जनवाद को ब्रह्मज्ञान-हिन्दी व्यंग्य (janvad ko brahmagyan-hindi vyangya)


जांच अधिकारी के ब्रह्मज्ञान से दुःखी जनवादी प्रेमी अपनी मृतक प्रेमिका की हत्या के मुकदमे में अपना दर्दभरा बयान करते हुए उसकी शिकायत करेगा-ऐसा कहीं पढ़ने को मिला। यह जनवादी प्रेमी पत्रकार है और अपनी पत्रकार प्रेमिका के माता पिता पर अपने सम्मान के लिये उसकी हत्या का आरोप लगा रहा है। इस जनवादी प्रेमी ने ही आर्यसमाज के एक मंदिर में अपनी उस स्वर्गीय प्रेमिका के साथ विवाह करने की तैयारी की थी, फिर प्रेमिका को अपने ही परिवार वालों की रजामंदी के लिये भेज दिया।

मामला यहीं से शुरु हुआ। यहीं से हम भी अपना विचार शुरु करते हैं। जनवादी दिखना एक शौक है पर यह कोई मुफ्त में नहीं पालता। इस तरह के शौक केवल भारतीय अध्यात्मवादी ही पाल सकते हैं कि बिना कुछ लिये दिये समाज निर्माण के लिये प्रयास करें। यह जनवादी कहीं न कहीं से प्रायोजित होने पर जोश के साथ सक्रिय होते हैं। कहीं कोई राजनीति, सामाजिक या गैर हिन्दू धार्मिक संगठन अपने आर्थिक स्त्रोत इनको उपलब्ध कराता है तो कहीं कोई विदेशी मानवाधिकार संगठन की इन पर कृपा होती है।

आमतौर से जनवाद और प्रगतिशील अलग अलग विचारधारायें मानी जाती हैं पर दोनों का मुख भारतीय दर्शन की दशा और दिशा के सामने विरोध में खुला रहता है। इनके बुद्धिजीवियों का देश पर इतना गहरा प्रभाव शैक्षणिक तथा सामाजिक संगठनों में रहा है कि परंपरावादी बुद्धिजीवी भले ही अलग सोचते हैं पर उनकी शैली भी इनकी तरह हो गयी है। जनवादी या प्रगतिशील समाज को एक शासित होने वाली इकाई मानते हैं और उनका प्रयास यही है कि जन कल्याण के सारे काम केवल राज्य डंडे के जोर पर करे। जबकि परंपरा के अनुसार राज्य और समाज एक पृथक इकाई है और दोनों के शिखर पुरुष अपने ढंग से काम करें यही श्रेयस्कर है। राज्य का जितना कम हस्तक्षेप समाज में होगा उतना ही वह विकसित हो सकेगा। मगर स्थिति यह है कि इन जनवादियों और प्रगतिशीलों ने परिवारों तक में कानून का हस्तक्षेप करा दिया है। हत्या एक जुर्म है पर कहीं दहेज हत्या को अलग कर नया कानून बनवा दिया। आतंकवाद की हत्या को अलग परिभाषित कर अलग से कानून बना। औरत और मर्द के जिंदगी के अलग अलग रूप दिखाये जाते हैं। मतलब जीने और मरने में की स्थितियों में भेद पैदा किया और बात करते हैं जबकि दावा यह कि समतावाद ला रहे हैं।

एक मजे की बात है कि समाज को आधार प्रदान करने वाले सक्रिय, कमाऊ तथा प्रतिभावान पुरुष इन जनवादियों और प्रगतिशीलों की दृष्टि से जारशाही का प्रतीक है जो केवल अपनी स्त्री तथा बच्चों पर अन्याय करता है। जनवादी और प्रगतिशील विचारकों के इस समूह को कथित विकासवादी भी मान सकते हैं जिनको ब्रह्मज्ञान तो अपना दुश्मन दिखाई देता है।

बहरहाल जनवादी प्रेमी इस समय ऐसे ही विकासवादियों का नायक बना हुआ है। वह शादी रद्द करने के पीछे जो तर्क दे रहा है वह ब्रह्मज्ञानियों को हज़म नहीं हो सकता। उसकी स्वर्गीय प्रेमिका ने माता पिता के इच्छा के बिना विवाह की तारीख तय की और फिर चली गयी। जनवादी प्रेमी चाहे कितना भी कहे कहीं न कहीं उसके प्रति दहेज की भारी रकम पाने का मोह जरूर उसमें रहा होगा। जहां तक जनवादी बुद्धिजीवियों का प्रश्न है वह बिना प्रायोजन के न तो किसी अभियान पर लिखते हैं न बोलते हैं ऐसे में वह प्रेमी बिना प्रायोजन के विवाह करता है इसमें संदेह है। विकासवादी तो प्रायोजित होकर काम करते हैं इसलिये यह संभव नहीं है कि कथित पत्रकार प्रेमी अपने अंदर के किसी कोने में दहेज का मोह न पालता हो। दूसरी बात यह है कि दिल्ली में उसकी स्थिति इतनी सुदृढ़ नहीं हो सकती थी जहां वह सभ्रांत परिवार का रूप प्रदर्शित कर सकता-संभव है शादी और बच्चे होने के बाद नमक रोटी के चक्कर में जनवाद का भूत साथ छोड़ देता।

विकासवादी बुद्धिजीवी युवक युवतियां ढाबों या होटलों पर जाकर काफी या चाय पीते हुए फोटो जरूर खिंचवाते हैं और उसके लिये पांच सौ से हजार तक की रकम उनके पास उपलब्ध भी हो जाती होगी पर घर गृहस्थी एक विशाल अंतहीन अभियान है जिसमें ढेर सारे रुपये चाहिये। फ्रिज, गाड़ी कूलर या ऐसी, टीवी तथा अन्य सामान न हो तो गृहस्थी किसी मज़दूर जैसी लगती है-यह अलग बात है कि महल बनाने वाले ईंटों की कच्ची झोंपड़ियों में रहते हुए कुछ मजदूरों के घर में भी आजकल यह सामान दिख ही जाता है-और विकासवादी बुद्धिजीवी कितना भी मज़दूरों, गरीबों तथा बेसहारों के कल्याण के लिये सक्रिय हो पर वह स्वयं वैसा दिख नहीं सकता। उसे तो जींस पहनना है और ढाबे या होटल में खाना है, सबसे बड़ी बात यह कि स्मार्ट दिखना है। इसके लिये चाहिए पैसा! शादी का मामला हो तो दहेज छोड़ने का काम कोई ब्रह्मज्ञानी ही विरला ही कर सकता है प्रायोजन के आदी विकासवादियों से ऐसी अपेक्षा निरर्थक है।

उस जनवादी पत्रकार की स्वर्गीय प्रेमिका की मासूम मां जेल में है और वह भी नारी है पर जनवादियों के सहयोगी नारीवादी बिना इसकी परवाह किये रोज प्रदर्शन किये जा रहे हैं। इनकी चालाकी कोई नहीं समझ पाता। यह अपना घर बचाये रखने और प्रचार पाने के लिये किसी भी बर्बाद घर की आग पर अपनी रोटी सैंक सकते है, कोई मर गया तो फिर तो इनकी पौ बारह है क्योंकि प्रचार माध्यमों में सहानुभूति लहर इनके पक्ष के अनुसार ही बहती है। उसे न्याय दिलवाना है! इन कथित बुद्धिमानों से कौन पूछ कि मरे हुए आदमी के लिये इस संसार में रह ही क्या जाता है जहां वह न्याय जैसी दुर्लभ चीज पाकर सजायेगा? मगर यह ब्रह्मज्ञान की बात है जो इनको विष तुल्य लगेगी।

जांच अधिकारी मृतक युवती के जनवादी मित्रों को ब्रह्मज्ञान दे रहा होगा उसे इसका आभास नहीं है कि सांप काटे हुए आदमी को पानी पिला रहा है जो कि उसके लिये विष तुल्य है। जनवाद ने जिसके दिमाग को काट लिया उसके लिये ब्रह्मज्ञान विष की तरह ही है। जिस तरह माया के शिखर पर बैठे आदमी को सत्य से डर लगता है वैसे ही जनवाद को ब्रह्मज्ञान से भय लगता है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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3.दीपक भारतदीप का चिंतन
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