इंटरनेट पर हिन्दी लिखने का अनुभव आम जगत से अलग-हिन्दी लेख (experience of hindi writing on ineternet)


अंतर्जाल पर गद्य लिखें या पद्य अंतद्र्वंद तो इस लेखक के मन में हमेशा ही रहेगा। ब्लाग पर पहले इसलिये कवितायें लिखी क्योंकि अंग्रेजी टाईप में अधिक गति नहीं थी और रोमन में हिन्दी लिखना जरूरी लग रहा था। बाद में कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला शस्त्र मिला तो खुशी हुई कि गद्य लिखेंगे। यह खुशी जल्दी काफूर भी हो गयी जब अंतर्जाल के बढ़ते तकनीकी ज्ञान से अपने पाठों की सफलता और असफलता का विवेचन किया। पता लगा कि छोटी पर मारक कविताएं अधिक सफल हैं।
प्रारंभिक दौर में लिखी गयी कवितायें और छोटी गद्य रचनाएं अभी तक पाठक जुटा रही हैं और बड़े पाठ उनसे कमतर साबित हुए। दरअसल यह लेखक उसके मित्र उस दौर के लोग हैंे जो कविताओं से थोड़ा एलर्जी रखते हैं। कविता शब्द ही उनको ऐसा लगता है जैसे कि किसी ने करंट मार दिया हो। लिखने को भले ही लिख जायें पर पढ़ने पर अगर प्रभाव न छोड़े तो समय खराब करने पर पछतावा होता है।
निजी मित्र हमेशा ही कविता लिखने के विरोधी रहे हैं। एक मित्र महाशय तो ऐसे हैं जो स्वयं ही गज़ब के गीत और गज़ल लिखते हैं और अब उन्होंने ब्लाग भी बनाया है वह हमेशा ही कविता लिखने का विरोध करते हैे। अपने ब्लाग पर आई कुछ टिप्पणियों ने हमेशा उनकी याद आयी जैसे कि उन्होंने ही टिप्पणी लिखी हो।
बहुत पहले एक बार उन्होंने हमारी गज़ल देखकर कहा था कि
‘तुम्हारी यह रचना बहुत गहरी और दिल को छू लेने वाली है पर यह गज़ल नहीं है।’
हमने कागज हमने हाथ में ले लिया और कहा‘चाहे इसने आपके दिल की कितनी भी गहराई में उतरकर प्रभाव जमाया हो पर हमें यह अफसोस है कि यह गज़ल नहीं है।’
एक बार एक कविता उनको लिखकर दिखाई तो वह बोले-‘यार, तुम जबरदस्ती तुक क्यों मिलाते हो? इसमें कोई शक नहीं है कि इसमें कथ्य दमदार है पर यह गद्यनुमा चिंतन है। इसे कविता तो कहना मुश्किल है।’
उनके पास अधिक हिन्दी का भाषा ज्ञान है और अंतर्जाल पर भी सक्रिय उन जैसा ज्ञान रखने वाले एक दो लेखक हमारी नज़र में हैं। हम पहले उनको अपने लेख और व्यंग्य दिखाते थे तो वह यही कहते थे कि तुम तो केवल गद्य लिखा करो।
ऐसा नहीं है कि वह गद्य नहीं लिखना जानते है। हमने उनके ही एक अन्य कवि मित्र की एक कविता की पुस्तक पर उनके द्वारा लिखी गयी समीक्षा पर उनसे कहा था कि‘कविता की वह पुस्तक पता नहीं कितनी दमदार है पर आपकी समीक्षा उसमें चार चांद लगायेगी।
हिन्दी और उर्दू के शब्दों का उनका ज्ञान असंदिग्ध है और कहीं परेशान होने पर उनसे चर्चा अवश्य करते हैं। वह बहुत कम लिखते हैं और हमने उनसे कहा था कि ‘ऐसा लगता है कि जिनको भाषा का ज्ञान अधिक होता है वह कम ही लिख पाते हैं।
तब उन्होंने हंसते हुए कहा था कि ‘हां, तुम अपने को धन्य समझो कि भाषा का ज्ञान कामचलाऊ है इसलिये अधिक लिख जाते हो। वैसे तुम कविताओं से जितना हो सके बचो। तुम अपने चिंतन के लिये अधिक जाने जा सकते हो।’
अल्पज्ञानी होना तब समस्या नहीं रहता जब आपको पता लग जाता है वरना दुनियां भर में अपनी मूर्खता दिखते रहते हैं। फिर ऐसे मित्र भी कम ही मिलते हैं जो आलोचना कर रास्ता बताते हैं।
उनकी कही बातें जब ब्लाग लिखने पर टिप्पणियों के रूप में भी आयी। अव्यवसायिक लेखक होने के नाते हमने उन पर कम ध्यान दिया पर जब चिंतन करते हैं तो सब ध्यान आता है। यहां हम केवल अपनी अभिव्यक्ति प्रकट करने के लिये लिख रहे हैं इसलिये कभी कभी उन पर विचार करते हैं। कवितायें लिखने का उद्देश्य केवल विषय को संजोना भर होता है ताकि उस पर कभी गद्य लिखेंगे पर अगर वह अपने स्वरूप में ही पंसद की जायें तो क्या किया जाये?
सच बात तो यह है कि छोटे अध्यात्मिक चिंतन ओर कविताओं ने इस लेखक के सभी ब्लाग/पत्रिकाओं को बहुत आगे तक पहुंचाया है। लोगों की प्रतिकियाओं का अध्ययन करें तो वह अधिक बड़े पाठों से जल्दी उकता जाते है। अगर कोई बात आपको गद्य में कहनी है तो उसके लिये विस्तार से कहना पड़ता है पर समय नहीं है तो व्यंजना विद्या में अगर उसे लिखा गया और वह प्रभावी हुआ तो पाठक उसे पकड़ लेंगे। वर्डप्रेस पर जिन पाठों ने अधिक वोट पाये हैं वह सभी कवितायें और छोटे अध्यात्मिक चिंतन ही है।
ऐसे में एक बात लगती है कि कहीं हम अपने रवैये को लेकर जिस तरह चल रहे हैं क्या वह ठीक है? व्यंजना विद्या में कही गयी बातें लेाग समझ रहे हैं तब उसके लिये विस्तार से गद्य लिखने की क्या जरूरत है? दूसरी बात यह है कि हमारे पास लिखने का समय नहीं है तो पाठक के पास भी कितना है?
दूसरी बात यह है कि कविताओं को अनदेखा करना भी ठीक नहीं है क्योंकि हो सकता है कि नये लेखक उसमें अपनी बात कुछ अनोखे ढंग से कह रहा हो। इस लेखक ने तो अपने पाठों पर इसलिये ही आलेख या कविता लिखने की परंपरा इसलिये प्रारंभ की कि शीर्षक देखकर कोई उसे खोले और कविता मिलने पर नाराज न हो। इसका उद्देश्य यह भी था कि कविता देखकर लोग कम खोलेंगे और घटिया होने पर उनका गुस्सा अभिव्यक्त नहीं होगा। आम पाठकों ने यह भ्रम तोड़ दिया है। उनके लिये महत्वपूर्ण कथ्य, तथ्य और विषय तत्व है। स्थिति यह हो गयी है कि वर्डप्रेस के ब्लाग/पत्रिकाओं के ‘पाठकों की पसंद’ का स्तंभ कविताओं की सफलता की जा कहानी कहा रहा है उससे तो यह लगता है कि नई पीढ़ी काव्य के प्रति वैसी संकीर्ण मानसिकता नहीं रखती। शर्त यही है कि कविताओं के शब्दों का मुख बाहर खुलता हो न कि एकांकी हो। कहने का तात्पर्य यही है कि अंतर्जाल पर हिन्दी का रूप कई विविधतायें लेकर आयेगा और उससे सभी को सामंजस्य बिठाना होगा।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: