क्रिकेट मैच खेलना तो सभ्य लोगों को खेल है-हिन्दी व्यंग्य लेख (cricket match sabhya logon ka khel hai-hindi vyangya lekh)


             इंग्लैंड के पूर्व कप्तान ने नासिर हुसैन ने टीवी पर भारत तथा इंग्लैंड के आंखों देखा हाल (रनिंग कमेंट्री) प्रसारित करते समय अपने श्रीमुख से कह डाला कि ‘भारतीय टीम में अच्छे क्षेत्ररक्षक हैं पर उसमें एक दो गधे हैं।’’ यह बात उन्होंने एक अंग्रेज बल्लेबाज का कैच बीसीसीआई की टीम के एक क्षेत्ररक्षक के हाथ से छूटने पर कही। दरअसल अगर उन्होंने पूरी टीम को गधा कहा होता तो शायद विरोधात्मक होकर अपनी कहते पर उन्होंने एक मासूम खिलाड़ी के कैच छोड़ने पर यह बात कही जो कि कथित रूप से एक महान खिलाड़ी को शोभा नहीं देता। एक नये खिलाड़ी के अपमान से दुःख हुआ है। हम यह दावा करते हैं कि ऐसा कतई नहीं हुआ होगा कि नासिर हुसैन ने अपने जीवन में कम से कम तीन बार कैच न छोड़ा हो। दक्षिण अफ्रीका के जोंटी रोड्स को अब तक दुनियां का सर्वश्रंष्ठ क्षेत्ररक्षक माना जाता है और हमने उनको कम से दो हाथ में आते हुए आते कैच छोड़ते देखा है तब यह नासिर हुसैन क्या चीज है। दरअसल पकड़े गये कैच आंकड़ों मेें जुड़ते हैं मगर छूटे कैचों की चर्चा कहंी नहीं होती। इसलिये किसी एक खिलाड़ी से एक दो बार ऐसी गलती होने पर इस तरह बोलना गलत है।
          बहरहाल इस पर हायतौब्बा मच गया है। अपना इसमें साफ मानना है कि क्रिकेट बाज़ार का खेल है जिसमें सब पैसे का काम है। आंखों देखा हाल का प्रसारण कमाई के लिये है तो उससे जुड़े पुराने क्रिकेट खिलाड़ी भी पैसा कमाने ही आते हैं। वह भी उसी विश्व समुदाय का हिस्सा है जो सनसनी चाहते हैं। इसलिये जिसे अवसर मिलता है वह सनसनी फैलाता है और बाज़ार के सौदागरों के विज्ञापन चलते रहें इस हेतु सक्रिय प्रचार माध्यमों को ऐसी सामग्री प्रदान करता है जो समाचार के साथ ही बहस के लिये भी उपयुक्त हो। बल्ला, बॉल और बकवास मिलकर बाज़ार के लिये कमाई का काम करते हैं। मैच का प्रयोजक बाज़ार, खिलाड़ियों का रहनुमा बाज़ार, और नासिर हुसैन भी बाज़ार का ही पुराना मॉडल खिलाड़ी-जो पहले खेलता था अब आंखों देखा हाल में अपने श्रीवचन प्रस्तुत करने लगा है। इसी श्रीवचन में एक शब्द शामिल हो गया गधा। बहस होगी पर हम बोलेंगे नहीं क्योंकि यह बाज़ार का मामला है। यहां फिक्सिंग मिक्सिंग सब चलता है।
        हम जैसे लोग तो अब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों को तो खेल मानते ही नहीं बल्कि उससे बाज़ार का मनोरंजन व्यवसाय मानते है। क्रिकेट संगठनों की अपनी सल्तनत है। यह सल्तनत पैसे से बनी है। पैसा जनता है का है पर उसकी ताकत इतनी बड़ी है कि जनसंगठन भी खरीदे जा सकते हैं। स्थिति यह है कि क्रिकेट को देश का धर्म बताया जाने लगा है जिसके भगवान क्रिकेट खिलाड़ी है। पूरे विश्व के क्रिकेट संगठनों के अधिकारी इस तरह     कहते दिखते हैं कि अगर तुम्हें मनोरंजन करना है तो तुम उनको तुम पूजो वह हमें पूजेंगे। वह पूजेंगे तो तुम्हारा बाप भी हमें पूजेगा। जाओगे कहां, हमारे पास पास है इसलिये सभी जगह पर हमारा कब्जा है। सुबह अखबार के प्रथम पृष्ठ पर किसी क्रिकेट खिलाड़ी का फोटो देखोगे। समाचारों में पचास फीसदी का समय हमारा है। रैम्प पर हमारे खिलाड़ी चलते हैं। टीवी के मनोरंजन धारावाहिकों में मेहमान के रूप में भी उनको लायेंगे। तुम्हारी लाचारी है कि अगर मनोरंजन चाहते हो तो बस हमारी राह पर आओ।
      भारत देश की कोई क्रिकेट टीम है। कौन बनाता है? बीसीसीआई! बीसीसीआई पर किसका अंकुश है? बाज़ार का! बाज़ार पूरी दुनियां का बाप है तो फिर किसकी मजाल कि दुनियां में कोई खेल संगठन किसी देश के कानूनी संगठनों की इज्जत करे। अभी बीसीसीआई की क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीता। अपने यहां तो स्थिति यह हो गयी कि प्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे इतने उत्साहित हुए कि इस अवसर पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ कर बैठे। सात दिन तक चला। क्रिकेट की क्लब स्तरीय प्रतियोगिता आई पी एल प्रारंभ होने से एक दिन पहले ही वह खत्म हो गया। हमें शक हुआ कि कहीं अन्ना हजारे साहेब को ब्रेकिंग टाईम के लिये बाज़ार के प्रचार प्रबंधकों ने तो नहीं चुना।
             अन्ना साहेब फिर दोबारा अनशन पर लौटे। इसी दौरान बीसीसीआई की टीम ने जो विश्व कप में इज्जत कमाई थी वह इंग्लैंड में लगातार पांच मैच हारकर गंवा दी। उसे गंवाना ही था क्योंकि इससे पहले भी 1983 के विश्व कप क्रिकेट कप के बाद ऐसा ही हुआ था जब वेस्ट इंडीज ने उसे रंगड़ दिया था। कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि विश्व कप जीतने के बाद अपने यहां लोग ज्यादा दीवाने हो जाते हैं कि वह ज्यादा आशा करते हैं तो खिलाड़ी कमाकर सुस्ताने लग जाते हैं। फिर सट्टेबाज भी कमाने लग जाते है क्योंकि टीम की जीत से ज्यादा हारने पर उनको कमाई होती है। इधर अन्ना साहेब अनशन के दौरान अपना स्वास्थ्य खोकर अपने गांव में एकांत साधना कर रहे हैं। वह जल्दी स्वस्थ हों यह हमार कामना है। जिस तरह वह अपने अनशन के दूसरे दौर में व्यस्त उसे देखकर नहीं लगता था कि जिस टीम की जीत पर उत्साहित होकर उन्होंने अपना पहले दौर का अनशन शुरु किया था वह दूसरे दौर से पहले ही बुरी तरह अपनी इज्जत बर्बाद कर रही थी। भारत में दिखने वाला रत्न लंदन में कांच का टुकड़ा भर साबित हुआ। संभव है समय नहीं मिल पाया हो वरना वह दूसरे दौर का अनशन शुरु होने से पहले ही समाप्त करने की सोचते। उनका पुराना उत्साह समाप्त हो जाता।
        बहरहाल हम जैसे फोकटिया लेखकों के लिये इस समय शून्यकाल की स्थिति है क्योंकि अन्ना साहेब के अनशन पर टीवी देखते देखते थक गये। वैसे भी अनशन समाप्त होते ही अन्ना हजारे के अस्पताल जाने के बाद पूरे भारत में टीवी चैनलों की स्थिति दो दिन तक इस तरह रही जैसे कि बारात वापस होते ही जनवासे की होती है। देश के लोगों की स्थिति भी कई दिन की बारात से लौटने वाले बाराती की होती है। देश में दूसरी आज़ादी का जश्न मन गया तो अब यह सवाल भी उठने लगा है कि पहली आजादी भी क्या इसी तरह की रही थी। यहां ऐसी कौनसी ऐसी जनक्रांति हुई या उसकी संभावना बलवती हो उठी है जो हमें नहीं दिखाई देती। शायद फोकटिया लेखक है इसलिये प्रायोजित बुद्धिजीवियों से गहरा चिंतन और अंतदृष्टि हमारे अंदर न हो पर नासिर हुसैन के शब्द पर बहस में एक आदमी ने सवाल पूछा था कि ‘‘क्या किसी अंग्रेज खिलाड़ी पर किसी भारतीय उद्घोषक ने ऐसी टिप्पणी की होती तो! यकीन मानिए पहले तो ऐसा होना नहीं था। ऐसी दबंगी दिखाने का साहस वर्तमान में भारत के ही सक्रिय क्रिकेट उद्घोषकों में से किसी में है नहीं क्योंकि अंग्रेजियत की गुलामी जारी है पर ऐसा होता तो इंग्लैंड में तो दो तीन बार शोर मचता भारत में पहले ही दिन उसे लानतमलानत मिलना शुरु हो जाती। कहा जाता ‘‘क्यों रे तू गुलाम होकर साहबों को आंख दिखा रहा है।’
            वैसे क्रिकेट खेलना ही हमारी गुलामी का प्रमाण है। मतलब हमने अंग्रेजियत को जिंदा रखा और इसलिये अंग्रेज आज भी हमारे साहब हैं। सीधी बात कहें तो दूसरी आज़ादी के दावे ने पहली आजादी का सच उन लोगों को बता दिया जो उस समय पैदा नहीं हुए थे। जिस तरह अंग्रेज बीसीसीआई की टीम को कभी कायर कुत्ता तो कभी गधा कर रहे हैं और कोई प्रतिवाद नहीं है। अन्ना साहेब और क्रिकेट दोनों पर इस तरह लिखना अजीब लगा पर कि अपने जेहन में दोनों बातें जिस तरह चल रही हैं उसे बिना किसी योजना के लिखकर फिलहाल तो अपने मन को उबारने के अलावा कोई मार्ग नहीं था। हमें पहली बार पता लगा कि गधे क्रिकेट भी खेलते हैं तब इस तरह व्यंग्य लिखना ही था खासतौर से तब गधा कैच नहीं पकड़ता बोझा ढोता है और अधिक होने पर उसे कभी गिराता नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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