तुलसीदास के दोहे-मनुष्य मोर के समान हो गए हैं


मनोरंजन व्यवसायियों के पैसे से निर्मित फिल्म और टीवी धारावाहिकों में युवा हृदयों के आपसी मेल मिलाप को ही इश्क, प्रेम और लव बताकर उनके दिमाग का हरण कर लिया गया है। एक तो हमारे देश में वैसे  गर्मी की प्रधानता के कारण काम का प्रभाव अधिक माना जाता है, दूसरे अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के कारण अध्यात्म ज्ञान का अभाव है ऐसे में वैसे भी लोगों को भरमाना आसान है।  उस पर मनोरंजन के नाम पर टीवी और फिल्मों के काल्पनिक कथानकों को इस तरह  रूप इस तरह बताया जाता है कि  वह सच लगें।  लोग यह नहीं समझ पा रहे कि कैसे उन पर अज्ञानता, असहिष्णुता तथा अंसवेदनशीलता का भाव बढ़ाने के साथ ही आधुनिकता के नाम पर अंधविश्वास थोपा जा रहा है।  अगर हम तुलसीदास का साहित्य देखें तो समाज उस समय भी लगभग वैसा ही था। यह अलग बात है कि उस समय पथभ्रष्ट करने वाले साधन बहुत कम थे।  उस पर संतों तथा कवियों के प्रभाव के चलते भटकाव कम था।  अब तो खुली आजादी है।

        मनोरंजन का व्यवसाय अब विशाल रूप धारण कर चुका है। लोगों के सामने कल्पित कथाओं के साथ  महिलाओं के सौंदर्य के साथ ही पुरुषों की आक्रामकता का प्रदर्शन इस तरह किया जाता है जैसे कि कोई सत्यता बखान कर रहे हों। नये लड़के लड़कियां उनके दृश्यों के प्रभाव में बहकर अपनी हानि करते हैं।

संत प्रवर तुलसीदास कहते हैं कि

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हृदयं कपट  वर वेष धरि, बचन कहहिं गढ़ि खोलि।

अब के लोग मयूर ज्यों, क्यों मिलए मन खोलि।।

      सामान्य हिन्दी भाषा में  भावार्थ-अनेक लोग हृदय में कपट रखते हुए सुंदर वेष धारण कर मीठे वचन बोलते हैं। आजकल के लोग मोर के समान हो गये हैं जिनसे खुलकर मिलना कठिन है।

माखी काक उलूक, दादुर से भए लोग।

भले ते सुक पिक मोर से, कोउ न प्रेमपथ जोग।।      

         सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-आजकल के लोग मक्खी, कौऐ, उल्लू, बगुले और मेंढक की तरह हो गये हैं। मोर की तरह लोग सुंदर लगते हैं पर प्रेम का मार्ग कोई नहीं जानता। 

      प्रेम दृश्यों की आड़ में धन पाने, प्रतिष्ठा बढ़ाने  तथा प्रदर्शन कर अपने अंदर श्रेष्ठ कहलाने वाले अहं भाव को शांत करने की  प्रवृत्ति समाज में बढ़ाई जा रही है। मनोरंजन के व्यवसायी उसका नकदीकरण कर रहे हैं।  उससे समाज में आर्थिक तनाव भी बढ़ा है। सबसे बड़ी बात तो पाखंड अत्यंत हो गया है।  लोग फिल्मी अंदाज में वेश धारण करते हुए मधुर व्यवहार करते हुए इसलिये अपने संपर्क में आने वाले लोगों से व्यवहार करते हुए भी उन पर सहजता से विश्वास न करें।  आजकल लोग तरह तरह के स्वांग करने लगे है इसलिये जीवन में सावधानी रखना आवश्यक है।

 

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior

http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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