प्रचार माध्यम देशनिरपेक्ष दिखने का प्रयास न करें-हिंदी लेख


प्रकाशन तथा अन्य संचार माध्यमों में विदेशी विनिवेश का अक्सर यह कहकर विरोध किया जाता है कि उनका इस देश के हितों से कोई सरोकार नहीं रहेगा। विदेशी पूंजीपति से सुजज्जित प्रचार और प्रकाशन संगठन देश के प्रति वफादारी नहीं दिखायेंगे? उस समय कुछ भोलेभाले बुद्धिजीवी देशभक्ति के भाव के कारण यह सुनकर चुप हो जाते हैं। मगर नक्सलवाद पर जिस तरह संगठित प्रचार माध्यमों का कथित निष्पक्ष रवैया है वह उनके देशभक्ति के भाव में निरपेक्षता दिखा रहा है और तब उनका यह तर्क खोखला दिखाई देता है कि विदेशी विनिवेशकों को देश के हितों से कोई सरोकार नहीं रहेगा अतः उनका आगमन प्रतिबंधित रखना चाहिये।
एक किस्सा है जिसे अधिकतर लोगों ने सुना होगा। एक लड़के द्वारा बार बार ‘शेर आया’ ‘शेर आया’ कहकर गांव के लोगों को  अनावश्यक रूप से पुकार कर एकत्रित किया जाता था। एक बार सच में शेर आया पर गांव वाले नहीं आये और वह उसे मारकर खा गया। इसे ध्यान रखना चाहिये। संगठित प्रचार माध्यमों जिस तरह कथित रूप से निष्पक्षता दिखाते हुए समाज और देश हित के प्रति निरपेक्षता दिखा रहे है उसके बाद उनको यह आशा नहीं करना चाहिये कि उनके द्वारा कभी किसी प्रसंग में सहानुभूति प्राप्त करने का अभियाना चलाया गया तो आम दर्शक या पाठक वैसे ही उपेक्षा कर सकता है जैसे कि गांव वालों ने लड़के के प्रति दिखाई थी। संगठित प्रचार माध्यम कुछ संस्थान लोगों के जज़्बातों से खेल रहे हैं और इसे हर आदमी जान चुका है। नक्सली हिंसा में सुरक्षाबल के जवानों की मौत पर जिस तरह की बातें की जाती हैं उससे लोगों में जो गुस्सा भरता है उसका अंदाजा संगठित प्रचार माध्यमों में सक्रिय कुछ लोगों को नहीं है। वह आम आदमी तक खबर और दृष्टिकोण पहुंचाने की होड़ में इस बात को भूल जाते हैं कि उनके उपभोक्ता दर्शक और पाठकों के जज़्बात व्यवसायिक नहीं भावनात्मक होते हैं। ऐसे में किसी हिंसा के पक्ष या विपक्ष में तर्क कराने की बजाय आम आदमी की इकतरफा उग्र अभिव्यक्ति का प्रदर्शन करना चाहिये-आवश्यक हो तो व्यवस्था की नाकामी का प्रश्न उठाया जाये पर कम से कम हिंसक तत्वों के ऐजेंडे को इस तरह न  प्रस्तुत  किया जाये कि जैसे कि वह नायक हों।
विश्व भर में आतंकवाद एक व्यवसाय बन चुका है। जिस संगठित प्रचार माध्यम को इस पर असहमति हो वह अपने ही समाचारों का विश्लेषण कर ले क्योंकि इस लेखक का आधार भी वही हैं। कथित रूप से जो महान बुद्धिजीवी हैं उनको यह समझायें कि वह कल्पित जन कल्याण के नाम होने वाली हिंसा का समर्थन कर रहे हैं। यह सच है कि जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम पर बने समूहों मे आपसी हिंसा होती है पर इसके लिये उनके स्वरूप नहीं बल्कि शिखर पुरुषों की आपसी रंजिशें जिम्मेदार होती हैं यह अलग बात है कि वह समाज हित की आड़ में अपने आपको निर्दोष साबित करने का प्रयास करते हैं।
आतंकवादियों को बड़े पैमाने पर धन मिलता है जिससे वह स्वयं ऐश करते हैं। अनेक स्थानों पर वह महिलाओं की देह से खिलवाड़ करने की खबरे छपती हैं। वह आधुनिक हथियार खरीदते है। उनके पास महंगी गाड़ियां हैं। भारत में अपराध कर विदेश भाग जाने की उनको सुविधा मिल जाती है। ऐसे हिंसक तत्वों के स्थानों पर जब शराब और जुआ के दौर चलने की खबरें इन्ही संगठित प्रचार माध्यमों द्वारा दी जाती है। तब गरीबों, आदिवासियों, मजदूरों तथा शोषकों के लिये उनके लड़ाई के दावे पर यकीन कैसे किया जा सकता है। आप किसी विषय पर चर्चा करते हुए निष्पक्ष रहें पर इस तरह नहीं कि देश के प्रति निरपेक्षता दिखाई दे।
इस संबठित प्रचार माध्यमों का एक तय प्रारूप है। उनहोंने आर्थिक, सामाजिक,राजनीतिक तथा सामरिक विषयों पर कुछ ऐसे विशेषज्ञों का पैनल बना रखा है जो एक निश्चित सीमा के बाहर ही अपने विषय से बाहर नहीं देख पाते। उनके पूरे विश्व में आ रहे परिवर्तनों का आभास तक नहीं है। इसलिये वह रटी रटाई बातें करते हैं। घटनाओं के स्थान तथा तारीख बदल जाती है पर उनके बयान नहीं बदलते। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आजकल इन संगठित प्रचार माध्यमों की ताकत बहुत अधिक है।
कुछ माह पहले भारत तथा पाकिस्तान के दो प्रकाशन संस्थाओं ने दोनों देशों के बीच मैत्री भाव स्थापित करने का अभियान छेड़ा था। उस समय अंतर्जाल लेखको ने संदेह व्यक्त किया था कि अब यहां पाकिस्तान के लिये प्रायोजित मैत्री अभियान शुरु होगा। कुछ समय बाद वह दिखने लगा। भले ही वह दो संस्थान हैं पर यकीनन वह इस तरह दोनों देशों के-खासतौर से भारत के-बौद्धिक वर्ग के लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से एक संदेश दे रहे थे। उसके बाद तो यहां एक तरह से पाकिस्तान के लिये सद्भाव के प्रचार का जो दौर शुरु हुआ उसमें 26/11 को मुंबई पर हुए हमले की यादें लोगों से विस्मृत करने की योजना के रूप में देखा गया। एक तो अभी शादी और तलाक का नाटक चला गया जिसमें यह बताने का प्रयास हुआ कि यह सब तो दोनों देशों के बदमाश करते हैं और आम आदमी को इससे कोई मतलब नहीं है। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत में आयोजित एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में नहीं बुलाया गया तो उस पर इन्हीं संगठित प्रचार माध्यमों ें कुछ ने तो शोक जैसा माहौल दिया। तय बात है कि इसके पीछे आर्थिक लाभ तथा सुरक्षा का कोई स्वार्थ है जिसे छिपाया जाता है, या फिर मन में यह भय है कि पाकिस्तान में रह रहे अपराधी कहीं उनकी पोल न खोल कर रख दें।
यह बातें इतना परेशान नहीं  करती अगर निरंतर जारी नक्सली हिंसा में देश के सुरक्षा कर्मियों की मौत के बाद भी देश के ही अंदर के इलाकों पर उनकी उपस्थिति पर आपत्ति नहीं दिखाई जाती। उन पर कल्पित आरोप लगाकर यही साबित करने से तो यही साबित  होता है कि कुछ लोगों की यह मजबूरी है कि वह देश निरपेक्ष दिखकर बाहर के लोगों को खुश रखें। भारत में अधिकतर समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा टीवी चैनलों में काम करने वाले व्यक्तित्व समझदार हैं और उनकी देशभक्ति पर शक नहीं किया जा सकता पर उनमें कुछ ऐसे हैं जिनको आत्ममंथन करना ही होगा कि कहीं  वह अनजाने में तो अपने ही देश के शत्रुओं के हाथ में नहीं खेल रहे। उनको किसी लाचारी या लालच में काम न करता हुआ दिखना है ताकि देश की आम पाठक तथा दर्शक उनकी तरफ सवाल न उछाले। सबसे बड़ी बात यह है कि उनको अपनी शक्ति का अहसास होना चाहिये कि वह अपने प्रयासों से देश को एक दिशा दे सकते हैं। उसी तरह उनके कुछ प्रसारणों तथा प्रकाशनों से देश का मनोबल गिरता हे। इसलिये वह इस बात का ध्यान रखें कि देश की रक्षा करने वाले तथा समाज का सच में हित चाहने वालें लोग उनके अनजाने में किये गये प्रयासों से आहत न हों। अपनी व्यवसायिक प्रतिष्ठा बनाने के लिये निष्पक्ष रहना आवश्यक है पर अगर वह राष्ट्रनिरपेक्ष रहने का प्रयास करेंगे तो उससे उनके उपभोक्ता दर्शक तथा    पाठक उनसे निंराश हो जायेंगे। जिसका कालांतर में उनके व्यवसायिक हितों पर ही प्रभाव पड़ेगा।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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