‘हिरदै जिनके कपटु बाहरहु संत कहाहि।
तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।।
हिंदी में भावार्थ-ऐसे संत जो कि बाहर ने अपने आपको धार्मिक प्रवृत्ति का प्रदर्शित करते हैं पर उनके हृदय में कपट और पाप होता है उनकी तृष्णा ओर कामनाऐं कभी शांत नहीं होती। अंत में उनको बहुत पछताना पड़ता है।
‘जिना अंतरि कपटु विकार है तिना रोइ किआ कीजै।’
हिंदी में भावार्थ-गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार जिनके मन में कपट और विकार हैं उनकी विपत्तियां देखकर उनके साथ सहानुभूति दिखाना व्यर्थ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुनानक देव जी ने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर ही प्रहार नहीं किये बल्कि समाज को मार्गदर्शन करने वाले कथित धार्मिक संतों-जो केवल आजीविका के लिये धार्मिक प्रतीक धारण करते हुए चोला पहन लेते हैं-की नाटकबाजी की भी आलोचना की।
यह सच है कि आम इंसान में लोभ और लालच की प्रवृत्ति होती है पर वह उसकी पूर्ति के लिये अपनी सीमा में नैतिक आधार पर कर्म करता है। इतना ही नहीं अगर उसकी इच्छाऐं और कामनायें पूरी न हों तो वह एक बार उनकी पूर्ति करने का इरादा छोड़ भी देता है क्योंकि वह अकेले होने के कारण अपने उद्ददेश्य की लिये लंबे समय तक संघर्ष नहीं कर सकता। जबकि कथित लोभी और लालची साधु की कभी तृष्णायें शांत नहीं होती फिर उनको अपनी पूज्यता, सम्मान और शक्ति का भ्रम इस कदर ढीठ बना देता है कि वह अपनी इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। उसके लिये उनको अपने ही जैसे लोभी और लालची शिष्यों का भी समर्थन मिलता है। श्री गुरुग्रंथ साहिब की वाणियों से यही संदेश मिलता है किं ऐसे ही कथित ढोंगी और लालची साधुओं से सतर्क रहना चाहिये जो कि इच्छा और तृष्णा की पूर्ति न होने पर एक आम आदमी से अधिक खतरनाक हो जाते हैं।
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