नीति विशारद विदुर महाराज कहते है कि
अस्तयागात् पापकृतामापापांस्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात्।
शुष्केणार्द दह्याते मिश्रभावात् तस्मात् पापैः सहसंधि न कुर्यात्।।
हिंदी में भावार्थ- दुर्जन व्यक्ति का साथ न छोडने पर निरपराध सज्जन को भी उनके सम्मान ही दण्ड प्राप्त होता है। जैसे सूखी लकड़े के साथ मिल जाने पर गीली भी जल जाती है। इसलिये दुष्ट लोगों की संगत से बचना चाहिये।
दृश्यनते हि महात्मानो वध्यमानाः स्वकर्मभिः।
इद्रियाणामनीशत्वाद राजानो राज्यविभ्रमैः।।
हिंदी में भावार्थ-बड़े बड़े राजा और साधु भी इंद्रियों के वश होकर भोग विलास में डूब जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इंद्रियों पर नियंत्रण करने का उपदेश देना बहुत सरल है पर स्वयं ऐसा कर पाना एक कठिन कार्य है। कहने को भूमि का राजा कितना भी विशाल हृदय और दृढ़ चरित्र का लगता हो पर इंद्रियों का गुलाम तो वह भी होता है। उसी तरह प्रतिदिन अपने भक्तों को निष्काम भाव का संदेश देने वाले साधु भी इंद्रियों के आगे लाचार हो जाते हैं। कहीं सत्संग के लिये पैसे मांगने के लिये सौदेबाजी करते हैं तो कहीं स्वर्ग दिलाने के लिये दान मांगते हैं। इंद्रियों पर राज्य वही कर सकता है जिसके पास तत्व ज्ञान है। केवल यही नहीं वह उसको हमेशा धारण किये रहता है न कि कहीं केवल बधारने के लिये उसका प्रयोग करता है।
कोयले की दलाली में हाथ काले-यह कहावत तो सभी ने सुनी होगी। यही स्थिति पूरे जीवन में ही रहती है। दुष्टों की संगत में रहते हुए अपने सामने संकट आने की आशंका हमेशा रहती है। अतः प्रयास करना चाहिये कि उनकी संगत से दूर रहा जाये। आदमी स्वयं भले ही सचरित्र हो पर अगर वह दुष्टों के साथ रहता है तो उसकी छबि भी उन जैसी बनती है।
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