दिल्ली में बम विस्फोट और अंसवेदनशील समाज-हिन्दी लेख (delhi mein bab visfot aur asanvedansheel samaj-hindi lekh or article)


         दिल्ली में तीस हजारी अदालत के बाहर हुए विस्फोट से प्रत्यक्ष रूप से किसी का कोई उद्देश्य पूरा नहीं होने वाला यह सभी जानते हैं। मुंबई में भी हाल ही में हुए विस्फोटों में भी आम आदमी मरा और दिल्ली में हुए विस्फोटों में भी आम आदमी मरा।
        ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस तरह के विस्फोटों से क्या होता है? अभी हाल ही में एक टीवी चैनल ने आतंकियों को तमाम तरह के धनपतियों से पैसे मिलने की बात कही थी। इसमें कोई संदेह नहीं है जो इस तरह के  वह केवल पैसे के लिये करते हैं। जो पेसे देते हैं वह भी कोई न कोई उद्देश्य पूरा करते हैं। हम अनुभवों की बात करें। आज से पंद्रह वर्ष पूर्व हम कई प्रसिद्ध स्थानों पर बिना किसी रोक टोक के आ जा सकते थे। अनेक मंदिर, पर्यटन स्थल, बाज़ार तथा प्रसिद्ध स्थान हमने बिना किसी रोक टोक के देखे। अब स्थिति वह नहीं रही। अब तो ऐसे सार्वजनिक महत्वपूर्ण स्थानों के साथ ही शापिंग सेंटरों और मॉलों में भी ऐसी सुरक्षा देखने को मिलती है जैसे कि सारा देश ही खतरामय हो रहा है। सभी जगह मैटल डिक्टेटर लगे रहते हैं। सुरक्षा कर्मी इस तरह तलाशी लेते हैं जैसे कि किसी दूसरे देश की सीमा में प्रविष्ट हो रहे हैं। तमाम तरह के सीसीडी कैमरों का उपयोग भी हो रहा है। अगर हम एक सवाल पूछें कि अगर आतंकवाद न होता तो क्या इन चीजों का उपयोग आम होता? यकीनन नहीं होता पर तब यह सवाल उठता भी इनकी निर्माता कंपनियों का क्या होता? अनेक तरह के अवैघ हथियार बिक रहे हैं उनका उपयोग कम होता हो पर उनकी देखादेखी सुरक्षा उपकरण भी बिकने लगते हैं।
          बाज़ार का आतंकवाद से क्या संबंध है यह शोध का विषय हो सकता है। यह जरूरी नहीं है कि बाज़ार के सौदागर स्वयं ही ऐसा करने के लिये पैसा देते हों पर जिनको वह देते हैं यकीनन वह उनको सुरक्षा मुहैया कराने के नाम पर ऐसा असुरक्षापूर्ण वातावरण बनाये रखते हैं ताकि उनको अपना पैसा मिलता रहे। साथ ही अपने आकाओं के सुरक्षा उपकरण, हथियार तथा अन्य सामग्री बिकती रहे ऐसे अवसर दिलाने के लिये वह ऐसे हादसे करते हैं।
      दिल्ली में दर्दनाक हादसा हुआ है यह कहना और लिखना कोई मुश्किल बात नही है पर जिनके लोग मारे गये हैं उनकी पीड़ा की अनुभूति उनके निकटस्थ लोग ही कर सकते हैं। आजकल असंवेदनशील समाज किसी का दर्द नहीं समझता। मेले चाहे जितने भी लगा लो आदमी अंततः रहता अकेला ही है। हमारा मानना है कि आतंकवाद की घटनायें प्रचार के लिये हैं। अगर प्रचार माध्यम इसके दर्दनाक पक्ष को इतना विस्तार से न दिखायें जैसा कि दिखा रहे हैं तो शायद आतंकवाद के व्यापारी यह सब न करें। अब देखिये एक ही हादसे का दावा दो संगठन कर रहे हैं। क्या इन संगठनों के कर्ताधर्ता ऐसे हादसे के लिये जानबूझकर जिम्मा ले रहे हैं जो उन्होंने किया ही नहीं पर अपने आकाओं से धन वसूलने का मौका दिला सकता है भले ही वह तीसरे संगठन ने किया हो? जैसे ही कोई हादसा होता है वैसे ही प्रचार माध्यम अमुक जगह सुरक्षा की जा रही है तो अमुक जगह असुरक्षित है जैसे जुमले उछालने लगते हैं। दो दिन तक मामला प्रचार माध्यमों पर छाया रहता है। यकीनन इसी कारण आतंकवाद के व्यापारी इसलिये यदाकदा हिंसक वारदातें अपने धन के साधन बचाये रखने के लिये करते हैं। कोई उनको डरकर पैसा देता होगा तो कोई फायदा पाने पर देता होगा।
            दिल्ली हादसों में अस्पतालों में मृतकों और घायलों से जो व्यवहार हो रहा है उसकी प्रचार माध्यमों पर चल रही चर्चा से तो यह लगता है कि संवेदनाऐं तो इस समाज की मर ही चुकी हैं। बहरहाल ऐसा लगता है कि फिलहाल इस तरह की घटनाओं को रोकना मुश्किल है। जो मर गये उनके निकटस्थ रोऐंगे, घायल अपनी पीड़ाओं के स्वयं झेलेंगे। प्रचार माध्यमों के लिये दो दिन तक की सामग्री हो गयी। ऐसे में अगर संवेदनशील होंगे तो यकीनन आपकी आवाज भी निकलेगी क्योंकि आप जानते होंगे कि उससे कुछ होने वाला नहीं है। जिसको आपकी बात सुननी है उनका कान कुछ और सुन रहा है, आपकी तरफ जिसे देखना है वह कहीं अन्यत्र देख रहा है। जिसे आपके लिये कुछ करना है उसने अपने हाथ बांध लिये हैं। जुबानी जमा खर्च अलबत्ता कोई भी कर लेगा क्योंकि उसमें न खर्च होता है न परिश्रम! वाणी विलास हो जाता है सो अलग! इस हादसे में मरे लोगों से सहानुभूति जताना व्यर्थ है क्योंकि यह एक ढोंग है पर भगवान से हम प्रार्थना करते है मृतकों के परिवार के सदस्यों तथा घायलों को पीड़ा सहने की शक्ति प्रदान करे।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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