प्रचार माध्यम अपनी लोकप्रियता खो रहे हैं-हिन्दी लेख (prachar madhyam ki lokpriyata-hindi lekh)


‘दिल्ली में लड़कियां सुरक्षित नहीं, आज फिर हुई एक कोशिश  गैंग रैप की!’
‘गैंग रैप की घटना को इतने दिन हो गये हैं पर पुलिस अभी भी कुछ नहीं कर पाई है।’
दूरदर्शन चैनलों पर यह विलाप अनेक बाद सुनाई देता है-यहां यह भी उल्लेख कर देते हैं कि इनके मीडिया या प्रचार कर्मियों के लिये देश का मतलब दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई, अहमदाबाद, बैंगलोर तथा कुछ अन्य बड़े शहरों ही हैं, बाकी तो केवल उनके लिये कागजी नक्शा  भर हैं।
वह बार बार पुलिस पर बरसते हैं। अभी एक गैंग रैप के मामले में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया, उनमें से दो तो इस तरह की घटना में दूसरी बार शामिल हुए थे। अब सवाल यह है कि पुलिस क्या करे?
आम तौर से ऐसी अनेक घटनायें होती हैं जब पुलिस के साथ मुठभेड़ में खूंखार आतंकवादी तथा अपराधी मारे जाते हैं तो यही चैनल वहां मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए पहुंच जाते हैं। इन आतंकवादियों और अपराधियों पर इतने अधिक मामले दर्ज होते हैं जिनकी संख्या भी डरावनी होती है। मतलब यह कि भारतीय संविधान की परवाह तो ऐसे आतंकवादी और अपराधी कभी नहीं करते। उनका अपराध सामान्य नहीं बल्कि एक युद्ध की तरह होता है। उनका कायदा है कि जब तक वह जिंदा रहेंगे इसी तरह लड़ते हुए चलते रहेंगे। कानून या संविधान के प्रति उनकी कोई आस्था नहीं है। ऐसे युद्धोन्मादी लोगों को मारकर ही समाज को बचाया जा सकता है। पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गये अनेक अपराधियों तथा आतंकवादियों के परिजन पुलिस पर कानून से बाहर जाने का आरोप लगाते हैं पर अपने शहीद का युद्धोन्माद उनको नज़र नहीं आता। उनको ही क्या बल्कि अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी यह पसंद नहीं आता।
अब संविधान की बात करें तो उसमें आस्था रखना सामान्य इंसान के लिये हितकर है इसमें शक नहीं है। देश के अधिकतर लोग कानून को मानते हैं। इसका प्रमाण है कि एक सौ दस करोड़ वाली जनंसख्या में अधिकतर लोग अपने काम से काम रखते हुए दिन बताते हैं इसलिये ही तो शांति से रहते आज़ाद घूम रहे हैं। मगर जिनकी आस्था नहीं है वह किसी भी तरह अपनी हरकत से बाज़ नहीं आते। अगर उनका अपराध कानून के हिसाब से कम सजा वाला है और वह नियमित अपराधी भी नहीं है तो उनके साथ रियायत की जा सकती है पर जिन अपराधों की सजा मौत या आजीवन कारावास है जबकि अपराधी उस पर निरंतर बढ़ता ही जा रहा है तो उसे मारने के अलावा कोई उपाय बचता है यह समझ में नहीं आता।
इस संसार में हर समाज, वर्ण, धर्म, देश, जाति तथा शहर में अच्छे बुरे लोग होते हैं पर यह भारत में ही संभव है कि उनमें भी जाति और धर्म की पहचान देखी जाती है और प्रचार माध्यम या मीडिया यह काम बड़े चाव से करता है। दिल्ली में धौलकुंआ गैंग रैप में गिरफ्तार अभियुक्तों को पकड़ लिया गया। जब पुलिस उनको पकड़ने गयी तो वहां उसका हल्का विरोध हुआ। अगर विरोध तगड़ा होता तो संभव है कि हिंसा की कोई बड़ी वारदात हो सकती थी। ऐसे में एकाध अभियुक्त मारा जाता तो यह मीडिया क्या करता? एक बात यहां यह भी बता दें कि उस मामले में पुलिस के मददगार भी वहीं के लोग थे। यानि किसी एक समुदाय को अपराधी घोषित नहीं करना चाहिए पर मारे गये अपराधी को समुदाय के आधार पर निरीह कहकर उसे शहीद कहना भी अपराध से कम नहीं है।
चाहे कोई भी समुदाय हो उसका आम इंसान शांति से जीना चाहता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कोई भी अपराधी या आतंकवादी को पसंद नहीं  करता चाहे उसके समुदाय का हो? ऐसे में समुदाय के आधार पर अपराधियों के प्रति प्रचार माध्यमों को निकम्मा साबित कर रहा है। अभी एक टीवी चैनल के प्रमुख संपादक ने कहा था कि वह कार्पोरेट जगत की वजह से बेबस हैं। क्या इसका आशय यह मानना चाहिये कि है कि यही कार्पोरेट जगत उनको समुदाय विशेष के अपराधियों का महिमा मंडन के लिये बाध्य कर रहा है? क्या उनके विज्ञापनदाताओं का संबंध तथा आर्थिक स्त्रोत विश्व के कट्टर धार्मिक देशो से जुड़े हैं जो आतंकवादियों और अपराधियों को धर्म से जोड़कर देखते हैं?
बहरहाल एक बात निश्चित है कि किसी जघन्य मामले में अधिक लिप्त होने वाले अपराधी को सामान्य प्रवृत्ति का नहीं माना जा सकता बल्कि वह तो एक तरह युद्धोन्मादी की तरह होते हैं जिनके जीवन का नाश ही समाज की रक्षा कर सकता है। दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश में लड़कियों के साथ बदसलूकी घटनायें बढ़ रही हैं। दिल्ली में अनेक लड़कियों को ब्लेड मारकर घायल कर दिया गया है। अगर वह अपराधी कहीं पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया तो मीडिया क्या करेगा?
मुठभेड़ के बाद उसका समुदाय देखेगा फिर इस पर भी उसका ध्यान होगा कि कौनसी लाईन से उसको लाभ होगा। कानून के अनुसार कार्यवाही न होने की बात कहेगा? अगर कहीं ब्लेड मारने वाला जनता के हत्थे चढ़ गया और मर गया तो लोगों के कानून हाथ में लेने पर यही मीडिया विलाप करेगा। ऐसे में लगता है कि टीवी चैनलों पर कथित पत्रकारिता करने वाले लोग किसी घटना पर रोने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। वह सनसनी या आंसु बेचते हैं। कभी चुटकुले बेचकर हंसी भी चला देते हैं। कोई गंभीरता न तो उनके व्यवसाय में है न ही विचारों में-भले ही कितनी भी बहसें करते हों। इन सबसे डर भी नहीं पर मुश्किल यह है कि देश का संचालन करने वाली एजेंसियों में भी आखिर मनुष्य ही काम करते हैं और इन प्रचार माध्यमों का प्रभाव उन पर पड़ता है। उनको इन प्रचार माध्यमों पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि समाज या देश को लेकर उनके पास कोई गंभीर चिंतन इन प्रचार माध्यमों के पास नहीं है। अतः हर प्रकार के अपराध के प्रति उनको अपने विवेक से काम करना चाहिए क्योंकि इस देश में ईमानदार, बहादुर तथा विवेकवाद प्रशासनिक  अधिकारियों  की ही आवश्यकता है और मीडिया तो केवल हल्के प्रसारणों के लिये है। एक घंटे के कार्यक्रम में पौन घंटा क्रिकेट तथा फिल्मों पर निर्भर रहने वाले इन प्रचार माध्यमों से किसी बौद्धिक सहायता की आशा नहीं करना चाहिए।
अगर एक सवाल किसी मीडिया या प्रचार कर्मी से किया जाये कि‘आखिर आप अपने समाचार या चर्चा से क्या चाहते हैं?’
यकीनन उसका एक ही जवाब होगा-‘हम कुछ नहीं चाहते सिवाय अपने वेतन तथा आर्थिक लाभ के। हमें समाचार या बहस समय पास करने के लिये कुछ न कुछ तो चाहिए ताकि चैनल को विज्ञापन मिलते रहें। बाकी जवान मरे या बूढ़ा, हमें तो हत्या से काम, छोरा भागे या छोरी, हमें तो बस सनसनीखेज खबर से काम।’
—————
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com
—————————–

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
usdtad aur shagird
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: