बाज़ार और प्रचार तंत्र मिलकर बना रहा है महाक्रिकेट-हिन्दी लेख (bazar and media criation maha cricket-hindi lekh)


पाकिस्तान की पीसीबी तथा भारत की बीसीसीआई की टीमों के बीच विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता का सेमीफायनल मैच आखिर निपट गया। सेमी और फायनल से मिला यह शब्द किसी भी प्रतियोगिता के फाइनल मैच से पूर्व के मैचों के लिये प्रयुक्त होता है। सीधा कहें तो छोटा फायनल कहना चाहिए जिसे भारतीय प्रचार माध्यमों ने महायुद्ध, महाजंग, महामुकाबला और जाने क्या उपाधियां देकर महा साबित करने का प्रयास किया। वह सफल रहे। चार वर्ष पूर्व हुए विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में बीसीसीआई टीम की उसी धोनी नामधारी कप्तान के नेतृत्व में नाक कट गयी थी जो इस प्रतियागिता में जादूगर कप्तान कहला रहा है। स्थिति यह हो गयी थी कि सभी कथित महान खिलाड़ियों से अभिनीत कराये गये विज्ञापन पर्दे से गायब कर दिये गये। इस तरह प्रचार माध्यमों का बहुत बड़ा घाटा हुआ। अब यह घाटा उससे कई गुना अधिक राशि का होकर लाभ के रूप में परिवर्तित हो गया है। पिछले चार वर्ष में क्रिकेट दर्शक बहुत कम हो गये थे पर 30 मार्च 2011 को खेले गये उस मैच ने यकीनन कीर्तिमान स्थापित करते हुए दर्शक जुटाये होंगे इसमें संदेह नहीं है। इसके लिये प्रचार माध्यमों ने पूरी तरह से जोर लगा दिया था। इसमें कोई खास बात नहीं है पर इतना जरूर प्रमाणित हो गया है कि आजकल प्रचार माध्यमों के दम पर पूरा देश और उसकी बुद्धि अपहृत की जा सकती है।
फिक्सिंग के लिये बदनाम क्रिकेट से दूर हटे भारतीय दर्शकों की जेब में माल है यह सभी जानते थे। वेस्टइंडीज की 2007 में विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में बीसीसीआई की बुरी तरह हार के बाद उसका आर्थिक आधार जब लड़खड़ाने लगा तब बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रबंधकों को इस बात का होश आया था कि अंततः भारत इस खेल का सबसे बड़ा प्रायोजक है और यहां के निवासी जज़्बाती हैं इसलिये खेल को खेल की तरह नहीं बल्कि उसमें युद्ध की तरह विजय पाने की साम्राज्यवादी भावनाऐं उनमें है। उनकी मनोरंजन में भी साम्राज्यवाद की इस भावना को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि भले ही भारत की जीत पर दांव अधिक लगने से उसके हारने पर सट्टबाज भले ही फायदे में रहें पर प्रत्यक्ष रूप से प्रायोजक के रूप में दिखने वाली कंपनियों को भारी घाटा होता है। सट्टेबाजो के आका इन्हीं कंपनियों में भी पैसा लगाते हैं इसलिये वह भी इस घाटे से बच नहीं सकते। दूसरा इस तरह की हार के बाद क्रिकेट का शौक कम हो जाने से सट्टेबाजों को कालांतर में हानि होती है। माफिया, मीडिया और मनीपॉवर के संयुक्त उपक्रम के इस क्रिकेट खेल का पूरा दारोमदार भारत के मनोरंजन में है जो क्रिकेट से तभी तक ही संभव है जब तक उसमें जीत है।
2007 में विश्व कप प्रतियोगिता से बीसीसीआई की टीम शर्मनाक वापसी ने क्रिकेट के शौक को भारत में तहस नहस कर दिया था। इधर इंटरनेट ने भी अपनी ताकत दिखानी शुरु कर दी थी। कहीं प्रत्यक्ष तो सामने नहीं आया पर यकीनन इस व्यवसायिक पतन को मीडिया, माफिया, और मनीपॉवर के संयुक्त उपक्रम के प्रबंधकों ने कहीं न कहीं  अनुभव किया होगा कि क्रिकेट में लोगों का उतरता खुमार उनके बैंक खातों में बढ़ोतरी रोक सकता है। इसलिये जल्द प्रयास करने होंगे। ऐसे में उसी वर्ष आयोजित बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगता का आयोजन किया गया जिसमें बीसीसीआई को जीत मिली-कुछ लोग यह भी कहते हैं कि दिलवाई गयी। कभी तो लगता है कि यह संयोग भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह दुनियां भर की टीमें इसमें शामिल हुईं और इसमें बीसीसीआई यानि भारत की टीम की जीत पर यहां प्रतिक्रिया हुई उससे सभी भौंचक्क रह गये। दूसरी टीमों के कप्तानों ने माना कि वह इस प्रतियोगिता को लेकर गंभीर नहीं थे इसलिये हारे तो बीसीसीआई के कप्तान तथा खिलाड़ियों ने भी माना कि इस जीत से देश उनको सिर आंखों पर बिठा लेगा इसकी आशा तो उनको भी नहीं थी। कई खिलाड़ियों ने तो यहां तक माना कि इतने दर्शक उनको यहां देख रहे हैं इसका आभास तक उनको नहीं था। इन बातों से लगता है कि शायद वह प्रतियोगिता संयुक्त उपक्रम की बुराईयों से दूर रही होगी मगर इसमें जिस तरह का पैसा है उससे लगता है कि संयुक्त उपक्रम निंरतर शोध, प्रयोग, अनुसंधान तथा सर्वेक्षण भी करता रहता है ताकि उनके काले तथा सफेद व्यवसाय निरंतर चलते रहें। यही कारण है कि बीस ओवरीय प्रतियोतगता के बीसीसीआई की टीम की जीत के एकदम बाद बीस ओवरीय प्रतियोगिता मेें ऐसे क्लब बनाकर मैच खेल जाने लगे जिनके नाम भी भारत के बड़े शहरों के दर्शकों को प्रसन्न करने वाले रखे गये। इस प्रतियोगिता में भारी सट्टा चलता है। खिलाड़ी नीलाम तो पहले ही होते हैं। इसमें राष्ट्रभावना नहीं है इसलिये सट्टा या फिक्सिंग के आरोप लगने पर गद्दार कहने वाला कोई नहीं है। इसके साथ ही यह भी सत्य है कि इसमें दर्शक भी अधिक नहीं जुड़े हैं जितना राष्ट्रीय भाव होने से मिलते हैं।
यही कारण है कि 30 मार्च को होने वाले सेमीफायनल मैच को अधिक से अधिक जज़्बाती बनाया गया। मैच की हर संज्ञा में महा शब्द जुड़ा था। आखिरी बात यह कि लोगों का जज़्बा केवल जीत तक ही रहता है। मतलब यह कि मुंबई में फायनल मैच में बीसीसीआई की टीम जीतती है तभी भारत में अगले चार वर्ष तक क्रिकेट की खुमारी बनी रह सकती है। वैसे संभावना है कि मुंबई में श्रीलंका को बीसीसीआई की टीम हरा देगी क्योंकि 6 अप्रैल से प्रारंभ होने वाली क्लब स्तरीय प्रतियोगिता भी प्रारंभ होनी है। वह भी संयुक्त उपक्रम के लिये भारी कमाई का जरिया है। ऐसे में क्रिकेट प्रबंधकों सब तरफ देखना होता है। यही कारण है कि इसमें फिक्सिंग वगैरह भी हो जाये तो आश्चर्य क्या है? अंततः क्रिकेट के अब दो रूप हैं एक खेल का दूसरा व्यापार का! व्यापार में कुछ बुराईयां चलती हैं चाहे वह क्रिकेट का हो। क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता की लोकप्रियता इस बात पर निर्भर अवश्य करेगी कि बीसीसीआई की टीम विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 जीते। यकीनन बाज़ार, प्रचार माध्यम तथा क्रिकेट प्रबंधक बीसीसीआई की टीम के जीत के लिये उसके खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने तथा श्रीलंका की टीम के खिलाड़ियों पर दबाव बढ़ाने का काम भी करेंगे। हम यहां फिक्सिंग की बात नहीं कहेंगे क्योंकि यह चैनल वाले ही है जों मैच के पहले तो महाजंग, महायुद्ध और महामुकाबला की बात करते हुए उसका रोमांच बढ़ाते हैं फिर खत्म होने पर फिक्सिंग वगैरह की बात भी करते हैं। जैसा कि पाकिस्तान पर हार फिक्सिंग का आरोप कुछ टीवी चैनल लगा रहे हैं। अब यह कैसे संभव है कि एक की जीत महा हो दूसरे की हार फिक्स? इसका जवाब ढूंढना कठिन ही है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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