अन्ना हजारे का मौन व्रत शुरु तो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी मौन-हिन्दी लेख (anna hazare ka maun vrat or vrut aur unka bhrashtachar virodhi andolan-hindi lekh)


              अन्ना ने मौन व्रत ले लिया है। अपने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के बाद दो बार अनशन करने के बाद यह तीसरा अवसर है जब वह चर्चा में आये हैं। आमतौर से देश की गतिविधियों का गहन अध्ययन करने वाले लोग यह मानते हैं कि अभी यह आंदोलन परिणाम पाना तो दूर उस मार्ग पर आया तक नहीं है। अन्ना साहब ने अनशन के बाद मौन व्रत प्रारंभ कर भले ही प्रचार माध्यमों में स्थान बनाया पर चिंतनशील लोग इससे बहलने वाले नहीं है। यही कारण है कि धीरे धीरे उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जनमानस में अपनी पहचान खो रहा है। अब तो कुछ लोगों को लगने लगा है कि प्रचार माध्यमों को अपना विज्ञापन व्यवसाय चलाने के लिये प्रकाशन तथा प्रसारण का महानायक मिल गया है। उनकी गतिविधियों के साथ ही उनके साथियों के कार्यों के भी समाचार प्रसारित होने के साथ ही लंबी बहसें होती है। बार बार ब्रेक लेकर होने वाले इन प्रकाशनों और प्रसारणों को देखकर तो यही लगता है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का एक परिणाम लोकतंत्र के चौथे स्तंभों के पास विज्ञापन व्यवसाय बनाये रखने वाले एक महानायक मिलने के रूप में तो सामने आ ही गया है।
            दरअसल अन्ना हजारे स्वयं एक चतुर राजनीतिज्ञ हैं पर उनके सहयोगियों के साथ ऐसा नहीं है। जब अन्ना पहली बार अनशन करने दिल्ली आये थे तो कथित स्वयंसेवी संगठनों के लोगों ने उनके मंच पर आकर आंदोलन को संगठित रूप प्रदान किया। तय बात है कि अन्ना महानायक बने तो उनके सहयोगी नायक बन गये। मुश्किल यह आयी कि इन लोगों के पास भ्रष्टाचार का विरोध एक नारे के रूप में था पर कोई रणनीति नहीं है। दूसरी बात यह कि देश और विदेश से प्राप्त अनुदान से स्वैच्छिक संगठनों के वास्तविक उद्देश्यों पर शक भी किया जाता रहा है और कश्मीर पर अन्ना टीम के एक वरिष्ठ सदस्य की टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि अन्ना के सहयोगियों का यह भी एक उद्देश्य है कि वह विद्यमान लोकतंत्र प्रणाली से प्रथक होकर ऐसे समाज सेवी के रूप में अपनी पहचान बनायें जो राज्य प्रतिष्ठानों पर प्रभाव रखता हुआ प्रदर्शित हो। तय बात है राज्य पर प्रभाव रखने से समाज सेवा में दान, अनुदान और सम्मान अधिक मिलता है। अन्ना के सहयोगी के इस बयान ने आंदोलन पर संकट ला दिया है। एक बयान किस तरह पूरे आंदोलन को संकट में डाल सकता है यह पहली बार देखा गया है। इतना ही नहीं एक आंदोलन का प्रमुख अपने लक्ष्य से इतर विषय पर बयान देखकर लोगों के गुस्से का शिकार इस तरह होता है समूचा आंदोलन संदेह के दायरे में आ जाता है यह भी शायद ही कभी पहले देखा गया हो।
         जनलोकपाल बनेगा या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है। स्थिति यह है कि पहले से ही उसका श्रेय लेने की तैयारी हो रही है। अन्ना के बयानों का बारीकी से अध्ययन किया जाये तो उन्होंने उसमें अनेक बार बदलाव किये हैं। वह भले ही दावा करते हों कि वह किसी दबाव में नहीं आते पर उनके बदलते बयान इसके विपरीत स्थिति बयान करते हैं। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह उनकी रणनीतिक चतुराई का हिस्सा नहीं है जिससे वह अपने लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। मुश्किल यह है कि उनके सहयोगियों में न केवल रणनीतिक चतुराई का अभाव है बल्कि अनेक विषयों पर कार्य कर अपने आपको महानतम साबित करने के प्रयास में वह मूर्खतायें भी करते हैं। हम अन्ना के उस सहयोगी की ही बात कर लें जिन्होंने जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का समर्थन किया। दरअसल उन्हें शायद पता नहीं है कि अगर देश में भ्रष्टाचार खत्म होने के साथ ही राजकीय कार्यशैली में भी बदलाव आ जाये तो यकीनन जम्मू कश्मीर में कोई समस्या नहीं रहने वाली है। जम्मू कश्मीर में सभी जगह की तरह भ्रष्टाचार है और तय बात है कि वहां भी लोगों में आक्रोश होगा। इसी आक्रोश वहां के कुछ कथित लोग उठा रहे हैं और उनको भी वैसे ही समर्थन मिल जाता है जैसे कि भ्रष्टाचार के मसले पर अन्ना साहेब को मिल गया। मतलब यह कि कहीं भी किसी जगह आक्रोशित लोग व्यवस्था से इतने नाराज होते हैं कि वह किसी का भी समर्थन करने को तैयार हो जाते हैं। अन्ना साहेब भी भ्रष्टाचार का मामला लेकर तभी आगे आये जब भारतीय संसद, न्यायालय तथा प्रचार माध्यमों में अनेक घोटालों का पर्दाफाश हुआ। नेताओं का समूह भ्रष्टाचार के लिये बदनाम हैं पर याद रखने की बात यह है कि भारतीय संसद में घोटालों पर जमकर चर्चा हुई। सरकार ने उन पर कार्यवाही की। न्यायालय ने उनका संज्ञान लिया। भ्रष्टाचार के कुछ आरोपी जेल भी गये जिससे भ्रष्टाचार का मुद्दा ज्वलंत हो गया। तब कहीं अन्ना साहेब अनशन के लिये आये और उनको प्रचार में लाभ मिला।
           अन्ना का एक सहयोगी तो अपने साथियों से बेवफाई कर बाहर हो गया। दूसरा बयान देकर संकट में फंसा है। ऐसे में अन्ना को अपने आंदोलन को संगठित रूप से चलाने के लिये अब अपने नये साथी ढूंढना चाहिए। उनके वर्तमान साथियों में अधिकतर अपने अन्य लक्ष्य प्राप्त करने के लिये सक्रिय दिख रहे हैं। पता नहीं यह बात अन्ना अभी तक समझे कि नहीं पर इतना तय है कि भविष्य में वह इसका अनुभव अवश्य करेंगे। उनका मौन भी एक रणनीति का हिस्सा है। उनके विरोधी मानते हैं कि वह कुछ असुविधाजनक सवालों के जवाब से बचना चाहते हैं। समर्थकों के अनुसार वह अक्सर ऐसा करते हैं। वह पहले भी मौन व्रत रख चुके हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार चर्चित हो रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रचार माध्यमों के विज्ञापन व्यवसाय के लिये वह एक ऐसे नायक हैं जिनसे उनको अच्छी आय होती है।
         इन सबसे प्रथक भारतीय जनमानस के उतार चढ़ाव के भावों को भी देखना चाहिए। अन्ना साहेब ने देश की जनता में एक आशा की किरण फूंकी थी। वह स्वयं भी मानते हैं कि जनता ही उनके आंदोलन का आधार हैं। अन्ना का मौन होने का मतलब है एक आंदोलन का मौन होना। उनके सहयोगियों की संकीर्ण मानसिकता तथा सीमित चिंत्तन क्षमता का आभास अब लोगों को हो गया है ऐसे में अन्ना के अभियान के सफल होने में संदेह जनमानस को उनसे दूर ले जायेगा। इतना ही नहीं अब अन्ना साहेब पर देश के जागरुक लोगों की नजर है और वह यह यकीन माने कि अब टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में पेशेवन बुद्धिमान बाजार और प्रचार समूहों के हितों को देखने हुए केवल प्रशंसात्मक वाक्य लिखें पर इंटरनेट पर लिखने वाले बिना लाग लपेटे के लिखने वालो लोगों की कमी नहीं है जो केवल जनहित के परिणाम देखकर ही विचार करेंगे। भले ही वह ज्यादा नहीं पढ़े जाते पर समाज तक अपनी बात तो वह पहुंचा ही देते हैं। अलबत्ता फिर भी अन्ना टीम नामक संगठन अब कुछ दिन मौन रहेगा पर जब यह व्रत टूटेगा तब अनेक परिवर्तन परिलक्षित होंगे। तब यह देखना होगा कि उनका दूरगामी परिणाम क्या होता है। अगर अन्ना टीम का यथारूप रहता है तो आंदोलन के साथ उसकी सफलता का संदेह भी साथ चलता रहेगा।
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वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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