अमेरिका डॉलर का संकट,आसमान भारत में गया है फट-हिन्दी व्यंग्य चिंतन


                  जब अमेरिका की अर्थव्यवस्था डगमगाती है तब विश्व के प्रचार माध्यम ऐसे जताते हैं कि सभी देशों के लोग कांप रहे हैं। दुनियां के उद्योगपति, पूंजीपति और प्रतिष्ठत लोगों के आर्तनाद तब प्रचार माध्यमों में सुनाई देता है गोया कह रहे हों कि ‘‘भगवान, अमेरिका को बचा लो।’
          वैसे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखिर अमेरिका की अर्थव्यवस्था का रहस्य क्या है पर अभी   हाल ही में पता चला कि अमेरिका की जनप्रतिनिधि सभा सरकार को कर्ज लेने के संबंध में रियायतें देने से आनाकानी कर रही थी। यह जनप्रतिनिधि भी वहीं के हैं और सरकारी भी वहीं की। इसका मतलब यह अंदरूनी विवाद था जिस पर पूरे विश्व के बड़े लोग आंखों लगाये बैठे रहे कि कहीं अमेरिका का बाजा बजा तो अपनी भी बारात निकल जायेगी। दरअसल आजतक अमेरिका का बजट आज तक समझ में नहीं आया। अब पता लग रहा है कि दुनियां को धमकाने वाला अमेरिका ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबा है मगर फिर भी साहुकार कहलाता है।
       मूलतः भारत का अमेरिका से कोई आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा तथा वैचारिक संबंध नहीं है जिससे उसे सहोदर राष्ट्र कहा सके। प्रत्यक्ष उससे कोई शत्रुता वाली बात नहीं है वह इसी आधार पर ही मित्र कहा जाता है पर अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के साथ वह जो संबंध निभाता है वह एक तरह से दुश्मनी जैसा ही व्यवहार है। भारत की प्राकृतिक और खनिज संपदा, मानव संसाधन, अध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक शक्ति इतनी विशाल है कि उसे अमेरिका पर निर्भर रहने की आवश्यकता भी नहीं है तब यहां उसकी आर्थिक स्थिति डगमगाने पर चिंता करना व्यर्थ ही कहा जा सकता है पर जब हम देखते हैं कि हमारे यहां के प्रचार माध्यम उस पर विलाप कर रहे हों उस समय यह प्रश्न उठता है कि कहीं भारत के कुछ लोगों के वैयक्तिक आधार तो नहीं बिखर रहे है जिससे वह घबड़ा गये है। इस तरह का संदेह होने का कारण यह है कि डॉलर आज भी विश्व बाज़ार में विनिमय का साधन है। इसका मतलब यह है कि डॉलर उन लोगों के पास भी हो सकता है जो अमेरिका में नहीं है और जिन विदेशियों के पास है वह चाहेंगे कि अमेरिका बचा रहे ताकि उनका धन भी बचे। दूसरा यह कि दुनियां भर में आर्थिक लेनदेन का लेखा डॉलर में ही रखा जाता है। प्राकृतिक, खनिज और मानव संसाधन में अन्य देशों से कम धनी अमेरिका की मुद्रा डॉलर बहुत महंगी होती जा रही है। मान लीजिये किसी भारतीय के पास दस डॉलर हैं तो इसका मतलब यह समझें कि उसके पास पचास रुपये हैं। अगर डॉलर का रेट मान लीजिये 52 रुपये हो गया तो उसके 520 रुपये हो गये। अगर अमेरिका की घटती साख के साथ डॉलर कहीं आठ आने का हो गया तो उसके पास पांच रुपये रह जायेंगे। यही कारण है कि हमारे देश के शक्तिशाली आर्थिक पुरुष विदेशी बैंकों में अपना पैसा रखते रहे हैं क्योंकि डॉलर के भाव बढ़ने के साथ उनका रुपया वैसे ही बढ़ जाता है। अमेरिका कर्ज लेता है पर किससे और कहां से इसका पता नहीं लगता। फिर वह हथियार और आधुनिक तकनीकी बेचता है और उसके लिये भी सहायता देता है। देखा जाये तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आधार गोलमोल हैं जबकि इसके विपरीत भारतीय बजट संसद में हर तरह से स्पष्ट व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया जाता है। फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन तथा उनकी तरह विकसित अन्य यूरोपीय राष्ट्र अमेरिका की परवाह नहीं करते। यहां तक कि उन्होंने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपना यूरो भी उतार दिया है पर चूंकि अमेरिका दूसरों के गोलमाल को भी अपने यहां समायोजित करता है इसलिये डॉलर आज भी अधिक पंसदीदा मुद्रा है। यही कारण है कि डॉलरधारी लोग अमेरिका के संपन्न और शक्तिशाली होने की न केवल कामना करते हैं बल्कि उसकी मदद को हर समय तैयार रहते हैं।
          कहा जाता है कि पुजारी की दौड़ सर्वशक्तिमान के दरबार तक, यह बात दुनियां भर के विकासशील देशों के आर्थिक शिखर पुरुषों पर लागू होती है। अब यह कहना मुश्किल है कि दुनियां भर के काले धनिक लोग अमेरिका को चला रहे हैं या वही उनका संरक्षक है। अगर अमेरिकी डॉलर विश्व में विनिमय का प्रमुख मुद्रा का रूप खो बैठे तो रुपये के मुकाबले उसकी गिरावट कितनी होगी अंदाजा नहीं है। कम से कम भारतीय रुपया एक डॉलर से कम तो कभी रहने वाला नहीं है। दरअसल डॉलर का मूल्य अधिक होने का कारण है यह भी है कि दुनियां भर के छात्र, शिक्षक, इंजिनीयर, व्यापानी तथा फिल्मकार अमेरिका जाते हैं। अमीरों के लिये अमेरिका एक स्वर्ग जैसा है। वह अमेरिका जाते हैं तो उनको डॉलर चाहिए। तय बात है कि डॉलर की मांग अधिक रहती है। मांग और आपूर्ति के नियम से उसका मूल्य अधिक रहना ही है। फिर वह लोग वहां अधिक जाते हैं वहां की वस्तुओं और सेवाओं की कीमत भी बढ़ती है। अनेक बार अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाता है तो उसे चेताया जाता है कि अंततः हानि उसकी ही होनी है। बाद में वह प्रतिबंध हटा लेता है या ढीला कर देता है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशी देशों पर आधारित है यह बात उसके कर्ज लेकर घी पीने की आदत से पता चल ही जाती है।
               आम भारतीय को इसकी बिल्कुल परवाह नहीं है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में गिरावट है कि नहीं पर इतना तय है कि कहीं न कहीं उसके परिश्रम से अर्जित धन अमेरिका को भी सहारा देता है। अगर कुछ भारतीय अमेरिका न जायें न उससे सामान खरीदें तो शायद डॉलर बुरी हालत में आ जाये। डॉलर का अधिक भाव होने से हमारी चीजें और श्रम उसे सस्ता पड़ता है। जबकि उसकी चीजें और सेवायें हमें महंगी पड़ती हैं। इस तरह हमारे श्रमिक और छोटे व्यापारी घाटे में ही रहते हैं। बहरहाल 1971 में पाकिस्तान के लिये सातवां बेड़ा भेजने की घटना कभी भूली नहीं जा सकती इसलिये आज भी अमेरिका को इस देश के आमलोगों को वैसा मित्रभाव नहीं मिलता जैसा कि उसके स्वदेशी प्रशंसक चाहते हैं। वैसे प्रकृति के कुछ नियम हैं। कछुआ और खरगोश की दौड़े में कछुआ इसलिये जीता क्योंकि वह धीरे धीरे चला था। भारत को हम कछुआ कहेंगे और अमेरिका को खरगोश। भारत धीरे धीरे ही विश्व के राजनीतिक पटल पर उठा रहा है और आगे उसका भविष्य उज्जवल रहने वाला है जबकि अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद दुनियां में तेजी से उभर कर आया। अब वह शनैःशनै पतनोन्मुख होता दिख रहा है। लगता है कि अफगानिस्तान का युद्ध उसे ले डूबेगा। अमेरिकी रणनीतिकार वहां से निकलने की सोच रहे हैं पर जिस तरह वहां अभी हाल अमेरिकी के सील सैनिकों की मौत हुई है वह उसकी सामरिक शक्ति को भी चुनौती मिलने लगी हैं। यह सील सैनिक उसी समूह के हैं जिन्होंने पाकिस्तान में घुसकर दुनियां के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मारा था। बहरहाल अमेरिका भी एक विशालकाय जहाज है भले ही भंवर में फंस गया है पर डूबने में बहुत समय लेगा।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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