ब्लाग लिखने में दहाड़ना कहां होता है,पूछों (टैगों)के फटकारने में बहुत दम होता है-व्यंग्य आलेख


एक वरिष्ठ ब्लागर ने आज एक पाठ लिखा। उसमें उनकी शिकायत थी कि हमारे पाठ दहाड़ते बिल्कुल नहीं है पर पूंछें (टैग) उनमें अधिक लगी होती हैं। वह वरिष्ठ ब्लागर हैं,और उनके प्रति मेरे मन में मैत्री भाव है। सच तो यह है कि वह एक विद्वान व्यक्ति हैं और कम से कम मैं मानता हूं कि वह अध्ययन करने वाले व्यक्ति हैं। यही कारण है कि उनके सभी पाठ ब्लागवाणी पर तत्काल शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। वह एक सज्जन व्यक्ति हैं और इन हिट के बारे में शायद उनका अधिक अध्ययन नहीं है और इसलिये उन्होंने ऐसे विषय पर लिखा जिसके बारे में उनको विस्तृत रूप से जानकारी लेनी चाहिए थी। वह अपने पाठ में तमाम तरह के संशय से भरे लगते हैं। एक तरफ वह लिखते हैं कि सुरेश चिपलूनकर आक्रामक लिखते हैं दूसरी तरफ उनको दहाड़ कम दिखाई देती है। जहां तक मेरा सवाल है मैं तो हमेशा ही लिखता आया हूं कि ऐसं दहाड़ने वाले पाठ लिखने का कोई लाभ नहीं है जो फोरमों पर हिट दिलवायें और आम पाठक के लिये किसी मतलब के न हों। वैसे उन वरिष्ठ ब्लागर के पाठों पर भी बहुत कुछ लिखने लायक मेरे पास है पर वह जल्दी निराश हो जाते हैं, और इसलिये मैं उनका नाम भी नहीं दे रहा। केवल इस पाठ के माध्यम से अपने ब्लाग मित्रों और पाठकों को समझाना भर है कि अंतर्जाल एक बड़ा व्यापक मायाजाल भी है। ब्लाग स्पाट पर सक्रिय ब्लागर लेखक कभी भी वर्डप्रेस के ब्लाग को नहीं समझ पाते। उनको यह पता ही नहीं कि वहां के लेखक क्या कर रहे हैं और क्यों नहीं उनकी परवाह करते? वर्डप्रेस के ब्लागर फोरमों से जुड़े हैं पर उनके लिखने और पढ़ने का दायरा बहुत व्यापक है। अभी एक अंग्रेजी ब्लागर ने मेरा नाम लिये बिना लिखा था कि हिंदी का एक ब्लागर वहां की श्रेणियों और टैगों का सर्वाधिक उपयोग कर रहा है और अन्य ब्लाग लेखकों को ऐसा ही करना चाहिए था। उसका यह पाठ ब्लागस्पाट के ब्लाग नहीं देख सकते थे क्योंकि वह वर्डप्रेस के डेशबोर्ड के बारे में जानते तक नहीं हैं
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मेरे द्वारा उस ब्लाग पर लिखी गयी टिप्पणी
आपने बहुत अच्छा सवाल किया है। दरअसल मैंने ब्लाग के बारे में सवा दो वर्ष पहले मैंने एक पत्रिका में पढ़ा था। उस समय कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन होने के बावजूद मेरा इरादा ब्लाग बनाने का नहीं था क्योंकि मुझे बनाना ही नहीं आता था। जब बनाया तो जो उसमें पढ़ा था उसकी खास बातें मुझे याद रहीं जो यहां आपको संक्षिप्त में बता देता हूं क्योंकि उसमें बताये गये निर्देशों पर ही मैं चल रहा हूं।
1.अपने ब्लाग पर नियमित रूप से लिखते रहें। इस बात की परवाह न करें कि उसकी लंबाई चैड़ाई कितनी है। कुछ पोस्ट पाठकों को नापसंद भी आ सकते हैं, पर आप लिखें।
2.अपने ब्लाग पर अधिक से टैग या श्रेणियां लगायें क्योंकि वही आपके लिखे पाठ को वहां ले जायेंगी जहां आप भेजना चाहते हैं। अगर आप अंग्रेजी में नहीं लिखते तो भी अंग्रेजी के टैग लगायें क्योंकि आम पाठक अंग्रेजी शब्दों से सर्च करता है। जितने आप टैग लगाते हैं उतने ही शब्दों पर आपका ब्लाग खुलता है।
3.टिप्पणियेां की चिंता बिल्कुल न करें न इस बात की परवाह करें कि कितने लोगों ने इसे पढ़ा। आप तो यह सोचिये कि कितने लोग इसे पढ़ने वाले हैंं।
4.अखबार एक दिन बाद कबाड़ हो जाता है और किताबें अल्मारी में बंद हो जाती हैं पर आपका ब्लाग हमेशा ही हवा में तैरता रहेगा। यही सोचकर लिखते रहें।
5.आने वाला समय ब्लाग लेखकों के लिये उज्जवल है।

संयोगवश सुरेश चिपलूनकर और मैं मध्य प्रदेश के हैं, और लिखने में कहां हैं यह तो आप मित्र तय करते हैं। मैं तो लकीर का फकीर हूं। जिस बात का मुझे ज्ञान है उस विषय पर मैं किसी की नहीं सुनता और जिस बात का नहीं हैं उसके बारे में दूसरे का सुनकर या पढ़कर उसी राह पर ही चल पड़ता हूं जब तक कोई विपरीत ज्ञान प्राप्त न हो क्योंकि जीवन में आगे बढ़ने के लिये इतना तो करना ही पड़ता है। अधिक टैग लगाने का कोई लाभ नहीं है अगर यह बात आप या कोई अन्य ब्लाग लेखक मुझे समझा दे तों ऐसा नहीं करूंगा। वैसे जिस ब्लाग को आपने दिखाया है उसमें सबसे अधिक टैग और श्रेणियां हैं ओर पाठक भी अधिक यहीं हैं। आपका लिखा बहुत अच्छा लगा। सच तो यह है कि मैं आपसे भी बहुत सीखता हूं। आपके इस प्रयास की सराहना करता हूं।
दीपक भारतदीप

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मार्च में (शायद आठ मार्च) को उन वरिष्ठ ब्लाग लेखक महोदय ने अपने ब्लाग पर टिप्पणियां न आने पर निराशा व्यक्त की। सारे के सारे ब्लागर टिप्पणी की रस्म अदायगी करने पहुंच गये। आज भी इस समय तक इस 12 टिप्पणियां उनके पास हैं और शाम तक यह संख्या बढ़ जायेगी। यह पाठ जो मै लिख रहा हूं हो सकता है कि एक टिप्पणी के लिये भी तरस जाये। ब्लागवाणी पर उनके पाठ को पांच पसंद लगी हुईं हैं और यह शायद मेरा यह एक को तरस जाये। हां, मैं जाकर एक पसंद का बटन दबाकर आऊंगा। आमतौर से मैं ऐसा नहीं करता। मतलब साफ है कि हम लोग फ्लाप ब्लागर है इसलिये हिट के लिये अधिक टैग लगाते हैं और वह मिलती भी हैं। मेरे पांच पाठ ऐसे हैं जिन्होंने किसी भी एक फोरम पर एक टिप्पणी भी नहीं पायी वह अब दो हजार पाठक संख्या को पार करने वाले हैं। छह ऐसे ही पाठ 1000 हजार को पार करने वाले है। पूरा देश दहाड़ रहा है। टीवी चेनल दहाड़ रहे हैं। मगर होता क्या है जब तक आदमी के दिलोदिमाग पर प्रभाव न हो। अभी चार दिन पहले तक देश के सब टीवी चैनल दहाड़ रहे थे कि अमुक मुक्केबाज स्वर्ण पदक लायेगा मगर हुआ क्या? दहाड़ने से एनर्जी जाती है भइया! शांति से अपनी बात कहने में जो प्रभाव होता है वह दहाड़ने में नहीं होता।

यह आश्चर्य की बात है कि कई बार समझाने के बावजूद मेरे महापुरुषों के संदेश वाले ब्लाग से लोग छेड़छाड़ करते हैं आज भी इस ब्लाग का मनस्मृति का पाठ लिया गया है। अब बताईये क्या मैं उनके संदेशों को लेकर दहाड़ता! फिर भई दहाड़ने वाले पाठ लिखता हूं तो लोग कहते हें कि -’आप तो छोडि़ये कहां चक्कर में पड़ गये।
दिलचस्प बात यह है कि मेरे पाठ को उन्होंने लिंक किया एक पाठक ने उसे पढ़ा है बाकी नौ लोगों ने देखा भी नहीं और टिप्पणी लगा दी। इनमें मेेरे सबसे प्रिय मित्र उड़न तश्तरी ने यह भी नहीं देखा कि वहा क्या पढ़ रहे हैं और क्या लिख रहे हैं। दरअसल मैं पूरे प्रकरण में हंस रहा हूं और ऐसे ही यह पाठ लिख रहा हूं। मैं भी अपनी टिप्पणी लिख कर लौट आया पर बाद में देखा कि मेरे इसी ब्लाग से आठ महीने बाद फिर छेड़छाड़ की गयी है। पिछली जनवरी में जब इस पर पंद्रह पाठ भी नहीं थे इसे पांच अंक की रेटिंग देखकर प्रचारित किया गया था। अब जब मैंने यह पाठ देखा तो लगा कि प्रतिवाद आवश्यक हैं वरना तो कोई भी मेरे इन अध्यात्म ब्लाग से छेड़छाड़ कर सकता है। अंतर्जाल पत्रिका, शब्दलेख सारथी और यह शब्दलेख पत्रिका मेरे तीन ऐसे ब्लाग हैं जिन पर मैं बहुत संवेदनशील रहता हूं इसलिये यह सभी अलग रख दिये हैं इन पर अन्य कोई सामग्री नहीं लिखता। शायद यह पाठ पच्चीस पाठक ब्लागवाणी पर जुटा लेगा क्योंकि इससे अधिक तो मुझे भी छद्म और फर्जी लगेंगे। पसंद शायद एक ही मेरा किया होगा। मुझे फोरमों पर नकली हिट की परवाह भी नहीं हैं। हमारे पाठ ब्लागवाणी पर सिंहासन नहीं मांगते इसलिये अपनी पूंछों पर ही बैठते हैं क्योंकि वह कभी जमीन पर कभी आसमान पर उड़ते है। 195 या 120 हिट प्रतिदिन भला ब्लागवाणी पर कौन दिला सकता है? यह पूंछें ही हैं जो पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। हां देखते हैं जरा उड़न तश्तरी के चरण कमल कहों है? उन्होंने अपनी टिप्पणी में वहां यही मांग रखी थी। फिर उनको यही जवाब है कि महाराज पूंछे अधिक लगाने वाले थोड़े ही दहाडते हैं बल्कि दहाड़ने वाले तो मूंछों को लंबा चैड़ा रखते हैं। मूंछे यानि हिट तो उनके पाठों के पास हैं फिर काहे हमारे पाठों की पूछों से हैरान होते है।

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यह इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’ पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं
1.शब्दलेख सारथी
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • अनूप शुक्ल  On अगस्त 23, 2008 at 7:50 पूर्वाह्न

    अनिल रघुराज का वह लेख मैंने पढ़ा था। उन्होंने जो लिखा उनकी राय से आप इत्तफ़ाक नहीं रखते और अपने तर्क हैं आपके यह ठीक है। टैग की महिमा से आप अच्छी तरह परिचित हैं | लेकिन इत्ते सारे टैग इस पोस्ट से संबंध होता तो टैग विश्वनीय लगे। बहरहाल आपका मत है। आपके इत्ते सारे ब्लाग की बजाय एक ब्लाग होता तो ज्यादा अच्छा रहता पाठकों के लिहाज से। Hindi Education, Hindi friends, Hindi knowledge, Hindi vews, Hindi writing, deshbord, family, hasya vyangy, hindi Personal, hindi abhivyakti, hindi bharat, hindi bhasha, hindi blogging, hindi family, hindi india, hindi life, hindi media, hindi mitra, hindi samachar, hindi shabd, hindi thinking, hindi vyangy, india, inglish, web bhasakar, web dunia, web duniya, web jagaran, web nai duniya, अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, कला, कविता, मस्तराम, व्यंग्य, समाज, सूचना, हास्य आलेख, हास्य-व्यंग्य, हिंदी पत्रिका | Tagged: टिप्पणी, टैग, ब्लागवाणी, जमीन, आसमान, पाठक, सिंहासन, coment, teg, zamin, asman, readar, asan

  • दीपक भारतदीप  On अगस्त 23, 2008 at 8:34 पूर्वाह्न

    अनूप शुक्ल जी
    एक बात बताईये पाठक का टैग से क्या संबंध है? यह टैग कोई संदेश लेकर साथ नहीं जाते बल्कि पाठ को पाठकों को ले जाने के प्रयास में यह लगाता हू। आम पाठक की पाठ में दिलचस्पी होती हैं। टैग को कोई संदेश थोड़े ही देते हैं वह तो एक लिफाफा भर है। इसलिये कौन कैसे टैग लगाता है यह महत्वपूर्ण नहीं है यह आप और मेरी बीच का विषय हो सकता है एक ब्लागर के रूप में। आप अपने चिट्ठा चर्चा में शीर्षक और विषय देखकर ब्लाग लिंक करते हैं न कि टैग की तरफ देखकर। मैं अधिक से अधिक श्रेणियां और टैग इसलिये उपयोग कर रहा हूं क्योंकि मैंने सवा दो साल पहले ही एक लेखक में पढ़ा था कि टैगों का उपयोग पाठ के आगे ले जाने के लिये किया जा सकता है। वैसे भी हम कहां टैग देखते हैं यह तो सब ब्लाग लेखकों ने टिप्पणी में लिखा है कि उनका ध्यान आज तक इस तरफ नहीं गया है। इसी से आप समझ सकते हैं कि आम पाठक का ध्यान इस तरफ नहीं जाता। समस्या वही है कि हमें अपने लिये पाठक ढूंढने हैं और यही एक तरीका उपयोग किया जा सकता है। वर्डप्रेस के जो ब्लाग ब्लागवाणी पर नहीं दिखते वह भी अपने लिये इन टैगों के द्वारा ही पाठक जुटा लेते हैं। हमारा डेशबोर्ड इस बात का प्रमाण है कि लोग इन टैगों के जरिये इन पाठों तक आते हैं। वैसे इस विषय पर मैं अलग से आलेख लिखने वाला हूं क्योंकि अन्य ब्लाग लेखकों को-खासतौर से ब्लागस्पाट के ब्लाग लेखकों को-यह समझाना आवश्यक है। देश में आठ करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं पर हिंदी शब्दों से खोजने वाले कितने हैं यह आप और हम जानते हैं। इसलिये अंग्रेजी के टैग भी उपयोग कर लिये तो कोई बात नहीं है। वैसे इन बातों को लेकर आपस में मन मैला करना ठीक नहीं होगा। आप बताईये क्या मनुस्मृति का श्लोक लेकर दहाडा जा सकता है? मगर यकीन करिये यह खामोश से लगने वाले पाठ व्यूज जुटा रहे हैं उनकी कल्पना आप भी नहीं कर सकते। मेरी मुश्किल यही हो जाती है कि कोई मेरी कविताओं और व्यंग्यों से कोई छेड़छाड़ क्यों नहीं करता? सच कहता हूं मैं उन पर कुछ नहीं कहूंगा। लिखने में मामले में उन पर ही मैं जमकर मनमानी करता हूं। यह तीन ब्लाग तो मैंने केवल आत्मसंतोष के लिये बनाये हैं और पाठक ही मुझे इस पर लिखने के लिये प्रेरित करते हैं। वैसे आप परेशान न हो यह तो चलता रहेगा।
    दीपक भारतदीप

  • nitish raj  On अगस्त 23, 2008 at 8:40 पूर्वाह्न

    जो मैंने अनिल जी के यहां पर कमेंट किया वो ही आप को दे रहा हूं—
    हमेशा ही देखता हूं कि कई लोग अपना एक आर्टिकल दो दो ब्लाग से पोस्ट कर देते हैं।पढ़ने वाला बेवकूफ बन जाता है। लेकिन दीपक जी से एक बात पूछनी चाहिए थी कि क्या ज्यादा टैग लगाने से आर्टिकल के कंटेंट में कुछ फर्क आता है या नहीं। भई आप लिख रहे हैं क्यूबा के बारे में टैग ठेल दिए सारी बड़े बड़े देशों के तो क्या ये धोखाधड़ी नहीं है। मीडिया को हमेशा गाली देते रहेंगे कि न्यूज के नाम पर क्या दिखाते हैं लेकिन खुद पर भी तो झांकें। मुझे ढूंढना है अमेरिका और क्यूबा के आर्टिकल पर पहुंच गया क्या ठगा हुआ महसूस नहीं करूंगा मैं। पूरा पोस्ट पढ़ लूंगा लेकिन अमेरिका का नाम नहीं तो क्या ये जालसाजी नहीं है। लेकिन सजीव सारथी, संजय बेंगाणी और डॉ साहब से बिल्कुल एग्री करता हूं कि उनका ब्लॉग जो लिखें।

    दीपक जी मैं आप को पढ़ता रहता हूं और टिपियाता भी हूं एक दिन आपने मेल करके कुछ ज्ञान भी दिया था मुझे और मैंने उसे माना भी। कभी भी इतने टैग के बारे में नहीं सोचा। लेकिन ये जिज्ञासा हमेशा रही कि मैं पांच-सात शब्द से ज्यादा टैग डाल ही नहीं पाता। आपने उस दिन लिखा कि ब्लॉगस्पॉट से बेहतर है वर्डप्रैस। यहां पर कई दिन तक लोग पढ़ते हैं सिर्फ एक दिन ही नहीं। मैं उस दिन पूछना चाहता था कि तो हम क्या कर सकते हैं और ये कैसे पता चलता है कि कितने पाठक इस पोस्ट को मिले।

    ऐसा नहीं कि लोग सिर्फ यहां पर कुछ को ही पढ़ते हैं और दूसरों को पसंद और पढ़ने से, टिपियाने से भी गुरेज करते हैं। यहां के साथ साथ मेल से जवाब दें तो बहुत ही अच्छा इतने ब्लॉग में खो जाता हूं।

  • पांचो पूरन  On अगस्त 23, 2008 at 9:43 पूर्वाह्न

    गुरु ये सब ठलुये ब्लागर है जो फुरसत से ब्लाग जगत पर अपनी ठेले रहते हैं

    थोड़ा ज्ञान आपको जबरद्स्ती ठांस दिया है, अब आपकी मर्जी है रखें या वापस इनके मुंह पे मारें

    इधर-उधर के अनालिसिस में समय का फिजूल निवेश करने की जगह एक अच्छी सी पोस्ट लिख डालिये, बमय टैग

  • संजय बेंगाणी  On अगस्त 23, 2008 at 11:23 पूर्वाह्न

    यह आपका आपस का मामला है, आपका अपना ब्लॉग है, आप अपनी समझ और रूची के हिसाब से इसका संचालन करें.
    किसी को भी ऊँगली उठाने का अधिकार नहीं है.

    एक अनुभवी साथी के नाते आपको सुझाव दूँगा की भविष्य में सर्च इंजन के माध्यम से खोजते हुए आने वाले पाठको के लिए पोस्ट सम्बन्धी टेग ही लागाए जाने चाहिए. यह मात्र मेरा मत है.

  • Smart Indian  On अगस्त 23, 2008 at 12:02 अपराह्न

    Don’t worry, be happy!
    मस्त रहो, अच्छा लिखते रहो और लोग पढेंगे. इर्ष्या-डाह को इग्नोर करो और अपना काम करते जाओ. शुभकामनाएं!

  • anil pusadkar  On अगस्त 23, 2008 at 1:00 अपराह्न

    neki kar driya me daaal

  • समीर लाल ’उड़न तश्तरी वाले’  On अगस्त 23, 2008 at 2:56 अपराह्न

    इनमें मेेरे सबसे प्रिय मित्र उड़न तश्तरी ने यह भी नहीं देखा कि वहा क्या पढ़ रहे हैं और क्या लिख रहे हैं। दरअसल मैं पूरे प्रकरण में हंस रहा हूं और ऐसे ही यह पाठ लिख रहा हूं।

    –आप पुनः अवलोकन करें. मैं यह नहीं कहता कि ऐसा नहीं हो सकता पर इसकी संभावना कम ही रहती है खासकर जब टिप्पणी बड़ी रहे अन्यथा तो सही है-बढ़िया आदि से भी काम चलाया जा सकता है.

    आप परम मित्र हैं, आपसे संबंधित पाठों पर भी ध्यान न दूँ, ऐसा शायद ही हो मगर यदि मसला लिखने वाले के लेखन से प्रभावित हो तो टिप्पणी तो दी ही जा सकती है. अनिल जी का मसला उस नजरिये से उम्दा है कि आखिर यह टैग क्यूँ- मस्तराम, सिंहासन. इनका आलेख से क्या लेना देना

    किन्तु यह भी सत्य है कि आप का ब्लॉग है. आपका ट्रेफिक है, आप स्वतंत्र है, जैसा जी चाहे और जो आपको अपने ब्लॉग पर ट्रेफिक लाने को उचित माध्यम लगता है, आप कर सकते हैं. सभी कुछ न कुछ तो कर ही रहे हैं.

    मेरी शुभकामनाऐं हमेशा की तरह आपके साथ हैं.

  • सुरेश चिपलूनकर  On अगस्त 23, 2008 at 3:13 अपराह्न

    दीपक जी,
    आपने बहुत कुछ कह दिया है, लेकिन मैं एक पोस्ट में इस मामले के दूसरे पहलू पर रोशनी डालूंगा… क्योंकि आपका और मेरा नाम लिया गया है इसलिये अब…

  • Hari Joshi  On अगस्त 24, 2008 at 5:30 पूर्वाह्न

    टैग अंग्रेजी में व अधिक लगाने में क्या हर्ज है। हमें पाठक चाहिएं आैर नेट के अधिकांश पाठक अंग्रेजी के शब्दों से ही ज्यादा सर्च करते हैं। इतना ध्यान जरूर रखना चाहिए कि आलेख से संबंधित टैग ही लगाए जाएं ताकि पाठक को आकर निराशा न हो। आपकी ये बात सटीक है कि बहुत सारे वरिष्ठ ब्लागर लेख पढ़े बिना ही प्रतिक्रिया दे देते हैं, जिन्हें पढ़कर शर्म आती है।

  • सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी  On अगस्त 24, 2008 at 6:43 पूर्वाह्न

    दीपक जी यह तो बात का बतंगड़ बन गया। टैग के मामले में मेरा ज्ञान आपने बढ़ा दिया। नहीं तो मैं यही समझता था कि जिन शब्दों के बारे में हमारी पोस्ट कुछ खास बता सकने की स्थिति में हो वे शब्द ही उस पोस्ट के टैग हुए। इससे भी सरल मैं यह जानता था कि मेरे अनुसार मेरा लेख किस प्रक्रुति / श्रेणी का है। पाठक घेर कर लाने वाले जुगाड़ के रूप में इसका प्रयोग वास्तव में आपकी पोस्ट पढ़कर मैने जाना है। दिक्कत ये है कि ब्लॉगस्पॉट वाले छः-सात टैग से अधिक की इजाजत ही नहीं दे रहे हैं।

  • सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी  On अगस्त 24, 2008 at 6:45 पूर्वाह्न

    दीपक जी, यह तो बात का बतंगड़ बन गया। टैग के मामले में मेरा ज्ञान आपने बढ़ा दिया। नहीं तो मैं यही समझता था कि जिन शब्दों के बारे में हमारी पोस्ट कुछ खास बता सकने की स्थिति में हो वे शब्द ही उस पोस्ट के टैग हुए। इससे भी सरल मैं यह जानता था कि मेरे अनुसार मेरा लेख किस प्रक्रुति / श्रेणी का है, इसका टैग यही बताता है। पाठक घेर कर लाने वाले जुगाड़ के रूप में इसका प्रयोग वास्तव में आपकी पोस्ट पढ़कर मैने जाना है। दिक्कत ये है कि ब्लॉगस्पॉट वाले छः-सात टैग से अधिक की इजाजत ही नहीं दे रहे हैं।

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