मनुस्मृतिःअर्थ और काम में लिप्त न होने वालों को ही धर्म प्रचार का अधिकार


१.धर्मोपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं है। जो व्यक्ति विषयों में आसक्ति रखता उसकी धर्म में रूचि हो ही नहीं सकती और होगी तो दिखावे की। धर्म तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए धर्म ग्रंथों का ज्ञान ही सर्वोच्च प्रमाण है।
२.वेदों में जहाँ दो कथनों में विरोध हो वहाँ विद्वान लोगों को बराबर महत्व देते हुए उचित निर्णय लेना चाहिए।
३.धर्म के चार लक्षण हैं-१.वेदों द्वारा प्रतिपादित २. स्मृतियों द्वारा अनुमोदित ३. महर्षियों द्वारा आचरित 4. जहाँ किसी विषय में एक से अधिक मत हों वहाँ उस धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रिय। इन कसौटियों पर सिद्ध होने वाला ही प्रामाणिक धर्म है।

यह इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका’ पर प्रकाशित है। इस ब्लाग से संबद्ध अन्य यह ब्लाग भी संबद्ध हैं
1.शब्दलेख सारथी
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • balkishan  On अगस्त 9, 2008 at 6:46 पूर्वाह्न

    मैं सहमत हूँ.
    लेकिन चूँकि मैं अर्थ और काम में बुरी तरह लिप्त हूँ इसलिए कमेन्ट भी नहीं करूँगा.

  • nitish raj  On अगस्त 9, 2008 at 7:30 पूर्वाह्न

    मैं बालकिश्न जी से सहमत हूं लेकिन सोचता हूं ऐसे तो कोई भी कमेंट नहीं कर पाएगा। सभी तो लिप्त हैं। मैं हूं चाहे आप।

  • दीपक भारतदीप  On अगस्त 9, 2008 at 8:01 पूर्वाह्न

    नीतिश राज जी
    टिप्पणी करना कोई धर्म प्रचार नहीं है। मैं भी कोई यह लिखकर कोई धर्म प्रचार थोड़े ही कर रहा हूं। यह तो एक तरह का आपसी सत्संग है और इसके लिये कोई प्रतिबंध नहीं है। यह सत्संग ही भारतीय समाज की प्राणवायु है जिससे लोग दूर हट गये हैं और इसलिये लोगों का मानसिक तनाव बढ़ रहा है। वैसे आप दोनों की टिप्पणियां से मुझे हंसी और प्रसन्नता का अनुभव हुआ इसके लिये आपका आभारी हूं।
    दीपक भारतदीप

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