर तरस आता है। यहराजाओं का खजाना है और इसका मतलब यह है कि उन्होंने अपनी प्रजा के दम पर हीइसे बनाया होगा।नहीं भी बनाया होगा तो अपने उस राज्य के भौतिक या उसकेनाम का हीउपयोग किया तो होगा जो बिना प्रजा की संख्या और क्षमता के संभवनहीं है।

             राजा हो या प्रजा सोना, हीरा, जवाहरात तथा अन्य कीमती धातुओंइस देश के लिये हमेशा कौतुक का विषय रही हैं। पेट की भूख शांत करने के लियेइसका प्रत्यक्ष कतई नहीं हो सकता अलबत्ता चूंकि लोगों के लिये आकर्षण काविषय है इसलिये उसका मोल अधिक ही रहता है। हमारे देश में सोना पैदा नहींहोता।इसे बाहर से ही मंगवाया जाता है।जब हम प्राचीन व्यापार की बातकरते हैं तो यही बात सामने आती है कि जीवन उपयोगी वस्तुऐं-गेंहूं, चावल, दाल, कपास और उससे बना कपड़ा तथा अन्य आवश्यक वस्तुऐं-यहां से भेजी जाती थीजिनके बदले यह सोना और उससे बनी वस्तुओं जिनका जीवन में कोई उपयोग नहीं हैयहां आता होंगी। कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने।सोना दूर पैदा होताहै उससे देश का प्रेम है पर प्रकृति की जो अन्य देशों से अधिक कृपा है उसकीपरवाह नहीं है। हम कई बार लिख चुके हैं और आज भी लिख रहे हैं कि विश्व केप्रकृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में जलस्तर सबसे बेहतर है। जी हांवह जल जो जीवन का आधार है हमारे यह अच्छा है इसलिये गेंहूं, चावल, दाल, कपास और सब्जियों की बहुतायत होने के कारण हम उनका महत्व नहीं समझते वैसेही जैसे कहा जाता है किघर का ब्राह्मण बैल बराबर।यह बात भी कह चुके हैंकि निरुपयोगी पर आकर्षक चीजों के मोह में हमारा समाज इस तरह भ्रमित रहताहै कि उस पर हंसा ही जा सकता है।वैसे तो विश्व में सभी जगह अंधविश्वासफैला है पर हम भारतीय तो आंकठ उसमें डूबे रहे हैं। यहां इतना अज्ञान रहा हैकि हमारे महान ऋषियों को सत्य का अनुसंधान करने के अच्छे अवसर मिले हैं।कहा जाता है कि कांटों में गुलाब खिलता है तो कीचड़ में कमल मिलता है।अगरयह समाज इतना अज्ञानी नहीं होता तो सत्य की खोज करने की सोचता कौन? मूर्खोंपर शोध कर ही बुद्धिमता के तत्व खोजे जा सकते हैं। हम विश्व मेंअध्यात्मिक गुरु इसलिये बने क्योंकि सबसे ज्यादा मोहित समाज हमारा ही है।भौतिकता को पीछे इतना पागल हैं कि अध्यात्म का अर्थ भी अनेक लोग नहींजानते। इनमें वह भी लोग शामिल हैं जो दावा करते हैं कि उन्होंने ग्रंथों काअध्ययन बहुत किया है।

           कहा जाता है कि सोमनाथ का मंदिर मोहम्मद गजनबी ने लूटा था।उसमें भी ढेर सारा सोना था। कहते हैं कि बाबर भी यहां लूटने ही आया था। यहअलग बात है कि वहां यहीं बस गया यह सोचकर कि यहां तो जीवन पर सोने की डालपर बैठा जाये।बाद में उसके वंशज तो यहीं के होकर रह गये।यकीनन उस समयभारत में सोने के खजाने की चर्चा सभी जगह रही होगी। उस समय भगवान के बादसमाज में राजा का स्थान था तो राजा लोग मंदिरों में सोना रखते थे कि वहांप्रजा के असामाजिक तत्व दृष्टिपात नहीं करेंगे। उस समय मंदिरों में चोरीआदि होने की बात सामने भी नहीं आती।

इतना तय है कि अनेक राजाओं ने प्रजा को भारी शोषण किया। किसी की परवाह नहींकी। यही कारण कि कई राजाओं के पतन पर कहीं कोई प्रजा के दुःखी होने की बातसामने नहीं आती। यहां के अमीर, जमीदार, साहुकार और राजाओं ने प्रजा केछोटे लोगों को भगवान का एक अनावश्यक उत्पाद समझा।यही कारण है विदेशियोंने आकर यहां सभी का सफाया किया। राजा बदले पर प्रजा तो अपनी जगह रही। यहीकारण है यहां कहा भी जाता है कि कोउ भी नृप हो हमें का हानि।कुछ लोग इसभावयहां के लोगों की उदासीनता से उपजा समझते हैं पर हम इसे विद्रोह सेपनपा मानते हैं। खासतौर से तत्वज्ञान के सदंर्भ में हमारा मानना है कि जबआप स्वयं नहीं लड़ सकते तो उपेक्षासन कर लीजिये।

जिसके पास कुछ नहीं रहा उसे लुटने का खतरा नहीं था और जिन्होंने सोने केताज पहने गर्दने उनकी ही कटी।जिनकी जिंदगी में रोटी से अधिक कुछ नहीं आयाउन्होंने सुरक्षित जिंदगी निकाली और जिन्होंने संग्रह किया वही लुटे।

          अब यह जो भी खजाना मिला है यह तब की प्रजा के काम नहीं आया तोराजाओं के भी किस काम आया? ऐसे में हमारा ध्यान श्रीमद्भागवत् गीता केसंदेशों की तरफ जाता है। जिसमें गुण तथा कर्मविभाग का संक्षिप्त पर गुढ़वर्णन किया गया है। उस समय के आम और खास लोग मिट गये पर खजाना वहीं बनारहा। अब यह उन लोगों के हाथ लगा है जिनका न इसके संग्रह में प्रत्यक्ष याअप्रत्यक्ष कोई हाथ नहीं है। सच है माया अपना खेल खेलती है और आदमी समझताहै मैं खेल रहा हूं। वह कभी व्यापक रूप लेती है और कभी सिकुड़ जाती है। कभीयहां तो कभी वहां प्रकट होती है।सत्य स्थिर और सूक्ष्म है।सच्चा धनी तोवही है जो तत्वज्ञान को धारण करता है।वह तत्वज्ञान जिसका खजाना हमारेग्रंथों में है और लुटने को हमेशा तैयार है पर लूटने वाला कोई नहीं है।बहरहाल वह महान लोग धन्य हैं जो इसे संजोए रखने का काम करते रहे हैं इसलियेनहीं कि उसे छिपाना है बल्कि उनका उद्देश्य तो केवल इतना ही है कि आनेवाली पीढ़ियों के वह काम आता रहे।

      इस विषय पर लिखे गये एक व्यंग्य को अवश्य पढ़ें

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भारत आज भी सोने की चिड़िया है-हास्य व्यंग्य(bharat aaj bhi sone di chidiya hai-hasya vyangya)

          कौन कहता है कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। अब यह क्यों नहींकहते कि भारत सोने की चिड़िया है।कम से कम देश में जिस तरह महिलाओं औरपुरुषोंके गले से चैन लूटने की घटनायें हो रही हैं उसे तो प्रमाण मिल हीजाता है। हमें तो नहीं लगता किशायद का देश कोई भी शहर हो जिसके समाचारपत्रों में चैन खिंचने या लुटने की घटना किसी दिन न छपती हो।अभी तक जिनशहरों के अखबार देखे हैं उनमें वहीं की दुर्घटना और लूट की वारदात जरूरशामिल होती है इसलिये यह मानते हैं कि दूसरी जगह भी यही होगा।

          खबरें तो चोरी की भी होती हैं पर यह एकदम मामूली अपराध तो है साथही परंपरागत भी है। मतलब उनकी उपस्थिति सामान्य मानी जाती है।वैसे तोलूट की घटनायें भी परंपरागत हैं पर एक तो वह आम नहीं होती थीं दूसरे वहकिसी सुनसान इलाके में होने की बात ही सामने आती थी। अब सरेआम हो लूट कीवारदात हो रही हैं।वह भी बाइक पर सवार होकर अपराधी आते हैं।

         हमारे देश मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक व्यंग्य में लिखाथा कि हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि हमें मारने की फुरसत नहीं है। उनकामानना था कि हमसे अधिक अमीर इतनी संख्या मेंहैं कि लुटने के लिये पहलेउनका नंबर आयेगा और लुटेरे इतनी कम संख्या में है कि उनको समझ में नहीं आताकि किसे पहले लूंटें और किसे बाद में। इसलिये लूटने से पहले पूरी तरहमुखबिरी कर लेते हैं। यह बहुत पहले लिखा गया व्यंग्य था।आज भी कमोबेश यहीस्थिति है। हम ख्वामख्वाह में कहते है  कि अपराध और अपराधियों की संख्याबढ़ गयी हैं। आंकड़ें गवाह है कि देश में अमीरों की संख्या बढ़ गयी है। अब यहतय करना मुश्किल है कि इन दोनों के बढ़ने का पैमाना कितना है। अनुपात क्याहै? वैसे हमें नहीं लगता कि स्वर्गीय शरद जोशी के हाथ से व्यंग्य लिखने औरआजतक के अनुपात में कोई अंतर आया होगा।साथ ही हमारी मान्यता है कि अपराधीऔर अमीरों की संख्या इसलिये बढ़ी है क्योंकि जनसंख्या बढ़ी है। विकास की बातहम करते जरूर है पर जनसंख्या में गरीबी बढ़ी है। मतलब अपराध, अमीरी औरगरीबी तीनों समान अनुपात में ही बढ़ी होगी ऐसा हमारा अनुमान है।

          सीधी बात कहें तो चिंता की कोई बात नहीं है। सब ठीकठाक है। विकासबढ़ा, जनंसख्या बढ़ी, अमीर बढ़े तो अपराध भी बढ़े और गरीबी भी यथावत है। तबरोने की कोई बात नहीं है।फिर हम इस बात को इतिहास की बात क्यों मानतेहैं  कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी।हम यह क्यों गाते हैं कि कभी कभी डालपर करती थी सोने की चिड़िया बसेरा, वह भारत देश है मेरा। हम थे की जगह हैंशब्द क्यों नहीं उपयोग करते।अभी हमारे देश के संत ने परमधाम गमन किया तोउनके यहां से 98 किलो सोना और 307 किलो चांदी बरामद हुई।टीवी और अखबारोंके समाचारों के अनुसार कई ऐसे लोग पकड़े गये जिनके लाकरों से सोने की ईंटेमिली।

          वैसे तो सोना पूरे विश्व के लोगों की कमजोरी है पर भारत में इसेइतना महत्व दिया जाता है कि दस हजार रुपये गुम होने से अधिक गंभीर औरअपशकुन कामामला उतने मूल्य का सोना खोना या छिन जाना माना जाता है। बहुअगर कहीं पर्स खोकर आये तो वह सास को न बताये कि उसमें चार पांच हजार रुपयेथे। यह भी सोचे सास को क्या मालुम कि उसमें कितने रुपये थे पर अगर पांचहजार रुपये की चैन छिन जाये तो उसके लिये धर्म संकट उत्पन्न हो जाता हैक्योंकि वह सास के सामने हमेशा दिखती है और यह बात छिपाना कठिन है।

           एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के अनुसार भारत के लोगों के पास सबसेअधिक सोना है। इसमें शक भी नहीं है। भारत में सोने का आभूषण विवाह के अवसरपर बनवाये जाते हैं। इतने सारे बरसों से इतनी शादिया हुई होंगी।उस समयसोना इस देश में आया होगा। फिर गया तो होगा नहीं।अब कितना सोना लापता हैऔर कितना प्रचलन में यह शोध का विषय है पर इतना तय है कि भारत के लोगों केपास सबसे अधिक सोना होगा यह तर्क कुछ स्वाभाविकलगता है।

            भारत के लोग दूसरे तरीके से भी सबसे अधिक भाग्यशाली हैंक्योंकि अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ कहते हैं कि भूजल स्तर भारत में सबसे अधिकहै। यही कारण है कि हमारा देश अन्न के लिये किसी का मुंह नहीं ताकता।हमारे ऋषि मुनि हमेशा ही इस बात को बताते आये हैं पर अज्ञान के अंधेरे मेंभटकने के आदी लोग इसे नहीं समझ पाते। कहा जाता है कि भारत का अध्यात्मिकज्ञान सत्य के अधिक निकट है। हमें लगता है कि ऋषि मुनियों के लिये तत्वज्ञान की खोज करना तथा सत्य तत्व को प्रतिष्ठित करना कोई कठिन काम नहीं रहाहोगा क्योंकि मोह माया में फंसा इतना व्यापक समाज उनको यहां मिला जो शायदअन्यत्र कहीं नहीं होगा। अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान का दीपक जलाना भलाकौनसा कठिन काम रहा होगा?

             वैसे देखा जाये तो सोना तो केवल सुनार के लिये ही है। बनना होयाबेचना वही कमाता है। लोग सोने के गहने इसलिये बनवाते हैं वक्त पर कामआयेगा पर जब बाज़ार में बेचने जाते हैं तो सुनार तमाम तरह की कटौतियां तोकाट ही लेता हैं। अगर आप आज जिस भावकोई दूसरी चीज खरीदने की बजायसोनाखरीदें  और कुछ वर्ष बाद खरीदा सोना बेचें तो पायेंगे कि अन्य चीजभी उसीअनुपात में महंगी हो गयी है।मतलब वह सोना और अन्य चीज आज भी समान मूल्यकी होती है। अंतर इतना है कि अन्य चीज पुरानी होने के कारण भाव खो देती हैऔर सोना यथावत रहता है।हालांकि उसमें पहनने के कारण उसका कुछ भाग गल भीजाता है जिससे मूल्य कम होता है पर इतना नहीं जितना अन्य चीज का।संकट मेंसोने से सहारे की उम्मीद ही आदमी को उसे रखने पर विवश कर देती है।

          जब रोज टीवी पर दिख रहा है और अखबार में छप रहा है तब भी भला कोईसोना न पहनने का विचार कर रहा है? कतई नहीं! अगर महिला सोना नहीं पहनतीउसे गरीब और घटिया समझा जाता है। सोना पहने है तो वह भले घर की मानी जातीहै। भले घर की दिखने की खातिर महिलायें जान का जोखिम उठाये घूम रही है।धनके असमान वितरण ने कथित भले और गरीब घरों में अंतर बढ़ा दिया है।वैसे कुछघर अधिक भले भी हो गये हैं क्योंकि उनकी महिलाऐं चैन छिन जाने के बाद फिरदूसरी खरीद कर पहनना शुरु देती हैं।बड़े जोश के साथ बताती हैं कि सोना चलागया तो क्या जान तो बच गयी।

        भारत में वैभव प्रदर्शन बहुत है इसलिये अपराध भी बहुत है।वैभवप्रदर्शन करने वाले यह नहीं जानते कि उनके अहंकार से लोग नाखुश हैं औरउनमें कोई अपराधी भी हो सकता है।पैसे, प्रतिष्ठा और पद के अहंकार में चूरलोग यही समझते हैं कि हम ही इस संसार में है। वैसे ही जैसे बाइक पर सवारलोग यह सोचकर सरपट दौड़ते हुए दुर्घटना का शिकार होते हैं कि हम ही इस सड़कपर चल रहे हैं या सड़क पर नहीं आसमान में उड़ रहे हैं वैसे ही वैभव केप्रदर्शन पर भी अपराध का सामना करने के लिये तैयार होना चाहिए।टीवी परचैन छीनने की सीसीटीवी में कैद दृश्य देखकर अगर कुछ नहीं सीखा तो फिर कहनाचाहिए कि पैसा अक्ल मार देता है।

        कुछ संस्थाओं ने सुझाव दिया है कि देश में अनाज की बरबादी रोकने केलिये शादी के अवसर पर बारातियों की संख्या सीमित रखने का कानून बनायाजाये।इस पर कुछ लोगों ने कहा कि अनाज की बर्बादी शादी से अधिक तो उसकेभंडारण में हो रही है। अनेक जगह बरसात में हजारों टन अनाज होने के साथकहीं ढूलाई में खराब होकर दुर्गति को प्राप्त होता है और उसकी मात्रा भी कमनहीं है। हम इस विवाद में न पड़कर शादियों में बारातियों की संख्या सीमितरखने के सुझाव पर सोच रहे हैं। अगर यह कानून बन गया तो फिर इस समाज का क्याहोगा जो केवल विवाहों के अवसर के लिये अपने जीवन दांव पर लगा देता है।उसअवसर का उपयोग वह ऐसा करता है जैसे कि उसे पद्म श्री या पद्मविभूषण  मिलनेका कार्यक्रम हो रहा है।बाराती कोई इसलिये बुलाता कि उसे उनसे कोई स्नेहया प्रेम है बल्कि अपने वैभव प्रदर्शन के लिये बुलाता है। यह वैभवप्रदर्शन कुछ लोगों को चिढ़ाता है तो कुछ लोगों को अपने अपराध के लियेउपयुक्त लगता है। ऐसा भी हुआ है कि शादी के लिये रखा गया पूरा सोना चोरी होगया। सोने से जितना सामान्य आदमी का प्रेम है उतना ही डकैतों, लुटेरों औरचोरों को भी है। सौ वैभव प्रदर्शन और चोरी, लूट और डकैती का रिश्ता चलतारहेगा। पहले बैलगाड़ी और घोड़े पर आदमी चलता था तो अपराधी भी उस पर चलते थे।अब वह पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का उपयोग कर रहा है तो अपराधी भी वही कररहे हैं। जो भले आदमी की जरूरत है वही बुरे आदमी काभी सहारा है। सोना तोबस सोना है। हम इन घटनाओं को देखते हुए तो यह कहते है कि भारत आज भी सोनेकी चिड़िया है।

 

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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