बाघ बचाना है-व्यंग्य चिंत्तन


जहां तक हमारी जानकारी है सिंह, बाघ तथा चीता एक ही प्रजाति के जीव माने जाते हैं और इनकी नस्ल अब समाप्ति की तरफ बढ़ रही है। आजकल ‘बाघ बचाओ का नारा’ अनेक बार हमारे सामने आ रहा है। कहीं लेख वगैरह छप रहे हैं तो कहीं अंतर्जाल पर ऐसी सामग्री दिखाई दी। सच तो यह कि हमने कोई लेख पढ़ा ही नहीं क्योंकि नारों के पीछे लोगों की सोच भी उतनी ही होती है जिसे ‘वाद’ भी कहा जाता है। एक पंक्ति का नारा और उस पर वाद प्रस्तुत करते हुए अनेक बातों के दोहराव से सजे लेख पढ़कर बोरियत होती है।
नारा पढ़कर हमारे समझ में यह नहीं आया कि केवल बाघ ही बचाना है या शेर और चीतेे के बचाव की भी सोचना है। मान लिया कि इन तीनों को ही बचाना है। फिर सोचा कि बचाना कहां जाकर है? वह संकट में कहां हैं, जहां जाकर उनकी रक्षा की जाये। पिछले कई बरसों से एक नारा लगाया रहा है ‘कन्या भ्रण बचाओ’। एक नारा आजकल दूसरा भी चल रहा है‘पेट्रोल बचाओ।’ गर्मी के दिनों में एक नारा सामने आता है कि ‘पानी बचाओ’। कोपेनहेगन में एक सम्मेलन हुआ था जिसमें नारा लगा था कि ‘प्रथ्वी को गर्म होने से बचाओ’। कुछ नारे तो समय के साथ स्वयं ही गायब हो जाते हैं। बरसात प्रारंभ होते ही ‘पानी बचाओ’ का नारा नदारत होता है। उसी तरह कोपेनहेगेन में ‘प्रथ्वी को गर्मी से बचाओ’ का नारा भी पूरे विश्व में बर्फबारी और ठंड के प्रकोप के चलते गायब हो गया। मजे की बात यह है कि इधर वह सम्मेलन खत्म हुआ उधर सर्दी ने अपना रंग दिखाया ।
‘बाघ बचाओ अभियान’ का एक आम आदमी हिस्सा कैसे हो सकता है? बाघ कोई पालतु पशु नहीं है कि वह सड़क पर घूमता हो और बच्चे वगैरह उसे पत्थर मारते हों। यह भी नहीं होता कि आम आदमी शेर, बाघ या चीते की खाल खरीदकर अपने घर में बिछाता है और इसलिये शेर या बाघ मारे जाते हों। यह तो अमीरों का शौक है।
सुना है चीन में शेर, बाघ और चीते के मांस और खालों की खपत बहुत है इसलिये भारत में उनका शिकार कर नेपाल के जरिये वहां उनका शव भेज दिया जाता है।
हवा में नारे उछालकर प्रचार माध्यमों से लोगों को दिमागी विलासिता में व्यस्त रखने का यह तरीका पुराना है। नारे लगाओ और लोग सुनते रहें। रोज कोई नारा सामने आ ही जाता है। जहां तक उस पर काम होने का सवाल है उस पर क्या लिखें? सभी जानते हैं। हमारे देश के अनेक धार्मिक प्रवृत्ति के लोग बरसों से ‘गाय बचाओ’ का नारा लगाते आ रहे हैं। अनेक संत और साधु अपने प्रवचनों में भक्तों से बहुत मार्मिक भाव से इसके लिये अपीलें करते हैं। कुछ संतों ने केवल इसी उद्देश्य को लेकर अभियान छेड़ा हुआ है। इधर जब उसकी जमीन सच्चाई को देखते हैं तो हैरानी होती है। जो लोग रोज उन संतों की बात सुनते हैं पर उस अमल नहीं करते। हमारे यहां धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि भोजन ग्रहण करने से पहले रोटी गाय के लिये जरूर निकालना चाहिये। इस पर कितने लोग अमल करते हैं? रोटी और पानी के लिये इधर उधर भटकती गायों का झुंड कहीं भी देखा जा सकता है। यह हालत तो तब है जब गाय की सेवा हमारी धाार्मिक पंरपरा का अटूट हिस्सा है। ऐसे में सिंह या बाघ की रक्षा आम आदमी कैसे करेगा?
प्रसंगवश सिंह माता की सवारी माना जाता है। फिर भी आम आदमी जब प्रतिदिन सामने दिखने वाली गाय के प्रति लापरवाह है तो बाघ की रक्षा करने की कैसे सोच सकता है जिसका प्रत्यक्ष दर्शन भी उसके लिये किसी पर्यटन स्थल या चिड़िया घर में पैसे खर्च करने पर ही हो सकता है।
शेर, बाघ या चीता संविधान द्वारा संरक्षित क्षेत्रों में ही पाये जाते हैं। समाचार माध्यमों के अनुसार अनेक शिकारी अवैध रूप से वहां प्रवेश कर उनका शिकार करते हैं। हमने टीवी चैनलों पर पुलिस द्वारा पकड़े गये अनेक शिकारियों पर अनेक बाघों की हत्या का अपराधी होने के आरोपों को देखा है। अनेक जगह संरक्षण करने वालों पर संदेह जताया जाता रहा है। कई बार तो ऐसे भी समाचार देखे हैं कि जितने सिंह बाघ बताये जा रहे हैं उतने वास्तव में कथित संरक्षित क्षेत्रों में मौजूद ही नहीं है।
दरअसल यह संकट वनों के सिकुड़ते दायरे की वजह से पैदा हुआ है। असम के कुछ इलाकों में हाथियों के आतंक के समाचार आते हैं तब लगता है कि जैसे वह खलनायक हों, पर ऐसा नहीं है। दरअसल इंसान उनके इलाकों में दाखिल हो गया है। हाथी को एक मस्त शाकाहारी जीव माना जाता है पर उसके लिये हरित प्रदेश कम होते जा रहे हैं। यह कमी शेर बाघ तथा चीत के अस्तित्व का भी संकट बन रही है। यह सच है कि शेर या बाघ घास नहीं खाते पर वह मासांहारी जीव हैं और उनके भोज्य जीव घास ही खाते हैं। सिंह प्रजाति के इन जीवों का संकट इसलिये खतरे में हैं क्योंकि उनके भोजन का भोजन कम होता जा रहा है। सिंह और बाघ अपने इलाके के ऐसे राजा माने जाते हैं जिनका अस्तित्व प्रजा के कारण ही होता है। वनों के हरिण, खरगोश, लोमड़ी, बंदर, तथा अन्य ढेर सारे पशु पक्षी सिंह प्रजाति के जीवों की प्रजा की तरह होते हैं। यह प्रजा ही लापता हो रही है तो राजा कहां से बचेगा?
ऐसे अभियान केवल प्रचार के लिये ही चलाये गये लगते हैं। वन संपदा पर संकट की चर्चा गाहे बगाहे अनेक पर्यावरण्विद् करते रहते हैं पर उनका कुछ होता नहीं। ऐसा लगता है कि यह हमारी आदत हो गयी है कि संकट आने से पहले सतर्कता नहीं रखेंगे जब आयेगा तब नारे लगायेंगे। वह भी ऐसे ही जिनको अमली जामा पहनाने की कोई खास योजना नहीं होती। दरअसल वंन संपदा की कमी तथा पर्यावरण प्रदूषण हमारी बहुत बड़ी समस्या है। उसके बाद शेर, बाघ और चीते को मारने वाले कोई आम आदमी नहीं है और न ही विदेश से आने वाले लोग हैं। अनेक लालची, लोभी, और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग जल्दी और ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में उनकी हत्या करते हैं और उनका कड़ी सजा देने के साथ ही जिम्मेदार लोगों को अधिक सतर्कता से काम करने के लिये दबाव डालना चाहिए।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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