श्रीसीता जी ने अहिंसा धर्म का प्रतिपादन किया था-आलेख


बाल्मीकी रामायण एक प्राचीनतम ग्रंथ है। देखा जाये तो भगवान श्री रामचंद्र जी का चरित्र अत्यंत प्राचीनतम माना जाता है। वैसे तो हमारे यहां भगवान के अवतार उनसे पूर्व भी हुए हैं पर भगवान श्रीरामचंद्र जी से एक ऐसी सभ्यता प्रारंभ होती है जिसे आचरण की दृष्टि से मजबूत माना जाता है। हम इस समय विश्व में प्रचलित धर्म या विचाराधाराओं को देखें तो उसमें भगवान श्रीरामचंद्र जी का चरित्र सबसे अधिक प्राचीन है। एक बात जो महत्वपूर्ण है वह यह कि विश्व में अहिंसा धर्म की बहुत चर्चा होती है तो उसकी चर्चा भी उसी में मिलती है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी अहिंसा धर्म का प्रतिपादन किया है पर भगवान श्रीरामचंद्र के काल में उनकी पत्नी श्रीसीता जी ने भी अपने पति को अहिंसा धर्म के प्रेरित किया था। इस संबंध में इस लेखक ने एक पाठ लिखा था जो आज प्रस्तुत किया जा रहा है। वैसे अधिकतर लोग कहते हैं कि सभी प्रकार के विचार या धर्म पुरुषों द्वारा सृजित किये गये हैं। उनका यह तर्क भारतीय दृष्टिकोण से तो ठीक नहीं हैं क्योंेकि हमारे यह सभी धार्मिक महानायकों के साथ उनकी स्त्रियों को भी उतनी ही श्रद्धा से देखा जाता है क्योंकि वह अपने समय कोइ निष्क्रिय भूमिका में नहीं रहतीं थीं। यह अलग बात है कि कालांतर में उनको ऐसा प्रस्तुत किया गया। ऐसे में यह पाठ इस आशय से प्रस्तुत किया जा रहा है कि हमारे समाज के निर्माण में स्त्रियों की भूमिका भी कोई कम नहीं है।

इस पाठ को पढ़ने से तो यह लगता है कि अहिंसा धर्म की एक तरह से प्रतिपादक थीं। उन्होेंने भगवान श्रीरामचंद्र जी को अहिंसा धर्म में प्रवृत्त रहने का आग्रह किया। भले ही यह स्त्रियो के सुकोमल भाव के कारण उन्होंने ऐसा किया पर फिर भी अहिंसा धर्म के प्रतिपादकों में उनका नाम सबसे पहले आता है। फिर अनेक ज्ञानी और विद्वान लोग अहिंसा के प्रतिपादकों में उनका नाम पहले क्यों नहीं लेते? श्रीसीता जी की तो स्पष्ट मान्यता थी कि हथियार रखने मात्र से ही आदमी के मन में हिंसा का भाव आता है। फिर उन्होंने अहिंसा का धर्म सही रूप में प्रस्तुत किया कि अपने प्रति अपराध न करने वाले व्यक्ति के प्रति हिंसा अनुचित है। अर्थात जो अपराध करता है उसको दंड देने का वह विरोध नहीं करती। ऐसा विचार शायद ही किसी ने रखा हो। बहरहाल यह लेख पुनः प्रस्तुत है।
वाल्मीकि रामायण से-शस्त्रों का संयोग ह्रदय में विकार का उत्पादक
अपने वन प्रवास के दौरान सुतीक्षण के आश्रम से निकलकर जब श्री राम अपनी धर्म पत्नी सीताजी और भ्राता लक्ष्मण में साथ आगे चले। अपने पति द्वारा राक्षसों के वध करने के प्रतिज्ञा से वह दुखी थीं इसलिए उन्होने इससे हटने के लिए उनसे हिंसा छोड़ने का आग्रह किया और निम्नलिखित कथा सुनाई

पूर्वकाल की बात है किसी पवित्र वन में जहाँ मृग और पक्षी बडे आनंद से रहते थे वहीं एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिए शचिपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण कर हाथ में तलवार एक दिन उनके आश्रम पर आये। उन्होने मुनि के आश्रम में अपना उतम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया। उस शस्त्र को पाकर मुनि प्रसन्नता के साथ उस धरोहर की रक्षा में लग गए, वे अपने विश्वास की रक्षा के लिए वन में विचरते समय भी उसे अपने साथ रखते थे। धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फल-मूल लेने के लिए जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग की साथ लिए बिना नहीं जाते। तप ही जिनका धन था उस मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमश: तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया। फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रोद्र कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से अंतत: उनको में नरक जाना पडा।

इस प्रकार शस्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पडी। जैसे आग का संयोग ईंधन के जलाने का कारण होता है उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।

आगे सीता जी कहतीं हैं कि-‘मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना कारण के ही वन में रहने वाले राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिए। आपका बिना किसी अपराध के किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। अपने मन और इन्दिर्यों को वश में रखने वाले वीरों के लिए वन में धनुष धारण करने का इतना प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें।”

अरण्यकाण्ड के नौवें सर्ग से लिए गया यह वृतांत इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि लोग अस्त्रों-शस्त्रों को शौक के लिए अपने पास भी रखते है और उसके जो परिणाम आते हैं वह बहुत भयावह होते हैं ।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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