यह प्रकाश पर्व है और इसी दिन लक्ष्मी जी की आराधना खुलकर की जाती है। वैसे तो लक्ष्मी का हर कोई भक्त है पर बाकी दिन आदमी अपने आपको निस्वार्थ और परोपकार में लीन रहने का दिखावा करता है। अवसर मिले तो अध्यात्मिक ज्ञान का भी प्रदर्शन करता है और कहता है कि ‘धन ही सभी कुछ नहीं है’। इससे भी आगे कुछ लोग जो सरस्वतीजी के भक्त होने का भी प्रतिदिन प्रदर्शन करते हैं पर उन सभी को भी ‘लक्ष्मी जी’ के प्रति भक्ति का प्रदर्शन करते हुए संकोच नहीं होता। लक्ष्मी जी की आराधना और बाह्य प्रकाश में व्यस्त समाज में बहुत लोग ऐसे भी हैं जो अंधेरों में आज भी रहेंगे और उनके लिये दीपावली एक औपाचारिकता भर है। जिनके पास लक्ष्मी जी की कृपा अधिक नहीं है-याद रखें लक्ष्मी जी की थोड़ी कृपा तो सभी पर होती है वरना आदमी जिंदा नहीं रह सकता-वह बाह्य प्रकाश करने के साथ उनकी आराधना ऊंची आवाज में करेंगे। लक्ष्मी के साथ जिनपर सरस्वती की भी थोड़ी कृपा है-जिन पर उनकी अधिक कृपा होती है लक्ष्मी जी उनसे दूर ही रहती हैं, ऐसा भी कहा जाता है- वह भी अनेक प्रकार के ज्ञान की बात करेंगे। बाह्य प्रकाश में लिप्त लोगों को आंतरिक प्रकाश की चिंता नहीं रहती जो कि एक अनिवार्य शर्त है जीवन प्रसन्नता से गुजारने की।
अब वह समय कहां रहा जब सारे पर्व परंपरागत ढंग से मनाये जाते थे? आधुनिक तकनीकी ने नये साधन उपलब्ध करा दिये हैं। इधर एक टीवी चैनल पर देखने केा मिला कि एक चीनी पिस्तौल है जो दिखती है तो खिलौना है पर उसमें पड़ी गोली किसी की जान भी ले सकती है। अब कौन वह पुराने प्रकार की पिस्तौल चलाता है जिसमें चटपटी होती थी। इससे भी अधिक बुरा तो यह है कि दीपावली के पर्व पर मिठाई खाने का मन करता था वह अब मर गया है। नकली घी, खोए, शक्कर और दूध के ठिकानों पर प्रशासन शिकंजा कस रहा है। आदमी ऐसी खबरों को देखकर परंपरागत मिठाईयों से दूर होकर अन्यत्र वस्तुओं का उपयोग कर रहा है। एक के बाद एक नकली खोआ पकड़े जाने की खबर मिठाई खाने का उत्साह खत्म कर चुकी हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि दिवाली पर्व से जुड़े भौतिक तत्वों के उपयोग में परंपरागत शैली अब नहीं रही। वैसे तो सारे पर्व ही बाजार से प्रभावित हो रहे हैं पर दिवाली तो शुद्ध रूप से धन के साथ जुड़ा है इसलिये आधुनिक बाजार को उसे अपहृत करने में देर नहीं लगी। अपने देश ही के नहीं बल्कि विदेशी बाजार को भी इससे लाभ हुआ है। सबसे अधिक चीनी बाजार को इसका लाभ मिला है। वहां के बने हुए सामान इस समय जितना बिकते हैं उतना शायद कभी नहीं उनका व्यापार होता। बधाई संदेशो के लिये टेलीफोन पर बतियाते यह एस.एम.एस. संदेश भेजे जायेंगे जिससे संबंद्ध कंपनियों को अच्छी कमाई होगी।
इसके बावजूद दीपावली केवल भौतिकता का त्यौहार नहीं है। एक दिन के बाह्री प्रकाश से मन और विचारों में छाया हुआ अंधेरा दूर नहीं हो सकता। लक्ष्मी जी तो चंचला हैं चाहे जहां चली जाती हैं और निकल आती हैं। सरस्वती की पूर्ण कृपा होने पर लक्ष्मीजी की अल्प सुविधा से काम चल सकता है पर लक्ष्मी जी की अधिकता के बावजूद अगर सरस्वती की बिल्कुल नहीं या बहुत कम कृपा है तो आदमी जीवन में हमेशा ही सबकुछ होते हुए भी कष्ट सहता है। तेल या घी के दीपक जलाने से बाहरी अंधेरा दूर हो सकता है पर मन का अंधेरा केवल ज्ञान ही दूर करना संभव है। हमारे देश के पास धन अब प्रचुर मात्रा में है पर आप देख रहे हैं कि वह किसके पास जा रहा है? हमसे धन कमाने वाले हमें ही आंखें दिखा रहे हैं। चीन इसका एक उदाहरण है। इसका सीधा मतलब यह है कि धन सभी कुछ नहीं होता बल्कि उसके साथ साहस, तर्कशक्ति और मानसिक दृढ़ता और देश के नागरिकों में आपसी विश्वास भी होना चाहिए। दीपावली के अवसर एक दूसरे को बधाईयां देते लोगों का यह समूह वास्तव में दृढ़ है या खीरे की तरह अंदर से दो फांक है? यह भी देखना चाहिये। अपने अहंकार में लगे लोग केवल इस अवसर पर अपने धन, बाहुबल, पद बल था कुल बल दिखाने में लग जाते हैं। आत्म प्रदर्शन के चलते कोई आत्म मंथन करना नहीं चाहता। नतीजा यह है कि अंदर अज्ञान का अंधेरा बढ़ता जाता है और उतना ही मन बाहर प्रकाश देखने के लिये आतुर होता है। यह आतुरता हमें धललौलुप समुदाय का गुलाम बना रही है। स्वतंत्र विचार का सर्वथा अभाव इस देश में परिलक्षित है। देश विकास कर रहा है पर फिर भी अशांति यहां है। लोग यह समझ रहे हैं कि लक्ष्मी अपने घर में स्थाई है। समाज में गरीबों, मजबूरों और परिश्रमी समुदाय के प्रति उपेक्षा का भाव जिस विद्रोह की अग्नि को प्रज्जवलित कर रहा है उसे बाहरी प्रकाश में नहीं देखा जा सकता है। उसके लिये जरूरी है कि हमारे मन में कामनाओं के साथ ज्ञान का भी वास हो ताकि अपनी संवेदना से हम दूसरों का दर्द पढ़ सकें। मनुष्य यौनि का यह लाभ है कि उसमें अन्य जीवों से अधिक विचार करने की शक्ति है पर इसके साथ यह भी जिम्मेदारी है कि वह प्रकृत्ति और अन्य जीवों की स्थिति पर विचार करते हुए अपना जीवन गुजारे। अंतर्मुखी हो पर आत्ममुग्ध न हो। यह आत्म मुग्धता उसी अंधेरे में रहती है जो आदमी अपने अंदर पालता है। इस अंधेरे से लड़ने की ताकत आध्यात्मिक ज्ञान के दीपक में ही है और इसे इस अवसर पर जलाना है।
दीपावली के इस महान पर्व पर अपने साथी ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों और तथा सभी देशवासियों को अपने तले अंधेरा रखने वाले इस लेखक की तरफ से बधाई। सभी के उज्जवल भविष्य की कामना है। हमारे ऋषि मुनि कहते हैं कि जो सभी का सुख चाहते हैं वही सुखी रहते हैं। हमें उनके मार्ग पर चलने का इस अवसर पर संकल्प लेना चाहिए।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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