रहीम के दोहे:परमात्मा का महत्व स्वीकार करना चाहिए


रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभु की धाक

दांत दिखावत दीन है, चलत घिसावत नाक

कविवर रहीम कहते हैं की हाथी के समान किसी में शक्ति नहीं है परन्तु वह भी परमात्मा के महत्त्व को स्वीकार करता है और दोनों दंत दिखाता हुआ पृथ्वी पर नाक रगड़कर चलता है।

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत

चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत

कविवर रहीम कहते हैं की कठोर चिंताओं के से अपने को मुक्त कर अपने चित पर नियंत्रण करो क्योंकि चिता तो प्राणहीन प्राणी को जलाकर राख कर देती है परन्तु चिंता तो जिंदा प्राणी को ही जलाकर भस्म कर देती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई लोगों अपने देहाभिमान के साथ अपने दौलत का भी अहंकार होता है और वह ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। इसके अलावा कुछ लोग भगवान की भक्ति तो करते हैं पर मन में उसके प्रति विश्वास का भाव नहीं होता। भक्ति करने के बाद अपनी दिनचर्या में ऐसे लिप्त हो जाते हैं जैसे कि वह स्वयं ही कर्ता हों। उनकी मान्यता यह है कि ईश्वर ने हाथ पांव दिये हैं बुद्धि दी है तो कर्म तो हमें ही करना है तभी तो फल मिलेगा। यह विचार दर्शाता है कि उनमें ईश्वर के प्रति विश्वास नहीं है। कर्म करना है यह सत्य पर अपने अंदर यह विश्वास भी बनाये रखना है कि दाता तो वही परमात्मा है। कोई अमीर हो या गरीब काम सबके हो जाते हैं पर भ्रम यह रहता है कि अमीर पर भगवान की कृपा है और गरीब पर नहीं। यह भाव भक्ति से परे करता है क्योंकि इससे अहंकार और कुंठा का भाव पैदा होता है।

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