रहिमन निज मन की, बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैह लोग सब, बाटि न लैहैं न कोय।।
कविवर रहीम कहते हैं कि मन की व्यथा अपने मन में ही रखें उतना ही अच्छा क्योंकि लोग दूसरे का कष्ट सुनकर उसका उपहास उड़ाते हैं। यहां कोई किसी की सहायता करने वाला कोई नहीं है-न ही कोई मार्ग बताने वाला है।
रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि।
गांठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि को धूरि।
कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह जमीन पर पड़ी धूल हवा लगने के बाद चलायमान हो उठती है वैसे ही यदि आदमी की योजनाओं का समयपूर्व खुलासा हो जाये तो वह भी धूल हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दूसरे का दुःख देखकर प्रसन्न होने वालों की इस दुनियां में कमी नहीं है। पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्तियां हर मनुष्य में रहती हैं। इस संसार में भला कौन कष्ट नहीं उठाता पर अपने दिल को हल्का करने के लिये लोग दूसरों के कष्टों का उपहास उड़ाते हैं। इसलिये जहां तक हो सके अपने मन की व्यथा अपने मन में ही रखना चाहिये। सुनने वाले तो बहुत हैं पर उसका उपाय बताने वाला कोई नहीं होता। अगर सभी दुःख हरने का उपाय जानते तो अपना ही नहीं हर लेते।
अपने जीवन की योजनाओं को गुप्त रखना चाहिये। जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब हम अपने रहस्य और योजनायें दूसरों को यह कहते हुए बताते हैं कि ‘इसे गुप्त रखना’। यह हास्यास्पद है। सोचने वाली बात है कि जब हम अपने ही रहस्य और योजनायें गुप्त नहीं रख सकते तो दूसरे से क्या अपेक्षा कर सकते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

टिप्पणियाँ
बहुत ही उपयोगी जानकारी……………………शुक्रिया।
thank you!
bhut sunder. bhut hi kaam ki baat batai aap ne.
Bahut achcha…
asume……..
लेखक की यह लाइन बहुत ही अच्छी है कि जब हम अपने ही भावों को गुप्त नहीं रख पा रहे हैं तो जिनसे हम वह बात कह रहे हैं वही उसे कितने देर तक अपने मन में रख सकेगा अर्थात् वह भी किसी न किसी से कहेगा ही।
Thanks to all !!
i like these dohe
yes its really true
Very Nice information
haan ye baat sahi hai ki apni yojnaayon ko ya phir apne man ki vyatha hi kyun na ho kisi se nahi kehni chahiye,kyun ki manushya ke mann ko koi nahi jaanta ki wo uss baat ko kis prakar se sunta hai aur kis prakar se doosron se keh sakta hai.
ye bath sach hai
i like it
rahim das ji ke dohe mujhe bahut pasnd hai
Vartman ki bat ye kai varsho pahle kah gaye , jo ab charitarth ho rahi hay ye vastav may pahunche hue sant they jinhone apne aap ka jeewan us samay jiya or hamare liye likh gaye.
VERY NICE………………