आतंक उद्योग के अर्थतन्त्र का अध्ययन जरूरी-हिन्दी लेख (aatank udyog ka arthshatra ka adhyayan jaroori-hindi lekh


           मुंबई बम विस्फोटों पर कोई नया लिखना चाहे भी तो नहीं लिख सकता। हालांकि किसी हादसे में हताहतों के प्रति सहानुभूति जताने की प्रथा है पर लगता है कि वह भी अब अधिक नज़र नहीं आती। एसा लगता है कि हमारे देश हादसों की संख्या अब देश में मनाये जाने वाले पर्वों के बराबर हो गयी है। देखा जाये तो शायद हमारा देश विश्व का इकलौता देश है जिसमें इतने सारे पर्व मनाये जाते हैं कि हर हादसे के बाद कोई न कोई पर्व आता है और लोग अपना तनाव भुला देते हैं।
      13 जुलाई को मुंबई में बमविस्फोटों में हताहत लोगों की संख्या और उससे दो दिन पहले फतेहपुर में कालका एक्सप्रेस की दुर्घटना में हताहत लोगों की संख्या कहीं बहुत अधिक थी। इस दुर्घटना से पूरा देश अचंभित था। इस दुर्घटना की जांच पूरी नहीं हो पायी थी कि मुंबई में विस्फोट हो गये। दोनों हादसों में कोई अधिक अंतर नहीं था इसलिये ही शायद देश में वैसी सहानुभूति की लहर मुंबई हादसे पर नहीं दिखी। आखिर आंसुओं की भी सीमा है। आंसु सूख जाते हैं तो आंखें पथराने लगती हैं। फिर हादसे दर हादसे झेलते हुए इंसान निरंतर रोने के साथ आंसु इतने सुखा देता है कि फिर वह दर्द मिलने पर भी हंसने लगता है। मतलब वह दिमागी संतुलन खो देता है। मगर देश एक इंसान नहीं है बल्कि इंसानों से भरा पड़ा है। इसलिये सामूहिक प्रतिक्रियाओं से वहां के लोगों की भावना का समझा जा सकता है। तय बात है कि लोगों ने मान लिया है कि यह सब चलता रहेगा। हम इसे संवेदनहीनता की स्थिति नहीं मान सकते पर पिटने की आदत को स्वीकार कर लेना तो माना ही जा सकता है। आम आदमी ने मान लिया है कि वह तभी तक सुरक्षित है जब तक भगवान चाहता है।
मुंबई बमविस्फोटों की जांच जारी है। अब सवाल आता है कि आखिर इनका लक्ष्य क्या हो सकता? जहां तक हमारी मान्यता है कि आतंकवाद को किसी जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र से जोड़ना अपने आपको धोखा देना है। दरअसल ऐसा लगता है कि यह किन्हीं छद्म सफेदपोशो के समूहों के अपराधों कोे संरक्षण देने वाला व्यवसाय बन गया है।
         आतंकवाद को अपराध से अलग कोई नया पाप मानना तो अपराध शास्त्र से मुंह मोड़ना है। अपराध शास्त्र कहता है कि अपराध या हत्या जड़, जोरु और ज़मीन के लिये होता है। मतलब कि कोई भी अपराधी बिना लाभ के लिये कोई  काम नहीं करता। कुछ लोगों ने सवाल भी किया है कि आखिर आतंकवादी हमले मुंबई पर ही क्यों होते हैं? लोग यह प्रतिप्रश्न भी कर सकते हैं कि मोमबत्तियां भी मुंबई के हादसे वाली जंगहों पर ही क्यों जलती हैं अन्यत्र शहरों में ऐसा क्यों नहीं होता जहां आतंकवादियों ने हमले किये हैं?
         इस तरह की बेकार बहसों से इतर हम ऐसी बातों पर विचार करें जिससे सत्य सामने आये। मुंबई को भारत की आर्थिक राजधानी कहा जाता है। तय बात है कि देश के सर्वाधिक संपन्न लोग वहीं रहते हैं। इसके अलावा फिल्मी, टीवी धारावाहिक तथा अन्य महत्वपूर्ण मनोरंजन के केंद्रीय स्थल वहीं हैं जो सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की तरह हैं। इधर टीवी चैनलों और अखबारों ने इशारे से बताया है कि आतंकवादी संगठनों को पैसा मिलना कम हो गया है। ऐसा लगता है कि जांच एजेंसियां या अन्य महत्वपूर्ण लोग इस बात को रेखांकित कर सकते हैं कि कहीं यह मुंबई के साथ ही देश के अन्य अमीरों में भय पैदा करने के लिये तो यह विस्फोट नहीं किये गये। अक्सर पाकिस्तान में रहने वाले कुछ अपराधियों की इस तरह की वारदातों में शामिल होने की बात कही जाती है। इन्हीं अपराधियों के साथ भारत में सक्रिय कुछ सफेदपोशों के व्यवसायिक संबंध होने की बात भी कही जाती है। भारतीय अपराधियों के बारे में कहा जाता है कि वह आतंकवाद के प्रायोजक हैं तब यकीनन यह पैसा हमारे देश से ही जाता होगा। इधर देश में बहुत समय तक शांति रही है तो सकता है कि अपराधियों के गिरोहों की कमाई कम हो गयी हो और उन्होंने अमीरों को डराने के लिये मुंबई के महत्वपूर्ण व्यवसायिक क्षेत्रों में यह विस्फोट किये हों।
      सभी जानते हैं कि इस तरह के विस्फोटों से कोई समस्या हल नहीं होती। इनको कराने वाले पैसा खर्च करते हैं और यकीनन वह कहीं न कहीं से उससे अधिक उसकी वसूली करते हैं। यह पैसा केवल अमीर ही दे सकते हैं। अफसोस इस बात का है कि मरता सभी जगह आम आदमी है। यह सही है कि देश के सभी खास और अमीर आदमियों की संख्या कम होती है इसलिये सभी को सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जा सकती है जबकि आम आदमियों की तो उससे कई लाख गुना भीड़ है तब यह संभव नहीं हो सकता कि सभी को सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध करायी जाये! उसी तरह देश के महत्वपूर्ण स्थानों की चौकसी की जा सकती है पर हर सड़क या गली पर निगरानी नहीं की जा सकती! बहसों और चर्चाओं में भले ही पेशेवर बहसकर्ता कुछ भी कहें पर इसके पीछे पैसे की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका नहीं मानते। वह ऐसे अपराधों का जाति, भाषा, वर्ग और धन के आधार पर उनका विभाजन करते हैं। अपराधियों में भेद करते है। कुछ न मिले तो पड़ौसी देश पर आरोप मढ़कर खामोश हो जाते हैं। शायद ही यह कोई कहता हो कि देश के कथित बढ़ते विकास के साथ ही आतंकवाद भी बढ़ रहा है। इसके पीछे के अर्थतंत्र की पूरी भूमिका देखना आवश्यक है। हमारे जैसे ब्लाग लेखकों के स्त्रोत तो एकदम सीमित होते हैं इसलिये अखबार तथा टीवी के आधार पर लिखते हैं पर जिनके काम करने का दायरा व्यापक है ऐसे बुद्धिजीवी इस पर खोज करें तो उन्हें यकीनन नयी बातें पता चलेंगी तब आतंकवाद का अर्थशास्त्र समझ मे आयेगा।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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