महेंद्र सिंह धोनी की शानदार कप्तानी पारी-संपादकीय (mahendra singh ki kaptani pari-hindi editorial)


आखिर टीम इंडिया या भारत की टीम कहलाने वाली बीसीसीआई की टीम ने एक दिवसीय मैचों की विश्व कप प्रतियोगिता जीत ली है। यकीनन इससे हमें प्रसन्नता हुई है।
इस विजय ने झारखंड के युवक महेंद्रसिंह धोनी को विश्व का एक महानतम आदमी बना दिया है। प्रसंगवश धोनी के नेतृत्व में यह देश के नाम लाया गया यह दूसरा विश्व कप है। इससे पहले धोनी के नेतृत्व में ही बीसीसीआई की टीम ने बीस ओवरीय प्रतियोगिता का विश्व कप जीता था। इस विश्व कप का सचिन तेंदुलकर के लिये बहुत महत्व है क्योंकि वह विश्व के ऐसे एकमात्र महानतम बल्लेबाज हैं जिनके नाम पर कोई विश्व कप नहीं था। जहां तक धोनी का सवाल है तो मानना पड़ेगा कि वह गज़ब का कप्तान है। मतलब यह कि वह हमारी टीम का अब तक का सबसे श्रेष्ठ कप्तान है क्योंकि उसके नेतृत्व में जीता गया यह दूसरा विश्व कप है। इसके अलावा युवराज सिंह के शानदार प्रदर्शन की वजह से जीता गया भी यह दूसरा विश्व कप है। ट्वंटी विश्व कप में भी उनका प्रदर्शन जोरदार रहा था। पिछले कुछ समय से तो उनको टीम से हटाने की मांग उठी थी उसका उन्होंने अपने शानदार प्रदर्शन कर बदला लिया और आलोचकों का मुंह बंद कर दिया।
भारत को विश्व विजय छोटे शहरों से आये लोगों के नेतृत्व में ही मिल सकती है। 1983 में एक दिवसीय विश्व कप प्रतियोगिता कपिल देव के नेतृत्व में ही जीती गयी थी जो हरियाणा के थे। दो विश्व कप प्रतियोगिताओं में जितवाने वाले महेंद्र सिंह धोनी झारखंड के हैं। इस दौर में बड़े शहरों के जो भी कप्तान हुए वह टीम को आगे नहीं ले जा सके कई खिलाड़ियों का खेल कप्तान होने के बाद बिगड़ गया तो कई लोगों ने इसलिये कप्तानी छोड़ी क्योंकि उनको उनका खेल खराब हो रहा है जिनमें सचिन तेंदुलकर भी शामिल थे।
विश्व कप प्रतियोगिता के फायनल में श्रीलंका के साथ बीसीसीआई की टीम के मैच की सबसे बड़ी खासियत महेंद्रसिंह धोनी की कप्तानी भी रही। दरअसल जब कप्तान खेल रहा होता है तो वह खिलाड़ी नहीं होता बल्कि कप्तान ही होता है। भारत के दो कथित महानतम बल्लेबाज वीरेंद्र सहबाग तथा सचिन तेंदुलकर जल्दी आउट हो गये। सचिन के शतकों का शतक का ख्वाब अधूरा रह गया। तब गौतम गंभीर तथा विराट कोहली ने टीम को संभाला। विराट के आउट होने के बाद जब युवराज की जगह धोनी मैदान में आये तो उनकी आंखों में टीम को जितवाने का संकल्प साफ दिखाई दिया। उन्होंने आखिरी तक लड़ाई लड़ी और भारत के महानतम बल्लेबाजों को सस्ते में आउट करने वाले मलिंगा के नौवें ओवर में दो चौके लगाकर उसके दसवें ओवर की संभावना पर ही विराम लगा दिया। अगर इस मैच में जीत का सर्वाधिक श्रेय किसी को दिया जा सकता है तो वह है महेंद्र सिंह धोनी। संकट में टीम के काम न आने के मामले में सचिन ने एक दूसरा उदाहरण पेश किया। वैसे भी वह इसके लिये धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि कहा जाता है कि जब वह अच्छा खेलते हैं टीम खराब खेल जाती है। बहरहाल विराट कोहली का जल्दी आउट होना अच्छा नहीं लगा पर अपनी टीम का आत्मविश्वास वापस लाने में उसके 34 रनों ने बहुत बड़ा काम किया। वैसे सचिन को अब रिटायरमैंट ले लेना चाहिए। वह नये युवाओं का अवसर रोक रहे हैं। इस पूरे विश्व कप में उनके प्रदर्शनर का अधिक योगदान नहीं रहा है। यह उनके लिये सम्मानजनक विदाई होगी। बीसीसीआई की टीम को इस जीत पर बधाई क्योंकि अंततः इससे देश का नाम तो रोशन होगा ही युवाओं में भी आत्मविश्वास पैदा होगा। इस प्रतियोगिता में देखा गया कि पुराने खिलाड़ी वीरेंद्र सहबाग तथा सचिन तेंदुलकर में दबाव में खेलने की क्षमता नहीं है जबकि युवराज सिंह, गौतम गंभीर, विरोट कोहली तथा सुरेश रैना जैसे बल्लेबाज कभी परेशान होते नहीं दिखते।
वैसे मीडिया के लोग भी यह कह रहे हैं कि अब भारतीय टीम को सचिन के बिना चलना सीखना चाहिए। यह उनके लिये संदेश है कि वह सम्मान के साथ विदा हो जायें। वह यह नहीं भूलें कि बीस ओवरीय विश्व कप में विजय के समय सचिन भारतीय टीम का हिस्सा नहीं थे। दबे स्वरों में यह बात मीडिया कह रहा है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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