बाबा रामदेव को चुनौती देते लोगों के तर्क कितने मजबूत-हिन्दी लेख (baba ramdev ko chunauti detelog-hindi lekh)


            आज सुबह अपनी ही आनंद नगर कॉलोनी के पर्यटन में पतंजलि योग संस्थान के सानिध्य में आयोजित एक सात दिवसीय योग शिविर का उद्घाटन शिविर को देखने का अवसर मिल गया। बाबा रामदेव तो नहंी थे पर उनकी अनुपस्थिति कोई मायने भी नहीं रखती क्योंकि जो योग साधना का अभ्यास करवा रहे थे वह योग्य शिक्षक लगे। सिंहासन और हास्यासन का आनंद पूरी तरह लिया। यह आनंद तब दोगुना लिया जा सकता है आप योग साधना निरंतर करते हों। भारतीय योग संस्थान के योग शिविर में-जो वह बिना किसी प्रचार के आयोजित करता है-भी इस तरह का योगाभ्यास कराया जाता है पर वहां कम लोग ही पहुंचते हैं। इसका कारण यह है कि उसके शिविरों में कोई प्रसिद्ध हस्ती का नाम नहीं जुड़ा। पतंजलि योग संस्थान के नाम से स्वामी रामदेव का नाम जुड़ा हैै और यही कारण है कि उसके शिविर अधिक से अधिक लोग जुटा लेते हैं। यह अलग बात है कि वह स्थाई नहीं होते जबकि भारतीय योग संस्थान के शिविर नियमित रूप से चलते हैं।
यह लेखक न तो बाबा रामदेव का शिष्य है न ही उनका समर्थक पर इसके बावजूद उनके योग प्रचार से प्रसन्नता होती है। इस प्रसन्नता का कारण समाज के प्रति निष्काम प्रेम है। नौ बरस नितांत योग साधना कर चुकने के बाद आदमी का मन कैसे होता है, यह वही समझ सकता है जिसने किया हो। दूसरी बात यह भी है कि चार बरस से श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन के बाद इस बात का अनुभव हुआ कि जब तत्वज्ञान का आभास हो जाता है तब आदमी निरंकार दृष्टा होकर चिंतन करता है। ऐसे में शुभकर्म करने वाला कोई अन्य व्यक्ति क्यों न हो तत्वज्ञानी उसकी प्रशंसा करेगा।
        दरअसल यह लेख अगर एक दिन पहले लिखते तो शायद इस शिविर की चर्चा नहीं होती। इस लेख को लिखने का मूल उद्देश्य स्वामी रामदेव के कृत्तिव पर प्रकाश डालना जरूरी है। यह विचार स्वामी अग्निवेश के एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार को देखने सुनने के बाद आया।
         पहले स्वामी अग्निवेश की बात कर लें। वह 73 वर्ष के हैं यह बात कल उनके श्रीमुख से पता चली। इसका मतलब यह कि वह अन्ना हजारे से एक वर्ष छोटे हैं। अग्निवेश जी की आयु देखकर मन श्रद्धा से इसलिये भर गया क्योंकि उनके चेहरे और देह से वह इतनी बड़ी आयु के नहीं दिखते। उन्होंने इसका राज संयम बरतने को बताया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अपने ही साथियों के प्रति उनका जो बर्ताव टीवी चैनलों पर दिखाया गया उससे उनकी छवि खलनायक की बनी। इतना ही नहीं अमरनाथ को लेकर हिन्दू समाज पर उनकी टिप्पणी ने भी उनकी छवि खराब की थी। चूंकि हमने पहले भी कहा है कि बाज़ार और प्रचार समूह अपने प्रायोजित आदमी की छवि बनाने और बिगाड़ने का काम करते हैं और स्वामी अग्निवेश कहीं न कहीं उनके ही नायक हैं। संभव है कि स्वामी अग्निवेश को इसका आभास न हो बल्कि उनके पर्दे के पीछे सक्रिय साथी उनकी गतिविधियों का जिम्मा लेकर काम चला रहे हों पर यह तय है कि कहीं न कहीं उनके साथ बाज़ार का समर्थन है। यही कारण है कि छवि खराब होने के बाद उसे सुधारने के लिये उनको बिग बॉस में लाया गया और अब तमाम तरह के साक्षात्कार प्रसारित हो रहे हैं। हमने अपने पहले के पाठों में उनकी आलोचना की है पर कल के साक्षात्कार ने उनके प्रति हमारे मन में आकर्षण पैदा किया। सबसे पहले तो उनकी इस बात के लिये प्रशंसा कर चाहिए कि उन्होंने अपने संयम से आयु को मात दी है। मतलब उनसे भी सीखने लायक कुछ है। उन्होंने एक बात स्वीकार की कि अहंकारवश उन्होंने अपने साथियों के प्रति भूल की तो उनके साथी भी अहंकार में रहे हैं। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया पर प्रकृतियों से द्वंद्व की बात मानी। वह आर्यसमाजी हैं यह भी एक अच्छी बात लगी। उन्होंने गीता का अध्ययन किया है यह भी लगा। अखरी तो बस एक बात वह यह कि वह बाबा रामदेव के प्रति दुराग्रह रखते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने स्वामी रामदेव के एक निकटस्थ आदमी से कहा था कि वह व्यापार से अलग होकर काम करें वरना उनके विरोधी गलतियां निकालकर बदनाम करेंगे।
        इसी साक्षात्कार में तीनों महिला संचालनकर्ता बार बार ढोंगी साधुओं का जिक्र इस तरह कर रही थीं जैसे कि भक्तों से पैसा लेने वाला हर साधु ढोंगी हो। इतना ही नहीं वह इस तरह बोल रही थीं कि आधुनिक साज सज्जा से काम करने वाले सारे संत केवल पैसे से काम रहे हों। स्वामी अग्निवेश भी लगता है कि इससे सहमत थे। हमारी बात यहीं से शुरु होती है।
        हम यहां बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता में कहीं नहीं लिखा हुआ है कि माया से परे रहो। सांसरिक कर्म से विरक्त होना ही सन्यास है। दरअसल श्रीगीता में कहा गया कि हमें दृष्टा और देह के ंअंतर को समझते हुए आत्मिक रूप से कहीं भी सांसरिक विषयों में लिप्त नहीं होना चाहिए। धन से दूर रहने की बात इसलिये भी गलत लगेगी क्योंकि उसमें दान आदि करने का भी महत्व बताया गया है। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वह किसी को शिष्य नहीं बनाते। यह अच्छी बात है पर जो शिष्य बनाते हैं उन पर उनको आक्षेप करने का अधिकार नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि हम स्वामी अग्निवेश के अनेक कृत्यों से सहमत न होने के बावजूद उनके गुणों की चर्चा कर रहे हैं। यह श्रीगीता के ज्ञान की ही देन है। स्वामी अग्निवेश धर्मं के नाम पर ढोंग के विरोधी हैं। हम भी हैं। इसके बावजूद हम कर्मकांडियों के प्रति घृणा भाव नहीं रखते। यह घृणा मनुष्य के नकारात्मक भाव का प्रमाण है जो उसे दायरों में बांध देती है। स्वामी अग्निवेश को अधिक शिष्य मिलने भी नहीं थे। उनके साथ जो लोग भी है तो वह समर्थक होंगे प्रशंसक नहीं। अमरनाथ यात्रा पर उनकी टिप्पणियां सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना हमें पसंद नहीं था। दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करना अहंकार भाव दिखाना है जो तामस बुद्धि का परिचायक है। आयु में अग्निवेश हम से बड़े हैं इसलिये उनके प्रति हमारे मन में सम्मान है पर जहां अध्यात्म की बात आती है तो सबसे पहले यह देखना ही पड़ता है कि आदमी अपने ज्ञान के साथ कितना समय बिता रहा है।
      कुछ लोग शायद हमसे नाराज होंगे यह जानकर कि हम तो किसी भी साधु या संत को ढोंगी कहने के बाद मन में पछताते हैं। इसका कारण भी बताये देते हैं कि हम में इतनी कुब्बत नहंी है कि हम स्वामी रामदेव, आसाराम बापू, सुधांशु महाराज तथा मोरारी बापू की तरह अध्यात्म की शक्ति के सहारे इतनी भीड़ जुटा लें। जो भीड़ जुटती है उसमें सभी को अज्ञानी कहना भी तामस बुद्धि का परिचायक है क्योंकि हम स्वयं भी कुछ अच्छा सुनने की खातिर वहां जाते हैं। अगर कभी अवसर मिला तो स्वामी अग्निवेश की सभा सुनने भी जा सकते हैं यह जानते हुए कि वह हमारे मन को अप्रिय लगने की बात कर सकते है। हमारे अंदर ज्ञान और गुण की चाह है पर अपने ज्ञान के कारण यह यकीन भी है कि हम स्वामी अग्निवेश में भी ढूंढ निकाल सकते हैं। अगर धार्मिक संतों के पास काला धन है तो स्वामी अग्निवेश जी के कार्यक्रमों के आयोजक भी दूध के धुले नहीं हो सकते। इसके बावजूद हमें स्वामी अग्निवेश ने प्रभावित किया यह बात मानने में संकोच नहीं है। वह अरविंद केज़रीवाल के और अन्ना हजारे के प्रति कोई कठोर बात करते हुए झिझक रहे थे जो कि उनके मर्यादित स्वभाव का प्रमाण है।
       चाहे योग शिविर हो या प्रवचन का कार्यक्रम उनके आयोजन पर पैसा खर्च होता है। सीधी बात कहें तो माया का खेल है तो माया से ही जीता जा सकता है। हमारा समाज इसके लिये खर्च करने को तैयार भी रहता है। एक समय था जब फिल्म, क्रिकेट और टीवी ने लोगों के मन को बांध दिया पर फिर लोग ऊब गये तो यही अध्यात्म संत उनके काम आये। एक आयु के बाद जब आदमी थकने लगता है तब वह आसरा ढूंढता है। यह आश्रम, मंदिर तथा दरबार उसके लिये एक आसरा बन जाते हैं। इनके निर्माण पर पैसा खर्च होता है और इसके लिये भक्तों से दान या सहायता लेनी पड़ती है। स्वामी अग्निवेश सत्य के ज्ञानी है पर माया के खेल से अनभिज्ञ है। ज्ञानी तो इस देश में बहुत लोग हैं पर अधिक भीड़ सभी के पास नहीं जाती। माया भी बहुत लोगों के पास है पर सभी संतों की तरह नहीं पुजते। सीधी बात यह है कि जिसके पास ज्ञान का संग्रह और माया की शक्ति है वही बड़े प्रसिद्ध संत बन पाये हैं।
      स्वामी अग्निवेश बजाय अनर्गल विषयों पर में लगने के अगर आर्य समाज का ही विचार आगे बढ़ाते तो शायद बेहतर रहता। प्रसिद्ध की बात छोड़कर अगर योग्यता के आधार पर तुलना की जाये तो वह बाबा रामदेव के आगे बहुत छोटे लगते हैं। बाबा रामदेव ने जिस कदर योग साधना की पुनःप्रतिष्ठा की है वह अनुकरणीय है। उनके पतंजलि योग संस्थान का पूरे देश में काम चल रहा है। अब तो उन्होंने अनेक साधकों को शिक्षक होने योग्य भी बना दिया है। उनके शिविर लग रहे है। धन अगर नहीं होगा तो यह प्रचारतंत्र चलेगा कैसे? अलबत्ता हम स्वामी अग्निवेश से यह अपेक्षा जरूर करेंगे कि वह योग साधना की आलोचना करने की बजाय अपने नियम और संयम के विषयों पर लोगों को जागरुक करने का काम करें। भ्रष्टाचार केवल नारे लगाने या आंदोलन चलाने से हटने वाला नहीं है बल्कि लोगों में नियम और संयम से चलने की शिक्षा देने पर ही उसका निराकरण संभव है।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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