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पतंजलि योग सूत्र-स्व का ज्ञान संयोग है (patanjali yoga sootra-swyan ka gyan hi sanyog hai)


                          स्वस्वामिशक्त्यो स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः।।
                 “जब स्व तथा स्वामी की शक्ति के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो उसे संयोग कहा जाता है।”
           हमारी सृष्टि के दो रूप हैं एक तो भौतिक प्रकृति दूसरा अभौतिक जीवात्मा। प्रकृति स्वयं एक शक्ति है तो जीवात्मा भी अपना स्वामी स्वयं है। मनुष्य इस प्रथ्वी पर पंच तत्वों से बनी अपनी देह के साथ विचरण करते हुए सांसरिक पदार्थों का उपभोग करता है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब कोई मनुष्य तत्वज्ञान प्राप्त करता है तब वह दृष्टा की तरह अपना जीवन व्यतीत करता है। अपनी इंद्रियों के साथ कर्म करते हुए वह अपने कर्तापान का अहंकार नहीं पालता।
               यहां अज्ञानवश हर आदमी अपने इर्दगिर्द स्थित भौतिक संसार के स्वामी होने का भ्रम पाल लेता है। वह नहीं जान पाता कि उसकी देह में स्थित मन, बुद्धि और अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जो उसे दैहिक स्वामित्व का बोध कराकर भ्रमित करते हुए इधर से उधर दौड़ाती हैं। यही कारण है कि भौतिक देह और अभौतिक जीवात्मा का कभी आपस में मेल नहीं  हो पाता। आदमी मन को ही आत्मा समझने लगता है।
           जब योग साधना, ध्यान, स्मरण तथा भक्ति से कोई मनुष्य इस सत्य को जान लेता है तब उसे संयोग कहा जाता है वरना तो सारा  संसार दुर्योग का शिकार होकर जीवन तबाह कर लेता है। दैहिक प्रेम क्षीण हों जाता है तब घृणा या उदासीनता पनपती है। उसी तरह स्वार्थ की मित्रता का क्षरण भी जल्दी होता है। सकाम भक्ति में कामना पूर्ण न होने पर मन संसार से विरक्त होने लगता है मगर जो तत्वज्ञान को जान लेते हैं वह कभी हताश नहीं होता। वह ऐसे संयोग देखकर मन  में  क्षणिक   प्रसन्नता होती  है जो अंततः दुर्योग का कारण बनती है। 
         यह संसार संकल्प  और बने संयोग और दुर्योग का खेल है। मन में जैसा संकल्प होगा वैसी ही हमारी दुनियां होगी।  सीधी मत कहें तो मन का योग ही हमारे सामने दुर्योंग और संयोग बनाता है। हम अपने विचार और आचरण पवित्र रखेंगे तो हमारे संकल्प भी पवित्र होंगे और वैसे ही हमारे सामने दृश्य उपस्थित होंगे और वैस ही लोग हमारे संपर्क में आयेंगे।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

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मेहमानवाजी, अमेरिका और भारत-हिन्दी व्यंग्य


मुंबई फिल्मों के उस अभिनेता का वह विज्ञापन अंग्रेजी में अनुवाद कर अमेरिका में भी दिखाया जाना चाहिए क्योंकि उसकी जरूरत भारत में कम वहीं ज्यादा दिखती है जहां 1655 भारतीय छात्रों के पांव में रेडियो कालर बांध दिया गया है। वैसे ही रेडियो कालर जो भारत में संरक्षित वन्य क्षेत्रों में पशुओं की गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिये पहनाये जाते हैं। टीवी पर मुंबईया फिल्मों के इस अभिनेता का विज्ञापन आता है जिसमें वह लोगों को समझाता है कि विदेश से आये लोगों को मेहमान मानकर उनकी इज्जत करना चाहिए। एक जगह तो वह यह भी बताता है कि यह तो हमारी रोजी रोटी का आधार हैं।’’
यह अभिनेता पिछले कई दिनों से अपनी फिल्में अमेरिका में ऑस्कर के लिये भेज रहा है मगर अभी तक उसे वह नहीं मिला। वैसे देखा जाये तो वह क्या सारे अभिनेता विभिन्न पूंजीपतियों के प्रथक प्रथक समूहों का मुखोटा है जो क्रिकेट हो या फिल्म उससे कहीं न कहीं जुड़ जाते हैं। अवसर मिले तो राजनीति में भी चले आते हैं।
ऐसे में उस अभिनेता के बारे में यह माना जा सकता है कि वह किसी पूंजीपतियों के समूह का मुख हैं जो अमेरिका को खुश करना चाहता है। हम ऐसे ही उसके अज्ञात समूह के रणनीतिकारों को यही सलाह देंगे कि उसका यह मेहमानवाजी का उपदेश अब अमेरिका में भी दिखायें। हां, हम यह नहीं कह सकते कि इससे उनके अमेरिकी आका कहीं नाराज न हो जायें, और अभी तक ऑस्कर से उस अभिनेता की फिल्म विचार के लिये अपने यहां आने देते हैं फिर संभव है कि यह सुविधा भी बंद कर दें।
किस्सा यह है कि आंध्र प्रदेश के 1655 छात्र अमेरिका में स्थापित के विश्व विद्यालय में पढ़ने के लिये गये। इसके लिये उनको वीजा दिया गया जो कि अमेरिकी सरकार के जिम्मेदारी अधिकारियों बिना मिलना संभव नहीं था। पता लगा कि वह विश्वविद्यालय या यूनिवर्सिटी फर्जी है-यह भी बताया गया कि उसका पंजीयन नहीं हुआ इसलिये छात्रों का वीजा रद्द कर दिया गया। अमेरिकी अधिकारियों फर्जी विश्वविद्यालय के लिये वीजा कैसे जारी किया, इसकी जानकारी अभी तक नहीं मिला पर यह तय है कि कहीं न कहीं भ्रष्टाचार हुआ है।
यही छात्र जब अमेरिकी अधिकारियों से शिकायत करने पहुंचे तो उनको रेडियो कॉलर पहना दिया गया कि ताकि उन पर नज़र रखी जा सके। यह अलग से चर्चा का विषय हो सकता है कि अमेरिका में छात्र गये क्यों? क्या वह शैक्षणिक वीजा की आड़ में वहां कोई अपने रहने का जुगाड़ करना चाहते थे?
एक सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें अमेरिकी अधिकारी स्वयं शामिल हैं इसलिये वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। दूसरा यह भी कि जो लोग केवल भारतीयों को फर्जी काम करने वाला समझते हैं वह भी जान लें कि यह काम अमेरिकी भी करते है। 1655 भारतीय छात्रों के साथ पशुता का व्यवहार होने के लिये जहां भारत में अमेरिकी मोह तथा वहां के अधिकारियों के ईमानदार होने का भ्रम हो तो जिम्मेदार है पर साथ वहां के प्रशासन की पोल भी खोलता है।
भारत में विदेशी पर्यटकों को बड़ी हैरानी से देखा जाता है पर उतना दुर्व्यवहार नहीं होता जितना हमारे उन अभिनेता के विज्ञापन में दिखाया जाता है। यह अलग बात है कि सवारी आदि में उनसे पैसा ज्यादा ऐंठ लिया जाता हो पर यह दुर्व्यवहार की श्रेणी में नहीं आता। हम तो यहीं कहेंगे कि मेहमानवाजी के बारे में इस देश से ज्यादा विदेशियों को सिखाने की जरूरत है। यह भी स्पष्ट करें कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशों पर आधारित है फिर भी वहां भारतीयों का सम्मान नहीं है जबकि भारत में केवल सभ्य तबके में ही अमेरिका के प्रति आकर्षण है पर अर्थव्यवस्था का आधार अभी भी यहां की कृषि ही है। मतलब यह कि अगर विदेशी सहारा न हो तो कई लोगों के कमीशन बंद हो जायेंगे। स्विस बैंकों के खाते भी खाली हो सकते हैं पर भारतीय बैंक अपने देश की दम पर टिके रहेंगे। ंफिर भी विदेशी सैलानियों या नागरिकों के साथ ऐसी वैसी बातें नगण्य ही होती हैं। ऐसे में उस अभिनेता के अभिनीत विज्ञापन को अमेरिका और आस्ट्रेलिया में भी दिखाया जाये तो कुछ बात बने।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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मेहमानवाजी का विज्ञापन अमेरिका में दिखायें-हिन्दी लघु व्यंग्य (mehmanwaji aur america-hindi vyangya)

प्रचार माध्यम अपनी लोकप्रियता खो रहे हैं-हिन्दी लेख (prachar madhyam ki lokpriyata-hindi lekh)


‘दिल्ली में लड़कियां सुरक्षित नहीं, आज फिर हुई एक कोशिश  गैंग रैप की!’
‘गैंग रैप की घटना को इतने दिन हो गये हैं पर पुलिस अभी भी कुछ नहीं कर पाई है।’
दूरदर्शन चैनलों पर यह विलाप अनेक बाद सुनाई देता है-यहां यह भी उल्लेख कर देते हैं कि इनके मीडिया या प्रचार कर्मियों के लिये देश का मतलब दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई, अहमदाबाद, बैंगलोर तथा कुछ अन्य बड़े शहरों ही हैं, बाकी तो केवल उनके लिये कागजी नक्शा  भर हैं।
वह बार बार पुलिस पर बरसते हैं। अभी एक गैंग रैप के मामले में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया, उनमें से दो तो इस तरह की घटना में दूसरी बार शामिल हुए थे। अब सवाल यह है कि पुलिस क्या करे?
आम तौर से ऐसी अनेक घटनायें होती हैं जब पुलिस के साथ मुठभेड़ में खूंखार आतंकवादी तथा अपराधी मारे जाते हैं तो यही चैनल वहां मानवाधिकारों की दुहाई देते हुए पहुंच जाते हैं। इन आतंकवादियों और अपराधियों पर इतने अधिक मामले दर्ज होते हैं जिनकी संख्या भी डरावनी होती है। मतलब यह कि भारतीय संविधान की परवाह तो ऐसे आतंकवादी और अपराधी कभी नहीं करते। उनका अपराध सामान्य नहीं बल्कि एक युद्ध की तरह होता है। उनका कायदा है कि जब तक वह जिंदा रहेंगे इसी तरह लड़ते हुए चलते रहेंगे। कानून या संविधान के प्रति उनकी कोई आस्था नहीं है। ऐसे युद्धोन्मादी लोगों को मारकर ही समाज को बचाया जा सकता है। पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारे गये अनेक अपराधियों तथा आतंकवादियों के परिजन पुलिस पर कानून से बाहर जाने का आरोप लगाते हैं पर अपने शहीद का युद्धोन्माद उनको नज़र नहीं आता। उनको ही क्या बल्कि अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी यह पसंद नहीं आता।
अब संविधान की बात करें तो उसमें आस्था रखना सामान्य इंसान के लिये हितकर है इसमें शक नहीं है। देश के अधिकतर लोग कानून को मानते हैं। इसका प्रमाण है कि एक सौ दस करोड़ वाली जनंसख्या में अधिकतर लोग अपने काम से काम रखते हुए दिन बताते हैं इसलिये ही तो शांति से रहते आज़ाद घूम रहे हैं। मगर जिनकी आस्था नहीं है वह किसी भी तरह अपनी हरकत से बाज़ नहीं आते। अगर उनका अपराध कानून के हिसाब से कम सजा वाला है और वह नियमित अपराधी भी नहीं है तो उनके साथ रियायत की जा सकती है पर जिन अपराधों की सजा मौत या आजीवन कारावास है जबकि अपराधी उस पर निरंतर बढ़ता ही जा रहा है तो उसे मारने के अलावा कोई उपाय बचता है यह समझ में नहीं आता।
इस संसार में हर समाज, वर्ण, धर्म, देश, जाति तथा शहर में अच्छे बुरे लोग होते हैं पर यह भारत में ही संभव है कि उनमें भी जाति और धर्म की पहचान देखी जाती है और प्रचार माध्यम या मीडिया यह काम बड़े चाव से करता है। दिल्ली में धौलकुंआ गैंग रैप में गिरफ्तार अभियुक्तों को पकड़ लिया गया। जब पुलिस उनको पकड़ने गयी तो वहां उसका हल्का विरोध हुआ। अगर विरोध तगड़ा होता तो संभव है कि हिंसा की कोई बड़ी वारदात हो सकती थी। ऐसे में एकाध अभियुक्त मारा जाता तो यह मीडिया क्या करता? एक बात यहां यह भी बता दें कि उस मामले में पुलिस के मददगार भी वहीं के लोग थे। यानि किसी एक समुदाय को अपराधी घोषित नहीं करना चाहिए पर मारे गये अपराधी को समुदाय के आधार पर निरीह कहकर उसे शहीद कहना भी अपराध से कम नहीं है।
चाहे कोई भी समुदाय हो उसका आम इंसान शांति से जीना चाहता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कोई भी अपराधी या आतंकवादी को पसंद नहीं  करता चाहे उसके समुदाय का हो? ऐसे में समुदाय के आधार पर अपराधियों के प्रति प्रचार माध्यमों को निकम्मा साबित कर रहा है। अभी एक टीवी चैनल के प्रमुख संपादक ने कहा था कि वह कार्पोरेट जगत की वजह से बेबस हैं। क्या इसका आशय यह मानना चाहिये कि है कि यही कार्पोरेट जगत उनको समुदाय विशेष के अपराधियों का महिमा मंडन के लिये बाध्य कर रहा है? क्या उनके विज्ञापनदाताओं का संबंध तथा आर्थिक स्त्रोत विश्व के कट्टर धार्मिक देशो से जुड़े हैं जो आतंकवादियों और अपराधियों को धर्म से जोड़कर देखते हैं?
बहरहाल एक बात निश्चित है कि किसी जघन्य मामले में अधिक लिप्त होने वाले अपराधी को सामान्य प्रवृत्ति का नहीं माना जा सकता बल्कि वह तो एक तरह युद्धोन्मादी की तरह होते हैं जिनके जीवन का नाश ही समाज की रक्षा कर सकता है। दिल्ली ही नहीं बल्कि पूरे देश में लड़कियों के साथ बदसलूकी घटनायें बढ़ रही हैं। दिल्ली में अनेक लड़कियों को ब्लेड मारकर घायल कर दिया गया है। अगर वह अपराधी कहीं पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया तो मीडिया क्या करेगा?
मुठभेड़ के बाद उसका समुदाय देखेगा फिर इस पर भी उसका ध्यान होगा कि कौनसी लाईन से उसको लाभ होगा। कानून के अनुसार कार्यवाही न होने की बात कहेगा? अगर कहीं ब्लेड मारने वाला जनता के हत्थे चढ़ गया और मर गया तो लोगों के कानून हाथ में लेने पर यही मीडिया विलाप करेगा। ऐसे में लगता है कि टीवी चैनलों पर कथित पत्रकारिता करने वाले लोग किसी घटना पर रोने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। वह सनसनी या आंसु बेचते हैं। कभी चुटकुले बेचकर हंसी भी चला देते हैं। कोई गंभीरता न तो उनके व्यवसाय में है न ही विचारों में-भले ही कितनी भी बहसें करते हों। इन सबसे डर भी नहीं पर मुश्किल यह है कि देश का संचालन करने वाली एजेंसियों में भी आखिर मनुष्य ही काम करते हैं और इन प्रचार माध्यमों का प्रभाव उन पर पड़ता है। उनको इन प्रचार माध्यमों पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि समाज या देश को लेकर उनके पास कोई गंभीर चिंतन इन प्रचार माध्यमों के पास नहीं है। अतः हर प्रकार के अपराध के प्रति उनको अपने विवेक से काम करना चाहिए क्योंकि इस देश में ईमानदार, बहादुर तथा विवेकवाद प्रशासनिक  अधिकारियों  की ही आवश्यकता है और मीडिया तो केवल हल्के प्रसारणों के लिये है। एक घंटे के कार्यक्रम में पौन घंटा क्रिकेट तथा फिल्मों पर निर्भर रहने वाले इन प्रचार माध्यमों से किसी बौद्धिक सहायता की आशा नहीं करना चाहिए।
अगर एक सवाल किसी मीडिया या प्रचार कर्मी से किया जाये कि‘आखिर आप अपने समाचार या चर्चा से क्या चाहते हैं?’
यकीनन उसका एक ही जवाब होगा-‘हम कुछ नहीं चाहते सिवाय अपने वेतन तथा आर्थिक लाभ के। हमें समाचार या बहस समय पास करने के लिये कुछ न कुछ तो चाहिए ताकि चैनल को विज्ञापन मिलते रहें। बाकी जवान मरे या बूढ़ा, हमें तो हत्या से काम, छोरा भागे या छोरी, हमें तो बस सनसनीखेज खबर से काम।’
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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आधुनिक लोकतंत्र में-हास्य कविता (adhunik lotantra mein-hasya kavita)


आया फंदेबाज दनदनाता
और बोला
‘‘दीपक बापू,
लाया हूं तुम्हारे ब्लाग हिट होने का नुस्खा,
नहीं होना मेरी बात पर गुस्सा,
तुम अब बेईमानों के दुष्कर्म पर
लिखा करो जोरदार हास्य कविता,
जला दो भ्रष्टाचार की चिता,
एक दिन तुम बहुत बड़े
साहित्यकार बन जाओगे,
तब मेरी सलाह के गुण गाओगे,
आजकल सभी जगह भ्रष्टाचार की
चर्चा है,
कई लोगों के घर में आमदनी से
अधिक बहुत ज्यादा खर्चा है,
तुम बेईमानी पर लिख कर प्रसिद्ध हो जाओ।’’

सुनकर पहले सोच में पड़े दीपक बापू
फिर बोले-
‘‘कमबख्त जमाने के साथ चलना चाहिए,
न कि वह चले आगे आप पीछे आईये,
पहले कहा जाता था यथा राजा तथा प्रजा
आधुनिक लोकतंत्र में यह उलट है
यथा प्रजा तथा राजा,
आम इंसानों को पसंद आता
वही शख्स
जिसके सिर पर ताज है,
नहीं देखना चाहता कोई भी
छिपा जो इसके पीछे राज है,
भ्रष्टाचार ने इतना कमजोर कर दिया है समाज,
बेईमानी ताकत बन गयी है आज,
बेदाग आदमी भला
क्या अपनी जिंदगी बनायेंगे,
अपने बच्चों की शादी को तरस जायेंगे,
चरित्र पर दाग बन गये हैं
कमीज में सोने की बटन की वजह,
बेदाग की जिंदगी में रह जाती है कलह,
नहीं रहा अब वह समय
जब ईमानदार से लोग सीखने जाते हैं,
आजकल बेईमान ही गुरु हो जाते हैं,
सच बात तो यह है कि
भूल जाओ बेईमानी और भ्रष्टाचार पर
कविता लिखने की बात,
पुरानी मान्यताऐं हैं एक तरह से अंधेरी रात,
आओ,
ईमानदारी और सज्जनों पर
हास्य कविता सुने और सुनायें,
उनका जीभरकर मजाक उड़ायें,
भ्रष्टाचार ज़माने के खून में आ गया है,
शिष्टाचार की तरह छा गया है,
इसलिये ईमानदारी का मज़ाक हम उड़ायेंगे,
तब अधिक लोग हमसे जुड़ जायेंगे,
भ्रष्टाचारी और दुष्ट
पा रहे सभी जगह सम्मान,
नैतिकता पर उपदेश देकर
दिखाते सभी जगह अपनी शान,
बेदाग तो अपने घर में अजनबी हो जाते हैं,
दागदार सभी जगह चैन से सो पाते हैं,
हम से कह दी
भ्रष्टाचार और बेईमान पर हास्य कविता लिखने की बात,
कहीं अन्यत्र मत कहना
वरना कोई भी मारेगा जोर से लात,
ईमानदारी पर कटाक्ष कर
सभी जगह सम्मान पाओगे,
बेईमानों और गद्दारों पर छींटाकशी की
तो डंडे खाओगे,
हमारी बात अच्छी तरह समझ जाओ,
ऐसा न हो कि फिर पछताओ,
भीड़ में भी मूर्ख सिद्ध हो जाओगे।’’
…………………….

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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बाज़ार का बिग बॉस-हिन्दी व्यंग्य (bazar ka bigg boss-hindi satire)


श्रीमद्भागवत गीता में एक दो वाक्य समझ में नहीं आता था। अब समझ में आने लगा है। वह क्या है, यह लिखें कि नहीं तय नहीं कर पाये। बहरहाल अब समाज में अच्छे, बुरे, सभ्य, असभ्य तथा विख्यात तथा कुख्यात का अंतर मिट गया है या मिटा दिया गया है यह कहना चाहिए। एक आम आदमी के रूप में जब कोई बदलाव करने की शक्ति का अपने अंदर अभाव महसूस हो तो फिर ‘सब चलता है’ कि तर्ज पर मौन रहना ठीक है। अब हालत यह है कि गुस्सा नहीं  आता। हर बात पर व्यंग्य ही छूटता है। समाज के शिखर पुरुष तो अब जैसे समर्पण की मुद्रा में है और आम आदमी हमेशा की तरह बेबस है। बीच में खड़े पात्रों ने सारी दुनियां की सामाजिक, अर्थिक, राजनीतिक, कल, साहित्य तथा धार्मिक क्षेत्रों में सक्रिय संस्थाओं को अपने हाथ में ले लिया है। कार्ल मार्क्स ने जिस पूंजीवाद की कल्पना की होगी उससे ज्यादा खूंखार वह है। इससे लड़ने के लिये जो उन्होंने पूंजी किताब लिखी उसके ध्वज वाहक होने का दिखावा करने वाले ही उसी पूंजीवाद के सरंक्षक हो गये हैं।
बात लंबी नहीं खीचेंगे क्योंकि आज के समय संक्षिप्तीकरण आवश्यक है। किसी को प्यार की भाषा बोलनी है तो वह बेमतलब है क्योंकि न वह अब आकर्षित करती है न सनसनी फैलाती है पर उससे ज्यादा वह लंबा वाक्य बोलने पड़ते हैं। इसलिये गालियां देकर भी प्रेम किया जा रहा है क्योंकि वह संक्षिप्त होने के साथ ही सनसनी फैलाने वाली होती हैं। लोगों के सामने या पर्दे पर लड़ो और बाहर आकर गले में बाहें डालकर बीयर या वाइन पियो। इधर हम बिग बॉस देखने लगे थे कि आखिर माज़रा क्या है? ऐसा क्या है कि प्रचार माध्यमों को उसकी जरूरत पड़ गयी है।
दरअसल बिग बॉस कोई कार्यक्रम नहीं बल्कि प्रचार माध्यमों को साक्षात्कार दिलाने तथा विज्ञापन जगत को नये चेहरे दिलवाने वाला एक फोरम भर है। चेहरे भी कौनसे? जो पहले अपने अपराधिक कृत्य अथवा मूर्खतापूर्ण गतिविधियों संलिप्पता के कारण बदनाम हुए हों। उन पर फैशियल पोतकर उनको फिर लोगों के सामने पेश करने का काम कर रहा है बिग बॉस!
पिछले चार पांच दिन से टीवी के समाचार चैनलों में जो साक्षात्कार आ रहे हैं वह बिग बॉस से निकले लोग हैं। पहले तो बिग बॉस के कार्यक्रम के समय पर सरकारी नियंत्रण पर विवाद हुआ तो तीन चेहरे ऐसे आये जो बिग बॉस से निकले थे। तीन दिन तक वही चेहरे हर टीवी चैनल पर दिखाई दिये। फिर एक टीवी चैनलों का स्टार समाचार चैनल लाया एक स्वर्गीय नेता के बेटे को साक्षात्कार के लिये। इसी समाचार चैनल की तीन महिला पत्रकारों ने एक सप्ताह पहले ही बाबा रामदेव का साक्षात्कार लिया था। उसके बाद  उसी मीडिया  के बेटे को लाया गया। आज तक समझ में नहीं आया कि स्वर्गीय नेता के उस बेटे की खासियत क्या है?। उसे मीडिया के बेटे क्यों कहा? दरअसल टीवी के ही एक चैनल पर इंसाफ धारावहिक की संचालिका के स्वयंवर कार्यक्रम की पटकथा का सृजन करने का दावा करने वाले एक लेखक को धमकाते हुए समर्थकों ने उस संचालिका के लिये मीडिया की बेटी शब्द का ही उपयोग किया गया था। सो अब हम यह मान कर चल रहे हैं कि पर्दे के पीछे शायद इन लोगों के लिये ऐसे ही संबोधन होते होंगे।
हैरानी इस बात की रही कि बिग बॉस से एक सुपात्र तथा एक सुपात्रनी के
वहां से निकाले जाने की बात टूट रही खबर के रूप में दिखाई जाने लगी। यह दोनों ही विवादास्पद थे-केवल टीवी चैनलों के प्रसारणों में यह बात समझें आम जनता तो इनको जानती ही नहीं। उससे पहले एक विवाहिता जोड़े ने जब बिग बॉस में दोबारा शादी पहली कहकर अपना स्वांग रचा तो उस पर विवाद हुआ या कहें कि प्रचार के लिये करवाया गया। अगले दिन दूल्हा बाहर! टूट रही खबर दिखी। फिर दूल्हा साक्षात्कार देने के लिये उपलब्ध हो गया। दोनों को समाज से बाहर निकालने की घोषणा करने वाला एक धार्मिक ठेकेदार भी चर्चा में दिखा! फिर यह दो अन्य निष्कासित हुए! अब आ गये दोनों समाचार चैनलों में अपना पक्ष रखने के लिये। दूसरे शब्दों में कहें कि समाचार चैनलों में विज्ञापनों के बीच सामग्री बनवाने में सहायता करने के लिये तीनों को प्रसिद्धि का फैशियल लगाने के साथ तैयार कर भेजा गया।
सैलिब्रिटी आखिर क्या है? हिन्दी में पूछे आजकल हस्ती किसे कहा जाता है? अब तो हालत यह है कि लोग बदनाम होने के लिये घूम रहे हैं। अगर यही हालत रही तो आगे हम अपराधियों के यह बयान सुनेंगे कि हमें किसी टीवी चैनल में कोई कार्यक्रम मिले इसलिये ही यह सारा काम किया ताकि हमें सुधारने के अवसर देकर किसी निर्माता को प्रसिद्धि मिले तो हमें पैसा भी जोरदर मिलेगा।
बाज़ार और प्रचार के स्वच्छ बुतनुमा चेहरों के पीछे जो इंसान हैं उनको केवल पैसा चाहिए-कहीं समाज पर नियंत्रण करने जरूरी हो तो यह काम भी वही लोग कर रहे हैं। अब नंबर एक और दो का धंधा कोई मतलब नहीं रखता। यह लोग प्रचार माध्यमों पर भी कहीं  न कहीं अप्रत्यक्ष रूप से अपना नियंत्रण रखते हैं ताकि विज्ञापन की कमाई कहीं अन्यत्र न चली जाये। इधर अपनी कंपनी का विज्ञापन का पैसा देकर प्रचार माध्यम चलाओ उधर लाभांश के रूप में वापस पाओ। एक नंबर वाले अपना सामान बेचते हैं पर दो नंबर वाले विज्ञापनों के लिये चेहरे तलाशते हैं। सभी को मालुम है कि प्रचार के लिये बनने वाली सामग्री के केंद्रों में भी कहीं न कहीं यही दो नंबर वाले होते हैं। सीधी बात कहें तो मैदान पर एक खेल हो रहा है जिसमें खास लोग मैदान में हैं और आम आदमी बाहर बिना टिकट बैठा है जो यह सोचकर खुश हो लेता है चलो अंदर नहीं गये तो क्या बाहर तो अपना अस्तित्व है। दुनियां के आर्थिक, सामजिक, राजनीतिक, कला, तथा धर्म के शिखर पर विराजमान बुत, एक और दो नंबर के धंधे वाले धनपति, समाज की दृष्टि से बुरे धंधे वाले वाले माफिया-पैसा है तो वह भी सम्मानीय होते हैं-और उनके प्रचारक या अनुचरों के घेरे में एक खेल इस मैदान पर हो रहा है।
शायद यह सदियों से चल रहा है बिग बॉस नाम का खेल! ऐसे में आम इंसान मैदान में क्या बाहर ही बैठे देख रहे हैं? मैदान पर देखने वाले भी किराये के हैं या उनकी रक्षा करने वाले पहरेदार! फिल्मों के अभिनेता और अभिनेत्रियां अपने परिवार के सदस्यों को अभिनय में ला रहे हैं। निर्देशक अपने बच्चों को निर्देशक बना रहे हैं। वहां से कोई नया चेहरा नहीं मिल रहा क्योंकि पचास के ऊपर के आदमी को भी नायक की तरह निर्माता निर्देशक भुना रहे हैं। फिर युवा चाहिए तो भला काम करने से छोटी आयु में प्रसिद्धि नहीं मिल सकती इसलिये युवाओं को बदनाम होकर नायक की तरह प्रतिष्ठित करने की कला का नाम है बिग बॉस।
हमने बहुत माथा पच्ची की पर बिग बॉस में कुछ दिखाई नहीं दिया। बहुत देर तक सोचते रहे कि आखिर ऐसा क्या है कि लोग इसे देख रहे हैं? थक गये तो अचानक आंखें बंद होने लगी। वैचारिक क्रियाओं ने स्वतः योग किया और बताया कि टी. आर. पी. नाम का एक भ्रम है। भले ही इन कार्यक्रमों और चैनलों को लोकप्रियता के आधार पर नंबर मिलते हों पर सभी फ्लाप हैं। देश में एक सौ दस करोड़ लोग हैं पर टीवी पर यह कार्यक्रम देखने वाले कितने हैं पता नहीं! मगर भ्रम बेचना है और इसमें आपाधापी में व्यवसायिक सृजनकर्ता अनेक मिथक गढ़ने लगे हैं। दरअसल समाज की इच्छा शक्ति को पूरी तरह मारने में नाकाम रहे यह लोग राम और कृष्ण को भी मिथक कहते हुए अपने पर्दे के नायकों को वर्ष का नायक नायिका, दशक की महानायक महानायिका और सदी का महानतम नायक नायिका गढ़कर अपने मिथकों को सत्य साबित करने का प्रयास करते हैं। यह एक नाकाम कोशिश है, जो केवल पर्दे पर दिखती है? आम आदमी का समाज निराश है, और इनसे उसका कोई मतलब नहीं है। बिग बॉस ऐसे ही मिथकों के सृजन की एक क्रिया है कोई कार्यक्रम नहीं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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चाणक्य नीति-आदमी के गुण स्वयं ही पहचाने जाते हैं


पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।
इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और स्वयं अपना गुणगान करता है तो भी वह प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता, चाहे भले ही स्वयं देवराज इंद्र हो।

अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-थोथा चना बाजे घना इसलिये ही कहा जाता है कि जिसके पास गुण नहीं है वह अपने गुणों की व्याख्या स्वयं करता है। यह मानवीय प्रकृत्ति है कि अपने घर परिवार के लिये रोटी की जुगाड़ में हर कोई लगा है और विरले ही ऐसे लोग हैं जो दूसरों के हित की सोचते हैं पर अधिकतर तो खालीपीली प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहते हैं। धन, वैभव और भौतिक साधनों के संग्रह से लोगों को फुरसत नहीं है पर फिर भी चाहते हैं कि उनको परमार्थी मानकर समाज प्रशंसा प्रदान करे। वैसे अब परमार्थ भी एक तरह से व्यापार बन गया है और लोग चंदा वसूल कर यह भी करने लगे हैं पर यह धर्म पालन का प्रमाण नहीं है। यह अलग बात है कि ऐसे लोगों का कथित रूप से सम्मान मिल जाता है पर समाज उनको ऐसी मान्यता नही देता जैसी की वह अपेक्षा करते हैं। ऐसे लोग स्वयं ही अपनी प्रशंसा में विज्ञापन देते हैं या फिर अपनी प्रशंसा में लिखने और बोलने के लिये दूसरे प्रचारकों का इंतजाम करते हैं। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि ‘तू मुझे चाट, मैं तुझे चाटूं’, यानि एक दूसरे की प्रशंसा कर काम चलाते हैं। इसके बावजूद यह वास्तविकता है कि हृदय से केवल सम्मान उसी को प्राप्त होता है जो ईमानदारी सें परमार्थ का काम करते हैं।
धन प्राप्त तो कहीं से भी किया जा सकता है पर उसका स्त्रोत पवित्र होना चाहिये। दूसरों को क्लेश पहुंचाकर धन का संग्र्रह करने से पाप का बोझ सिर पर चढ़ता है। उसी तरह ऐसा धन भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिये जो शत्रु के सामने सिर झुकाकर प्राप्त होता है। आखिर मनुष्य धन किसी लिये प्राप्त करता है? यश अर्जित करने के लिये! अगर शत्रु के आगे सिर झुका दिया तो फिर वह कहां रह जायेगा। धन आखिर आदमी प्राप्त करता ही किसलिये है? उसका लक्ष्य अपना पेट पालने के अलावा समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करना भी होता है। ऐसे में जो धन अपयश से प्राप्त हो उसका कोई महत्व नहीं रह जाता।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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पतजंलि योग विज्ञान-आसन लगाकर भगवान का नाम लेना सिद्ध होता है (patanjali yog vigyan-asan aur bhagwan ka nam)


स्थिरसुखमासनम्।
हिन्दी में भावार्थ.
स्थिर होकर सुख से बैठने का नाम आसन है।
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापतिभ्याम्।
हिन्दी में भावार्थ-
आसन के समय प्रयत्न रहित होने के साथ परमात्मा का स्मरण करने से ही वह सिद्ध होता है।
ततोद्वन्द्वानभिघातः।।
हिन्दी में भावार्थ-
आसनों से सांसरिक द्वंद्वों का आघात नहीं लगता।
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः।।
हिन्दी में भावार्थ-
आसन की सिद्धि हो जाने पर श्वास ग्रहण करने और छोड़ने की गति रुक जाती है उसे प्राणायाम कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना कोई सामान्य व्यायाम नहीं है बल्कि ऐसी कला है जिसे जीवन में हमेशा ही आनंद का अनुभव किया जा सकता है। सबसे पहली बात तो यह है कि हम सुखपूर्वक अपने मन और इंद्रियों का निग्रह कर बैठ सकें वही आसन है। इस दौरान अपने हाथ से कोई प्रयत्न न कर केवल परमात्मा का स्मरण करना चाहिये। उस समय अपनी श्वास को आते जाते एक दृष्टा की तरह देखें न कि कर्ता के रूप में स्थित हों। बीच बीच में उसे रोकें और फिर छोड़ें। इस प्राणायाम कहा जाता है। यह प्राणायाम मन और बुद्धि के विकारों को निकालने में सहायक होता है। इससे इतनी सिद्धि मिल जाती है कि आदमी गर्मीए सर्दी तथा वर्षा से उत्पन्न शारीरिक द्वंद्वों से दूर हो जाता है। इतना ही नहीं संसार में आने वाले अनेक मानसिक कष्टों को वह स्वाभाविक रूप से लेता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह दुःख और सुख के भाव से परमानन्द भाव को प्राप्त होता है।
इस संसार में दो ही मार्ग हैं जिन पर इंसान चलता है। एक तो है सहज योग का दूसरा असहज योग। हर इंसान योग करता है। एक वह हैं जो सांसरिक पदार्थों में मन को फंसाकर कष्ट उठाते हैं दूसरे उन पदार्थों से जुड़कर भी उनमें लिप्त नहीं होते। इसलिये कहा जाता है कि योग जीवन जीने की एक कला है और यह भी अन्य कलाओं की तरह अभ्यास करने पर ही प्राप्त होती है। जो सतत योगाभ्यास करते हैं उनके चेहरे और वाणी में तेज स्वत: आता है और उससे दूसरे लोग प्रभावित होते हैं। इसके अलावा जीवन में अपने दायित्वों का निर्वहन करने में सहजता का अनुभव होता  है।

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इस हिन्दी ब्लाग ने पार की एक लाख पाठक संख्या पार-हिन्दी संपादकीय (A Hindi blog-editorial)


इस ब्लाग ने भी आज एक लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर ली। गूगल पेज रैकिंग में चार अंक प्राप्त तथा एक लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार करने वाला इस लेखक का यह पांचवां ब्लाग है। यह संख्या कोई अधिक मायने रखती क्योंकि हिन्दी भाषियों की संख्या को देखते हुए लगभग तीन वर्ष में इतनी संख्या पार करना कोई अधिक महत्व का नहीं है। न ही इस संख्या को देखते हुए ऐसा कहा जा सकता है कि हिन्दी ने अंतर्जाल पर कोई कीर्तिमान बनाया है पर अगर कोई स्वतंत्र, मौलिक तथा शौकिया लेखक है तो उसके लिये यह एक छोटी उपलब्धि मानी जा सकती है। इस लेखक के अनेक ब्लाग हैं पर इससे पूर्व के चार ब्लाग बहुत पहले ही इस संख्या को पार कर चुके हैं पर कोई ऐसा ब्लाग नहीं है जो अभी एक दिन में हजार की संख्या पार कर चुका है अलबत्ता सभी ब्लाग पर मिलाकर 2500 से तीन हजार तक पाठक/पाठ पठन संख्या पार हो जाती है।
प्रारंभ में इस ब्लाग को अन्य ब्लाग से अधिक बढ़त मिली थी पर बाद में अपने ही साथी ब्लाग की वजह से इसे पिछड़ना भी पड़ा। इसकी वजह यह थी कि इस लेखक ने वर्डप्रेस की बजाय ब्लाग स्पॉट के ब्लाग पर ही अधिक ध्यान दिया जबकि वास्तविकता यह है कि वर्डप्रेस के ब्लाग ही अधिक चल रहे हैं। कभी कभी लगता है कि वर्डप्रेस के ब्लाग पर लिखा जाये पर मुश्किल यह है कि ब्लाग स्पॉट के ब्लाग कुछ अधिक आकर्षक हैं दूसरे उन पर अपने पाठ रखने में अधिक कठिनाई नहीं होती इसलिये उन पर पाठ रखना अधिक सुविधाजनक लगता है। चूंकि यह लेखक शौकिया है और यहां लिखने से कोई धन नहीं मिलता इसलिये अंतर्जाल पर निरंतर लिखने के लिये मनोबल बनाये रखना कठिन होता है। दूसरी बात यह है कि पाठक संख्या में घनात्मक वृद्धि अधिक प्रेरणा नहीं देती। इसके लिये जरूरी है कि गुणात्मक वृद्धि होना। एक बात निश्चित है कि देश में ढेर सारे इंटरनेट कनेक्शन हैं पर उनमें हिन्दी के प्रति सद्भाव अधिक नहीं दिखता है। संभव है कि अभी इंटरनेट पर अच्छे लिखने को नहीं मिलता हो।
दूसरी बात यह है कि दृश्यव्य, श्रव्य तथा प्रकाशन माध्यम अपनी तयशुदा नीति के तहत ब्लाग लेखकों के यहां से विषय लेते हैं पर उनके नाम का उल्लेख करने की बजाय उनके रचनाकार अपना नाम करते हैं।
दूसरी बात यह कि अंतर्जाल पर फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियां, खिलाड़ी तथा अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के ब्लाग है और उनका प्रचार इस तरह होता है जैसे कि लिखना अब केवल बड़े लोगों का काम रह गया है।
एक सुपर स्टार के घर के बाहर से मैट्रो ट्रेन निकलने वाली है। निकलने वाली क्या, अभी तो चंद विशेषज्ञ उनके घर के सामने थोड़ा बहुत निरीक्षण करते दिखे। अभी योजना बनेगी। पता नहीं कितने बरस में पटरी बिछेगी। उस सुपर स्टार की आयु पैंसठ से ऊपर है और संभव है कि पटरियां बिछने में बीस साल और लग जायें। संभव है सुपर स्टार कहीं अन्यत्र मकान बना लें। कहने का अभिप्राय है कि अभी जंगल में मोर नाचने वाला नहीं पर उन्होंने अपनी निजी जिंदगी में दखल पर अपने ब्लाग पर लिख दिया। सारे प्रचार माध्यमों ने उस पर चिल्लपों मचाई। तत्काल उन सुपर स्टार ने ट्विटर पर अपना स्पष्टीकरण दिया कि ‘हम मैट्रों के विरोधी नहीं है। मैं तो केवल अपनी बात ऐसे ही रख रहा था।’
वह ट्विटर भी प्रचार माध्यामों में चर्चित हुआ। इससे संदेश यही जाता है कि इंटरनेट केवल बड़े लोगों का भौंपू है। ऐसे में आम लेखक के लिये अपनी पहचान का संकट बन जाता है। वह चाहे कितना भी लिखे पर उससे पहले यह पूछा जाता है कि ‘तुम हो क्या?’
किसी आम लेखक की निजी जिंदगी उतनी ही उतार चढ़ाव भरी होती है जितनी कि अन्य आम लोगों की। मगर वह फिर भी लिखता है पर अपनी व्यथा को भी तभी कागज पर लाता है जब वह समग्र समाज की लगती है वरना वह उससे जूझते हुए भी उसका उल्लेख नहीं करता। लेखक कभी बड़ा या छोटा नहीं होता मगर अब उसमें खास और आम का अंतर दिखाई देता है और यह सब ब्लाग पर भी दिखाई देता है।
आखिरी बात यह है कि जो वास्तव में लेखक है वह अपने निज अस्तित्व से विचलित नहीं होता और न पहचान के लिये तरसता है क्योंकि समाज की चेतना जहां विलुप्त हो गयी है वहां समस्या पाठक बढ़ाने की नहीं है बल्कि जो हैं उनसे ही निरंतर संवाद बनाये रखना है। जब लेखक लिखता है तब वह अध्यात्म के अधिक निकट होता है और ऐसे में समाज से जुड़ा उसका निज अस्तित्व गौण हो जाता है और अंदर तक पहुंचने वाला लेखन तभी संभव हो पाता है। इस अवसर पर मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों का आभार।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमदभागवत गीता-जन्माष्टमी पर विशेष हिन्दी लेख (bhagwan shri krishna and shri madbhagavat gita)


आज सारे देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनायी जा रही है। भगवान श्रीकृष्ण जी हमारे ‘अध्यात्मिक दर्शन’ के सबसे बड़े आधार स्तंभ हैं। इस अवसर पर उनकी बालक्रीड़ाओं और प्रेमलीलाओं को लेकर तमाम तरह की चर्चाऐं होती हैं। वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर में ढेर सारी भीड़ जुटती है। लोग आते जाते ‘राधे राधे’ कहते हुए उनके मंदिरों में दर्शनों के लिये जाते हैं। अनेक संत तो भगवान श्रीकृष्ण की बालक्रीडाओं और प्रेमलीलाओं के प्रसंग को सुनाकर भक्तों को भाव विभोर करते हैं।
इस प्रसन्नता पूर्ण वातावरण में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो श्रीकृष्ण के महाभारत युद्ध के दौरान उनके उस स्वरूप का स्मरण करते हों जिसमें उनकी लीला से श्री मदभागवत गीता एक अलौकिक और अभौतिक अमृत के रूप में प्रकट हुई। समुद्र मंथन में निकला अमृत तो देवता पी गये और इस कारण दैत्यों से उनका बैर बंध गया जो आज भी जारी सा लगता है। अनेक लोग दैत्यों को उनका फल न मिलने के कारण देवताओं को मनुवादी और पूंजीवादी भी बता देते हैं। मगर श्री गीता में जो अमृत प्रकट हुआ हुआ वह न पीने योग्य है न ही खाने योग्य, उसका स्वाद तो पढ़कर उसे धारण करने पर ही अनुभव किया जा सकता है। इसके लिये अपने अंदर बस संकल्प और विश्वास होना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण का राधा के साथ आत्मीय संबंध था पर वह केवल प्रेम का नहीं  बल्कि निष्काम प्रेम का प्रतीक था। भले ही कुछ विद्वान इस प्रेम का उपयोग अपने लिये बड़े सुविधाजनक ढंग से समाज को निर्देशित करते हुए प्रेमभाव को दैहिक सीमाओं तक ही समेट देते हैं पर जिन्होंने श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने साथ ही उसे समझने का प्रयत्न किया है वही इस बात को जानते हैं कि प्रेम न केवल देह तक ही सीमित न मनुष्य रूप तक, बल्कि वह आत्मा की गहराई में रहने वाला ऐसा भाव है जो कामनाओं से रहित एक अनुभूति है। उससे मनुष्य की अध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है न कि दैहिक वासनायें। भगवान श्रीकृष्ण की बालक्रीड़ाओं तथा प्रेमलीलाओं का बखान ज्ञानी लोगों को रोमांचित करता है पर वहीं तक ही सीमित नहीं रखता क्योंकि महाभारत का युद्ध और उसमें प्रकट हुई श्रीगीता ही वह ग्रंथ है श्रीकृष्ण के रूप का सर्वश्रेष्ठ दर्शन कराती है जो कि भारतीय अध्यात्म दर्शन का वर्तमन में मुख्य केंद्र बिंदु है।
महाभारत युद्ध के मैदान में खड़े श्री अर्जुन को श्रीगीता का रहस्य बताते हुए एक बार भी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने साथ दैहिक रूप से जुड़े किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया न राधा का, न रुकमणी का न सत्यभामा का। यहां तक कि अपने हाथ से गोवर्धन पर्वत उठाने की घटना का भी स्मरण नहीं किया जिससे उनको बाल्यकाल में कीर्ति मिल गयी थी। उस समय भगवान श्रीकृष्ण केवल धर्म की स्थापना का वह काम कर रहे थे जिसके लिये वह अवतरित हुए थे वह चमत्कारी लीलाओं के माध्यम से अपने भक्त बनाने की बजाये लोगों को धर्म पालन के प्रेरित करना चाहते थे। जिस वृंदावन में उन्होंने बाल कीड़ाओं और प्रेमलीलाओं से अपने आसपास के लोगों को रोमांचित किया वहां से एक बार वह निकले तो फिर नहीं लौटे बल्कि जीवन पर धर्म स्थापना के लिये द्वारका में रहकर जूझते रहे। महाभारत में स्वयं हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा कर ‘अहिंसा’ के सिद्धांत की जो स्थापना की उसका कोई सानी आज तक नहीं मिलता। इस अहिंसा का संदेश कोई कायर नहीं वीर और योद्धा ही दे सकता है।
ज्ञानी लोगों को लिये वृंदावन अत्यंत रोमांचक स्थान होता है पर श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण स्वरूप में आस्था के कारण उनका चिंतन केवल वहीं तक नहीं सिमटता क्योंकि वह जानते हैं कि धर्म स्थापना का काम तो उन्होंने वहां से निकलने के बाद ही किया था। कंस वध के बाद उन्होंने पांडवों की सहायता से उस समय के दुष्ट राजाओं का संहार किया पर स्वयं कहीं हथियार का प्रयोग नहीं किया। स्पष्टतः वह यही संदेश दे रहे थे कि सारे काम केवल भगवान के भरोसे नहीं छोड़े जाने चाहिए। युद्ध जिनका विषय हो वही उसें संलिप्त हों और यह भी कि राज्य का काम धर्म स्थापना नहीं बल्कि वह समाज में लोगों द्वारा स्वयं किया जाना चाहिए। वृंदावन से जाकर द्वारिका में बसने के बावजूद उन्होंने धर्म स्थापना का काम नहंी छोड़ा। केवल परिवार में बैठकर मस्ती नहीं की बल्कि समाज के लिये ऐसा काम किया जो आज भी नवीनतम लगता है। श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान का वह वह समंदर जो बाहर से सूक्ष्म लगता है पर उसके अंदर विराट खजाना है।
श्रीगीता में निष्काम कर्म तथा निष्प्रयोजन दया जैसे शब्द बहुत सीमित दिखते हैं पर उनका भाव इतना गहरा है कि जो इनको समझ ले उसका तो पूरा ही जीवन आनंदमय हो जाये। निष्कर्ष यह है कि श्री कृष्ण जी का चरित्र केवल बालक्रीडा़ओं और प्रेमलीला तक ही सीमित नहीं है बल्कि जीवन जीने का एक ऐसा तरीका इसमें बताया गया है जो कहीं नहीं मिलता। यही कारण है कि भारत के पुराने मनीषियों ने महाभारत से श्रीमद्भागवत गीता को प्रथक कर उसे समाज के सामने प्रस्तुत किया।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अपने मित्र ब्लाग लेखकों तथा पाठकों को हार्दिक बधाई। 
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लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,Gwalior
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अपराध और नज़रिया-हिन्दी आलेख (apradh aur nazriya-hindi lekh)


पिछले कई दिनों से देखा गया है कि जब भी कोई नया सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक विवाद प्रचार माध्यमों में चर्चा क्रे लिये लगातार आता है तो उस पर नियंत्रण करने के लिये कानून बनाने की मांग उठत्ी और कई विषय पर कानून बना भी दिया जाता है। ऐसा लगता है कि कानून बनाने की मांग करना या बनाना भी लोकप्रियता का माध्यम बन गया है। मुख्य बात यह है कि कानून का लागू करने वाली संस्थाओं को मजबूत बनाने की बात पर किसी का ध्यान नहीं जाता।
भारत में कानून लागू करने वाली सबसे बड़ी संस्थाओं में स्थानीय पुलिस को माना जाता है और अगर समाचार पत्र पत्रिकाओं में छपे समाचारों पर यकीन करें तो अनेक जगह पुलिस बल की कमी के अलावा उसके पास आधुनिक साधनों की कमी की शिकायतें मिलती हैं। हम यहां भूल जाते हैंे कि अगर पुलिस बल और उसके अधिकारी अपने ऊपर काम का अधिक बोझ तथा साधनों की कमी अनुभव करेंगे तो अपराधों से निपटने की उनकी क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा। समस्या यही नहीं है कि पुलिस अपनी ढांचागत समस्याओं के चलते मामलों से निपट नहीं पा रही बल्कि देश की कागजी कार्यवाही पर आधारित कार्यप्रणाली भी पुराने ढर्रे पर चल रही है और उससे कानून को असरकार ढंग से लागू करना मुश्किल हो रहा है यह बात समझनी होगी।
इधर सम्मान के लिये हत्या तथा कन्याओं के साथ घर में अन्याय को लेकर कानून बनाने की मांग के साथ विचार भी चल रहा है। समझ में नहीं आता कि आखिर इस देश में सोच का अकाल क्यों पड़ गया है? देश की व्यवस्था चलाना मजाक नहीं है पर लगता है कि इसे गंभीरता से भी नहीं लिया जा रहा। हर जरा से विवाद पर कानून बनाने का फैशन देश के संविधान के प्रति नयी पीढ़ी में विश्वास कम कर सकता है।
जहां तक चर्चित विवादों के चलते उससे संबंधित विषय पर कानून बनाने की मांग करना या बनाना लोकप्रियता प्राप्त करने का साधन लगता है पर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, आतंकवाद तथा आर्थिक विषमतओं के कारण अपनी निजी समस्याओं से जूझ रहे लोग इससे अधिक खुश होते। उनके निजी जीवन के संघर्ष इतने दुरूह हो गये हैं कि इनकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाता। इसके अलावा जो जागरुक लोग हैं वह देश की हालत देखते हुए इस बात को समझते हैं कि यह कानून होने या न होने से अधिक उसे लागू करने का विषय है।
सम्मान के लिये हत्या या कन्याओं को घर में परेशान करने जैसे विषय गंभीर है। देश में स्त्रियों की दशा सदियों से ही खराब है और उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। यह कानून से अधिक समाज सुधारकों के लिये शर्म की बात है और देश में सक्रिय धर्म प्रचारकों के लिये तो डूब मरने वाली बात है जो यहां महापुरुष होने का दावा करते हैं।
कहने का आशय यह है कि समाज की समस्याओं के लिये कानून कम उसके शिखर पुरुष अधिक दोषी है जो समय समय पर अपने अपने सामाजिक समूहों को अपने लाभ के लिये एकत्रित करते हैं और मतलब निकलते ही उसे अपने हाल में छोड़ देते हैं।
हमारे देश में दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा जैसे कानून बने और समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य प्रचार माध्यमों में अक्सर इस तरह की चर्चा होती है कि इसका दुरुपयोग हुआ है। इतना ही इसमें निर्दोष पुरुष परेशान हुए और दोषियों का बाल बांका भी न हुआ है। आतंकवाद के लिये यह कानून तो देर से बना कि अपराधी अपने को निर्दोष साबित करे दहेज एक्ट में इसका प्रावधान पहले ही कर दिया गया था। निर्दोष लोग परेशान हुए क्योंकि वह सामान्य वर्ग के थे जो बचे वह ऊंचे वर्ग के थे पर यह बात केवल इसी कानून को लागू करने के बारे में नहीं बल्कि हर अपराध में ऐसा ही देखने में आता है।
इधर कुछ घटनायें ऐसी हुई है कि अपने परिवार या समाज की मर्जी के खिलाफ विवाह करने वाली युवतियों की उनके अपने लोगों ने ही हत्या कर दी। आजकल ऐसे समाचार खूब छाये हुए हैं और इस पर कानून बनाने की मांग हो रही है। सवाल यह है कि क्या वर्तमान कानून के चलते इससे निपटना कठिन है?
शायद नहीं! किसी की हत्या करना अपराध है, और इसके लिये अलग से कानून बनाने की कहना ही अपनी सोच के संकीर्ण होने का प्रमाण है। हत्या के प्रकरण में जमानत बड़ी कठिनाई से होती है। हत्या चाहे किसी की भी हुई हो और किसी ने भी की हो उससे निपटने के लिये अलग से कानून बनाने की आवश्यकता इतनी नहीं लगती जितनी प्रकरण से सक्षमता से निपटने की।
महिलाओं के लिये दहेज एक्ट जैसा कानून किसलिये बना? दहेज लेना देना दोनों ही जुर्म है और अनेक प्रकरणों में लड़कियों के माता पिता स्वीकार करते हैं कि उन्होंने दहेज दिया? क्या वह कानून से परे हैं जो उन पर कार्यवाही नहीं की गयी। कन्या भ्रुण हत्या का कानून बना पर उसकी धज्जियां उड़ते हुए सभी ने देखी हैं। सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीना वर्जित कानून में किया गया पर क्या उसे रोका जा सका।
एक बात निश्चित है कि कानून में हत्या, बेईमानी, डकैती तथा ठगी जैसे अपराध रोकने के लिये पर्याप्त प्रावधान है। इसलिये अपराधों में वर्गीकरण करने की बात समझ में नहीं आती। यह अलग बात है कि हमारे देश के प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी वर्ग अपराधों में जाति, भाषा, धर्म, तथा क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों से सोचते हैं पर उनके कहने पर व्यवस्था चलाने को मतलब है कि अंधेरे कुंऐ में देश को ढकेलना। सच तो यह है कि दौलत, शौहरत और बाहुबलियों के बंधुआ बुद्धिजीवी केवल रुदन कीर्तन के अलावा कुछ नहीं करते क्योंकि उनके पास अपनी सोच नहीं है। इसलिये कानून बनाने और उसे लागू करने के विषय में व्यवहारिक ज्ञान के साथ काम करना चाहिए।

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जीवन जीने की कला यानि कभी विचलित न होना-चिंतन (art of living-hindu thought


कथित रूप से जीने की कला सिखाने वाले एक संत के आश्रम पर गोली चलने की वारदात हुई है। टीवी चैनलों तथा समाचार पत्रों की जानकारी के अनुसार इस विषय पर आश्रम के अधिकारियों तथा जांच अधिकारियों के बीच मतभेद हैं। आश्रम के अधिकारी इसे इस तरह प्रचारित कर रहे हैं कि यह संत पर हमला है जबकि जांच अधिकारी कहते हैं कि संत को उस स्थान से निकले पांच मिनट पहले हुए थे और संत वहां से निकल गये थे। यह गोली सात सो फीट दूरी से चली थी। अब यह कहना कठिन है कि इस घटना की जांच में अन्य क्या नया आने वाला है।
संतों की महिमा एकदम निराली होती है और शायद यही कारण है कि भारतीय जनसमुदाय उनका पूजा करता है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के प्रचार प्रसार तथा उनके ज्ञान को अक्षुण्ण बनाये रखने में अनेक संतों का योगदान है वरना श्रीमदभागवतगीता जैसा ग्रंथ आज भी प्रासंगिक नहीं बना रहता है।
मगर यह कलियुग है जिसके लिये कहा गया है कि ‘हंस चुनेगा दाना, कौआ मौती खायेगा’। यह स्थिति आज के संत समाज के अनेक सदस्यों में लागू होती है जो अल्पज्ञान तथा केवल भौतिक साधना की पूजा करते हुए भी समाज की प्रशंसा पाते हैं । कई तो ऐसे लोग हैं कि जिन्होंने पहनावा तो संतों का धारण कर लिया है पर उनका हृदय साहूकारों जैसा ही है। ज्ञान को रट लिया है पर उसको धारण अनेक संत नहीं कर पाये। हिन्दू समाज में संतों की उपस्थिति अब कोई मार्गदर्शक जैसी नहीं रही है। इसका एक कारण यह है कि सतों का व्यवसायिक तथा प्रबंध कौशल अब समाज के भक्ति भाव के आर्थिक् दोहन पर अधिक केंद्रित है जिसे आम जनता समझने लगी है। दूसरा यह कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से शिक्षित बुद्धिजीवी अब संतों की असलियत को उजागर करने में झिझकते नहीं। बुद्धिजीवियों की संत समाज के प्रतिकूल अभिव्यक्तियां आम आदमी में चर्चित होती है। एक बात यह भी है कि पहले समाज में सारा बौद्धिक काम संतों और महात्माओं के भरोसे था जबकि अब आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर यह काम ऐसे बुद्धिजीवी करने लगे हैं जो धार्मिक चोगा नहीं पहनते।
ऐसे अनेक बौद्धिक रूप से क्षमतावान लोग हैं जो भारतीय अध्यात्म के प्रति रुझान रखते हैं पर संतों जैसा पहनावा धारण नहीं करते। इनमें जो अध्यात्मिक ज्ञान के जानकार हैं वह तो इन कथित व्यवसायिक संतों को पूज्यनीय का दर्जा देने का ही विरोध करते हैं।
वैसे संत का आशय क्या है यह किसी के समझ में नहीं आया पर हम परंपरागत रूप से देखें तो संत केवल वही हैं जो निष्काम भाव से भक्ति में करते हैं और उसका प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि अन्य सामान्य लोग उसने ज्ञान लेने उनके पास आते हैं। पहले ऐसे संत सामान्य कुटियाओं मे रहते थे-रहते तो आज भी कुटियाओं में कहते हैं यह अलग बात है कि वह संगममरमर की बनी होती हैं और उनके वातानुकूलित यंत्र लगे रहते हैं और नाम भी कुटिया या आश्रम रखा जाता है। सीधी बात कहें कि संत अब साहूकार, राजा तथा शिक्षक की संयुक्त भूमिका में आ गये हैं। नहीं रहे तो संत, क्योंकि जिस त्याग और तपस्या की अपेक्षा संतों से की जाती है वह अनेक में दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि समाज में उनके प्रति सद्भावना अब वैसी नहीं रही जैसे पहले थी। ऐसे में आश्रम के व्यवसाय तथा व्यवस्था में अप्रिय प्रसंग संघर्ष का कारण बनते हैं पर उनको समूचे धर्म पर हमला कहना अनुचित है।
उपरोक्त आक्रमण को लेकर जिस तरह टीवी चैनलों ने भुनाने का प्रयास किया उसे बचा जाना चाहिए। भारतीय धर्म एक गोली से नष्ट नहीं होने वाला और न ही किसी एक आश्रम में गोली चलने से उसके आदर्श विचलित होने वाले हैं।
बात संतों की महिमा की है तो यकीनन कुछ संत वाकई संत भी हो सकते हैं चाहे भले ही उनके आश्रम आधुनिक साजसज्जा से सुसज्तित हों। इनमें एक योगाचार्य हैं जो योगसाधना का पर्याय बन गये हैं। यकीनन यह उनका व्यवसाय है पर फिर भी उनको संत कहने में कोई हर्ज नहीं। मुश्किल यह है कि यह संत हर धार्मिक विवाद पर बोलने लगते हैं और व्यवसायिक प्रचार माध्यम उनके बयानों को प्रकाशित करने के लिये आतुर रहते हैं। चूंकि यह हमला एक आश्रम था इसलिये उनसे भी बयान लिया गया। .32 पिस्तौल से निकली एक गोली को लेकर धर्म पर संकट दिखाने वाले टीवी चैनलों पर जब वह इस घटना पर बोल रहे थे तब लग रहा था कि यह भोले भाले संत किस चक्कर में पड़े गये। कुछ और भी संत बोल रहे थे तब लग रहा था कि कथित जीने की कला सिखाने वाले संत को यह लोग व्यर्थ ही प्रचार दे रहे हैं। जीवन जीने की कला सिखाने वाले कथित संत की लोकप्रियता से कहीं अधिक योगाचार्य की है और लोग उनकी बातों पर अभी भी यकीन करते हैं। कुछ अन्य संत कभी जिस तरह इस घटना को लेकर धर्म को लेकर चिंतित हैं उससे तो लगता है कि उनमें ज्ञान का अभाव है।
जहां तक जीवन जीने की कला का सवाल है तो पतंजलि योग दर्शन तथा श्रीमदभागवतगीता का संदेश इतना स्वर्णिम हैं कि वह कभी पुरातन नहीं पड़ता। इनके रचयिता अब रायल्टी लेने की लिये इस धरती पर मौजूद नहीं है इसलिये उसमें से अनेक बातें चुराकर लोग संत बन रहे हैं। वह स्वयं जीवन जीने की कला सीख लें जिसमें आदमी बिना ठगी किये परिश्रम के साथ दूसरों का निष्प्रयोजन भला करता है, तो यही बहुत है। जो संत अभी इस विषय पर बोल रहे हैं उनको पता होना चाहिए कि अभी तो जांच चल रही है। जांच अधिकारियों पर संदेह करना ठीक नहीं है। जीवन जीने की कला शीर्षक में आकर्षण बहुत है पर उसके बहुत व्यापक अर्थ हैं जिसमें अनावश्यक रूप से बात को बढ़ा कर प्रस्तुत न करना और जरा जरा सी बात पर विचलित न होना भी शामिल है। 
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

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जेब ढीली करो-हास्य कविताएँ


अंधों की तरह रेवड़ियां बांटने का
चलन अब आंख वालों में भी हो गया है।
कहीं पुजते दौलतमंद
कहीं सजते ऊंचे ओहदे वाले
कहीं जमते बाजुओं में दम वाले
तो कहीं उनके चाटुकार चमकते हैं
लोगों के हैं अपने अपने दाव
उजले नकाब पहनने पर हैं आमदा
क्योंकि चरित्र सभी का खो गया है।
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सम्मान बेचने वाले ने
एक कवि से कहा
‘कुछ जेब ढीली करो तो
हमसे सम्मान पाओ।
आजकल सब बिकता है बाजार में
शब्दों से खाली वाह वाह मिलती है,
कविता कागज पर लिखकर
पैसा खर्च करने की बजाय
हमारी जेब में पहुंचाओ।
कुछ अपना कुछ हमारा सम्मान बढ़ाओ।’
कवि ने कहा
‘पैसा होता तो कवितायें क्यों लिखता,
अभाव न होते तो कवि कैसे दिखता,
सम्मान खरीदने की ताकत होती
तो कवितायें भी खरीद कर लाता,
सम्मान के लिये सजाता,
फिर तुम जैसे तुच्छ प्राणी की
शरण क्यों कर लेता,
किसी बड़े आदमी पर चढ़ाता दाम
जो बड़ा ही सम्मान देता।
तुम सम्मान के छोटे सौदागर हो
अपने सम्मान को बड़ा न बताओ।
गली मोहल्ले के कवियों पर
अपना दाव लगाने से अच्छा है
अपना प्रस्ताव कविता के बाजार में
कवियों जैसे दिखने वालों को समझाओ।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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ॐ नम: शिवाय-महाशिवरात्रि पर विशेष लेख


‘ किं कारण ब्रह्म’
प्रश्न पूछा गया कि ‘ब्रह्म कौन है?
उत्तर मिलता है कि एको हि रुद्रः।’
आगे चलकर स्पष्ट किया जाता है कि
‘स शिव।।’’
यह भी आगे स्पष्ट किया गया है कि जगत का कारण स्वभाव न होकर स्वयं भगवान् शिव ही इसके अभिन्न निमित्तोपादान कारण है।
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थयं इमोल्लोकानीशत ईशनीभिः।
प्रत्यंजनांस्तिष्ठिति संचकोचान्तकाले
संसृज्य विश्व भुवनानि गोपाः।।
इसका आशय यह है कि जो अपनी शक्ति से इस संसार के शासक पद पर प्रतिष्ठित हैं वह रुद्र एक ही है। इसलिये ही विद्वानों ने जगत में कारण के रूप में किसी अन्य का आश्रय नहीं लिया है।
कहने का अभिप्राय यह है कि शिव और रुद्र एक दूसरे  पर्यायवायी शब्द हैं।
भगवान रुद्र को इस कारण कहा जाता है क्यों रुत् अर्थात दुःख को विनष्ट कर देते हैं-‘रुत् दुःखम् द्रावयति नाशयतीति रुद्रः।’
भगवान शिव के लिये ही सत्यम् शिवम सुंदरम शब्दों का प्रयोग किया गया है। सत्य जो कि अदृश्य है और इस संसार के संचालन का कारण नहीं है। वह सृष्टिकर्ता है पर वह कर्म का कारण नहीं है। उसमें इद्रियों के गुण नहीं है। वह न सुनता, न बोलता और न कहता है क्योंकि वह कारण नहीं है।
यह मायावी संसार अत्यंत आकर्षक लगता है।  इस सत्य और सुंदरम के बीच स्थित शिव हैं।  वह इस संसार के कारण हैं।  वह परमात्मा का वह स्वरूप हैं जो दृश्यव्य होकर संसार को चलाता दिखता है पर वह सुंदर नहीं है।
कहा जाता है कि जब भगवान शिव की विवाह के लिये बारात निकली थी उसमें शामिल गणों को देखकर लोग डर गये थे।  यह गण हमारी इस सृष्टि रूपी देह में भी विराजमान हैं।  बाहर से शरीर कितना आकर्षक लगता है पर अंदर का दृश्य देखकर कोई भी डर सकता है।  अब तो शरीर के अंदर झांकने वाली मशीनें आ गयी हैं और उससे अगर अपने अंदर देखें तो  स्वयं ही डर जायें। मगर यही डराने वाले तत्व इस आकर्षक शरीर को संभाल रहे हैं यही भयानक गण इस आकर्षक संसार का आधार हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा सत्य के बाद शिव रूप में स्थित होने पर आकर्षक नहीं लगते पर इस संसार को भौतिक रूप से सुंदर बनाते हैं।  शिव तो सत्य और सुंदरम को जोड़ने वाले तत्व हैं और इसके लिये तो उन्होंने विष तक पी लिया जिससे नीलकंठ भी कहलाये।  अगर वह विष नहीं पीते तो क्या संसार का निर्माण होता? शायद नहीं और इसलिये उनको इस जगत के निर्माण संचालन का कारण भी माना गया है। गंगा आकाश में अदृश्य रूप से स्थित है, पर दिखती नहीं। धरती पर उसका स्वरूप आकर्षक दिखता है पर वह शिव नहीं दिखते जिन्होंने उसे जटाओं में धारण किया है, मगर उनकी उपस्थिति की अनुभूति है। वह गंगा के प्रवाह का कारण है। शिवजी की जटायें भले सुंदर न हों पर वह धरा पर बहती पावन नदी गंगा के सौंदर्य का कारण है। यह शिव तत्व ही सारे संसार के चलने का निमित या कारण है।
ऐसे भगवान श्री शिव जी को हार्दिक नमन। ॐ  नमो शिवायः।



कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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अंतर्जातीय विवाहों से समाज में बदलाव की कितनी उम्मीद-हिंदी आलेख


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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देश की सामाजिक, आर्थिक तथा पारिवारिक संकटों के निवारण का एक उपाय यह भी सोचा गया है कि अंतर्जातीय विवाहों का स्वीकार्य बनाय जाये। जहां माता पिता स्वयं ही अपनी पुत्री के लिये वर ढूंढते हैं वहां अंतर्जातीय विवाह का प्रयास नहीं करते क्योकि बदनामी का भय रहता ह। पर प्रेमविवाहों को अब मान्यता मिलने लगी है कम से कम सहधर्म के आधार पर यह अब कठिन बात नहीं रही। मगर क्या इससे कोई एतिहासिक परिवर्तन होने जा रहा है और हम क्या अब अगले कुछ वर्षों में एक नया समाज निर्मित होते देखेंगे? अगर सब ठीक हो जाये तो अलग बात है पर अंतर्जातीय या प्रेम विवाहों से ऐसे आसार दिख नहीं रहे कि भारतीय समाज अपने अंदर कोई नई सोच विकसति करने जा रहा है। इस लेखक ने कम से कम पांच ऐसी शादियों को देखा है जो अंतर्जातीय होने के साथ ही पारिवारिक स्वीकृति के साथ धूमधाम से हुईं और जिस दहेज रूपी दानव से मुक्ति की चाहत सभी को है उसकी उपस्थिति भी वहां देखी गयी। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने सोच की दिशा बदले बिना परिवर्तन की आकांक्षा सिवाय हवा में तीर चलाने के अलावा कुछ नहीं दिखाई देती।

नारियों को अपने वर की स्वतंत्रता की वकालत करने वाले विवाह के बाद की परिस्थितियों से अपनी आंखें बंद किये बैठे हैं। सच तो यह है कि लड़की माता पिता के अनुसार विवाह करे या स्वयं प्रेमविवाह उसकी हालातों में परिवर्तन नहीं देखने को मिलता-चिंतकों के लिये यही चिंता का विषय होता है।

मात्र 45 दिन में एक प्रेमविवाह करने वाली लड़की संदेहास्पद स्थिति में मौत के काल में चली जाती है-यह हत्या है या आत्महत्या इस पर विवेचना चल रही है-तब जो सवाल उठते हैं जिनकी अनदेखी करना अपनी संकीर्ण मानसिकता का प्रमाण होगी और इससे इस बात की पुष्टि भी होगी कि यह देश केवल नारे और बाद पर चलता है और उनको ही चिंतन मान लिया जाता है।

लड़की पढ़ी लिखी तथा अच्छे घराने की थी। इतना ही नहीं वह अच्छी आय कमाने वाली भी थी। जाति अलग थी पर उसके पिता ने उसकी पसंद को स्वीकार करते हुए परंपरागत ढंग से विवाह करते हुए उसके अंतर्जातीय प्रेम विवाह को स्वीकृति प्रदान की। । टीवी पर दे,खी गयी इस खबर को देखकर मन भर आया। यकीनन उसके पति और उसके बीच प्रेम संबंध तो वर्षों पुराने रहे होंगे। कहा जाता है कि माता पिता लड़की को अनजान लड़के के हाथ में सौंपना या किसी लड़की को विवाह बाद प्रेम में करने सोचने की दूट मिलना दकियानूसी विचारधारा है पर क्या इन अंर्तजातीय विवाहों से वह पौंगापन समाप्त हो जाता है। पारंपरिक ढंग से शादी में दहेज लेनदेन के चलते किसी आधुनिक सोच का विकास नहीं माना जा सकता। लंबे समय के प्रेम में भी वह लड़की अपने साथी को क्या समझ पायी? एक प्रतिभाशाली लड़की का इस तरह दहेज के लिये चला जाना अत्यंत दुःखःदायी लगता है।

वैसे सजातीय विवाहों में भी कोई अच्छी स्थिति नहंी रहती पर यह आशा तो की जाती है कि प्रेम विवाह भले ही अंतर्जातीय हों पर दहेज की समस्या का हल हो पर अब उसके भी निराशाजनक परिणाम आने लगे हैं। कुछ अंतर्जातीय विवाहों में बारातियों में एक अजीब सा परायापन लगता है पर यह सोचकर सभी सहज दिखते हैं कि चलो अच्छा हुआ कि प्रेमियों ं का मिलन हुआ पर उनका इस तरह टूटना अत्यंत कष्टकारक लगता है। अंतर्जातीय विवाह टूटने के अनेक प्रसंग भी सामने आने लगे हैं और यह माता पिता की स्वीकृति से हुए थे।

इस देश की समस्या यह नहीं है कि यहां जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर समूह बने हैं। समस्या यह है कि पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण ने उनमें आपनी श्रेष्ठता का भाव पैदा किया है जिससे वैमनस्या फैल रहा हे। टीवी, फ्रिज, कूलर, मोटर साइकिल, कार, कंप्यूटर तथा अन्य आधुनिक साधनों का अनुसंधान भारत में नहीं हुआ पर दहेज जैसी पुरानी परंपरा में इनका जमकर उपयोग हो रहा है। जिस बाप को अपनी शादी में साइकिल भी नहीं मिली वह अपने बेटे की शादी में मोटर साइकिल या कार मांगता है। सबसे अधिक हैरानी तब होती है जब पढ़ीलिखी महिलायें भी बात तो आधुनिकता की करती हैं पर दहेज का मामला हो तो खलनाियका को रोल अदा करते हुए जरा भी नहीं हिचकती।

कहने का अभिप्राय यही है कि देश की कुपरंपरायें, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास तथा अन्य कुरीतियों की भी उतनी ही पुरानी गंदी विचाराधाराएं बहती आ रही हैं जैसे कि पावन नदियां गंगा, यमुना और नर्मदा। हमने अपने लोभ लालच से इन पावन नदियों को भी गंदा कर दिया और अपनी कुत्सित विचारधाराओं को भी आधुनिकता का रूप देकर उनको अधिक भयावह बनाने लगे हैं। जिस तरह यह नदियां स्वच्छ करने के लिये अपने उद्गम स्थल से पवित्र करने की आवश्यकता है-बीच में कहीं से साफ करने की योजनाओं को कोई परिणाम नहीं निकलने वाला-वैसे ही समाज में बदलाव लाने का प्रयास तभी सफल हो सकता है जब लोगों को सोच बदलने के लिये प्रेरित किया जाये। अंतर्जातीय विवाह से नये समाज के निर्माण की बात या जाति पांत का भेद मिटने से धर्म की रक्षा की बात तब तक निरर्थक साबित होगी जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी।

कितने आश्चर्य की बात है कि लड़की जब कमाने लगती है तो लोग सोचते हैं कि उसकी शादी बिना दहेज को हो जायेगी पर माता पिता को फिर भी योग्य वर के लिये पैसा खर्च करना पड़ता है फिर भी उसके खुश रहने की गारंटी नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि अनेक कथित संस्कृत और आधुनिक माता पिता और उनके लड़के पाश्चात्य सभ्यता की देखादेखी कमाऊ बीवी या बहु के लिये आंखें फैलाकर प्यार के नाम पर शिकार करने के लिये घूम रहे हैं पर दहेज लेना और फिर बहू से सामान्य गृहस्थ औरत की तरह कामकाज की भी अपेक्षा करते हैं। उसे ताने देते हैं। चंद दिन पहले ही उसे प्रेम करने वाला जब पति बन जाता है तो वह उसे संकट से उबारने की बजाय उसे बढ़ाने लगता है। उस लड़की की तब क्या व्यथा होती होगी जब जीवन भर साथ निभाने का वादा करने वाला प्रेमी जब पति बनता है तब अपने माता पिता या बहिन के तानों से उसे बचाने की बजाय

उनके साथ हो जाता है। मुश्किल यही है कि हम अपने यहां पाश्चात्य आधारों पर हम अपना समाज चलाना चाहते हैं पर उसके लिये सहनशीलता हमारे अंदर तब तक ही है जब तक हमें कष्ट नहीं उठाना पड़ता। जहां हमें कष्ट पहुंचता है वहां हम अपने संस्कारों का हवाला देकर अध्यात्मिक होने का प्रयास करते हैं। ऐसे विरोधाभासों से निकलने का कोई मार्ग भी नहीं दिखता क्योंकि हमारे देश के दिशा निर्देशक शादियो के स्वरूपों पर ही सोचते हैं उसके बाद चलने वाली गृहस्थी पर नहीं।

हमारे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि अंतर्जातीय प्रेम विवाह होना ठीक नहीं या सभी का यही हाल है बल्कि इससे समाज में व्यापक सुधार की आशा करना अतिउत्साह का प्रतीक है यही आशय है। जब तक ऐसे विवाहों में दहेज और शादी के समय अनाप शनाप खर्च ये भी बचने का प्रयास करना चाहिये।

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योग साधना को केवल व्यायाम न समझें-हिन्दू धर्म संदेश (yog sadhna no simple exercise-hindu dharm sandesh)


एक सर्वे के अनुसार 45 से 55 वर्ष की आयु के मध्य व्यायाम करने वालों में घुटने तथा शरीर के अन्य जोड़ों वाले भागों में दर्द होने की बात सामने आयी है। यह आश्चर्य की बात नहीं है पर यहां एक बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि भारतीय योग पद्धति का हिस्सा दैहिक आसन इस तरह के व्यायाम की श्रेणी में नहीं आते। यह व्यायाम नहीं बल्कि योगासन हैं यह अलग बात है कि इसकी कुछ क्रियायें व्यायाम जैसी लगती हैं।
इसके संबंध में एक मजेदार बात याद आ रही है। एक गैर हिन्दू धार्मिक चैनल पर एक कथित विद्वान से भारतीय योग पद्धति के बारे में पूछा गया तो उसने जवाब दिया कि ‘हमारी पवित्र किताब में भी इंसान को व्यायाम करते रहने के लिये कहा गया है।’
उन विद्वान महोदय का बयान कोई आश्चर्य जनक नहीं था क्योंकि सभी धर्मों के विद्वान हमेशा अपनी पुरानी किताबों के प्रति वफादार रहते हैं और उनसे यह आशा करना बेकार है कि वह किसी भी हालत में दूसरे धर्म की किसी परंपरा की प्रशंसा करेंगे। फिर टीवी चैनलों ने भी कुछ विद्वान तय कर रखे हैं जिनके पास बहस करने के लिये आपके पास सुविधा नहीं है। बहरहाल सच बात यही है कि भारतीय येाग पद्धति के शारीरिक आसन कोई सामान्य व्यायाम नहीं बल्कि देह से विकार बाहर निकालने की एक प्रक्रिया है।
योगासनों में किसी भी शारीरिक क्रिया में शरीर ढीला नहीं होता। हर अंग में कसावट होती है और यह तनाव की बजाय राहत देती है इतना ही नहीं हर आसन में उसके अनुसार शरीर के चक्रों पर ध्यान भी लगाया जाता है-इस संबंध में भारतीय येाग संस्थान की पुस्तक उपयोग प्रतीत होती है। व्यायाम में जहां शरीर से ऊर्जा रस के निर्माण के साथ उसका क्षरण भी होता है पर योगासन में केवल देह मेें स्थित वात, कफ तथा पित के विकार ही निर्गमित होते। दूसरी बात यह है कि ध्यान की वजह से देह को ऐसी सुखानुभूति होती है जिसकी व्यायाम में नहीं की जाती। इसके अलावा व्यायाम जहां जमीन बैठकर या खड़े होकर किया जाता है जबकि योगसन में नीचे चटाई, दरी और चादर का बिछा होना आवश्यक है ताकि देह में निर्मित होने वाली ऊर्जा का बाहर विसर्जन न हो। योगासन के बारे में सबसे बड़ी दो बातें यह है कि एक तो वह इसमें शरीर को खींचा नहीं जाता बल्कि जहां तक सहजता अनुभव हो वहीं तक हाथ पांवों में तनाव लाया जाता है। दूसरा यह कि योगसन किसी भी आयु में प्रारंभ किया जा सकता है जबकि व्यायाम को एक आयु के बाद प्रारंभ करना खतरनाक माना जाता है। योगसन में सहजता का भाव आता है और व्यायाम में इसका अभाव साफ दिखाई दे्रता है क्योंकि उसमें शरीर के चक्रों पर ध्यान नहीं रखा जाता।
कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय येाग पद्धति के शारीरिक आसनों को भारतीय या पश्चिमी पद्धति के व्यायामों से तुलना करना ही ठीक नहीं है। दोनों ही एकदम पृथक विषय है-भले ही उनकी शारीरिक क्रियाओं में कुछ साम्यता दिखती है पर अनुभूति में दोनों ही अलग हैं। दूसरी बात यह है कि भारतीय योग पद्धति में आसन केवल एक विषय है पर सभी कुछ नहीं है और यही कारण है कि इसे व्यायाम मानना गलत है। अलबत्ता कुछ विद्वान इसे सीमित दृष्टिकोण से देखते हैं उनको इस बारे में जानकारी नहीं है। कई लोग अक्सर यह शिकायत करते हैं कि वह अमुक आसन कर रहे थे तो उनकी नसें खिंच गयी दरअसल वह आसनों को व्यायाम की तरह करते हैं जबकि इसके लिये पहले किसी योग्य गुरु का सानिध्य होना आवश्यक है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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