कौटिल्य का अर्थशास्त्र-काबिल लोग ही देश को बचा सकते हैं (kautilya ka arthashastra-kabil log hi desh ki raksha kar sakate hain)


         हमारे यहां स्वतंत्रता संग्राम में दौरान आज़ादी तथा देश भक्ति का नारा इस तरह लगा कि हमारे यहां पेशेवर अभियान संचालक लोगों की भीड़ को एकत्रित करने के लिये आज भी लगाते हैं। लोगों   के राष्ट्रप्रेम की धारा इस तरह बह रही है कि आज भी स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा गांधी जयंती पर भाव विभोर करने वाले गीत लोगों को लुभाते हैं। जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन होता है तो उस समय मातृभूमि का नारा देकर लोगों को अपनी तरफ आकृष्ट करने के प्रयास होते हैं जिनसे प्रभावित होकर लोगों की भीड़ जुटती भी है।
         देश को स्वतंत्रता हुए 64 वर्ष हो गये हैं और इस समय देश की स्थिति इतनी विचित्र है कि धनपतियों की संख्या बढ़ने के साथ गरीबी के नीचे रहने वालों की संख्या उनसे कई गुना बढ़ी है। आर्थिक उदारीकरण होने के बाद तो यह स्थिति हो गयी है कि उच्च मध्यम वर्ग अमीरों में आ गया तो गरीब लोग अब गरीबी की रेखा के नीचे पहुंच गये हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में करोड़पतियों की संख्या में बढ़ोतरी हो गयी है तो समाज के हालत बता रहे हैं कि रोडपति उससे कई गुना बढ़े हैं। इसी कारण विकास दर के साथ अपराध दर भी तेजी बढ़ी है। आधुनिक तकनीकी जहां विकास में योगदान दे रही है तो उसके सहारे अपराध के नये नये तरीके भी इजाद हो गये हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा देश आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरोधाभासों के बीच सांसे ले रहा है। स्थिति यह है कि अनेक लोग तो 64 वर्ष पूर्व मिली आजादी पर ही सवाल उठा रहे हैं। अनेक लोग तो अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ करने की आवश्यकता बता रहे हैं। मातृभूमि की रक्षा के नारे की गूंज इतनी तेज हो उठती है कि सारा देश खड़ा होता है। तब ऐसा लगता है कि देश में बदलाव की बयार बहने वाली है पर बाद में ऐसा होता कुछ नहीं है। वजह साफ है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा नारों से नहीं होती न ही तलवारें लहराने या हवा में गोलियां चलाने से शत्रु परास्त होते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सत्यं बृहदृत्तामृग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्पुरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु्।।
                ‘‘सत्य पथ पर चलने की प्रवृत्ति, हृदय का विशाल भाव, सहज व्यवहार, साहस, कार्यदक्षता तथा प्रत्येक मौसम को सहने की शक्ति, ज्ञान के साथ विज्ञान में समृद्धि तथा विद्वानों का सम्मान करने के गुणों से ही राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा की जा सकती है।’’
           राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा के लिये सतत और गंभीर प्रयास करने होते हैं। अपने नागरिकों को ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण करना होता है। उनका नेतृत्त करने वालों को न केवल शारीरिक रूप से सक्षम होना चाहिए बल्कि उनमें साहस भी होना चाहिए। समाज के नागरिक वर्ग के लोग आर्थिक रूप से उत्पादक, भेदभाव से रहित तथा सत्यमार्गी होना चाहिए। हम देख रहे हैं कि अभी तक विकसित कहलाने वाले पश्चिमी राष्ट्र अब लड़खड़ाने लगे हैं क्योंकि उनके यहां अनुत्पादक नागरिकों का वर्ग बढ़ रहा है। इसके विपरीत हमारे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है पर जिस तरह हमने पश्चिमी के विचारों को स्थान दिया है उसके चलते हमारे यहां भी अनुत्पादक नागरिक वर्ग बढ़ने की संभावना हो सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा का नारा लगाना अलग बात है पर उसके लिये सतत और गंभीर प्रयास करते रहना अलग बात है और इस बात को समझना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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