आसन और प्राणायाम सिखाने वाले शिक्षक अध्यात्म गुरू की श्रेणी में नहीं आते-आलेख


भारतीय योग एक प्राचीनतम विद्या मानी जाती है जिसके जनक महर्षि पतंजलि हैं। यह एक बृहद विषय है और भगवान श्रीकृष्ण ने इसकी उपयोगिता को अपने श्रीगीता के संदेश में प्रतिपादित किया है। योग का एक हिस्सा शारीरिक आसन और प्राणायाम हैं न कि संपूर्ण रूप से से यही योग है-यह बात नहीं समझना चाहिये। चूंकि योगासन और प्राणायाम शुरुआती चरण में किये जाते हैं तो उससे शरीर में स्फूर्ति और मन में प्रसन्नता का आभास होता है। जो लोग इसे बचपन से ही प्रारंभ करते हैं वह प्रतिदिन इसकी अनुभूति करते हैं इसलिये उनके लिये यह कोई नई चीज नहीं होती पर जो बड़ी उम्र मेें अपने बीमारियों के बाद जब इसे शुरू करते हैं उनको इसकी अनुभूति तीव्रतर होती है और वह इसका प्रचार अधिक करते हैं। उनकी प्रसननता को अर्थशास्त्र के उपयोगिता हृास नियम से जोड़ सकते हैं जिसमें किसी भूखे को पहली रोटी से जो शांति मिलती है वह अधिक होती है और दूसरे से कम और यह क्रम से कम होती जाती है-यही कारण है कि अनेक योग शिक्षक उसका लाभ उठाकर अपने आपको अध्यात्मिक गुरुओं के रूप में प्रचारित करवा रहे है।। बचपन से योग साधना करने वाले इसलिये इसका प्रचार नहीं करते जबकि आजकल योग साधना की शिक्षा का व्यवसाय करने वालों के यहां शिविरों में लाभ उठाकर के बीमारियों, मानसिक तनावों और परेशानियों से उबरने लोग इस पर अधिक बोलते हैं।

योग साधना के दो उपयोग हैं। एक तो यह जीवन जीने की कला है और दूसरा वह आदमी को स्वस्थ करने के लिये रोग की एक दवा भी है। अधिकतर योगाचार्य इसका दवा की तरह उपयोग कर रहे हैं और उनकी शिक्षायें केवल योगासन और प्राणायाम तक ही सीमित हैं अतः अच्छे योग शिक्षक होने के बावजूद उन्हें अध्यात्मिक गुरु मानना ठीक नहीं है। अध्यात्म एक बृहद विषय है। इसमें ध्यान के साथ प्रार्थना करते हुए अपने अंदर स्थित जीवात्मा से संपर्क करना भी शामिल है। अध्यात्मक में सांसरिक विषयों की चर्चा कतई नहीं होती। इधर यह दिखाई दे रहा है कि अति आत्मविश्वास से भरे योगशिक्षक आसन और प्राणायम कराते हुए ही ‘समाज, राष्ट्र, परिवार तथा आर्थिक विकास जैसे सांसरिक विषयों की बात कर अपने आपको एक अच्छा वक्ता साबित करने का भी प्रयास कर रहे हैं ताकि वह टीवी और समाचार पत्रों में नाम कमा सकें। सच तो यह है कि योगासन तथा अन्य साधनायें चित को एकाग्र रखते हुए की जानी चाहिए नहीं तो उनका पूरा लाभ समाप्त हो जाता हैं। सुबह वक्त केवल अध्यात्म के लिये है और उसमें सांसरिक विषयों पर बोलना तो दूर विचार तक नहीं करना चाहिये।

इसके बावजूद ऐसे शिक्षकों से योगासन और प्राणायाम सीखना चाहिये-दक्षिणा में रूप में वह वैसी भी अग्रिम धन ले लेते है। ये आसन सीखने के बाद सुबह उनको एकांत में करना चाहिये। योगासन करते समय अपने देह के समस्त अंगों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिये। सबसे आखिर में औंकार का ध्यान करते हुए निरंकार की तरफ जाना चाहिये। इसके लिये आवश्यक है कि भृकुटि पर अपना ध्यान रखें। ध्यान ही वह शक्ति है जो योगासन से अर्जित ऊर्जा का संचय कर पूरे शरीर को वितरित करता है और हम मन और तन से प्रसन्नता अर्जित करते हैं।
अध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ है स्वयं और परमात्मा को जानना और यह स्वस्थ तन और मन के रहते ही संभव है। योगासन एक पहुंच मार्ग है अध्यात्मिक ज्ञान तक पहुंचने का न कि अध्यात्म।
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टिप्पणियाँ

  • paramjitbai  On जुलाई 18, 2008 at 5:17 पूर्वाह्न

    दीपक जी,सही लिखा योग और अध्यात्म दोनों अलग विषय हैं।अच्छा ज्ञानवर्धक लेख है।आभार।

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