रहीमदास के दोहे-अपने मन की बात दूसरे को न बताएं (apne man ki bat-rahim das ke dohe)


रहिमन निज मन की, बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैह लोग सब, बाटि न लैहैं न कोय।।

कविवर रहीम कहते हैं कि मन की व्यथा अपने मन में ही रखें उतना ही अच्छा क्योंकि लोग दूसरे का कष्ट सुनकर उसका उपहास उड़ाते हैं। यहां कोई किसी की सहायता करने वाला कोई नहीं है-न ही कोई मार्ग बताने वाला है।

रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि।
गांठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि को धूरि।

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह जमीन पर पड़ी धूल हवा लगने के बाद चलायमान हो उठती है वैसे ही यदि आदमी की योजनाओं का समयपूर्व खुलासा हो जाये तो वह भी धूल हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दूसरे का दुःख देखकर प्रसन्न होने वालों की इस दुनियां में कमी नहीं है। पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्तियां हर मनुष्य में रहती हैं। इस संसार में भला कौन कष्ट नहीं उठाता पर अपने दिल को हल्का करने के लिये लोग दूसरों के कष्टों का उपहास उड़ाते हैं। इसलिये जहां तक हो सके अपने मन की व्यथा अपने मन में ही रखना चाहिये। सुनने वाले तो बहुत हैं पर उसका उपाय बताने वाला कोई नहीं होता। अगर सभी दुःख हरने का उपाय जानते तो अपना ही नहीं हर लेते।
अपने जीवन की योजनाओं को गुप्त रखना चाहिये। जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हम अपने रहस्य और योजनायें दूसरों को यह कहते हुए बताते हैं कि ‘इसे गुप्त रखना’। यह हास्यास्पद है। सोचने वाली बात है कि जब हम अपने ही रहस्य और योजनायें गुप्त नहीं रख सकते तो दूसरे से क्या अपेक्षा कर सकते हैं।
……………………………..

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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टिप्पणियाँ

  • वन्दना  On अक्टूबर 25, 2009 at 9:40 पूर्वाह्न

    बहुत ही उपयोगी जानकारी……………………शुक्रिया।

  • Anupam  On दिसम्बर 19, 2011 at 12:49 अपराह्न

    thank you!

  • Rupesh Kumar Srivastava  On जनवरी 5, 2012 at 8:36 पूर्वाह्न

    bhut sunder. bhut hi kaam ki baat batai aap ne.

  • BHUWAN SAKLANI  On जनवरी 15, 2012 at 5:24 पूर्वाह्न

    Bahut achcha…

  • ashok chawla  On जनवरी 27, 2012 at 2:26 अपराह्न

    asume……..

  • ब्रह्मानन्द मिश्र  On मई 1, 2012 at 10:57 पूर्वाह्न

    लेखक की यह लाइन बहुत ही अच्छी है कि जब हम अपने ही भावों को गुप्त नहीं रख पा रहे हैं तो जिनसे हम वह बात कह रहे हैं वही उसे कितने देर तक अपने मन में रख सकेगा अर्थात् वह भी किसी न किसी से कहेगा ही।

  • Abdul raheem kahaney khana  On मई 22, 2012 at 5:07 पूर्वाह्न

    Thanks to all !!

  • gurjinder  On जून 5, 2012 at 5:49 पूर्वाह्न

    i like these dohe

  • sukhpreet  On जून 21, 2012 at 1:30 अपराह्न

    yes its really true

  • Sachin gurjar  On जून 23, 2012 at 12:41 अपराह्न

    Very Nice information

  • noopur dubey  On जून 30, 2012 at 5:47 पूर्वाह्न

    haan ye baat sahi hai ki apni yojnaayon ko ya phir apne man ki vyatha hi kyun na ho kisi se nahi kehni chahiye,kyun ki manushya ke mann ko koi nahi jaanta ki wo uss baat ko kis prakar se sunta hai aur kis prakar se doosron se keh sakta hai.

  • Aditya Raj  On अगस्त 9, 2012 at 2:33 अपराह्न

    ye bath sach hai

  • sawan patidar  On अगस्त 21, 2012 at 12:16 अपराह्न

    i like it

  • tahaseeldar singh  On सितम्बर 12, 2012 at 3:23 अपराह्न

    rahim das ji ke dohe mujhe bahut pasnd hai

  • MLGUPTA  On नवम्बर 2, 2012 at 12:26 अपराह्न

    Vartman ki bat ye kai varsho pahle kah gaye , jo ab charitarth ho rahi hay ye vastav may pahunche hue sant they jinhone apne aap ka jeewan us samay jiya or hamare liye likh gaye.

  • SURBHI JAIN  On नवम्बर 15, 2012 at 5:09 पूर्वाह्न

    VERY NICE………………

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