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राष्ट्रभाषा के शिरोमणि-हिंदी कविता


14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर

हर बरस लगते हैं

राष्ट्रभाषा के नाम पर मेले,

वैसे हिंग्लिश में करते हैं टॉक

पूरे साल  गुरु और चेले,

एक दिन होता है हिन्दी के नाम

कहीं गुरु बैठे ऊंघते है,

कहीं चेले नाश्ते के लिये

इधर उधर सूंघते हैं,

खाते और कमाते सभी हिन्दी से

अंग्रेजी में गरियाते हैं,

पर्सनल्टी विकास के लिये

हिंग्लिश का मार्ग भी बताते हैं।

कहें दीपक बापू

हिन्दी के शिरोमणियों की

जुबां ही अटक गयी है,

सोचे हिन्दी में

बोली अंग्रेजी की राह में भटक गयी है,

दुनियां में अपना ही देश है ऐसा

जहां राष्ट्रप्रेम का नारा

जोरदार आवाज में सुनाया जाता है,

पर्दे के पीछे विदेशों में भ्रमण का दाम

यूं ही भुनाया जाता है,

हिन्दी शिरोमणि कर रहे हैं

दिखावे की  भारत भक्ति,

मन ही मन आत्मविभोर है

अमेरिका और ब्रिटेन की देखकर शक्ति,

यहीं है ऐसे इंसान

जो हिन्दी भाषा को रूढ़िवादी कहकर  शरमाते हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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हिंदी दिवस पर चिंत्तन लेख-इन्टरनेट पर हिंदी का महत्व बढ़ने लगा है


                        हिन्दी दिवस 14 नवंबर 2013 को है पर इस लेखक के बीस ब्लॉग इस विषय पर लिखे गये पाठों पर जमकर पढ़े जा रहे हैं।  पता नहीं कब हमने एक लेख लिख डाला था, जिसका शीर्षक था हिन्दी भाषा का का महत्व समाज कब समझेगा? उस समय इस इतने पाठक नहीं मिले थे जितने अब मिलने लगे हैं। इससे एक बात तो जाहिर होती है कि इंटरनेट पर लोगों का हिन्दी मे रुझान बढ़ गया है, दूसरी यह भी कि हिन्दी दिवस के मनाये जाने का महत्व कम नहीं हुआ है।  एक तीसरी बात भी सामने आने लगी है कि लोग हिन्दी विषय पर लिखने या बोलने के लिये किताबों से अधिक इंटरनेट पर सामग्री ढूंढने में अधिक सुविधाजनक स्थिति अनुभव करने लगे हैं।  मूलतः पहले विद्वान तथा युवा वर्ग किसी विषय पर बोूलने या लिखने के लिये किताब ढूंढते थे। इसके लिये लाइब्रेरी या फिर किसी किताब की दुकान पर जाने के अलावा उनके पास अन्य कोई चारा नहीं था।  इंटरनेट के आने के बाद बहुत समय तक लोगों का  हिन्दी के विषय को लेकर यह भ्रम था कि यहां हिन्दी पर लिखा हुआ मिल ही नहीं सकता।  अब जब लोगों को हिन्दी विषय पर लिखा सहजता से मिलने लगा है तो वह किताबों से अधिक यहां अपने विषय से संबंधित सामग्री ढूंढने  लगे हैं।  ऐसे में किसी खास पर्व या अवसर पर संबंधित विषयों पर लिखे गये पाठ जमकर पढ़े जाते हैं। कम से कम एक बात तय रही कि हिन्दी अब इंटरनेट पर अपने पांव फैलाने लगी है।

                        हिन्दी ब्लॉग पर पाठकों की भीड़ का मौसम 14 सितंबर हिन्दी दिवस के अवसर पर अधिक होता है।  ऐसे में पुराने लिखे गये पाठों को लोग पढ़ते हैं।  हमने हिन्दी दिवस बहुत पाठ लिखे हैं पर उस यह सभी उस दौर के हैं जब हमें लगता था कि यहंा पाठक अधिक नहीं है और जो सीमित पाठक हैं वह व्यंजना विधा में कही बात समझ लेते हैं।  उससे भी ज्यादा कम लिखी बात को भी अपनी विद्वता से अधिक समझ लेते हैं।  कहते हैं न कि समझदार को इशारा काफी है।  इनमें कई पाठ तो भारी तकलीफ से अंग्रेजी टाईप से यूनिकोड के माध्यम से  हिन्दी में लिखे गये।  अब तो हिन्दी टाईप के टूल हैं जिससे हमें लिखने में सुविधा होती है। लिखने के बाद संपादन करना भी मौज प्रदान करता है।

                        जिस दौर में अंग्रेजी टाईप करना होता था तब भी हमने बड़े लेख लिखे पर उस समय लिखने में विचारों का तारतम्य कहीं न कहंी टूटता था।  ऐसे में हिन्दी के महत्व पर लिखे गये लेख में हमने क्या लिखा यह अब हम भी नहंी याद कर पाते।  जो लिखा था उस पर टिप्पणियां यह  आती हैं कि आपने इसमें हिन्दी का महत्व तो लिखा ही नहीं।

                        यह टिप्पणी कई बार आयी पर हम आज तक यह नहीं समझ पाये कि हिन्दी का महत्व बताने की आवश्यकता क्या आ पड़ी है? क्या हम इस देश के नहीं है? क्या हमें पता नहीं देश में लोग किस तरह के हैं?

                        ऐसे में जब आप हिन्दी का महत्व बताने के लिये कह रहे हैं तो प्रश्न उठता है कि आपका मानस  अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तरफ तो नहीं है।  आप यह जानना चाहते हैं कि हिन्दी में विशेषाधिकार होने पर आप विदेश में कैसे सम्माजनक स्थान मिल सकता है या नहीं? दूसरा यह भी हो सकता है कि आप देश के किसी बड़े शहर के रहने वाले हैं और आपको छोटे शहरों का ज्ञान नहीं है।  हिन्दी के महत्व को जानने की जरूरत उस व्यक्ति को कतई नहीं है जिसका वर्तमान तथा भावी सरोकार इस देश से रहने वाला है।  जिनकी आंखें यहां है पर दृष्टि अमेरिका की तरफ है, जिसका दिमाग यहां है पर सोचता कनाडा के बारे में है और जिसका दिल यहा है पर ं धड़कता इंग्लैंड के लिये है, उसे हिन्दी का महत्व जानने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस भाषा से उसे वहां कोई सम्मान या प्रेम नहीं मिलने वाला।  जिनकी आवश्यकतायें देशी हैं उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह जानते हैं कि इस देश में रहने के लिये हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान होना आवश्यक है।

                        पहले तो यह समझना जरूरी है कि इस देश में हिन्दी का प्रभाव ही रहना है।  भाषा का संबंध भूमि और भावना से होता है। भूमि और भावना का संबंध भूगोल से होता है। भाषाओं का निर्माण मनुष्य से नहीं वरन् भूमि और भावना से होता है। मनुष्य तो अपनी आवश्यकता के लिये भाषा का उपयोग करता है जिससे वह प्रचलन में बढ़ती है।  हम यह भी कहते हैं कि इंग्लैंड में कभी हिन्दी राज्य नहीं कर सकती क्योंकि वहां इसके लिये कोई भूगोल नहीं है।  जिन लोगों में मन में हिन्दी और इंग्लिश का संयुक्त मोह है वह हिंग्लिश का विस्तार करने के आधिकारिक प्रयासों में लगे हैं। इसमें दो प्रकार के लोग हैं। एक तो वह युवा वर्ग तथा उसके पालक जो चाहते हैं कि उनके बच्चे विदेश में जाकर रोजगार करें।  दूसरे वह लोग जिनके पास आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्तियां हैं तथा वह इधर तथा उधर दोनों तरफ अपना वर्चस्व स्थापित करने की दृष्टि से भारत में स्थित  मानव श्रम का उपयोग अपने लिये करना चाहता है।  एक तीसरा वर्ग भी है जो किराये पर बौद्धिक चिंत्तन करता है और वह चाहता है कि भारत से कुछ मनुष्य विदेश जाते रहें ताकि देश का बोझ हल्का हो और उनके बौद्धिक कौशल का  विदेश में सम्मान हो।

                        हिन्दी रोजगार की भाषा नहीं बन पायी न बनेगी।  हिन्दी लेखकों को दोयम दर्जे का माना जाता है और इसमें कोई सुधार होना संभव भी नहंी लगता।  जिन्हें लिखना है वह स्वांत सुखाय लिखें। हम यहां पर लिखते हैं तो दरअसल क्रिकेट, टीवी धारावाहिकों तथा फिल्मों से मिलने वाले मनोरंजन का वैकल्पिक उपाय ढूंढना ही उद्देश्य होता है।  एक बेकार धारावाहिक या फिल्म देखने से अच्छा यह लगता है कि उतने समय कोई लेख लिखा जाये।  हिन्दी हमारे जैसे योग तथा ज्ञान साधकों के लिये अध्यात्म की भाषा है। हम यहां लिखने का पूरा आनंद लेते हैं। पाठक उसका कितना आनंद उठाते हैं यह उनकी समस्या है।  ऐसे  फोकटिया लेखक है जो अपना साढ़े सात सौ रुपया इंटरनेट पर केवल इसलिये खर्च करता है कि उसके पास मनोरंजन का का दूसरा साधन नहीं है। बाज़ार और प्रचार समूहों के लिये हम हिन्दी के कोई आदर्श लेखक नही है क्योंकि मुफ्त में लिखने वाले हैं।  यह हमारी निराशा नहीं बल्कि अनुभव से निकला निष्कर्ष है। सीधी बात कहें तो हिन्दी का रोजगार की दृष्टि से कोई महत्व नहीं है अलबत्ता अध्यात्मिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसी भाषा का ही महत्व रहने वाला है।

                        विश्व में भौतिकतवाद अपने चरम पर है। लोगों के पास धन, पद तथा प्रतिष्ठा का शिखर है पर फिर भी बेचैनी हैं। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का व्यापार करने वालों की बनकर आयी हैं।  विश्व के अनेक देशों में भारतीय या भारतीय मूल के लोगों ने विज्ञान, साहित्य, राजनीति, कला तथा व्यापार के क्षेत्र में भारी सफलता अर्जित की है और उनके नामों को लेकर हमारे प्रचार माध्यम उछलते भी है।ं पर सच यह है कि विदेशें में बसे प्रतिष्ठित भारती  हमारे देश की पहचान नहंी बन सके हैं।  प्रचार माध्यम तो उनके नामों उछालकर एक तरह से देश के युवाओं को यह संदेश देते हैं कि तुम्हारा यहां कोई भविष्य नहीं है बल्कि बाहर जाओ तभी कुछ होगा। लोगों को आत्मनिर्भर तथा स्वतंत्र जीवन जीने की बजाय उनको विदेशियों  चाकरी के लिये यहां उकसाया जाता है।  सबसे बड़ी बात यह कि आर्थिक उन्नति को ही जीवन का सवौच्च स्तर बताने वाले इन प्रचार माध्यमों से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिये कि वह अध्यात्म के उच्च स्तर का पैमाना बता सकें।

                        यहीं से हिन्दी का मार्ग प्रारंभ होता है।  जिन युवाओं ने अंग्र्रेजी को अपने  भविष्य का माध्यम बनाया है उनके लिये अगर विदेश में जगह बनी तो ठीक, नहंी बनी तो क्या होगा? बन भी गयी तो क्या गारंटी है कि वह रोजगार पाकर भी खुश होगा।  अध्यात्म जिसे हम आत्मा कहते हैं वह मनुष्य से अलग नहीं है। जब वह पुकारता है तो आदमी बेचैन होने लगता है। आत्मा को मारकर जीने वाले भी बहुत है पर सभी ऐसा नहीं कर सकते।  सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो लोग अंग्रेजी के मुरीद हैं वह सोचते किस भाषा में है और बोलते किस भाषा में है यह बात समझ में नहीं आयी। हमने सुना है कि कुछ विद्यालय ऐसे हैं जहां अंग्रेजी में न बोंलने पर छात्रों को प्रताड़ित किया जाता है।  अंग्रेजी में बोलना और लिखना उन विद्यालयों का नियम है। हमें इस बात पर एतराज नहीं है पर प्रश्न यह है कि वह छात्रों के सोचने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। तय बात है कि छात्र पहले हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषा में सोचते और बाद में अंग्रेजी में बोलते होंगे।  जो छात्र अंग्रेंजी में ही सोचते हैं उन्हें हिन्दी भाषा को महत्व बताने की आवश्यकता ही नहीं है पर जो सोचते हैं उन्हें यह समझना होगा कि हिन्दी उनके अध्यात्म की भाषा है जिसके बिना उनका जीवन नारकीय होगा। अतः उन्हें हिन्दी के सत्साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। मुंबईया फिल्मों या हिंग्लिश को प्रोत्साहित करने वाले पत्र पत्रिकायें उनकी अध्यात्मिक हिन्दी भाषा की संवाहक कतई नहीं है।  भौतिक विकास से सुख मिलने की एक सीमा है पर अध्यात्म के विकास बिना मनुष्य को अपने ही अंदर कभी कभी पशुओं की तरह लाचारी का अनुभव हो सकता है। अगर आत्मा को हमेशा सुप्तावस्था में रहने की कला आती हो तो फिर उन्हें ऐसी लाचारी अनुभव नहीं होगी। 

                        हिन्दी में टाईप आना हम जैसे लेखकों के लिये सौभाग्य की बात हो सकती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है कि वह इसे सीखें।  हम न केवल हिन्दी भाषा की शुद्धता की बात करते हैं वरन् हिन्दी टाईप आना भी महत्वपूर्ण मानते हैं।  यह जरूरी नही है कि हमारी बात कोई माने पर हम तो कहते ही रहेंगे।  हिन्दी भाषा जब अध्यात्म की भाषा होती है तब ऐसा आत्मविश्वास आ ही जाता है कि अपनी बात कहें पर कोई सुने या नहीं, हम लिखें कोई पढ़े या नहीं और हमारी सोच का कोई मखौल उड़ाये या प्रशंसा, इन पर सोचने से ही बेपरवाह हो जाते हैं। आखिरी बात यह कि हम हिन्दी के महत्व के रूप में क्या लिखें कि सभी संतुष्ट हों, यह अभी तक नहीं सोच पाये। इस हिन्दी दिवस के अवसर पर फिलहाल इतना ही।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

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६,ईपत्रिका
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राष्ट्रभाषा का महत्व पूछने की नहीं बल्कि देखने की जरूरत -१४ सितम्बर हिंदी दिवस


 

                        हिन्दी दिवस 14 नवंबर 2013 को है पर इस लेखक के बीस ब्लॉग इस विषय पर लिखे गये पाठों पर जमकर पढ़े जा रहे हैं।  पता नहीं कब हमने एक लेख लिख डाला था, जिसका शीर्षक था हिन्दी भाषा का का महत्व समाज कब समझेगा? उस समय इस इतने पाठक नहीं मिले थे जितने अब मिलने लगे हैं। इससे एक बात तो जाहिर होती है कि इंटरनेट पर लोगों का हिन्दी मे रुझान बढ़ गया है, दूसरी यह भी कि हिन्दी दिवस के मनाये जाने का महत्व कम नहीं हुआ है।  एक तीसरी बात भी सामने आने लगी है कि लोग हिन्दी विषय पर लिखने या बोलने के लिये किताबों से अधिक इंटरनेट पर सामग्री ढूंढने में अधिक सुविधाजनक स्थिति अनुभव करने लगे हैं।  मूलतः पहले विद्वान तथा युवा वर्ग किसी विषय पर बोूलने या लिखने के लिये किताब ढूंढते थे। इसके लिये लाइब्रेरी या फिर किसी किताब की दुकान पर जाने के अलावा उनके पास अन्य कोई चारा नहीं था।  इंटरनेट के आने के बाद बहुत समय तक लोगों का  हिन्दी के विषय को लेकर यह भ्रम था कि यहां हिन्दी पर लिखा हुआ मिल ही नहीं सकता।  अब जब लोगों को हिन्दी विषय पर लिखा सहजता से मिलने लगा है तो वह किताबों से अधिक यहां अपने विषय से संबंधित सामग्री ढूंढने  लगे हैं।  ऐसे में किसी खास पर्व या अवसर पर संबंधित विषयों पर लिखे गये पाठ जमकर पढ़े जाते हैं। कम से कम एक बात तय रही कि हिन्दी अब इंटरनेट पर अपने पांव फैलाने लगी है।

                        हिन्दी ब्लॉग पर पाठकों की भीड़ का मौसम 14 सितंबर हिन्दी दिवस के अवसर पर अधिक होता है।  ऐसे में पुराने लिखे गये पाठों को लोग पढ़ते हैं।  हमने हिन्दी दिवस बहुत पाठ लिखे हैं पर उस यह सभी उस दौर के हैं जब हमें लगता था कि यहंा पाठक अधिक नहीं है और जो सीमित पाठक हैं वह व्यंजना विधा में कही बात समझ लेते हैं।  उससे भी ज्यादा कम लिखी बात को भी अपनी विद्वता से अधिक समझ लेते हैं।  कहते हैं न कि समझदार को इशारा काफी है।  इनमें कई पाठ तो भारी तकलीफ से अंग्रेजी टाईप से यूनिकोड के माध्यम से  हिन्दी में लिखे गये।  अब तो हिन्दी टाईप के टूल हैं जिससे हमें लिखने में सुविधा होती है। लिखने के बाद संपादन करना भी मौज प्रदान करता है।

                        जिस दौर में अंग्रेजी टाईप करना होता था तब भी हमने बड़े लेख लिखे पर उस समय लिखने में विचारों का तारतम्य कहीं न कहंी टूटता था।  ऐसे में हिन्दी के महत्व पर लिखे गये लेख में हमने क्या लिखा यह अब हम भी नहंी याद कर पाते।  जो लिखा था उस पर टिप्पणियां यह  आती हैं कि आपने इसमें हिन्दी का महत्व तो लिखा ही नहीं।

                        यह टिप्पणी कई बार आयी पर हम आज तक यह नहीं समझ पाये कि हिन्दी का महत्व बताने की आवश्यकता क्या आ पड़ी है? क्या हम इस देश के नहीं है? क्या हमें पता नहीं देश में लोग किस तरह के हैं?

                        ऐसे में जब आप हिन्दी का महत्व बताने के लिये कह रहे हैं तो प्रश्न उठता है कि आपका मानस  अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तरफ तो नहीं है।  आप यह जानना चाहते हैं कि हिन्दी में विशेषाधिकार होने पर आप विदेश में कैसे सम्माजनक स्थान मिल सकता है या नहीं? दूसरा यह भी हो सकता है कि आप देश के किसी बड़े शहर के रहने वाले हैं और आपको छोटे शहरों का ज्ञान नहीं है।  हिन्दी के महत्व को जानने की जरूरत उस व्यक्ति को कतई नहीं है जिसका वर्तमान तथा भावी सरोकार इस देश से रहने वाला है।  जिनकी आंखें यहां है पर दृष्टि अमेरिका की तरफ है, जिसका दिमाग यहां है पर सोचता कनाडा के बारे में है और जिसका दिल यहा है पर ं धड़कता इंग्लैंड के लिये है, उसे हिन्दी का महत्व जानने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस भाषा से उसे वहां कोई सम्मान या प्रेम नहीं मिलने वाला।  जिनकी आवश्यकतायें देशी हैं उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह जानते हैं कि इस देश में रहने के लिये हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान होना आवश्यक है।

                        पहले तो यह समझना जरूरी है कि इस देश में हिन्दी का प्रभाव ही रहना है।  भाषा का संबंध भूमि और भावना से होता है। भूमि और भावना का संबंध भूगोल से होता है। भाषाओं का निर्माण मनुष्य से नहीं वरन् भूमि और भावना से होता है। मनुष्य तो अपनी आवश्यकता के लिये भाषा का उपयोग करता है जिससे वह प्रचलन में बढ़ती है।  हम यह भी कहते हैं कि इंग्लैंड में कभी हिन्दी राज्य नहीं कर सकती क्योंकि वहां इसके लिये कोई भूगोल नहीं है।  जिन लोगों में मन में हिन्दी और इंग्लिश का संयुक्त मोह है वह हिंग्लििश का विस्तार करने के आधिकारिक प्रयासों में लगे हैं। इसमें दो प्रकार के लोग हैं। एक तो वह युवा वर्ग तथा उसके पालक जो चाहते हैं कि उनके बच्चे विदेश में जाकर रोजगार करें।  दूसरे वह लोग जिनके पास आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्तियां हैं तथा वह इधर तथा उधर दोनों तरफ अपना वर्चस्व स्थापित करने की दृष्टि से भारत में स्थित  मानव श्रम का उपयोग अपने लिये करना चाहता है।  एक तीसरा वर्ग भी है जो किराये पर बौद्धिक चिंत्तन करता है और वह चाहता है कि भारत से कुछ मनुष्य विदेश जाते रहें ताकि देश का बोझ हल्का हो और उनके बौद्धिक कौशल का  विदेश में सम्मान हो।

                        हिन्दी रोजगार की भाषा नहीं बन पायी न बनेगी।  हिन्दी लेखकों को दोयम दर्जे का माना जाता है और इसमें कोई सुधार होना संभव भी नहंी लगता।  जिन्हें लिखना है वह स्वांत सुखाय लिखें। हम यहां पर लिखते हैं तो दरअसल क्रिकेट, टीवी धारावाहिकों तथा फिल्मों से मिलने वाले मनोरंजन का वैकल्पिक उपाय ढूंढना ही उद्देश्य होता है।  एक बेकार धारावाहिक या फिल्म देखने से अच्छा यह लगता है कि उतने समय कोई लेख लिखा जाये।  हिन्दी हमारे जैसे योग तथा ज्ञान साधकों के लिये अध्यात्म की भाषा है। हम यहां लिखने का पूरा आनंद लेते हैं। पाठक उसका कितना आनंद उठाते हैं यह उनकी समस्या है।  ऐसे  फोकटिया लेखक है जो अपना साढ़े सात सौ रुपया इंटरनेट पर केवल इसलिये खर्च करता है कि उसके पास मनोरंजन का का दूसरा साधन नहीं है। बाज़ार और प्रचार समूहों के लिये हम हिन्दी के कोई आदर्श लेखक नही है क्योंकि मुफ्त में लिखने वाले हैं।  यह हमारी निराशा नहीं बल्कि अनुभव से निकला निष्कर्ष है। सीधी बात कहें तो हिन्दी का रोजगार की दृष्टि से कोई महत्व नहीं है अलबत्ता अध्यात्मिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसी भाषा का ही महत्व रहने वाला है।

                        विश्व में भौतिकतवाद अपने चरम पर है। लोगों के पास धन, पद तथा प्रतिष्ठा का शिखर है पर फिर भी बेचैनी हैं। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का व्यापार करने वालों की बनकर आयी हैं।  विश्व के अनेक देशों में भारतीय या भारतीय मूल के लोगों ने विज्ञान, साहित्य, राजनीति, कला तथा व्यापार के क्षेत्र में भारी सफलता अर्जित की है और उनके नामों को लेकर हमारे प्रचार माध्यम उछलते भी हैं। पर सच यह है कि विदेशें में बसे प्रतिष्ठित भारती  हमारे देश की पहचान नहीं बन सके हैं।  प्रचार माध्यम तो उनके नामों उछालकर एक तरह से देश के युवाओं को यह संदेश देते हैं कि तुम्हारा यहां कोई भविष्य नहीं है बल्कि बाहर जाओ तभी कुछ होगा। लोगों को आत्मनिर्भर तथा स्वतंत्र जीवन जीने की बजाय उनको विदेशियों  चाकरी के लिये यहां उकसाया जाता है।  सबसे बड़ी बात यह कि आर्थिक उन्नति को ही जीवन का सवौच्च स्तर बताने वाले इन प्रचार माध्यमों से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिये कि वह अध्यात्म के उच्च स्तर का पैमाना बता सकें।

                        यहीं से हिन्दी का मार्ग प्रारंभ होता है।  जिन युवाओं ने अंग्रेंजी को अपने  भविष्य का माध्यम बनाया है उनके लिये अगर विदेश में जगह बनी तो ठीकनहीं बनी तो क्या होगा? बन भी गयी तो क्या गारंटी है कि वह रोजगार पाकर भी खुश होगा।  अध्यात्म जिसे हम आत्मा कहते हैं वह मनुष्य से अलग नहीं है। जब वह पुकारता है तो आदमी बेचैन होने लगता है। आत्मा को मारकर जीने वाले भी बहुत है पर सभी ऐसा नहीं कर सकते।  सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो लोग अंग्रेजी के मुरीद हैं वह सोचते किस भाषा में है और बोलते किस भाषा में है यह बात समझ में नहीं आयी। हमने सुना है कि कुछ विद्यालय ऐसे हैं जहां अंग्रेजी में न बोंलने पर छात्रों को प्रताड़ित किया जाता है।  अंग्रेजी में बोलना और लिखना उन विद्यालयों का नियम है। हमें इस बात पर एतराज नहीं है पर प्रश्न यह है कि वह छात्रों के सोचने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। तय बात है कि छात्र पहले हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषा में सोचते और बाद में अंग्रेजी में बोलते होंगे।  जो छात्र अंग्रेंजी में ही सोचते हैं उन्हें हिन्दी भाषा को महत्व बताने की आवश्यकता ही नहीं है पर जो सोचते हैं उन्हें यह समझना होगा कि हिन्दी उनके अध्यात्म की भाषा है जिसके बिना उनका जीवन नारकीय होगा। अतः उन्हें हिन्दी के सत्साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। मुंबईया फिल्मों या हिंग्लिश को प्रोत्साहित करने वाले पत्र पत्रिकायें उनकी अध्यात्मिक हिन्दी भाषा की संवाहक कतई नहीं है।  भौतिक विकास से सुख मिलने की एक सीमा है पर अध्यात्म के विकास बिना मनुष्य को अपने ही अंदर कभी कभी पशुओं की तरह लाचारी का अनुभव हो सकता है। अगर आत्मा को हमेशा सुप्तावस्था में रहने की कला आती हो तो फिर उन्हें ऐसी लाचारी अनुभव नहीं होगी। 

                        हिन्दी में टाईप आना हम जैसे लेखकों के लिये सौभाग्य की बात हो सकती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है कि वह इसे सीखें।  हम न केवल हिन्दी भाषा की शुद्धता की बात करते हैं वरन् हिन्दी टाईप आना भी महत्वपूर्ण मानते हैं।  यह जरूरी नही है कि हमारी बात कोई माने पर हम तो कहते ही रहेंगे।  हिन्दी भाषा जब अध्यात्म की भाषा होती है तब ऐसा आत्मविश्वास आ ही जाता है कि अपनी बात कहें पर कोई सुने या नहीं, हम लिखें कोई पढ़े या नहीं और हमारी सोच का कोई मखौल उड़ाया या प्रशंसा, इन पर सोचने से ही बेपरवाह हो जाते हैं। आखिरी बात यह कि हम हिन्दी के महत्व के रूप में क्या लिखें कि सभी संतुष्ट हों, यह अभी तक नहीं सोच पाये। इस हिन्दी दिवस के अवसर पर फिलहाल इतना ही।

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

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लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
५,हिन्दी पत्रिका
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७.जागरण पत्रिका

हिंदी दिवस पर लेख-समाज की असहिष्णुता रोकती है अभिव्यक्ति की आज़ादी


         इधर हिन्दी दिवस आने वाला है और उधर देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस चल रही है। किसी एक कार्टूनिस्ट को कथित रूप से देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। इससे भारतीय बौद्धिक जगत में उत्तेजना का प्रचार पूरे देश के टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में हो रहा है। भारत के अंग्रेजी छाप बुद्धिजीवी याचक बनकर अभिव्यक्ति की आजादी का नारा लगा रहे हैं तो उनके अनुयायी हिन्दी विद्वान भी उनके पीछे हो लिये हैं। हिन्दी के लेखक और विद्वानो की त्रासदी यह है कि वह अंग्रेजी की सामग्री का अनुवाद कर लिखें तो कोई बात नहीं पर वह तो सोच का भी अनुवाद अपने मस्तिष्क करते हैं। वह ऐसे ही सोचते हैं जैसे कि अंग्रेजी वाले उनके लिये प्रेरक ढांचा बनाते हैं। इसका कारण यह है कि प्रतिष्ठित हिन्दी लेखक और विद्वान अपने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर सोचते और लिखते हैं। अंग्रेजी भाषा हो प्रवृत्ति हमें गुलामी की तरफ ले जाती है इसलिये हिन्दी वाले केवल नारे लगाते हुए रह जाते हैं।
         इस विषय पर लिखने का मन नहीं था। कारण यह कि हमारे लेख जिस तरह चुराये जाते हैं उससे सदमा लगता है। प्रकाशन तथा प्रसारण माध्यमों में स्थापित विद्वान और लेखक हम जैसे अप्रसिद्ध लेखकों के विचार चुराकर भी लिखते हैं। खैर, यहां हिन्दी में अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में नहीं लिखा जा रहा है। लिखने और बोलने वालों को आजादी दो यह नारा नहीं लगाया जा रहा है। हम तो यहां स्पष्ट रूप से यह कहना चाहते हैं कि आम आदमी की निजता का सम्मान होना चाहिए। अभी हाल ही में पंजाब में एक लड़की को पुलिस वालों ने पूछताछ के लिये रोका उसके साथ लड़का था। उसी समय एक टीवी चैनल के दल ने अपनी सनसनीखेज खबर बनाने के लिये अपना कैमरा वहां लगा दिया। लड़की ने कैमरे का विरोध किया पर चैनल वाले नहीं माने। वह लड़की वहां से भागती चली गयी और कुछ देर बाद ही उसने रेल से कटकर आत्महत्या कर ली। यह उस आम लड़की की निजता पर प्रहार था जिसे किसी हालत में भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहां अभिव्यक्ति की आजादी पर वही लोग प्रहार करते दिखे जो आज उसकी याचना के लिये नारे लगा रहे हैं। आजकल लड़के लड़के परेशान हाल हैं। ऐसे में अगर उनमें कोई आपस व्यक्तिगत तालमेल बनता है तो यह उनकी निजी अभिव्यक्ति है। उनका पीछा करना अभिव्यक्ति पर प्रहार है। अलबत्ता प्रचार माध्यमों को सार्वजनिक विषयों, संगठनों और व्यक्तियों पर सभ्यता के दायरे में की गयी टिप्पणियों से रोकना नहीं चाहिए। दूसरी बात यह कि जो सार्वजनिक क्षेत्र में – जिसमें निजी कंपनियां, संगठन तथा कला साहित्य से जुड़े लोग भी शामिल हैं-उन लोगों को अपने अंदर सहिष्णुता पैदा करने का प्रयास करना चाहिए। उनका मजाक भी बन सकता है और निंदा भी हो सकती है। समर्थन पर प्रसन्नता दिखाने के साथ ही विरोध का तार्किक प्रतिकार का सामार्थ्य हो तो ही सार्वजनिक क्षेत्र में आयें नहीं तो घर बैठकर निजी उद्यम कर अपना जीवन निर्वाह करें।
               देश के हर नागरिक को देश के झंडे, संविधान, न्यायपालिका तथा महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों को सम्मान से देखना चाहिए यह बात ठीक है मगर यह भी सच है कि जो व्यक्ति जिस विषय से प्रसन्न होता है उसकी प्रशंसा करता है जिससे अप्रसन्न होता है उसे गालियां देता है या मजाक बनता है। हम जैसे लोग देश के संविधान, झंडे और न्यायपालिका का सम्मान करते हैं क्योंकि हमें इससे अपने परिवार तथा संपूर्ण समाज का हित होता दिख रहा है मगर जिनको इससे अपना या समाज का हित नहीं दिखता उनका क्या? हम जैसे लोग उनकी मजाक की निंदा करेंगे उनको विरोध में तर्क देंगे पर यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनके खिलाफ कोई दैहिक या मानसिक प्रताड़ना वाली कार्यवाही हो। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोग सभी को प्रसन्न नहीं रख सकते। संविधान सभी के हित की बात करता है पर इतने बड़े देश में ऊंच नीच होता रहता है। न्यायाधीश लोग सबूत के आधार पर निर्णय देते हैं। ऐसे में उनके निर्णयों में किसी को गुण तो किसी को दोष भी दिख सकता है। जिसके पक्ष में फैसला आता है वह प्रसन्नता से सत्यमेव जयते बोलता है और जिसके विपक्ष में आता है वह असत्यमेव जयते की दुहाई देता है। चाहे कुछ भी यह उसकी अभिव्यक्ति है। उसे सहजता से बहते देना चाहिए।
           यह आजादी का प्रश्न नहीं है वरन् असंतुष्ट आदमी की अभिव्यक्ति रोकना ही अपने आप में अनुचित कार्य है।
कहने का अभिप्राय यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों को आमजनों में अपने समर्थन तथा विरोध के साथ ही मजाक सहन करना पड़ सकता है। ऐसी मनस्थिति के लोग ही सार्वजनिक क्षेत्र में आकर काम करें, कंपनियां बनायें या कला साहित्य से जुड़ी समितियां उनको अपने अंदर सहिष्णुता पैदा करना होगी। यह बात कोई विद्वान नहीं कह पा रहा है। इसका कारण यह कि हिन्दी जगत में प्रायोजित लोगों की भरमार है और उनसे ऐसी अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। बहरहाल हिन्दी पखवाड़ा प्रारंभ हो चुका है और आगे भी इस विषय पर हम लिखेंगे।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

http://rajlekh.blogspot.com 

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इस पत्रिका ने पार की दो लाख पाठक/पाठ पठन संख्या-हिन्दी संपादकीय (it blog and his vews number cross 2 lakh-hindi editorial)


          दीपक भारतदीप समूह के इस‘शब्द लेख पत्रिका’ ब्लाग/पत्रिका ने पाठक/पाठ पठन संख्या दो लाख पार कर ली। इस समूह का यह पांचवा ब्लाग है जिसने यह संख्या पार की है। यह ब्लाग भी वर्डप्रेस पर ही बना है। अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि ब्लॉग स्पॉट के ब्लाग के मुकाबले वर्डप्रेस के ब्लाग अधिक पाठक संख्या क्यों जुटाते हैं। इसका कारण शायद यह है कि वर्डप्रेस पर अपने पाठ के साथ लेबल या मुंह कहें या टैग या पूंछ कहें अधिक संख्या में लगाने की सुविधा है जिनसे पाठों को सर्च इंजिन पर अधिक पाठक मिल जाते हैं। बीच में अधिक लेबल लगाने की सुविधा ब्लॉग स्पॉट के ब्लॉग पर मिली थी पर पता नहीं अचानक वह बंद हो गयी।
शुरुआती दौर में यह लगा था इंटरनेट पर ब्लॉग लिखने से कोई हिन्दी जगत का नया रूप सामने आयेगा पर वह अभी तक परिलक्षित नहीं हुआ। मुख्य विषय यह है कि हिन्दी भाषी अधिक संख्या होने के बावजूद भारत में इंटरनेट पर हिन्दी के पाठक अत्यंत कम हैं जो हैरान करती है। कम से कम हम जैसे आम लेखक के लिये स्वांत सुखाय लिखने के अलावा कोई अन्य प्रेरणा नहीं है। अब यह हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों की मानसिकता है या बाज़ार की थोपी गयी बाध्यता कि उसे शुद्ध हिन्दी लेखक तब तक रास नहीं आता जब तक लेखन से इत्तर उसके पास अन्य कोई उपलब्धि न हो। लेखक अगर नेता, अभिनेता, समाज सेवी, धार्मिक गुरु या फिर पूंजीपति हो तो उसे समाज पढ़ने के लिये तैयार है। इसके अलावा वह अंग्रेजी में श्रेष्ठता साबित कर हिन्दी में अनुवाद होकर छपे तो भी वह स्वागतयोग्य है। अगर कोई आम जीवन वाला मनुष्य है और हिन्दी में लेखन करता है तो वह भाषाई दृष्टि से वह सराहनीय नहीं है। मतलब उसे जीवन में सिद्ध होना चाहिए तभी उसका लेखन भी पठनीय है।
           हम लिखे जा रहे हैं इस बात की परवाह किये बिना कि उसकी कोई प्रशंसा करता है या नहीं। अलबत्ता ऐसा लगता जरूर है कि कहीं न कहंीं ऐसे लोग हमारे ब्लॉग पढ़ते हैं जो फिर उनको अपने विचार बताकर प्रस्तुत करते हैं। कभी कभी तो लगता है कि बड़े लोग स्वयं या उनके अनुयायी इसे पढ़कर अपनी रणनीति भी बनाते हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के चुनावी राजनीति की तरफ मुड़ने की संभावना इसी ब्लाग समूह पर व्यक्त की गयी थी। यह हुआ भी। उस समय समाचार पत्र या चैनल में किसी विद्वान ने उस पाठ को पढ़ लिया होता तो वह तत्काल व्यक्त कर देता। आज की तारीख में उसकी जयजयकार होती। संभव तो यह भी लगता है कि अन्ना के ही किसी अनुयायी ने उसे अवश्य पढ़ा होगा और व्यक्त संभावना को भविष्य की रणनीति बना लिया हो। संभव है कि यह हमारी आत्ममुग्धता हो पर इतना तय है कि हम जैसे आम लेखक की उपेक्षा करने की वजह से ही हिन्दी भाषा के व्यवसायिक क्षेत्र में ऐसे मुखौटे छा गये हैं जिनकी चिंत्तन क्षमता भी केवल तत्कालिक मुद्दों भी क्षणिक रूप सीमित है। हिन्दी में गंभीर तथा सुरुचिपूर्ण लेखन नहीं होता यह शिकायत गलत है बल्कि बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों की आत्ममुग्धता इसके लिये जिम्मेदार है यह बात अब हमारे समझ में आने लगी है। आम पाठक को दोष देना बेकार है क्योंकि वह बाज़ार और प्रचार के संयुक्त ढांचों पर ही निर्भर है। इंटरनेट में तकनीकी समस्या है और कंप्यूटर बेचने वाली तथा इंटरनेट चलाने वाली कंपनियों को हिन्दी से पैसा तो चाहिए पर उसके लेखकों की सहायता करना उनके लक्ष्यों में शािमल नहीं है। इसके अलावा पाठकों तथा प्रयोक्ताओं को प्रथक से कोई बेहतर सामग्री देने की भी उनकी कोई योजना नहीं है। ऐसे में आम हिन्दी ब्लाग लेखक और पाठकों के बीच सर्च इंजिन ही एक पुल है। उसमें भी याहू तो किसी तरह हिन्दी का मददगार नहीं है। इसके अलावा गूगल ने तो ब्लॉग तक पहुंचने के रास्ते बनाये हैं पर याहू तो एकदम खामोश है। हिन्दी सर्च इंजिनों में रफ्तार और गुरुजी चल रहे हैं पर जनमानस को इसके बारे में अधिक नहीं मालुम।
           बहरहाल हम पाठ लिखते हैं तो पाठक पढ़ता है। हमारा पाठ भी उनको पढ़कर बता जाता है कि उसे किस तरह पढ़ा गया। अपने अनुभवों में सबसे अधिक हमें जिस बात ने चौंकाया है वह यह कि जब देश में क्लब स्तरीय प्रतियोगितायें होती हैं तब यहां पाठक संख्या तीस से चालीस प्रतिशत तक गिर जाती है। फिक्सिंग के आरोपों के चलते हम क्रिकेट कम ही देखते हैं और जब अचानक पाठक संख्या कम दिखती है तो दो तीन तक तो सोचते नहीं और बाद में पता चलता है कि यह सब चैंपियन लीग और आईपीएल की वजह से हुआ है। इससे पता चलता है कि भारत में लोग मनोरंजन का लंबा घटनाक्रम चाहते हैं और क्रिकेट जैसा सुस्त खेल उनको इसकी सुविधा प्रदान करता है। इस पर बीस ओवरीय मैचों में चौके छक्के अधिक लगने से लोग ज्यादा मनोरंजन लेते हैं। बाज़ार और प्रचार समूहों के पास क्रिकेट एक ऐसा हथियार लग गया है जिसे वह समय के अनुसार परिवर्तन कर अपने लिये आय के साधन जुटा लेते हैं। ऐसे में फिक्सिंग के आरोप भी इस खेल से लोगों को विरक्त नहीं कर पाये। यही कारण है कि 14 सितम्बर हिन्दी के दिवस आसपास जहां इस ब्लाग समूह के 20 ब्लाग जहां एक दिन में नौ हजार के आसपास पाठक/पाठ पठन संख्या जुटा रहे थे अब दो हजार की संख्या पार करने को भी तरस गये हैं। उस समय दीपक बापू कहिन अकेला ही इस संख्या के पास था। चैपियन लीग के चलते सब गड़बड़ हो गया। बहरहाल यह शिकायत नहीं है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसका हम पहले भी उल्लेख कर चुके हैं पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
        ‘शब्दलेख पत्रिका’ को दो लाख पर करना कोई बड़ी बात नहीं है पर इसका उल्लेख इसलिये भी करना जरूरी है ताकि हिन्दी ब्लाग जगत के विश्लेषक उसे देख सकें। पाठक भी यह बात समझें कि वह अकेले ही हिन्दी ब्लाग पर सक्रिय नहीं है बल्कि उनकी गतिविधियों का सकारात्मक प्रभाव लेखक पर पड़ता है। इस पर सभी साथी ब्लाग लेखकों और पाठकों धन्यवाद करते हुए इस बात का वादा करते हैं कि अपने निष्काम प्रयास करते हुए निष्प्रयोजन लेखन दान हम करते रहेंगे।
दीपक भारतदीप
         नीचे वह लेख  अवश्य   पढ़ें जो दीपक बापू कहिन पर अन्ना हजारे के आद्नोलन के राजनीती की तरफ बढ़ने  की संभावना व्यक्त की गयी थी ।              
अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे)  का अनशन समाप्त होने का मतलब-हिन्दी संपादकीय लेख (anna hazare ka anshan samapt hone ka matlab-hindi editorial article or lekh)
अन्ना हजारे का अनशन समाप्त होने पर पूरे देश में जश्न मनाया जा रहा है। कोई इसे लोकतंत्र की जीत बता रहा है तो किसी का दावा है कि इस लोकचेतना का संचार हुआ है। भ्रष्टाचार रोकने के लिये जनलोकपाल बनाने को लेकर महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे ने 12 दिन तक जमकर अनशन किया। अंततः कुछ आश्वासनों पर हजारे साहब ने बड़े राजनीतिक चातुर्य के साथ आधी जीत बताकर उसे समाप्त कर दिया। संविधान और राजनीतिक विश्लेषकों की बात माने तो आधी जीत तो दूर अभी उनका अभियान अपनी जगह से एक इंच हिला भी नहीं है। इतना ही नहीं अब कथित रूप से गैरराजनीतिक होने का दावा करने वाली उनकी कथित ‘अन्ना टीम’ अंततः परंपरागत राजीनीतिक दलों के शिखर पुरुषों में की दरबार में मदद मांगने भी जा पहंुची। जब देश में कानून बनाने में संसद सर्वोपरि है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वह दलीय राजनीतिक दलों के आधार पर ही गठित होती है। ऐसे में उनके साथ संवाद करना उस आदमी के लिये भी जरूरी होता है जो स्वयं गैरराजनीतिक है पर किसी जनसमस्या का हल चाहता है। दूसरी बात यह है कि अगर कोई समूह अपने मनपसंद का कानून बनाना चाहता है तो उसके पास चुनाव लड़ना ही एक जरिया है। किसी गैर राजनीतिक आंदोलन के माध्यम से कानून बनाना एक आत्ममुग्ध प्रक्रिया हो सकती है जिससे परिणाम प्रकट नहीं होता चाहे नारे कितने भी लग जायें। अन्ना की टीम यह जानती है और ऐसा लगता है कि कहंी न कहीं भविष्य के चुनाव उसकी नजर में है।
          अब हम जो देख रहे हैं तो लग रहा है कि अन्ना हजारे और अन्ना टीम दो अलग अलग केंद्र बन गये हैं। अन्ना टीम के सदस्य पेशेवर अभियानकर्ता हैं जबकि अन्ना स्वयं एक फकीर हैं। अलबत्ता राजनीतिक चातुर्य उनमें कूटकूटकर भरा ही यही कारण है कि उन्होंने पेशेवर अभियानकताओं की दाल नहीं गलने दी। इससे हुआ यह कि एक स्वामी नामधारी एक पेशेवर अभियानकर्ता उनसे नाराज हो गया। उसका सीडी जारी हो गया है जिसमें वह अपने किसी मित्र के साथ सहयोगियों की निंदा कर रहा है। सच तो यह है कि उसके शामिल होने की वजह से लोग इस आंदोलन को अनेक बुद्धिजीवी शक की नजर से देख रहे थे। कहने को वह जोगिया वस्त्र पहनता है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की निंदा उसके श्रीमुख से कई बार सुनी गयी है। उस पर यह आरोप लगता है कि वह समाज सेवा की आड़ के केवल दिखावा करता है। हमारा उसके चरित्र से मतलब नहीं है पर इतना जरूर अब लग रहा है कि आने वाले समय में अन्ना टीम को अनेक तरह के सवालों का सामना करना पड़ेगा।
       अन्ना हजारे ने कहा था कि यह आधी जीत है। लोग फूल रहे हैं। जश्न बनाये जा रहे हैं। विवेकशील लोगों के लिये इतना ही बहुत है कि अन्ना जी ने अनशन तोड़ दिया। दूसरी बात यह भी लग रही है परंपरागत समाज सेवी और राजनीतिक संगठन अब चेत गये हैं। अभी तक वह देश के जनमानस में फैले असंतोष का शायद सही अनुमान नहीं कर पाये थे जो अन्ना के अनशन के लिये शक्ति बना और अन्ना टीम उसके आधार पर ऐसा व्यवहार करने लगी कि वह कोई संवैधानिक संगठन है। वैसे हम यहां साफ कर दें कि इस अनशन की समाप्ति से कोई हारा नहीं है कि किसी को विजेता बताया जाये। अलबत्ता प्रचार माध्यमों के लिये यह अनशन महान कमाई का साधन बन गया। पूरे पंद्रह दिन तक उन्होंने इस प्रकरण को जिस तरह चलाया वह आश्चर्यजनक लगता है। अलबत्ता इस चक्कर में उन्होंने देश के संविधानिक संगठनों के महत्व को कम कर दिखाया। आज तो सारे चैनल दूसरी आजादी का जश्न मना रहे हैं। अब इस आजादी का मतलब कौन पूछे?
        भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों के लिये यह एक दो दिन आत्म मंथन का समय है जब उनको प्रचार माध्यम हाशिए पर बैठा दिखा रहे हैं। विवेकवान लोग जानते हैं कि भारतीय संसद और सत्ता प्रतिष्ठान में अनेक बुद्धिमान लोग सक्रिय हैं। शीर्ष पदों पर है और अपनी चतुराई से उन्होंने इस आंदोलन की हवा निकाल दी है। यह अलग बात है कि इस आंदोलन की वजह से उनके मन में अब तेजी से जनकल्याण का भाव आया लगता है। इसमें कोई शक नहीं है कि हमारा संविधान हैं तो हम बचे हुए हैं और संसद और सत्ता प्रतिष्ठान कहीं न कहीं हमारे चुने हुए लोगों की सक्रियता के कारण चल रहे हैं।
पिछले 15 दिनों से परंपरागत राजनीतिक संगठन को शीर्ष पुरुषों ने शायद बहुत तनाव झेला होगा पर अब वह यकीनन चेत गये होंगे। अन्ना साहेब भले हैं पर उनकी टीम का का व्यवहार राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हैं। सबसे बड़ी बात यह कि अन्ना अकेले अनशन कर रहे थे पर यह अन्ना की टीम केवल राजनीति करती दिखी। ऐसा लगा कि अन्ना का अनशन उनकी निजी जागीर हो। अभी एक स्वामी की हवा निकली है और अब उनका सामना देश के समस्त परंपरागत राजनीतिक संगठनों से होगा तो पता नहीं कितनों की हवा निकल जायेगी।     आखिरी बात यह है कि इस गलत फहमी में किसी को नहीं रहना चाहिए कि अन्ना टीम कोई हाथ पर हाथ धरे बैठेगी। ऐसा लगता है कि अगले चुनाव में इसके लोग मैदान में भी उतर सकते हैं। परंपरागत राजनीतिक दलों को उनकी इस बात पर यकीन नहीं करना चाहिए वह गैरराजनीतिक लोग हैं। दरअसल अन्ना टीम धीरे धीरे परंपरागत राजनीतिक संगठनों को अप्रासंगिक दर्शाते हुए जनता में उनकी छवि खराब करेगी फिर आखिर यही कहेगी कि चुनाव में हमें जितवाने के अलावा जनता के पास कोई चारा नहीं है।
          विवेकशील पुरुष इस बात से खुश हैं कि अन्ना साहेब के अनशन से देश भर में उपजा तनाव खत्म हो गया है पर जिस तरह इसकी कथित विजय पर जश्न मन रहा है वह शक पैदा करता है कि वाकई यह कोई भ्रष्टाचार की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाले हैं। अब तो मामला चुनाव सुधार की तरफ मुड़ गया है। अन्ना साहेब भले हैं पर अपना राजनीतिक इस्तेमाल होने देते हैं। कोई उनको चला नहीं सकता यह सच है पर अपनी राजनीतिक मौज के चलते वह अपने चेलों की सहायता करते हैं। वह कहते हैं कि वह महात्मा गांधी के अनुयायी हैं और यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी छवि राजनीतिक संत की रही है। अन्ना साहब की वाक्पटुता गजब की है और उनका एक एक वाक्य जनमानस में प्रभाव डालता है। जब वह कहते हैं कि अभी अनशन स्थगित किया है खत्म नहीं किया तो समझना चाहिए कि उनकी राजनीतिक मौज का सिलसिला जारी रहेगा। यह स्पष्ट है कि अनशन की समाप्ति पर वह विवेकवान लोगों के नजरिये को समझते हैं पर यह भी जानते हैं कि उनके नाम से जुटी भीड़ नारों पर चलने और वादों में बहने वाली है इसलिये उसे अपने साथ बनाये रखने के लिये यह अहसास दिलाना जरूरी है कि आधी ही सही जीत जरूर हुई है।

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होना स्वागतयोग्य-हिन्दी लेख (end of anna hazare fast and agitation-hindi lekh or article)               
       महाराष्ट्र के समाज सेवी अन्ना हजारे आज पूरे देश के जनमानस में ‘महानायक’ बन गये हैं। वजह साफ है कि देश में जन समस्यायें विकराल रूप ले चुकी हैं और इससे उपजा असंतोष उनके आंदोलन के लिये ऊर्जा का काम कर रहा है। पहले अप्रैल में उन्होंने अनशन किया और फिर अगस्त माह में उन्होंने अपने अनशन की घटना को दोहराया। जब अप्रेल   में उन्होंने अनशन आश्वासन समाप्त किया तब उनका मजाक उड़ाया गया था कि वह तो केवल प्रायोजित आंदोलन चला रहे हैं। अब की बार उन्होंने 12 दिन तक अनशन किया। इस अनशन से भारत ही नहीं बल्कि विश्व जनमानस पर पड़े प्रभावों का अध्ययन अभी किया जाना है क्योंकि इस प्रचार विदेशों तक हुआ है। फिर जिन लक्ष्यों को लेकर यह अनशन किया गया उनके पूरे होने की स्थिति अभी दूर दिखाई देती है मगर देश के चिंतकों के लिये इस समय उनकी उपेक्षा करना ही ठीक है। अन्ना हजारे के अनशन आंदोलित पूरे देश के लोगों ने उसकी समाप्ति पर विजयोन्माद का प्रदर्शन किया पर महानायक ने कहा‘‘यह जीत अभी अधूरी है और अभी मैंने अनशन स्थगित किया है समाप्त नहीं।’ इस बयान से एक बात तो समझ में आती है कि अन्ना साहेब में राजनीतिक चातुर्य कूट कूटकर भरा है।

              अन्ना साहेब के बारह दिनों तक चले अनशन में तमाम उतार चढ़ाव आये और अगर उनका उसे छोड़ना ही सफलता माना जाये तो कोई बुरी बात नहीं है। साथ ही लक्ष्य से संबंधित परिणामों पर दृष्टिपात न करना भी ठीक है। पूरे देश का जनमानस ही नहीं जनप्रतिनिधियों के मन में जो भारी तनाव इस दौरान दिखा वह चौंकाने वाला था। इसका कारण यह था कि हिन्दी प्रचार माध्यम निरंतर इससे जुड़े छोटे से छोटे से घटनाक्रम का प्रचार क्रिकेट मैच की तरह कर रहे थे गोया कि देश में अन्य कोई खबर नहीं हो।
            अगर हम तकनीकी दृष्टि से बात करें तो अन्ना साहेब के प्रस्तावित जनलोकपाल ने अभी एक इंच कदम ही बढ़ाया होगा पर अन्ना साहेब की गिरते स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह भारी सफलता है। हम तत्काल इस आंदोलन के परिणामों पर विचार कर सकते हैं पर ऐसे में हमारा चिंत्तन इसके दूरगामी प्रभावों को देख नहीं पायेगा।  इस आंदोलन के लेकर अनेक विवाद हैं पर यह तो इसके विरोधी भी स्वीकारते हैं कि इसके प्रभावों का अनदेखा करना ठीक नहीं है।
         प्रधानमंत्री श्रीमनमोहन सिंह की चिट्ठी मिलने के बाद श्री अन्ना साहेब न अनशन तोड़ा। अपने पत्र में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यह अच्छी बात कही है कि ‘संसद ने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है जो कि देश के लोगों की भी है।’’
           उनकी इस बात में कोई संदेह नहीं है और इस विषय पर संसद के शनिवार को अवकाश के दिन विशेष सत्र में सांसदों ने जिस तरह सोच समझ के साथ ही दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने विचार जिस तरह दिये वह इसका प्रमाण भी है। संभव है विशेषाधिकार के कारण कुछ सांसदों के मन में अहंकार का भाव रहता हो पर कल सभी के चेहरे और वाणी से यही भाव दिखाई देता कि किस भी भी तरह इस 74 वर्षीय व्यक्ति का अनशन टूट जाये जो कि इस देश के जनमानस का ही भाव है। सच बात तो यह है कि इस बहस में आंदोलन से जुड़े संबंधित सभी तत्वों का सार दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रचार माध्यमों के सहारे इस आंदोलन की सफलता की बात कही गयी। अनेक सांसदों ने इस आंदोलन के उन देशी विदेशी पूंजीपतियों से प्रायोजित होने की बात भी कही जो भारत की संसदीय प्रणाली पर नियंत्रण करना चाहते हैं। इसके बावजूद सभी ने श्री अन्ना हजारे के प्रति न केवल सभी ने सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके चरित्र की महानता को स्वीकार भी किया। देश के जनमानस का अब ध्यान करना होगा यह बात कमोबेश सभी सांसदों  ने स्वीकार की और इस आंदोलन के अच्छे परिणाम के रूप में इसे माना जा सकता है।
           देश के जिन रणनीतिकारों ने इस विषय पर संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बनाई हो वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि श्री अन्ना साहेब की वजह से देश के युवा वर्ग ने उसे देखा और यकीनन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रुचि बढ़ेगी। देश के संासदों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इस बात को अनुभव किया कि अन्ना साहेब की देश में एक महानायक की छवि है और उन पर आक्षेप करने का मतलब होगा देश की आंदोलित युवा पीढ़ी के दिमाग में अपने लिये खराब विचार करना इसलिये शब्दों के चयन में सभी ने गंभीरता दिखाई। बहरहाल कुछ सांसदों ने प्रचार माध्यमों पर आंदोलन को अनावश्यक प्रचार का आरोप लगाया पर उन्हें यह भी याद रखना होगा इसी विषय पर हुए विशेष सत्र के बहाने उन्होंने पूरे देश को संबोधित करने का अवसर पाया जिसे इन्हीं प्रचार माध्यमों ने अपने समाचारों में स्थान दिया। यह अलग बात है कि इस दौरान उनके विज्ञापन भी अपना काम करते रहे। वैसे तो संसद की कार्यवाही चलती रहेगी पर इस तरह पूरे राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर सांसदों के पास बहुत समय बाद आया। उनको इस बात पर भी प्रसन्न होने चाहिए कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र को संबोधित न करने के कारण जनप्रतिनिधियों पर देश के जनमानस की उपेक्षा का आरोप लगता है वह इस अवसर के कारण धुल गया क्योंकि उन्होंने देश की इच्छा को ही व्यक्त किया।
         हम जैसे आम लेखकों के पास इंटरनेट और प्रचार माध्यम ही है जिसके माध्यम से विचारणीय सामग्री मिलती है यह अलग बात है कि उसे छांटना पड़ता है। होता यह है कि समाचार पत्र और टीवी चैनल अपनी रोचकता का स्तर बनाये रखने के लिये किसी एक घटना में बहुत सारे पैंच बना देते हैं और फिर अलग अलग प्रस्तुति करने लगते हैं। सामग्री में दोहराव होता है और जब पाठकों और दर्शकों के अधिक जुड़ने की संभावना होती है तो उनके विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं। समस्त प्रचार माध्यम धनपतियों के हाथ में और यही कारण है कि अन्ना साहेब के आंदोलन के प्रायोजन की शंका अनेक बुद्धिमान लोगों के दिमाग में आती है। इसमें कुछ अंश सच हो सकता है पर एक बात यह है अन्ना साहेब एक सशक्त चरित्र के स्वामी हैं।
             आखिरी बात यह है कि भोगी कितना भी बड़ा पद पा जाये वह बड़ा नहीं कहा जा सकता। बड़ा तो त्यागी ही कहलायेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना साहेब ने अन्न का त्याग किया था। पूरे 12 दिन तक अन्न का त्याग करना आसान काम नहीं है। हम जैसे लोग तो कुछ ही घंटों में वायु विकार का शिकार हो जाते हैं। अन्ना साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना लोगों के सामने प्रस्तुत की है जो अभी स्वप्न ही लगता है पर सबसे बड़ी बात वह अभी अपने प्रयास जारी रखने की बात भी कह रहे हैं। मुश्किल यह है कि वह अनशन शुरु कर देते हैं तब आदमी का हृदय कांपने लगता है। यही कारण है कि उनका अनशन टूटना भी ही लोगों में विजयोन्माद पैदा कर रहा है। उन्होंने जिस तरह आज की युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त बनाया उसकी प्रशंसा तो की ही जाना चाहिए जो कि अंततः हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वाहक हैं।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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हिन्दी दिवस पर लेख-अंतर्जाल लेखकों और पाठकों के बीच संपर्क आवश्यक (betweem internet hindi writer and reader contract neccesary-special article on hindi diwas or hindi divas)


           एक बार फिर 14 सितंबर को हिन्दी दिवस आ रहा है। वैसे तो हमें लिखते लिखते पैंतीस वर्ष से ऊपर का समय हो गया है पर पिछले पांच साल से इंटरनेट पर ब्लाग लिखते लिखते अनेक ऐसे अनुभव हैं जिन्होंने समाज के शिखर पुरुषों की उन वास्तविकताओं की अनुभूति करवाई जिनकी पहले कल्पना ही हम करते थे।  मूल बात यह है कि शिखर पुरुष हिन्दी में कला, साहित्य, पत्रकारिता था अन्य रचना क्षेत्र में अपने साथ लेखक को चाटुकारित की कीमत पर अपने साथ जोड़ना चाहते हैं।  नतीजा यह है कि उनके ऐजेंडे पर लिखने वाले लिपिक तो मिल जाते हैं पर स्वतंत्र लेखक उनकी तरफ झांकते भी नहीं है। 

         हिन्दी दिवस पर हम बहुत लिख चुके पर लगता है कि फिर भी कुछ छूट रहा है। आज हमारे बीस ब्लाग का समूह अनुमान के अनुसार एक दिन आठ हजार पाठक/पाठक संख्या को पार कर गया। जिस गति से यह चल रहा है नौ हजार तक पहुंचने की भी संभावना लगती है। यकीनन यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। करीब करीब सभी ब्लाग अपने पुराने कीर्तिमानों से बहुत आगे निकल रहे हैं। सच कहें तो हिन्दी के साथ कोई भी शब्द जोड़कर इंटरनेट पर मातृभाषा में पढ़ने वाले आज के लोग हमसे अधिक भाग्यशाली हैं कि उन्हें कुछ पढ़ने को मिल जाता है। हम हिन्दी ब्लाग लेखक मिलों और पाठकों से कुछ कहना चाहते हैं पर क्या? लिखते लिखते कुछ भी लिख जायेंगे। यकीन मानिए वह निरर्थक नहीं होगा। आज मौका अच्छा लगता है क्योंकि हिन्दी दिवस कोई रोज रोज थोड़े ही आता है। कल से संख्या फिर सिमटने लगेगी।

         इंटरनेट खोलने पर पांच साल पहले हमें निराशा हाथ लगती थी। कुछ लिखा नहीं मिलता था। ब्लाग मिला तो लिखना इसलिये नहीं शुरु किया कि किसी को पढ़ाना है बल्कि आत्म संतुष्टि का भाव था। स्वतंत्र रूप से लिखने का भाव! यह अलग बात है कि प्रायोजित हिन्दी बाज़ार हम जैसे इंटरनेट लेखकों को प्रयोक्ता मानता है। यह हम अपने पाठकों को बता दें कि आतंकवाद को एक व्यापार मानने का सिद्धांत इसी ब्लाग समूह पर दिया गया। यह भी माना गया है कि भारत में हो या भारत से बाहर विश्व का आतंकवाद बाज़ार समूहों के धन से प्रायोजित हो सकता है जो अपनी अवैध गतिविधियों से जनता और राज्य का ध्यान बंटाने के लिये करते हैं। देश में गरीबी और भ्रष्टाचार है यह सच है! जनता में आक्रोश है यह भी छिपा हुआ नहीं है, मगर गोलियां और बम खरीदने की क्षमता हमारे आम लोगों में नहीं है। भूखे बंदूक उठायेंगे यह सिद्धांत हमेशा धोखा लगता रहा है। अब छत्तीसगढ़ में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के नक्सलियों को आर्थिक मदद देने के आरोप लगने से यह प्रमाणित हो गया है। इस पर अनेक बहसें इंटरनेट पर हुईं। जब हमने आतंकवादियों के आर्थिक स्तोत्रों के बारे में प्रश्न उठाया तो कोई जवाब नहीं दे सका। अनेक सुधि टिप्पणीकारों ने इसका समर्थन कर अनेक उदाहरण भी दिये कि किस तरह जिस क्षेत्र में आतंकवाद है वही अवैध काम भी अधिक होते है।
         हम यहां स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं कि आप देश के जिन भी अंग्रेजी और हिन्दी के नामी लेखकों, बुद्धिजीवियों के साथ बहसकर्ताओं को टीवी या समाचार पत्रों में देखते सुनते हैं वह कहीं न कहंी इंटरनेट लेखकों की नयी धारा से प्रभावित होकर अपना नाम कर रहे हैं। वह हमारा नाम नहीं देते। गांधी जी को नोबल न मिलने का मामला हो या ओबामा को नोबल मिलने वाला मजाक या आतंकवाद को व्यापार मानने का सिद्धांत हो, इन विषयों पर इस लेखक के पाठ और विचार प्रचार माध्यमों में दिखाई दे रहे हैं। क्रिकेट को खेल की बजाय व्यापार मानने की बात अब अनेक लोग स्वीकारने लगे हैं। हम यहां साफ बता दें कि आप अगर नये विचार और नया चिंत्तन पढ़ना चाहते हैं तो इस समूह का कोई ब्लाग अपने यहां ईमेल का पता दर्ज कर मंगा लें। अन्ना हज़ारे का आंदोलन हो या बाबा रामदेव का अभियान, इन पर हमारी राय आम धारा से मेल नहीं खाती। कुछ पाठक नाराज होते हैं पर कुछ सराहते हैं। सच बात तो यह है कि हम दबी जुबान में लिखते हैं क्योंकि यहां आम पाठकों से कोई समर्थन नहीं है। अगर पाठकों से प्रोत्साहन हो तो शायद हम किसी की परवाह नहीं करें। अगर हमारे किसी ब्लाग के दस हजार पाठक प्रतिदिन हो जायें तो हम ऐसा लिखें कि देश के नामीगिरामी बाज़ार से प्रायोजित बुद्धिजीवी दांतों तले उंगलियां दबा लें। अधिक पाठक होने पर ं वह हमारे पाठ और विचार अपने नाम करने के प्रयास भी नहीं करेंगे।
     दूसरी बात यह है कि आम पाठक एक बात ध्यान रखें कि इंटरनेट पर ब्लाग लिखने वाले हम जैसे स्वतंत्र लेखकों को एक भी पैसा नहीं मिलता। बल्कि साढ़े छह सौ जेब से जाते हैं। स्वयंभू लेखक और संपादक है जिसके पास इस रूप में एक पैसा भी नहीं आता। ऐसे में पाठकों को अधिक से अधिक टिप्पणियां करना चाहिए। दूसरी बात लेखक के नाम की चर्चा अवश्य दूसरी जगह करना चाहिए ताकि उनका प्रचार हो। ऐसा कर वह इंटरनेट लेखकों के ऐसे वर्ग का निर्माण वह करेंगे जो बाज़ार और प्रचार समूहों के बड़े बड़े बुद्धिजीवियों की हवा निकाल देगा। अगर हिन्दी के पाठक चाहते हैं कि इंटरनेट पर हिन्दी में मौलिक, तयशुदा विचाराधारा से प्रथक तथा स्वतंत्र लेखन से सुजज्जित सृजन हो तो उन्हें टिप्पणियों अवश्य करना चाहिए।
         हिन्दी के आम पाठक शायद इस बात को मजाक समझेंगे पर यह सत्य है कि जिन लोगों का बौद्धिक व्यवसाय संगठित प्रचार माध्यमों पर-टीवी, समाचार पत्र, फिल्म तथा साहित्य प्रकाशन-आधारित है वह इस इंटरनेट से प्रभावित होकर सृजन कर रहे हैं। वह यहां के लेखकों का नाम नहीं देते तो केवल इसलिये कि उनको पता है कि देश में बहुत कम आम पाठक इस बात को जानेंगे कि हमने अपना नवीनतम विचार कहां से लिया है? अगर पाठक यहां इंटरनेट लेखकों से संवाद बनायेंगे तो उनको अनेक महत्वपूर्ण रचनायें पढ़ने को मिल सकती हैं। पाठकों की अधिक सक्रियता यहां के लेखकों की कवितायें और कहानियों की चोरी रोकने में सहायक होगी। आम पाठक को यह बात याद रखना चाहिए कि यहां के लेखक भी उनकी तरह आम हैं। उनकी रोजी रोटी का आधार भी आम आदमी की तरह है पर यहां लेखन केवल स्वांत सुखाय है। इस सुख में उनको भागीदार बनना है। यह टिप्पणी कर प्राप्त किया जा सकता है।
        हिन्दी दिवस पर पता नहीं क्या लिखना था क्या लिख गये? मगर जो लिखा डूबकर लिखा। इंटरनेट पर लिखने का अपना एक अलग मजा है और अनुभव है। इतना बड़ा लेख लिखा यह जानते हुए भी कि इसके पाठक होंगे। इससे अच्छा तो बेतुकी, और व्याकरण से पैदल कवितायें लिखना ठीक रहता जो लेखों से अधिक हिट होती हैं। लोग कहते हैं कि यह कविता नहीं है, यह गज़ल नहीं है यह गीत नहीं है पर इतना सब मानते हैं कि उसमें कथ्य जोरदार है। इंटरनेट पर हम कविता जब लिखते हैं तो मुख्य विषय कथ्य होता है। यह हैरानी की बात है कि कवितायें सुनना या पढ़ना आमजीवन में लोग पसंद नहीं करते पर कथ्य जोरदार हो तो इंटरनेट पर उनका नजरिया बदल जाता है। हमने ब्लागों का अवलोकन किया तो पाया कि अध्यात्मिक लेखों के बाद पाठकों की पसंद कवितायें ही रही हैं। बहरहाल इस हिन्दी दिवस पर इस लेख में इतना ही। इस अवसर पर पाठकों और साथी ब्लाग लेखक मित्रों को बधाई।
इस हिन्दी दिवस अवसर पर शपथ लें कि
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1.शुद्ध हिन्दी बोलेंगे। उसमें उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का मिश्रण नहीं करेंगे।
2.इंटरनेट पर हिन्दी की रचनाऐं ही ढूंढेंगे।
3.ऐसे लेखकों को हतोत्साहित करेंगे जो हिन्दी में उर्दू और अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण कर अपनी श्रेष्ठता झाड़ते हैं।
शेष फिर कभी
दीपक भारतदीप
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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