हिंदी दिवस पर लेख-समाज की असहिष्णुता रोकती है अभिव्यक्ति की आज़ादी


         इधर हिन्दी दिवस आने वाला है और उधर देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस चल रही है। किसी एक कार्टूनिस्ट को कथित रूप से देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। इससे भारतीय बौद्धिक जगत में उत्तेजना का प्रचार पूरे देश के टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में हो रहा है। भारत के अंग्रेजी छाप बुद्धिजीवी याचक बनकर अभिव्यक्ति की आजादी का नारा लगा रहे हैं तो उनके अनुयायी हिन्दी विद्वान भी उनके पीछे हो लिये हैं। हिन्दी के लेखक और विद्वानो की त्रासदी यह है कि वह अंग्रेजी की सामग्री का अनुवाद कर लिखें तो कोई बात नहीं पर वह तो सोच का भी अनुवाद अपने मस्तिष्क करते हैं। वह ऐसे ही सोचते हैं जैसे कि अंग्रेजी वाले उनके लिये प्रेरक ढांचा बनाते हैं। इसका कारण यह है कि प्रतिष्ठित हिन्दी लेखक और विद्वान अपने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर सोचते और लिखते हैं। अंग्रेजी भाषा हो प्रवृत्ति हमें गुलामी की तरफ ले जाती है इसलिये हिन्दी वाले केवल नारे लगाते हुए रह जाते हैं।
         इस विषय पर लिखने का मन नहीं था। कारण यह कि हमारे लेख जिस तरह चुराये जाते हैं उससे सदमा लगता है। प्रकाशन तथा प्रसारण माध्यमों में स्थापित विद्वान और लेखक हम जैसे अप्रसिद्ध लेखकों के विचार चुराकर भी लिखते हैं। खैर, यहां हिन्दी में अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में नहीं लिखा जा रहा है। लिखने और बोलने वालों को आजादी दो यह नारा नहीं लगाया जा रहा है। हम तो यहां स्पष्ट रूप से यह कहना चाहते हैं कि आम आदमी की निजता का सम्मान होना चाहिए। अभी हाल ही में पंजाब में एक लड़की को पुलिस वालों ने पूछताछ के लिये रोका उसके साथ लड़का था। उसी समय एक टीवी चैनल के दल ने अपनी सनसनीखेज खबर बनाने के लिये अपना कैमरा वहां लगा दिया। लड़की ने कैमरे का विरोध किया पर चैनल वाले नहीं माने। वह लड़की वहां से भागती चली गयी और कुछ देर बाद ही उसने रेल से कटकर आत्महत्या कर ली। यह उस आम लड़की की निजता पर प्रहार था जिसे किसी हालत में भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहां अभिव्यक्ति की आजादी पर वही लोग प्रहार करते दिखे जो आज उसकी याचना के लिये नारे लगा रहे हैं। आजकल लड़के लड़के परेशान हाल हैं। ऐसे में अगर उनमें कोई आपस व्यक्तिगत तालमेल बनता है तो यह उनकी निजी अभिव्यक्ति है। उनका पीछा करना अभिव्यक्ति पर प्रहार है। अलबत्ता प्रचार माध्यमों को सार्वजनिक विषयों, संगठनों और व्यक्तियों पर सभ्यता के दायरे में की गयी टिप्पणियों से रोकना नहीं चाहिए। दूसरी बात यह कि जो सार्वजनिक क्षेत्र में – जिसमें निजी कंपनियां, संगठन तथा कला साहित्य से जुड़े लोग भी शामिल हैं-उन लोगों को अपने अंदर सहिष्णुता पैदा करने का प्रयास करना चाहिए। उनका मजाक भी बन सकता है और निंदा भी हो सकती है। समर्थन पर प्रसन्नता दिखाने के साथ ही विरोध का तार्किक प्रतिकार का सामार्थ्य हो तो ही सार्वजनिक क्षेत्र में आयें नहीं तो घर बैठकर निजी उद्यम कर अपना जीवन निर्वाह करें।
               देश के हर नागरिक को देश के झंडे, संविधान, न्यायपालिका तथा महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों को सम्मान से देखना चाहिए यह बात ठीक है मगर यह भी सच है कि जो व्यक्ति जिस विषय से प्रसन्न होता है उसकी प्रशंसा करता है जिससे अप्रसन्न होता है उसे गालियां देता है या मजाक बनता है। हम जैसे लोग देश के संविधान, झंडे और न्यायपालिका का सम्मान करते हैं क्योंकि हमें इससे अपने परिवार तथा संपूर्ण समाज का हित होता दिख रहा है मगर जिनको इससे अपना या समाज का हित नहीं दिखता उनका क्या? हम जैसे लोग उनकी मजाक की निंदा करेंगे उनको विरोध में तर्क देंगे पर यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनके खिलाफ कोई दैहिक या मानसिक प्रताड़ना वाली कार्यवाही हो। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोग सभी को प्रसन्न नहीं रख सकते। संविधान सभी के हित की बात करता है पर इतने बड़े देश में ऊंच नीच होता रहता है। न्यायाधीश लोग सबूत के आधार पर निर्णय देते हैं। ऐसे में उनके निर्णयों में किसी को गुण तो किसी को दोष भी दिख सकता है। जिसके पक्ष में फैसला आता है वह प्रसन्नता से सत्यमेव जयते बोलता है और जिसके विपक्ष में आता है वह असत्यमेव जयते की दुहाई देता है। चाहे कुछ भी यह उसकी अभिव्यक्ति है। उसे सहजता से बहते देना चाहिए।
           यह आजादी का प्रश्न नहीं है वरन् असंतुष्ट आदमी की अभिव्यक्ति रोकना ही अपने आप में अनुचित कार्य है।
कहने का अभिप्राय यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों को आमजनों में अपने समर्थन तथा विरोध के साथ ही मजाक सहन करना पड़ सकता है। ऐसी मनस्थिति के लोग ही सार्वजनिक क्षेत्र में आकर काम करें, कंपनियां बनायें या कला साहित्य से जुड़ी समितियां उनको अपने अंदर सहिष्णुता पैदा करना होगी। यह बात कोई विद्वान नहीं कह पा रहा है। इसका कारण यह कि हिन्दी जगत में प्रायोजित लोगों की भरमार है और उनसे ऐसी अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। बहरहाल हिन्दी पखवाड़ा प्रारंभ हो चुका है और आगे भी इस विषय पर हम लिखेंगे।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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