संगम और मेले अंधविश्वास नहीं होते-हिन्दी लेख


कई लोगों को काम धंधे से फुरसत नहीं मिलती या फिर किसी के पास पैसा नहीं होता कि वह जाकर मकर संक्रांति, सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण के अवसर पर पवित्र नदियों में जाकर स्नान करे। अनेक लोग हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और इलाहाबाद नियमित रूप से घूमने जाते हैं पर जब इन शहरों में कुंभ लगता है तो भीड़ के कारण घर ही बैठे रह जाते हैं। कुछ लोग धर्म और विश्वास की वजह से तो कुछ लोग इस भौतिक संसार का आनंद लेने के लिये ही देश में फैली परंपराओं को निभाते हैं जिनको कुछ लोग अंधविश्वास कहते हैं।
पूरे विश्व में श्रीमद्भागवत गीता को हिन्दुओं का ग्रंथ माना जाता है और उसकी उपेक्षा भी की जाती है। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि सारे संसार का ज्ञान, विज्ञान और मनोविज्ञान उसमें समाया हुआ है। इतना ही नहीं श्रीमद्भागवत गीता को ‘सन्यास’ की तरफ प्रवृत्त करने वाली मानने वालों को पता ही नहीं है कि वह निर्लिप्ता का अभ्यास कराती है न कि विरक्ति के लिये उकसाती है। श्रीगीता में सांख्यभाव-जिसे सन्यास भी कहा जाता है-को कठिन माना गया है। अप्रत्यक्ष रूप से उसे असंभव कहा गया है क्योंकि अपनी आंखें, कान, नाक तथा अन्य इंद्रियां निचेष्ट कर पड़े रहना मनुष्य के लिये असंभव है और वही सांख्यभाव माना जाता है। अगर हमारी देह में इंद्रियां हैं तो वह सक्रिय रहेंगी। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीगीता में इस संसार में मुुक्त भाव से विचरण के लिये कहा गया है यह तभी संभव है जब आप कहीं एक जगह लिप्त न हों। इसलिये सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के अवसर अनेक अध्यात्मिक ज्ञानी अगर पवित्र नदियों पर नहाने जाते हैं तो उन पर हंसना नहीं चाहिये। दरअसल वह ऐसे स्थानों पर जाकर लोगों में न केवल अध्यात्मिक रुझान पैदा करते हैं बल्कि ज्ञान चर्चा भी करते हैं।

इधर देखने को मिला कि कुछ लोग इसे अंधविश्वास कहकर मजाक उड़ा रहे हैं तो उन पर तरस आ रहा है। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान हर किसी की समझ में नहीं आता और इसलिये यह अधिकार हर किसी को नहीं है कि वह किसी के धाार्मिक कृत्य को अंधविश्वास कहे। अगर कोई पूछता है कि ‘भला गंगा में नहाने से भी कहीं पाप धुलते हैं?’
मान लीजिये हमने जवाब दिया कि ‘ हां!’
तब वह कहेगा कि ‘साबित करो।’
इसके हमारे पास दो जवाब हो सकते हैं उसका मुंह बंद करने के लिये! पहला तो यह कि ‘तुम साबित करो कि नहीं होते हैं।’
दूसरा जवाब यह है कि ‘तुम एक बार जाकर नहाकर देखो, तुम्हें अपने पाप वहां गिरते दिखेंगे।’
एक मजे की बात यह है कि अनेक ऐसे बुद्धिमान लोग हैं जो भक्तों का मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि ‘तुम्हें तो सारा ज्ञान है फिर माया के चक्कर में क्यों पड़ते हो? यह तो हम जैसे सांसरिक लोगों का काम है।

इसका एक ही जवाब है कि ‘अगर यह देह है तो माया का घेरा तो रहेगा ही। अंतर इतना है कि माया तुम्हारे सिर पर शासन करती है और हम उस पर। तुमने पैसा कमाया तो फूल जाते हो पर हम समझते हैं कि वह तो दैहिक जरूरत पूरी करने के लिये आया है और फिर हाथ से चला जायेगा।’
कहने का अभिप्राय है कि देश का हर आदमी मूर्ख नहीं है। लाखों लोग जो मकर संक्रांति और सूर्यग्रहण पर नदियों में नहाते हैं वह हृदय में शुचिता का भाव लिये होते हैं। हिन्दू धर्म में अनेक कर्मकांड और पर्व मनुष्य में शुचिता का भाव पैदा करने के लिये होते हैं। एक बात दूसरी भी कि अपने यहां यज्ञ और हवन आदि होते हैं। अगर हम ध्यान से देखें तो हमारे अधिकतर त्यौहार मौसम के बदलाव का संकेेत देते हैं। मकर संक्रांति के बाद सूर्य नारायण उत्तरायण होते हैं। इसका मतलब यह है कि अब गर्मी प्रारंभ होने वाली है। वैसे हमारे यहां यज्ञ हवन सर्दी में ही होते हैं। इसका कारण यह है कि अग्नि के कारण वैसे ही देह को राहत मिलती है दूसरे मंत्रोच्चार से मन की शुद्धि होती है। अब कहने वाले कहते रहें कि यह अंधविश्वास है।
मकर संक्रांति के अवसर पर तिल की वस्तुओं को सेवन किया जाता है जो सर्दी के मौसम में गर्मी पैदा करने वाली होती है। सबसे बड़ी बात यह है कि हिन्दू धर्म के समस्त त्यौहारों के अवसर सेवन की जाने वाली वस्तुऐं शाकाहारी होती हैं।
कुंभ के दौरान, सूर्यग्रहण और चंद्रगहण के अवसर पर नदियों के किनारे लगने वाले मेले अंधविश्वास का नहीं बल्कि सामुदायिक भावना विकसित करने वाले हैं। अब तो हमारे पास आधुनिक प्रचार साधन हैं पर जब यह नहीं थे तब इन्ही मेलों से धार्मिक, अध्यात्मिक तथा सामाजिक संदेश इधर से उधर प्रेषित होते होंगे। देश में जो संगठित समाज रहें हैं उनमें एकता का भाव पैदा करने में ऐसे ही सामूहिक कार्यक्रमों का बहुत महत्व रहा है।
अब रहा अंधविश्वास का सवाल! इनको अंधविश्वास कहने वाले इनसे मुंह क्यों नहीं फेरते? वह समाज में क्या चेतना ला रहे हैं? कतई नहीं! उनके पास कलम, माईक और कैमरा है इसलिये चाहे जो मन में बकवास है वह कर लें क्योंकि उनका अज्ञान और कमाई का लोभ कोई नहीं दूर सकता। कम से कम श्रीमद्भागवत गीता के संदेश से सराबोर यह समाज तो बिल्कुल नहीं है जो धर्म के नाम पर मिलने वाले आनंददायी अवसर पर समूह के रूप में एकत्रित होता है ऐसी बकवास की परवाह किये बिना। दूसरे यह भी कि श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों को अपना ज्ञान सुनाने का आदेश दिया है। ऐसे में आलोचना करते हुए चीखने वाले चीखते रहें कि यह अंधविश्वास है।’
कहने का तात्पर्य यह है धर्म को लेकर बहस करने वाले बहुत हैं। इसके अलावा हिन्दुओं पर अंधविश्वासी होने को लेकर तो चाहे जो बकवास करने लगता है। मुश्किल यही है कि उनका प्रतिकार करने वाले श्रीगीता का ज्ञान नहीं रखते। हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहां के लोगों के खून में श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान ऐसा रचाबसा है कि वह किसी की परवाह न कर अपने कार्यक्रम में लगे रहते हैं। कम से कम मौत का गम इस तरह नहीं मनाते कि हर बरस मोमबती जलाकर उन पत्थरों पर जलायें जिनसे मुर्दानगी का भाव मन में आता है। हिन्दू पत्थरों के भगवान को पूजते हैं पर याद रहे उसमें जीवंतता की अनुभूति होती है। मृत्यु सभी की होनी है पर उसका शोक इतना लंबा नहीं खींचा जाता है। जीवन लंबा होता है उसके लिये जरूरी है कि आदमी के अंदर जिंदा दिली हो। पत्थरों में भगवान मानकर उसे पूजो तो जानो कि कैसे अपने अंदर सुखानुभूति होती है। नदी में धार्मिक नहाकर देखो तो जानो मन में कैसे आनंद आता है-ऐसी पिकनिक भी क्या मनाना जिसकी थकावट अगले दिन तक बनी रहे। मकर सक्रांति के पावन पर्व पर मन में जो चिंतन आया वह व्यक्त कर दिया क्योंकि कुछ परेशानियों की वजह से वह लिख नहीं पाया। वैसे भी हमारा मानना है कि हर काम समय पर सर्वशक्तिमान की कृपा से ही होता है।

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