सेवा से सिंहासन की तरफ-हिंदी व्यंग्य कविता


स्वयंभू समाज सेवकों का

जमावड़ा है इस देश में,

कल्याण और सेवा का ठेका लेते है

काली नीयत वाले वह लोग

घूमते हैं जो धवल वेश में,

जिनका अपने कमीशन से ही है वास्ता,

बताते हैं  बेबसों के घर पहुंचाने का रास्ता,

सभी नीयत के साफ होते

स्वर्ग जमीन पर आ गया होता,

न तरसता कोई रोटी को

न कोई बिना छत के सोता।

कहें दीपक बापू

सिंहासन की सीढ़ियां चढ़ने में

जो लोग कतराते हैं,

गरीब, बेबस और बीमार की लाचारी पर

अपनी किस्मत अजमाते हैं,

न लगायें हल्दी न फिटकरी

अपनी छवि का रंग चोखा कर जाते हैं,

अपने घर पर चंदे से करवाते सजावट,

प्रचार में चमक जाते फटाफट,

स्वयंसेवक की पदवी नाम के आगे सजाते,

अपने दयावान होने का बैंड बजवाते,

किताबों में आय और कमाई के आंकड़े

करीने से दर्ज हैं,

बेबस गरीब और लाचार

चाहे भले हमेशा अपनी मजबूरी पर रोता।

———————————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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