भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को प्रचार के लिये हिंसा की आवश्यकता नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख


             नार्वे में बहुसंस्कृतिवादी विरोधी एक व्यक्ति ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर अनेक लोगों का मार डाला। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों से प्राप्त जानकारी कुछ हैरान करने वाली है। कम से कम उससे एक बात प्रमाणित होती है कि आज के आधुनिक संचार माध्यमों के प्रसारणों और प्रकाशनों का प्रभाव आज की नयी पीढ़ी पर हाल होता है। जिस तरह उसने भारत के बारे में विचार व्यक्त किये हैं उससे साफ लगता है कि वह प्रचार माध्यमों के प्रसारणों और प्रकाशनों से प्रभावित है। साथ ही यह भी प्रमाणित होता है कि वह भारतीय क्षेत्र की धार्मिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, भाषा, तथा सांस्कृतिक विविधता से परिचित नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह भारत की उस अध्यात्मिक शक्ति से तो उस बिल्कुल अनभिज्ञ जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरू कहा जाता है।
          मूल बात यह है कि उसने अपनी जिस विचाराधारा के लिये यह कांड किया वह आगे कतई नहीं बढ़ने वाली। फिर उसने मार्क्सवादी तथा अन्य धर्मों के विरुद्ध जो अपनी कटु अभिव्यक्ति दी है वह प्रभाहीन तथा तर्कहीन है। मुख्य बात यह है कि आप जब किसी भी व्यक्ति, समूह या विचाराधारा की आलोचना करते हैं तो आपको ठीक उसके विपरीत अपनी व्यक्तिगत कार्यशैली और व्यवहार से अपनी सिद्धि साबित करनी होती है। सीधी बात कहें कि जब आप किसी व्यक्ति, समूह या विचाराधारा पर क्रूरता, हिंसक कायरता और और स्वार्थ सिद्ध होने का आरोप लगाते हैं तो आपको अपनी जीवन शैली से अपने अंदर की उदारता, अहिंसक, वीरता और परोपकार की भावना को बाहर लाकर प्रमाणित करना चाहिए। इसके विपरीत अगर आप अपने विपरीत चलने वालों का ही अनुसरण करते हैं तो फिर इसका आशय यह है कि आप भी उतने ही पाखंडी हैं जितना आप अपन विरोधियों के बारे में कह रहे हैं। उस व्यक्ति न हिंसा कर यही काम किया है। उसने किसी को निंदनीय कहा पर जिस मार्ग पर चला तो वह भी क्रूरता, मूर्खता तथा दंडनीय श्रेणी में ही आता है।
          हम भारतीय इतिहास की बात करें तो क्षुद्र स्वार्थों की खातिर राजकीय अहंकार की वजह से यहां अनेक युद्ध हुए हैं। अनेक राजाओं ने आपस ंमें केवल इसलिये युद्ध किये क्योंकि वह एक दूसरे का वैभव सहन नहीं कर सकते थे। इतना ही नहीं इन्हीं राजाओं की वजह से प्रजा त्रस्त भी रही और इसी कारण यहां राजनीतिक अशांति होने से आर्थिक, शैक्षणिक सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में हुए विकास का प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ-यह बात हम अभी तक ज्ञात इतिहास के आधार पर ही कह रहे हैं।
      मुगलकाल में भारतीय समाज संक्रमण काल से गुजरा पर उसी समय हमारे हिंन्दी साहित्य का भक्ति काल का दौर भी चला। उस समय धाार्मिक रूप से देश में बदलाव आया। मुगलकाल में सांस्कृतिक हªास होने की बात कही जाती है पर क्या यह सच नहीं है कि उस समय भी उसका हिंसा से प्रतिकार करने की बात सामने नहीं आयी बल्कि उस समय के शाब्दिक ऋषियों ने जो रचनाऐं की वह आज हमारे अध्यात्म की ऐसी अनमोल धरोहर बनी जिसका लोहा आज पूरा विश्व मानता है। इसी मुगल काल में तुलसीदास जी की महान रचना ‘रामचरितमानस’ प्रकट हुई और जिसका प्रभाव हम आज तक देख रहे हैं। हमारा मानना है कि रामचरित मानस के व्यंजना विधा में कहे गये कुछ दोहों पर कुछ लोग भले ही नाकभौं सिकोड़ें पर सच बात यह है कि उदारता, चिंतनशीलता और धार्मिक सहिष्णुत वाला जो हम अपना आज का समुदाय देख रहे हैं वह उनकी रचना से सकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ है। उस समय भारतीय आस्थाओं पर आक्रमण को नाकाम करने में भक्ति काल के शाब्दिक ऋषियो का-कबीर, तुलसी, मीरा, सूरदास, रहीम तथा अन्य महान रचनाकार-महान योगदान रहा है और उनकी रचनाओं में कहीं भी हिंसा का तत्व शामिल नहीं है। सच बात तो यह है कि इन लोगों ने किसी धार्मिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक आक्रमण का प्रतिकार करने का लक्ष्य मानकर रचनायें नहीं की बल्कि समाज में चेतना लाने के लिये अपनी अभिव्यक्ति से ऐसा मार्ग दिखाया जिसमें राजकीय गतिविधियों की गंदगी से उनको दूर रखा।
        वैसे कहीं भी धार्मिक सांस्कृतिक या वैचारिक आक्रमण की बात वास्तव में एक भ्रम है पर फिर भी हमें अपने समाज की चिंतन क्षमता बनाये रखने के प्रयास हमें भक्तिकाल के रचनाकारों से सीखना चाहिए। जब हम यह मानते हैं कि हमारे समाज पर कहीं से धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक हमला हो रहा है तब उसका मुकाबला बुद्धि और विवेक से ही संभव है हिंसा से नहीं। भारत के मध्ययुगीन इतिहास में ही हिन्दी के स्वर्णकाल का चलना इस बात का प्रमाण है कि ऐसे संक्रमण काल में रचनाकार, कलाकार तथा अध्यात्मिक पुरुष ही समाज की रक्षा कर सकते हैं। यह अलग बात है कि आज के समाज के शिखर पुरुष किसी ऐसे रचनाकार या कलाकार को प्रश्रय नहीं देते जो उनका दरबारी न हो।
         नार्वे के आक्रमणकारी ने भारतीय समाज की स्थिति को रेखांकित किया है पर उसे इतिहास की जानकारी नहीं है। संभव है भारतीय समाज से जुड़े कुछ लोग उससे हमदर्दी दिखायें पर यह अज्ञान का प्रमाण है। हम यह दावा भले ही करें कि हमारे समाज की रक्षा तलवार वीरों ने की है पर सच यही है कि अध्यात्मिक पुरुषों के अथक प्रयासों से आज हम वर्तमान समाज को इतना सभ्य और शक्तिशाली देख रहे हैं पर जिस तरह विदेशी विचाराधाराओं को स्वीकार करने की मनोवृत्ति दिख रही है वह कोई देश के लिये अत्यंत दुःखदायी है। एक मजेदार बात यह है कि नार्वे के उस आक्रमणकारी का मानना है कि भारत से बाहर रह रहे अप्रवासी नागरिक बहुसांस्कृतिकवाद के उस संकट को समझ सकते हैं जो देश में रह रहे लोग समझ नहीं रहे। उसकी बात पर यकीन किया जाये तो यह कहना ही पड़ता है कि भारत से बाहर रह रहे लोग अपनी देश की धार्मिक और सांस्कृतिक शक्ति को नहीं जानते। वह धरा से कटे हुए हैं इसलिये पश्चिम में चल रहे धार्मिक संघर्षों में भारतीय संदर्भ ढूंढ रहे हैं। हम देखें तो इतिहास बताता है कि पश्चिम में धर्म के आधार पर संघर्ष चलता रहा है। पश्चिम और मध्यएशिया के देशों के बीच धार्मिक विवाद अभी का नहीं वरन् बहुत पुराना है। पहले परिवहन और संचार के साधन विकसित नहीं थे इसलिये भारतीय जनमानस उससे अनभिज्ञ रहा है पर जैसे उनका विकास हुआ और फिर भारतीय शिक्षित वर्ग दोनों ही विचारधाराओं से जुड़ा वैसे वैसे वही वैचारिक विवाद भी यहां आ गया है।
अब भारत में वैचारिक जगत में यह संघर्ष इसलिये चलता दिख रहा है क्योंकि चाहे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी दोनों ही प्रकार के विचारक विदेशियों के इतिहास में अपने देश के संदर्भ ढूंढ रहे हैं। सामान्य लोगों में उनका प्रभाव इतना ही होता है कि वह चर्चाओं में उनके तथ्यों का उल्लेख करते हैं पर व्यवहार में सब जानते हैं कि स्वार्थों की वजह से सबसे संबंध रखना पड़ता है। इसलिये सामान्य जीवन में आमतौर से लोग धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा भाषाई भेदों से दूर ही रहते हैं।
       दरअसल इस लेखक को यह प्रेरणा अपने ही लेख से मिली। हुआ यूं कि हिंसा के अव्यवाहारि होने के संबंध में लिखे एक लेख को नार्वे की हिंसा के बाद कुछ लोगों को पढ़ते हुए देखा। यह लेख नीचे प्रस्तुत है और अब भी प्रासांगिक है। मायावी लोग हिंसा के लिये प्रेरित करते हैं पर उनका लक्ष्य वह नहीं होता जो बताते हैं। यह अलग बात है कि कमजोर दिमाग वाले लोग उनके प्रभाव में आ जाते हैं। मूलतः हिंसा कभी निर्णायक नहीं होती और जिन लोगों को लगता है कि यह सब बकवास है उनको भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। हम तो यह मानते हैं कि नार्वे की आतंकवादी घटना में भारतीय संदर्भ आये हैं पर इतना तय है कि इसका प्रेरक हमारा दर्शन नहीं है।
हिंसा में उद्भव है तो पराभव भी-हिन्दी लेख (gandhiji ki ahinsa niti-hindi article)
            जब किसी व्यक्ति के हाथ में हथियार होता है तो वह उसे चलाकर दिखाना चाहता है कि वह एक योद्धा है। उसका मन स्वाभाविक रूप से हिंसा के लिये प्रवृत्त होता है। जब लोग उससे डरते हैं तो उसे विजय की अनुभूति होती है पर दरअसल ऐसा करके वह अपने लिये संकट बुलाता है। जब उसे हिंसा के लिये तत्पर देखकर भीड़ में लोग चुप हैं तो उनमें उसे जैसे ही कुछ लोग भी जरूर होंगे जो यह हथियार जुटाकर उसे चुनौती देने का अपना सोच बनायें। ऐसा करके वह अपने विरोधी बना रहा होता है।
हिंसा चाहे हाथ से या वाणी से, तात्कालिक रूप से लाभदायक भले लगे कालांतर में अपने पतन का कारण भी होती है।
          इसे देश में बुद्धिजीवियों में हिटलर और गांधीजी को लेकर हमेशा बहस चलती है। अनेक लोग गांधी को अहिंसा नीति का यह कहते हुए विरोध करते हैं कि उससे समाज की रक्षा नहंी हो सकती पर जब देश में एक संविधान और सेना है तो समाज को हिंसा से रक्षित बनाने का ख्याल ही बेमानी है। दरअसल गांधी ने अहिंसा के रूप में कोई नया विचार व्यक्त नहीं किया था क्योंकि वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में सदियों से मौजूद है। उन्होंने आधुनिक सभ्यता- जिसमें देशों के गठन और उनके संविधानों के कारण समाजों वाद विवाद से पनपने वाली हिंसक संघर्षों की परंपरा कम हो रही थी-में अहिंसा की राजनीति करना सिखाया।
पहले हिटलर की बात करें। हिटलर का अंत क्या हुआ? उसने आत्महत्या की थी। उसने अपने देश के लिये अनेक युद्ध किये पर उससे अपने देश को क्या मिला? एक विभाजन! हिटलर मर गया उसके बाद भी जर्मनी खड़ा रहा और अब तो दोनों जर्मनी भी एक हो गये। उसी हिटलर को आज जर्मनी में नफरत से देखा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जो हिटलर की चाल चलेगा, वैसी ही मौत मरेगा।
वैसे तो गांधीजी के इस देश में भक्त बहुत हैं पर वह अहिंसा की उनकी नीति की व्याख्या कम ही लोग कर पाये हैं। वह उनकी नीतियों की बात तो करते हैं पर उसके परिणामों का सकारात्मक पक्ष नहीं रखते। गांधीजी ने अंग्रेजों को मानसिक रूप से इतना तंग किया होगा इसका अंदाजा उनके भक्त भी नहीं लगा सकते। एक तरफ पूरा विश्व गांधी जी को सराहता है और हिटलर के नाम से हर कोई नफरत करता है। सच तो यह है कि हिंसा या हिंसक आंदोलन करना हमेशा ही विरोधियों और शत्रुओं को जीत का आसानी से अवसर देना ही है। किसी वस्तु या बहिष्कार की अहिंसक कोशिश और हिंसक कोशिश में अंतर होता है।
            गांधी जी ने लोगों को विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने की अपील की। तब अनेक लोगों ने अपने ही घर से विदेशी वस्तुऐं निकालकर आग के हवाले की। इतिहास में ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता कि उस समय लोगों ने विदेशी वस्तुओं के विक्रय केंद्र जलाये या उनके इस्तेमाल करने वालों को पीटा। इस बात का भी उल्लेख नहीं मिलता कि कितने लोगों ने तब भी विदेशी वस्तुओं का उपयोग जारी रखा। मान लीजिये अगर उस समय गांधी समर्थकों ने हिंसा का सहारा लिया होता तो क्या होता? प्रचार माध्यम बता रहे होते कि किस तरह अभी भी ऐसे लोग हैं जो विदेशी वस्तुओं का उपयेाग कर रहे हैं? हो सकता है कि कुछ यह भी कहते कि ‘देखिये गांधी जी को जनता करारा जवाब’।
       उस महान विभूति को अपने ही देश में अप्रासंगिक बनाने के लिये अनेक विदेशी ताकतें सक्रिय हैं और उनका मुख्य उद्देश्य गांधीजी को विश्व मसीहा को तोड़ते रहना है। हमारे यहां के अनेक बुद्धिजीवी हिटलर की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते। एक आत्महत्या करने वाला व्यक्ति उनका प्रेरक है, तब उनकी बुद्धि की स्तर समझा जा सकता है। हिटलर कभी विजेता न बन सका और गांधी जी के नाम की प्रसिद्धि इतनी है कि उसके सामने जीत हार का विचार ही नहीं आता। हिंसा में उद्भव है तो पराभव भी है। अहिंसा की राजनीति भी कोई ऐसे वैसे लोग नहीं कर सकते। जिनके पास बुद्धि, बल और धैर्य है उन्हीं के बूते ही इस पथ पर चलना।
हमारे यहां अनेक आंदोलन होते हैं जिनके व्यक्ति, फिल्म, वस्तु, समाज या भाषा के बहिष्कार का आह्वान होता है। उनकी सबसे बड़ी कमी यही होती है कि वह हिंसा से ओतप्रोत होकर जनसमर्थन से दूर हो जाते हैं। ऐसे आंदोलन करने वाले अपने बहिष्कार के साथ दूसरे पर दबाव डालने लगते हैं। तय बात है कि हिंसा होती है। इस कारण सैद्धांतिक रूप से सहमत होने वाले भी दूर हो जाते हैं और उससे विरोधियों को भी अवसर मिल जाता है। तब यह बात दब जाती है कि कितने लोगों ने बहिष्कार किया बल्कि कितने लोगों ने नहीं किया यह सिद्ध कर आंदोलन की हवा निकाल दी जाती है।
         सच तो यह है कि इस देश में जो हिंसक आंदोलन चल रहे हैं उनकी सफलता इसलिये संदिग्ध रही है क्योंकि वह हिंसक हो उठते हैं-दूसरे शब्दों में कहें तो येनकेन प्रकरेण उनकी विरोधी ही उनका लाभ उठाते हैं। भारत का जनमानस कभी हिंसा का साथ नहीं देता, यही कारण है कि इस देश पर विदेशी काबिज हो गये क्योंकि देश के शिखर पुरुष आपस में हिंसा करते थे और जनता का समर्थन कम हो गया होगा।
अंतिम बात यह कि हिंसा चाहे तलवार से हो वाणी से दोनों ही स्वयं के लिये खतरनाक है। किसी के लिये अभद्र और आक्रामक शब्द लिख कर हम यह सोचकर भले ही प्रसन्न हों कि हमने अपनी भड़ास निकाल ली पर अंततोगत्वा वह अपने लिये ही खतरनाक है। तब आपके अपने भी यह सोचकर डर जाते हैं कि कहीं ऐसे ही शब्दों का प्रयोग कहीं उनके विरुद्ध भी न करने लगें। हिटलर पराजित हुआ, उसने आत्म हत्या की क्योंकि वह हिंसा में लीन था जबकि गांधीजी ने अपना जीवन सहजता से व्यतीत किया क्योंकि उनको अपने प्रति कहीं भी हिंसा का भय नहीं था। नाथूराम गोडसे उनके शरीर को नष्ट कर सका पर उनके व्यक्तित्व को नहीं जो हमेशा ही सूरज की तरह चमकता रहने वाला था। भले ही कुछ लोग इस बात को न माने पर सच यह है कि उनकी अहिंसा की राजनीति आज के समाज के लिये उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस समय थी। गांधीजी को संत कहा जाता है पर इसका अर्थ कतई नहीं है कि उनमें राजनीतिक चतुराई का अभाव था, और उनके द्वारा चलाया गया अहिंसक आंदोलन इसी का ही प्रमाण है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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