भर्तृहरि शतकः कामदेव करते हैं इस विश्व में अद्भुत लीला



कृशः काणः खञ्ज श्रवणरहितः पुच्छविकलो
व्रणी पूयक्लिनः कृमिकुलशतैरावुततनु
क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककापालार्पिततगलः
शनीमन्वेति श्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः

हिंदी में भावार्थ-देह से दुर्बल, खुजली वाला, बहरा काना, पुंछ विहीन, फोड़ों से भरा, पीव और कीट कृमियों से लिपटा, भूख से व्याकुल, बूढ़ा मिट्टी के घड़े में फंसी हुई गर्दन वाला कुत्ता भी नई तथा युवा कुतिया के पीछे पीछे दुम हिलाता हुआ फिरता है। यह कामदेव की लीला है कि वह मरे हुए में भी काम भावना लाकर उसे गहरी खाई में ढकेल कर मार देते हैं।
संपादकीय व्याख्या-कामदेव की विचित्र लीला है। कोई भी कितना तपस्वी या ज्ञानी क्यों
न हो उसे अपने मन में कभी अपने भाव लाकर विचलित कर ही देते हैं। ऐसा कोई जीव इस धरती पर नहीं है जो काम वासना के आधीन हैं होता हो। सच बात तो यह है की इस जीवन का आधार ही काम देव महाराज निर्मित करते हैं। मनुष्य हो या पशु अपनी जाति की नवयौवना को देखते उत्तेजित हो जाता है। यह अलग बात है की मनुष्यों में कुछ लोग कनखियों से देखकर आह भरते हैं पर प्रदर्शित ऐसे करते हैं कि कि वह तो सामान्य दृष्टि से देख रहे है।

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टिप्पणियाँ

  • rahul  On अप्रैल 11, 2009 at 4:57 अपराह्न

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